समावेशी शिक्षा

समाज का विकास उसमें निहित सम्पूर्ण मानवीय क्षमता का कुशलतापूर्वक उपभोग पर निर्भर करता है। समाज में सभी वर्ग के सहयोग के बिना पूर्ण विकास सम्भव नहीं हो सकता है। शिक्षा किसी समाज के चहुँमुखी विकास में सबसे महत्वपूर्ण कारक है। शिक्षा को व्यक्ति की दक्षता बढ़ाने का साधन ही नहीं माना जाता है बल्कि लोकतंत्र में सक्रिय भागीदारी निभाने और अपने सामाजिक जीवन-स्तर में सुधार के लिए भी शिक्षा आवश्यक है। भारत में शारीरिक रूप से चुनौती झेल रहे लोगों की संख्या अधिक है और इनके विकास के बिना देश का पूर्ण विकास संभव नहीं है। भारत की विशिष्ट शिक्षा आयामों में एक महत्वपूर्ण आयाम है-

कक्षा में जब कोई एक बच्‍चा ऐसा होता है, जो औरों से अलग हो। खासकर तब जब वह शारीरिक रूप से भी औरों से कुछ अलग हो। ऐसे में शिक्षक के लिए एक चुनौती होती है कि वह उसे अन्‍य बच्‍चों के साथ लेकर कैसे चले।

अ‍ंशिका अज़ीम प्रेमजी स्‍कूल, उत्‍तरकाशी की कक्षा 3 की एक ऐसी ही छात्रा है। उसके साथ उसके शिक्षकों तथा सहपाठियों के क्‍या अनुभव रहे हैं, उन्‍होंने उससे क्‍या सीखा है और उसे क्‍या सिखाया है, यह जानने योग्‍य है। आप भी यह कहानी देखें।

सरकारी स्‍कूलों में अक्‍सर यह समस्‍या आती है कि उसमें पढ़ने वाले बच्‍चों के अभिभावकों से सम्‍पर्क का क्‍या तरीका अपनाया जाए। कुछ परम्‍परागत तरीके होते हैं। आमतौर पर उन्‍हें ही उपयोग में लाया जाता है। अगर वे सफल नहीं होते हैं, तो मान लिया जाता है कि अभिभावक उनकी बात सुनना नहीं चाहते हैं। लेकिन वास्‍तव में ऐसा होता नहीं है। कई बार बच्‍चे के परिवार के बारे में उसकी पृष्‍ठभूमि के बारे में जानकर भी सम्‍पर्क के तरीके खोजने होते हैं।

यह वीडियो इस बात को रेखांकित करता है।

विद्यालय में हर वर्ग, हर संप्रदाय या हर समुदाय के विद्यार्थियों को बिना किसी भेदभाव के प्रवेश मिलना चाहिए। यह उनका मौलिक अधिकार है। लेकिन इस अधिकार का पालन हो इसकी जिम्‍मेदारी निश्चित ही स्‍कूल नेतृत्‍व की बनती है। यह वीडियो इसी बात को रेखांकित करता है।

माध्‍यमिक विद्यालय  में अँग्रेजी शिक्षण की एक कक्षा में शिक्षिका किस तरह सब बच्‍चों को एक ही अभ्‍यास में अलग-अलग तरह शामिल करती हैं, यह उसका एक उदाहरण है। इस वीडियो में समावेशी शिक्षा का भी एक उदाहरण है। एक छात्र जिसके हाथ नहीं हैं, लेकिन वह अपने पैरों से लेखन कार्य करता है और कक्षा की हर गतिविधि में बराबरी से भाग लेता है। 

दस बरस पहले की बात है। मध्‍यप्रदेश के होशंगाबाद जिले के गाँधीवादी समाजसेवी शम्‍भूनाथ गुप्ता जी ने शिक्षा के मुददे पर एक संवाद कार्यक्रम रखा था। इसमें जाने-माने शिक्षाविद अनिल सद्गोपाल अपना व्याख्यान देने आए थे। यह वक्त था जब ‘राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005’ के दस्तावेज पर देश भर में संवाद और परिचर्चाओं के द्वारा रायशुमारी की जा रही थी। अपनी बात रखते हुए अनिल सदृ गोपाल ने बताया कि गाँधी जी ने कहा था, ‘हमें समाज के ‘अन्तिम आदमी’ तक शिक्षा पहुँचाने का प्रयास करना होगा। दूरदराज के गाँव में रहने वाले ‘दलित परिवार की बेटी’ तक शिक्षा

लर्निंग कर्व : समावेशी शिक्षा अंक में महत्‍वपूर्ण लेख

खण्ड अ : परिदृश्य

समावेश ही आगे बढ़ने का मार्ग है * अंकुर मदान

प्रतिभाशाली बच्चों को शिक्षा का अधिकार * अनिता कुरुप

सिन्थिया स्टीफेन

ऐनी जॉन

दीपिका के. सिंह

मैं एक ऐसे स्कूल में विद्यार्थी होने के अपने अनुभव बाँट रही हूँ जो मुख्यतः मध्यमवर्गीय पड़ोस की जरूरतों को पूरा करता था, और जिसके अधिकांश विद्यार्थियों के माता-पिता एक से उद्यम में लेकिन अलग-अलग भूमिकाओं में लगे होते थे, झाड़ू लगाने से लेकर किसी विभाग के निदेशक तक।

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