हरदा

हम शिक्षा को सामाजिक बदलाव का महत्वपूर्ण जरिया मानते हैं। शिक्षा वो जो सोचने-समझने और अभिव्यक्त करने का कौशल विकसित करे। जो रटे रटाए प्रश्न-उत्तरों से हटकर हो, जो ज्ञान को अपने आसपास की दुनिया से जोड़कर देखने की समझ विकसित करे। इसके लिए जरूरी है बच्चों से संवाद हो, उनकी बात सुनी जाए, उनकी राय ली जाए। इसके लिए जरूरी है बच्चों को अहमियत दी जाए, उनसे संवाद हो, उनकी बात सुनी जाए, उनकी राय ली जाए। हमारा यह भी मत है कि वर्तमान स्कूली तंत्र में इसकी गुंजाईश कम है। बच्चों के व्यक्तित्व और शैक्षणिक विकास में खेलों और कलाओं के महत्व को भी हम समझते हैं, साथ ही यह भी जानते हैं कि निर्धन परिवार के बच्चों को स्कूल की किताबों के अलावा अन्य किताबें देखने-पढ़ने को नहीं मिलती हैं। पालकों की गरीबी के अलावा इन मुद्दों पर उनकी अनभिज्ञता भी बच्चों को छोटी-छोटी चीजें जैसे कागज, पेन्सिल, कलर आदि से वंचित रखती है।

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