समावेशी शिक्षा

विद्यालय में हर वर्ग, हर संप्रदाय या हर समुदाय के विद्यार्थियों को बिना किसी भेदभाव के प्रवेश मिलना चाहिए। यह उनका मौलिक अधिकार है। लेकिन इस अधिकार का पालन हो इसकी जिम्‍मेदारी निश्चित ही स्‍कूल नेतृत्‍व की बनती है। यह वीडियो इसी बात को रेखांकित करता है।

माध्‍यमिक विद्यालय  में अँग्रेजी शिक्षण की एक कक्षा में शिक्षिका किस तरह सब बच्‍चों को एक ही अभ्‍यास में अलग-अलग तरह शामिल करती हैं, यह उसका एक उदाहरण है। इस वीडियो में समावेशी शिक्षा का भी एक उदाहरण है। एक छात्र जिसके हाथ नहीं हैं, लेकिन वह अपने पैरों से लेखन कार्य करता है और कक्षा की हर गतिविधि में बराबरी से भाग लेता है। 

दस बरस पहले की बात है। मध्‍यप्रदेश के होशंगाबाद जिले के गाँधीवादी समाजसेवी शम्‍भूनाथ गुप्ता जी ने शिक्षा के मुददे पर एक संवाद कार्यक्रम रखा था। इसमें जाने-माने शिक्षाविद अनिल सद्गोपाल अपना व्याख्यान देने आए थे। यह वक्त था जब ‘राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005’ के दस्तावेज पर देश भर में संवाद और परिचर्चाओं के द्वारा रायशुमारी की जा रही थी। अपनी बात रखते हुए अनिल सदृ गोपाल ने बताया कि गाँधी जी ने कहा था, ‘हमें समाज के ‘अन्तिम आदमी’ तक शिक्षा पहुँचाने का प्रयास करना होगा। दूरदराज के गाँव में रहने वाले ‘दलित परिवार की बेटी’ तक शिक्षा

लर्निंग कर्व : समावेशी शिक्षा अंक में महत्‍वपूर्ण लेख

खण्ड अ : परिदृश्य

समावेश ही आगे बढ़ने का मार्ग है * अंकुर मदान

प्रतिभाशाली बच्चों को शिक्षा का अधिकार * अनिता कुरुप

सिन्थिया स्टीफेन

ऐनी जॉन

दीपिका के. सिंह

मैं एक ऐसे स्कूल में विद्यार्थी होने के अपने अनुभव बाँट रही हूँ जो मुख्यतः मध्यमवर्गीय पड़ोस की जरूरतों को पूरा करता था, और जिसके अधिकांश विद्यार्थियों के माता-पिता एक से उद्यम में लेकिन अलग-अलग भूमिकाओं में लगे होते थे, झाड़ू लगाने से लेकर किसी विभाग के निदेशक तक।

रितिका चावला

समावेशी शिक्षा में एक जरूरी सवाल : कौन तय करता है कि मेरी जगह कहाँ है?

राम

उर्दू के मशहूर शायर साहिर लुधियानवी ने अपनी किताब ‘‘तलखियाँ’’  की भूमिका में लिखा है : ....

‘‘दुनिया के तजुर्बातों हवादिस की शक्ल में,

रमा कान्त अग्निहोत्री ►इतिहास इस बात का गवाह है कि हमने सदियों से अपने समाज की रचना एक ‘सामान्य व्यक्ति’  की छवि को सामने रखते हुए की है। हम यही समझते हैं कि समाज में अलग-अलग तरह की परेशानी केवल ‘विकलांग’ लोगों को ही होती है। हम यह नहीं सोचते कि किसी-न-किसी अर्थ में, चाहे वह शारीरिक हो या मानसिक,  हर व्यक्ति किसी-न-किसी दृष्टि से विकलांग ही है। क्या कोई भी छोटा बच्चा या बच्ची या कोई भी बुजुर्ग पुरुष या महिला हमारे ‘सामान्य व्यक्ति’ की छवि से कुछ अलग नहीं है?  क्या यह सच नहीं कि हम स

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