शिक्षिका

' अभिभावकों ने ध्यान दिया तो बच्चे अब रोज स्कूल आ रहे हैं। अब उनके पास शिक्षण सामग्री भी होती है। जो स्कूल में आज पढ़ाया वही हम गृहकार्य देते हैं और लगभग सभी बच्चे अपना गृहकार्य करके लाने लगे हैं जो करके नहीं लाते उन्हें हम विद्यालय में करवाते हैं, ऐसा करने से अब बच्चे समझने लगे हैं कि अगर गृहकार्य करके नहीं ले गए तो स्कूल में तो करना ही पड़ेगा। पढ़ने-लिखने में गलती करना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है इसे अभ्यास से सुधारा जा सकता है और इसके लिए हम बच्चों को पढ़ने-लिखने के खूब अवसर किताब, कॉपी व श्यामपट्ट पर देते हैं। जिससे बच्चे एक दूसरे के द्वारा किए गए सही-गलत से ज्यादा समझते हैं और उन्हें सही-गलत का अन्तर ठीक से समझ में आ जाता है। हम बच्चों से अपने अनुभव लिखने को कहते हैं जिसे वे बड़े चाव से लिखते हैं व एक-दूसरे को सही भी करते हैं।'

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प्रधानाध्यापक कहते हैं कि, ‘दिलशाद एक सकारात्मक विचारधारा की शिक्षिका हैं। वे किसी भी कार्य को करने के लिए तत्पर रहती हैं, कभी न नहीं करती हैं। विद्यालय में उनके आने के पश्‍चात विद्यालय के बच्चों की स्थिति में काफी बदलाव आया है।’ बस दिलशाद की इन्ही कुछ खूबियों ने उन्हें अच्छे शिक्षकों के समकक्ष ला खड़ा किया है।

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अमिता के आत्मविश्वास और प्रयासों ने मुझे यह दिलासा दिया कि ऐसे शिक्षक ही वर्तमान शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ ही हड्डी हैं। इनके प्रयासों से ही उस तबके के बच्चे भी शिक्षित होंगे जो आज तक शिक्षा से वंचित थे।

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सविता प्रथमेश

भारत में बालिकाओं की शिक्षा के लिए किए गए प्रयासों के लिए सावित्रीबाई फुले का नाम सबसे पहले आता है।वे स्‍वयं नौ बरस की उमर में विवाहित हो जाने के बावजूद शिक्षा प्राप्‍त कर शिक्षिका बनीं। उन्‍होंने अपने पति ज्‍योतिराव फुले के साथ मिलकर बालिकाओं के लिए एक स्‍कूल की शुरुआत की। माना जाता है कि बालिकाओं के लिए वह पहला स्‍कूल था।

उत्तराखण्ड के राजकीय प्राथमिक विद्यालय नवीन ज्ञानसू उत्तरकाशी की रामेश्वरी लिंगवाल का जुझारूपन देखते ही बनता है। जैसे ही उन्हें किसी बच्चे के बारे में पता चलता है की वह स्कूल न आकर कूड़ा बीन रहा है या भीख माँग रहा है, वे सुबह और शाम नहीं देखतीं बस निकल पड़ती हैं। प्रशासन से उनकी रिहाइश का इंतजाम करवाना हो या उन्हें नहलाना, खिलाना और उन्हें कपड़े पहनाना वे सब करती है...

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इन्‍दु ने कहा,' कि नहीं जैसा भी है,स्‍कूल है। जरूरी नहीं है कि यहाँ मुझे सारी सुविधाएँ मिलें, लेकिन मुझे यहाँ के बच्चों के लिए कुछ करना है। उनको शिक्षित करना है क्योंकि उनके माता-पिता जब उनको इतनी दूर से पढ़ने के लिए भेज सकते हैं तो मैं इनको यहाँ आकर क्यों नहीं पढ़ा सकती। मुश्किलों का क्या है वो तो अच्छे काम में हर किसी के सामने आती रहती हैं।'

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अनिता भारती

उत्‍तराखण्‍ड के उत्तरकाशी जनपद की वादियों में बहुत सारे विद्यालय हैं। उनमें से एक है राजकीय प्राथमिक विद्यालय डामटा में। विद्यालय में 200 बच्‍चे हैं। इन सबको शिक्षा देने की जिम्‍मेदारी एक मात्र शिक्षिका सुश्री विजया रावत पर है। वे इसे एक चुनौती के रूप में लेती हैं और बिना कोई शिकायत किए अपने लक्ष्‍य की ओर अग्रसर हैं। इसमें वे अपने विद्यार्थियों का ही सहयोग लेती हैं। एकल शिक्षक विद्यालयों के लिए यह एक उदाहरण है। अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन जिला संस्‍थान, उत्तरकाशी के साथियों ने सर्व शिक्षा अभियान, उत्तरकाशी के सहयोग से

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