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शैक्षिक पत्रिका 'पाठशाला - भीतन और बाहर ' में प्रकाशित यह  लेख एक अच्‍छी विषय आधारित कक्षा के बारे में हमारी धारणाओं पर प्रश्‍न उठाता है। हम एक 'अच्‍छी कक्षा' कारे किस प्रकार समझते हैं ?  वे कौन से पहलू हैं जो एक 'अच्‍छी कक्षा' को एक 'सफल विषयी कक्षा' भी बनाते हैं?  दूसरे शब्‍दों में हम इस प्रश्‍न को उठाकर यह सन्‍देश देने का इरादा रखते हैं कि सामान्‍यत: एक अच्‍छी कहलाई जाने वाली कक्षा में विषय आधारित भागीदारी भी हो, ऐसा जरूरी नहीं । इस लेख में उपयुक्‍त की श्रेणी में रखी जाने वाली उन गणितीय कक्षाओं के बारे में चर्चा की है जो गणितीय सोच के विकास में नगण्‍य भूमिका निभाती है।

शैक्षिक पत्रिका 'पाठशाला - भीतर और बाहर' अंक 1 जुलाई, 2018 में प्रकाशित देवयानी भारद्वाज का यह लेख भाषा शिक्षण में कविता की जगह, उसे समझने के नजरिए, कविता को उपयोग में लाए जाने के तौर तरीकों के संदर्भ में स्‍कूली शिक्षक को मदद मिल सके इस दिशा में एक प्रयास है।
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शैक्षिक पत्रिका 'पाठशाला - भीतर और बाहर' अंक 1 जुलाई, 2018 में प्रकाशित यह लेख वर्तमान परिप्रेक्ष्‍य में गुणवत्‍ता के विभिन्‍न आयामों की बात करता है। गुणवत्‍ता के मायने क्‍या हैं ?  क्‍या हर क्षेत्र के लिए गुणवत्‍ता के मानदण्‍ड और उसके एक ही होने चाहिए या क्षेत्र विशेष के हिसाब से इससे फर्क हो सकते हैं ? इन प्रश्‍नों पर विचार नहीं किया जाता। यह लेख शिक्षा और सामाजिक सेवाओं के क्षेत्र में गुणवत्‍ता तय करने के लिएएद्योग जगत के मानदण्‍ड अपनाने के सन्‍दर्भ में विश्‍लेषण प्रस्‍तुत करता है।
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शैक्षिक पत्रिका 'पाठशाला - भीतर और बाहर' अंक 1 जुलाई, 2018 में प्रकाशित भारती पंडित का यह लेख शुरुआती कक्षाओं में भाषा की पढ़ाई में शुद्धता के विषय पर विमर्श करता है। यह शिक्षकों की चिन्‍ता का प्रमुख विषय रहता है। इस चिन्‍ता के चलते बच्‍चों के उच्‍चारण दोष और इसे सुधारने या शुद्ध उच्‍चारण के लिए नाना प्रकार के प्रयास किए जाते हैं। आज ये प्रयास भाषा पढ़ाई के मकसद में बड़ी बाधा के तौर पर देखे जाते हैं। यह आलेख भाषा शिक्षण में उच्‍चारण के विविध निहितार्थों पर विचार प्रस्‍तुत करता है और सवाल उठाता है कि क्‍या उच्‍चारण को एक बहुत बड़ी समस्‍या के रूप में देखा जाना चा

शैक्षिक पत्रिका 'पाठशाला - भीतर और बाहर' अंक 1 जुलाई, 2018 में प्रकाशित  महमूद खान का यह लेख कक्षा में संवाद की महत्‍ताके बारे में है। अपनी पर्यावरण की कक्षा का अनुभव साझा करते हुए वे बताते हैं कक्षा में संवाद बच्चों को सीखने में किस तरह मददगार होता है। लेखक सुकरात को उद्धृत करते हुए संक्षेप में यह बताता है कि संवाद क्‍या है, इसकी प्रक्रिया कैसी हो, प्रन कैसे हों, किन पर विमर्श हो, किन पर नहीं, शिक्षक की क्‍या तैयारी हो, शिक्षक की क्‍या भूमिका हो और बच्चों की इसमें क्‍या जगह हो।

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लर्निंग कर्व हिन्दी अंक 1 दिसम्बर,2009 : विज्ञान शिक्षा पर केन्द्रित अंक

व्यापक मुद्दे
एनसीएफ के तरीके से विज्ञान सीखना * इन्दु प्रसाद
ज्वलंत प्रश्न और उनमें छिपी ज्ञान की लौ * कृष्णन बाल सुब्रह्मणयम
वैज्ञानिक सोच का विकास * दिलीप रांजेकर

समय एक ऐसी अवधारणा है जो मानव द्वारा प्रतिदिन इस्‍तेमाल की जाती है और सम्‍भवत: जानवरों व पौधों के जीवन में भी सहज रूप से इसका इस्‍तेमाल होता है। मुर्गे को पता होता है कि उसे बाँग कब देनी है। फूलों को पता होता है कि उन्‍हें कब अपनी पंखुडि़याँ खोलनी हैं। पेड़ों को पता होता है कब अपने पत्‍ते झड़ाने हैं।

बहुत से बच्‍चों के लिए इबारती सवाल किसी अवरोध की तरह होते हैं। इनमें वे बच्चे भी शामिल हैं जो संक्रियात्‍मक (संक्रियाओं का इस्‍तेमाल कर गणना करना) और प्रक्रियात्‍मक कौशलों में निपुण होते हैं। कई बच्‍चे संकेत शब्‍दों जैसे कुल मिलाकर, अन्‍तर, जोड़ इत्‍यादि की तलाश के आधार पर इबारती सवालों को हल करने का तरीका विकसित कर लेते हैं। लेकिन इस तरीके का महत्‍व बहुत ही सीमित होता है। ऐसे बच्‍चे सवाल हल करने के लिए कौन-सी संक्रिया इस्‍तेमाल करनी है यह जानने के लिए आमतौर पर अनुमान का सहारा लेते हैं। इबारती सवालों से सामना होने पर ऐसे बच्‍चे गणि

क्षेत्रफल और परिमाप मापन के वो रूप हैं जो आमतौर पर रोजमर्रा की कई गतिविधियों में इस्‍तेमाल होते हैं। विशेष तौर पर क्षेत्रफल बहुत ही सहज तरीके से हमारे रोजमर्रा के कार्यों में शामिल होता है। जैसे कि किसी बरतन को ढँकने के लिए किसी प्‍लेट का चयन करते समय, किसी मेज विशेष के लिए इस्‍तेमाल होने वाले मेजपोश के रूप में, एक किताब पर कवर लगाने के लिए कागज की किसी शीट के रूप में आदि। विशिष्‍ट शब्‍दों को जाने बिना भी बच्चे आमतौर पर ऐसे निर्णय लेते हैं जिनमें क्षेत्रफल की समझ सहज रूप से निहित होती है। ऐसे में एक सवाल स्‍वाभाविक रूप से उठता है कि हम किसी भी जगह की सटीक माप क

हम तेजी से बढ़ती हुई एक ऐसी दुनिया में रह रहे हैं जहाँ ऐसा प्रतीत होता है जैसे सभी दिशाओं से बड़ी संख्‍याओं की बमबारी हो रही हो। वैश्‍वीकरण और ज्ञान के विस्‍फोट का धन्‍यवाद, जिसकी वजह से नियमित रूप से हमारा सामना बहुत बड़ी-बड़ी संख्‍याओं से होता है। फिर भी, यहाँ एक प्रासंगिक सवाल यह उठता है कि ‘क्‍या इन संख्‍याओं से होता सामना इन संख्‍याओं के आकार की समझ बनाने का कारण बनता है?’ या फिर यह सम्‍भव है कि इन संख्‍याओं के निरन्‍तर उपयोग के कारण हम इनके आकार को कुछ कम करके आँकते हैं।  क्‍या इन संख्‍याओं से अत्‍याधिक परिचय सही दृष्टिकोण विकसित करने में बाधक है?

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