शिक्षिका

श्रीमती रूबीना अख्‍तर का कहना है, 'शिक्षण कार्य सदैव बालिकाओं के स्तर के अनुरूप स्वतंत्र वातावरण में प्रेमपूर्ण एवं समयबद्ध होना चाहिए।'

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अमित कुमार

मैना कुमारी कहती हैं, 'मेरा सिद्वान्त है कि बच्चों को उनके स्तर के अनुसार शिक्षा दी जानी चाहिए। शिक्षण कार्य को रुचिकर बनाने के लिए खेल व अन्य गतिविधियों का भी सहारा लिया जाना चाहिए। बच्चों की अधिक से अधिक सहभागिता प्राप्‍त करनी चाहिए। शिक्षण कार्य में बच्चा जितना सक्रिय रहता है, वह उतना ही अधिक सीख रहा है। शिक्षण बाल केन्द्रित होना चाहिए।'

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' जमीनी स्‍तर पर किए गए व्‍यक्तिगत प्रयास पर्याप्‍त नहीं हैं, पर वे फिर भी नितांत आवश्‍यक हैं-आगे बढ़ने के लिए, अपने नियंत्रण की चीजों को बदलने और आशा की किरण को जलाए रखने के लिए। और इस देश में ऐसे आशावान लोगों की कोई कमी नहीं। ' यह अनुभव है अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन के सीईओ तथा अज़ीम प्रेमजी विश्‍वविद्यालय के वॉइस चांसलर अनुराग बेहार का।

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एम.ए. के बाद काम की शुरुआत बतौर एक शिक्षिका के रुप में की थी। मैंने कभी सोचा नहीं था कि शिक्षिका बनूँगी, बस कोई भी नौकरी कर लेने की इच्छा थी। मेरा बचपन राजस्थान के बांदीकुई कस्बे में बीता। पिता वहाँ रेल्वे में मेलगार्ड थे।  माँ भी एम. ए.

‘यहाँ ज्‍यादातर ग्रामीण; गरीब किसान, खेतिहर मजदूर और दिहाड़ी मजदूर हैं। जब मैं इस स्कूल में आई तब यहाँ 37 बच्चे आते थे। स्कूल का समुदाय के साथ कोई समन्‍वय नहीं था। गाँव वाले भी स्कूल के मामले में सहयोग नहीं करते थे और हमसे मिलते-जुलते भी नहीं थे। जाहिर है जब पालक ही जागरूक नहीं हैं तब बच्चों की शिक्षा को लेकर वे कितने सजग होंगे। तो मैंने भी ठान लिया कि जब तक गाँव वालों को स्कूल से जोड़ नहीं लूँगी, तब तक चैन से नहीं बैठूँगी।' यह संकल्‍प था मोटवाड़ा प्राथमिक स्‍कूल की प्रधान शिक्षिका अनुसुइया देवी जैन का।

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जब गाँव में मेरी नियुक्ति हुई तो लोगों के मन में महिला शिक्षिका के प्रति यह धारणा थी कि महिला शिक्षक केवल स्वेटर बुनने, बातें करने में ही रुचि रखती है तथा पुरुषों की अपेक्षा अच्छा शिक्षण नहीं करवाती है। साथ ही महिला होने के नाते उनका पूरा ध्यान अपने घर एवं उससे जुड़ी समस्याओं पर ही लगा रहता है। इसलिए मेरे लिए यह आवश्‍यक हो गया कि मैं लोगों की इस धारणा को बदल सकूँ।

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