सभी शिक्षा बोर्ड

पाठशाला भीतर और बाहर अंक 6, दिसम्बर 2020  : अनुक्रम

शिक्षणशास्‍त्र

डॉ. गिफ्टी जोएल

महामारी के इस दौर में बच्चों के साथ सीखने-सिखाने की प्रक्रिया को जारी रखना सच चुनौतीपूर्ण है।  हम भी हाथ-पर हाथ रखकर नहीं बैठना चाहते थे। संस्थागत रूप से सामूहिक समझ के साथ बच्चों के साथ समुदाय में जाकर काम करने की योजना बनी।  छोटे-छोटे समूहों में जाकर बच्चों के साथ काम करने के दौरान यह भी चुनौतीपूर्ण था कि अलग-अलग कक्षाओं के विभिन्न विषयों पर कैसे काम किया जाए। इसलिए गणित और भाषा की आधारभूत संकल्पनाओं पर योजनाबद्ध रूप से काम करने पर सहमति बनी।  लगभग डेढ़ महीने में के काम के दौरान 25 दिन बच्चों के साथ काम हो पाया।

‘शैक्षिक प्रवाह’ अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन द्वारा प्रकाशित होने वाली पत्रिका है जिसका प्रकाशन शिक्षक साथियों और शिक्षा के सरोकारों से जुड़े लोगों को, उनके विचारों और कार्यों को एक सूत्र में बाँधने के उद्देश्य से किया जाता है।  पत्रिका  निशुल्क वितरण हेतु प्रकाशित होती है।  आप सभी के साथ इस पत्रिका के रजत जयन्‍ती अंक को साझा करते हुए हमें बेहद हर्ष है। इस पत्रिका ने नन्हे-नन्हे क़दमों से चलते हुए कई मोड़ों से मुड़ते हुए आज 25 वें पायदान पर कदम रखा है। इस पत्रिका की विशेषता है इसका पूरी तरह से फील्ड के अनुभवों को संजोना। शिक्षक साथियों के अनुभव, चुनौतियाँ, किस्से, प्रक

कोरोना महामारी काल अत्यधिक लम्बा और अनिश्चितकालीन होता जा रहा था। लोग सामान्य स्थिति को देखने के लिए तरसने लगे हैं। हालाँकि काम कुछ समय तक प्रभावित तो रहे मगर हाथ पर हाथ रखकर बैठे रहना प्रगतिशील मानव को अनुकूल कब तक लग सकता है?

काजल अडवाणी

जब लोग मुझसे पूछते हैं कि क्या आज से दस बरस पहले मैं यह जानती थी कि मेरा बेटा पंकज अडवाणी  स्नूकर और बिलियर्ड्स का विश्व चैम्पियन बनेगा, तो मैं कहती हूँ, ‘‘नहीं, जानती तो मैं नहीं थी, लेकिन मुझे विश्वास था कि वह बन सकता है।’’

पाठशाला - भीतर और बाहर

अंक 5 अगस्त 2020 में

परिप्रेक्ष्य

बच्चों के सवाल हल्के मत लीजिए * कालू राम शर्मा

शिक्षकों का अनुभव लेखन : शिक्षक–शिक्षा में जगह और सम्भावनाएँ * अमित कोहली

हिंदी प्रदेशो में संख्यावाचक शब्दों के उच्चारण और लेखन में एकरूपता का अभाव दिखाई देता है। शिक्षा मंत्रालय द्वारा प्रकाशित “ए बेसिक ग्रामर ऑफ मॉडर्न हिंदी” में भी इस एकरूपता का अभाव था। अतः निदेशालय में 5-6 फरवरी ,1980 को आयोजित भाषा विज्ञानियों की बैठक में इस पर गम्भीरतापूर्वक विचार करने के बाद इनका जो मानक रूप स्वीकार हुआ, वह इस प्रकार है।

एक से सौ तक संख्यावाचक शब्दों का मानक रूप
एक, दो, तीन, चार, पाँच।
छह, सात, आठ, नौ, दस।।

ग्‍यारह, बारह, तेरह, चौदह, पन्द्रह।
सोलह, सत्रह, अठारह, उन्नीस, बीस।।

स्वाती सरकार

बच्‍चे घरों में हैं। वे भी स्‍कूल नहीं जा पा रहे हैं। उन्‍हें घर पर रहकर ही पढ़ाई करनी है। तो पर्यावरण अध्‍ययन के लिए कक्षा 3 तथा 4 के विद्यार्थियों को ध्‍यान में रखकर यह वर्कशीट बनाई गई हैं।

पृष्ठ

19212 registered users
7451 resources