भाषा

माध्‍यमिक विद्यालय  में अँग्रेजी शिक्षण की एक कक्षा में शिक्षिका किस तरह सब बच्‍चों को एक ही अभ्‍यास में अलग-अलग तरह शामिल करती हैं, यह उसका एक उदाहरण है। इस वीडियो में समावेशी शिक्षा का भी एक उदाहरण है। एक छात्र जिसके हाथ नहीं हैं, लेकिन वह अपने पैरों से लेखन कार्य करता है और कक्षा की हर गतिविधि में बराबरी से भाग लेता है। 

प्राथमिक भाषा के शिक्षण और पढ़ने-लिखने के कौशल को बच्‍चों में विकसित करने के लिए कहानी सुनाना, गीत, रोल प्ले और नाटक का उपयोग किया जा सकता है। यह वीडियो एेसा ही एक उदाहरण प्रस्‍तुत करता है। ध्‍यान दें कि कक्षा कहाँ लगी है, शिक्षिका बच्‍चों से किस तरह संवाद कर रही है, वह कविता को सुनाते हुए किस तरह से हाव-भाव प्रस्‍तुत कर रही हैं। 

इस इकाई में आप एक कल्पनाशील, भाषा-समृद्ध कक्षा बनाने के सरल परन्तु प्रभावी तरीकों के बारे में जानेंगे, ताकि स्कूली परिवेश में स्वाभाविक बातचीत और लेखन के अलग अलग स्वरूपों के साथ आपके विद्यार्थियों का सम्‍पर्क बढ़ सके।

उत्‍तराखण्‍ड से प्रकाशित होने वाली पत्रिका शैक्षिक दख़ल का नौवॉं अंक (जनवरी 2017) 'पढ़ने की संस्‍कृति' पर केन्द्रित है। बच्‍चों में पढ़ने की आदत किस तरह विकसित होती है या की जा सकती है, उसके सामने क्‍या चुनौतियाँ हैं, उन चुनौतियों से कैसे जूझा जा सकता है। इन सब सवालों पर यह अंक विचार कर रहा है। इसमें प्रकाशित लेखों की निम्‍नलिखित सूची से सामग्री की सघनता का अंदाजा लगाया जा सकता है :

पढ़ने की आदत को आंदोलन बनाने की जरूरत : महेश पुनेठा

अँग्रेजी की प्राथमिक कक्षा के लिए एक शिक्षक द्वारा बनाई गई शिक्षण सामग्री। यह सस्‍ती भी है और प्रभावी भी। आप भी आजमा सकते हैं।

हिन्दी
हिन्दी

पगड़ी पर सर्वेश्‍वर दयाल सक्‍सेना की एक आठ लाईन की छोटी सी कविता है।  यह ऑडियो बताता है कि उसे अलग बच्‍चों के बीच अलग-अलग तरीके से कैसे गाया या गवाया जा सकता है।
यह प्राथमिक कक्षाओं के लिए एक अच्‍छा संसाधन है।

 

बच्चे अक्सर किसी अवधारणा को समझ तो जाते हैं लेकिन जब उसे अपनी स्मृति में तथ्यात्मक रूप से याद रखना हो तो उन्हें विषयवस्तु के दोहरान की आवश्यकता होती है। दोहरान के लिए उन्हें बहुत-सी सूचनाओं को पढ़ना पड़ता है। यह अक्सर बच्चों के लिए नीरसता लिए और बोरियत भरा होता है। अक्सर बच्चों में स्मृति आधारित तथ्यों को याद कराने में शिक्षक को बहुत-सी समस्याओं का सामना करना पड़ता है साथ ही शिक्षक की बहुत-सी ऊर्जा भी खर्च होती है। क्योंकि उनकी एकाग्रता बनाए रखना आसान नहीं होता है।

दिल्‍ली के जवाहरलाल नेहरू विश्‍वविद्यालय में 1978 में कुछ विद्यार्थियों ने मिलकर एक ग्रुप बनाया जिसका नाम रखा - 'प्रतिध्‍वनि'। यह ग्रुप गीत गाता था, तरह-तरह के जनगीत, जन संघर्षों के गीत। इन गीतों में जुल्‍म,बेरोजगारी, अन्‍याय और ऐसी तमाम बातों के खिलाफ गीत शामिल थे। धीरे-धीरे प्रतिध्‍वनि के साथियों ने एक और काम किया। उन्‍होंने अपने गाँवों में गाए जाने वाले गीतों को भी एकत्रित करना शुरू किया। उन्‍हें यह देखकर सुखद आश्‍चर्य हुआ कि उन गीतों में केवल संघर्ष नहीं है, उत्‍सव भी है, उमंग भी है और खुशी भी। 

पृष्ठ

17921 registered users
6752 resources