शिक्षक विकास

 

शैक्षिक दखल  : स्‍कूल कुछ हटकर -2 

अंक 11   जनवरी 2018

शिक्षकों को ही अवसर तलाशने होंगे : महेश पुनेठा

स्‍कूल को समुदाय से कैसे जोड़ा जाए : फेसबुक परिचर्चा

पिछले दिनों देश भर में स्‍कूलों में बच्‍चों द्वारा हिंसा किए जाने की घटनाऍं सामने आई हैं। जाहिर है इससे यह सवाल और ज्‍वलंत रूप में सामने आया है कि आखिर ऐसा क्‍यों हो रहा है। इसके लिए जिम्‍मेदार कौन है। क्‍या यह हमारी शिक्षा व्‍यवस्‍था की कमी है ? क्‍या इसके लिए अभिभावक दोषी हैं ? क्‍या समाज की इसमें कोई भूमिका है ? बढ़ते डिजीटल मीडिया का हाथ है?

समाज का विकास उसमें निहित सम्पूर्ण मानवीय क्षमता का कुशलतापूर्वक उपभोग पर निर्भर करता है। समाज में सभी वर्ग के सहयोग के बिना पूर्ण विकास सम्भव नहीं हो सकता है। शिक्षा किसी समाज के चहुँमुखी विकास में सबसे महत्वपूर्ण कारक है। शिक्षा को व्यक्ति की दक्षता बढ़ाने का साधन ही नहीं माना जाता है बल्कि लोकतंत्र में सक्रिय भागीदारी निभाने और अपने सामाजिक जीवन-स्तर में सुधार के लिए भी शिक्षा आवश्यक है। भारत में शारीरिक रूप से चुनौती झेल रहे लोगों की संख्या अधिक है और इनके विकास के बिना देश का पूर्ण विकास संभव नहीं है। भारत की विशिष्ट शिक्षा आयामों में एक महत्वपूर्ण आयाम है-

अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, देहरादून द्वारा प्रकाशित पत्रिका 'प्रवाह' का मई-अगस्‍त,2017 का अंक शिक्षा के परिप्रेक्ष्‍य पर केन्द्रित है। इसमें विभिन्‍न लेखकों के कुल 23 लेख हैं। निश्चित ही यह शिक्षा के परिप्रेक्ष्‍य को समझने में मददगार होगा।

शिक्षा विमर्श के सितम्‍बर-अक्‍टूबर, 2017 अंक में

सम्‍पादकीय * प्रमोद

व्‍याख्‍यान *  शिक्षा का सतत संकट * कृष्‍णकुमार

लेख * रचनावादी शिक्षाशास्‍त्र * वर्जीनिया रिचर्डसन

दिसम्‍बर 2016 में देहरादून के प्रकाशन संस्‍थान ‘समय-साक्ष्‍य’ ने देहरादून लिटरेचर फेस्टिवल का आयोजन किया था। इस आयोजन में एक सत्र बालसाहित्‍य पर भी था। टीचर्स ऑफ इंडिया के हिन्‍दी सम्‍पादक राजेश उत्‍साही ( जो लम्‍बे समय तक एकलव्‍य की बालविज्ञान पत्रिका 'चकमक' के सम्‍पादन से जुड़े रहे हैं) को इस सत्र के लिए बीज व्‍यक्‍तव्‍य देने की जिम्‍मेदारी दी गई थी। इस अवसर पर उन्‍होंने जो वक्‍तव्‍य दिया उसका पाठ नीचे दिया गया है।

पूजा बहुगुणा

इस लेख के माध्यम से मैं अपनी  बेटी के किताबों के साथ बिताए  शुरुआती पल आपके साथ साझा करना चाहती हूँ। मेरी बेटी का नाम शुभावरी है, हम उसे प्यार से शुभा बुलाते हैं।   उसके साथ बिताए शुरुआती साल  और उनसे जुड़ी यादें मेरे लिए सीखने के सुनहरे अवसर लिए हुए थीं। इन्हीं यादों का एक अटूट हिस्सा है शुभा के साथ कहानियों की किताबें पढ़ना।  

प्रतियोगिता के साथ साथ मनोरंजन भी। ये गतिविधि मैंने अपने विद्यालय में बाल दिवस से प्रारम्भ की जिसमें बालिकाओं ने अति उत्साहित होकर भाग लिया और वो भी बिना झिझक के।बच्चों की झिझक को हम शिक्षक ऐसी मनोरंजक प्रतियोगिताएं आयोजित कराकर दूर कर सकते हैं और उनका सक्रिय प्रतिभाग निश्चित कर सकते हैं विद्यालय की गतिविधियों में।

यह सब मानते हैं और जानते भी हैं कि शिक्षकों का क्षमता वर्द्धन होना चाहिए। लेकिन वास्‍तव में उसके मायने क्‍या हैं ? वह कैसे किया जाता है? कैेसे किया जाना चाहिए ? कौन करेगा ? कैसे करेगा ? कब करेगा ? ऐसे तमाम सवाल हैं। इनमें से कुछ का जवाब अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन के सीईओ अनुराग बेहार इस वीडियो में दे रहे हैं। 

कक्षा में जब कोई एक बच्‍चा ऐसा होता है, जो औरों से अलग हो। खासकर तब जब वह शारीरिक रूप से भी औरों से कुछ अलग हो। ऐसे में शिक्षक के लिए एक चुनौती होती है कि वह उसे अन्‍य बच्‍चों के साथ लेकर कैसे चले।

अ‍ंशिका अज़ीम प्रेमजी स्‍कूल, उत्‍तरकाशी की कक्षा 3 की एक ऐसी ही छात्रा है। उसके साथ उसके शिक्षकों तथा सहपाठियों के क्‍या अनुभव रहे हैं, उन्‍होंने उससे क्‍या सीखा है और उसे क्‍या सिखाया है, यह जानने योग्‍य है। आप भी यह कहानी देखें।

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