शिक्षक

यहाँ मुद्दा यह नहीं है कि बच्चे कैसे सीखते हैं ? मुद्दा यह है कि  “हम बच्चों को कैसे सिखाते हैं? क्योंकि जब हम शिक्षक इस मुद्दे पर शैक्षिक विद्वता दिखाने का एक पल भी कभी नहीं छोडते कि बच्चे कैसे सीखते हैं ? तो फिर हमारे लिए यह जानना और समझना भी उतना ही जरूरी हो जाता हैं कि हम बच्चों को कैसे सिखाते हैं ?

विद्यालय की अवधारणा में बहुत सारी बातों, विचारों व प्रक्रियाओं को शामिल किया गया है। अक्सर उन पर शिक्षक समाज में हर अवसर पर बात करने के अवसर भी निकाले जाते रहे हैं। विद्यालय की संरचना को और ठोस रूप देने या यूँ कहा जाए, कि विद्यालय के आदर्श स्वरूप को परिभाषित करने को हर शिक्षक तत्पर भी दिखाई देता है क्योंकि शिक्षक तभी शिक्षक है जब विद्यालय है। नहीं तो शिक्षक का अपना कोई स्वरूप समाज में बनता दिखाई नहीं देता। एक समय था जब शिक्षक का स्वरूप समाज में अलग तरह का था। विद्यालय के भौतिक स्वरूप व संसाधनों का इतना महत्व नहीं था

भोपाल में शिक्षकों का रचनात्‍मक मैत्री समूह 'शिक्षक सन्‍दर्भ समूह' नाम से कार्यरत है। इस समूह ने 104 विभिन्‍न शिक्षकों की शैक्षिक यात्रा तथा उनके शैक्षिक अनुभवों को एकत्र किया है। इन्‍हें एड एट एक्‍शन तथा अन्‍य संस्‍थाओं की मदद से एक किताब का रूप दिया गया है। इसका नाम है 'शिक्षकों की शैक्षिक यात्रा'।

किताब की पीडीएफ यहाँ उपलब्‍ध है

 गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पाय,

बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दियो बताये।।।

लर्निंग कर्व हिन्‍दी अंक 14 : जून, 2018 * इस अंक में

खण्‍ड क : परिप्रेक्ष्‍य

शिक्षक-शिक्षा और प्रबन्‍धन : नीति, व्‍यवहार और विकल्‍प * बी.एस. ऋषिकेश

अच्‍छे शिक्षक और ज्ञानार्जन * कृष्‍ण हरेश

कभी बच्चों को विद्यालय के निर्धारित गणवेश में आने को लेकर बाध्य नहीं किया। बच्चे जिस भी प्रकार के कपड़ों में आते, उस पर टीका-टिप्पणी करने की बजाय वे बच्चों के साथ क्या काम करना चाहिए, इस पर ध्यान देते। आरम्भ में जब कोई बच्चा देर से भी (जैसे - लंच के बाद भी) विद्यालय आता तो वे उसे वापिस जाने को नहीं कहते बल्कि वे उसे कक्षा में बैठने की अनुमति देते।बच्चों का पढ़ाने के लिए उन्होंने सीधे पाठ्यपुस्तकों का उपयोग न करते हुए अन्य संसाधनों और गतिविधियों के माध्यम से बच्चों को सिखाने की कोशिश की।

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दिनेश कर्नाटक उत्‍तराखण्‍ड में शासकीय शाला में शिक्षक हैं। वे एक कहानीकार भी हैं। इस नाते वे  शिक्षा और समाज के रिश्‍ते को एक अलग दृष्टि से भी देखते हैं। जब समाज की बात होती है, तो उसकी जो चुनौतियॉं और संकट हैं, वे हमारे सामने आ खड़े होते हैं। दिनेश जी ने इस वीडियो में शिक्षा और समाज के बीच की इन चुनौतियों और संकट को सामने रखने की कोशिश की है। यह वीडियो अपनी बात लोगों तक कैसे पहुँचाई जाए, इसका भी एक उदाहरण है।

यह उनके वीडियो का दूसरा भाग है।

दिनेश कर्नाटक उत्‍तराखण्‍ड में शासकीय शाला में शिक्षक हैं। वे एक कहानीकार भी हैं। इस नाते वे  शिक्षा और समाज के रिश्‍ते को एक अलग दृष्टि से भी देखते हैं। जब समाज की बात होती है, तो उसकी जो चुनौतियॉं और संकट हैं, वे हमारे सामने आ खड़े होते हैं। दिनेश जी ने इस वीडियो में शिक्षा और समाज के बीच की इन चुनौतियों और संकट को सामने रखने की कोशिश की है। यह वीडियो अपनी बात लोगों तक कैसे पहुँचाई जाए, इसका भी एक उदाहरण है।

“बदलाव अथवा परिवर्तन एक बहुत बड़ी स्थिति है, जीवन के हर क्षेत्र में समय के साथ वैचारिक एवं व्यवहारिक बदलाव आते रहते हैं। इन बदलावों का प्रभाव हमारी कार्य शैली मे स्पष्ट दिखाई देता है।’’ ऐसा मानना है राजस्‍थान के टोंक जिले के उनियारा ब्लॉक में पद स्थापित शिक्षक हंसराज जी का।

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यह सब मानते हैं और जानते भी हैं कि शिक्षकों का क्षमता वर्द्धन होना चाहिए। लेकिन वास्‍तव में उसके मायने क्‍या हैं ? वह कैसे किया जाता है? कैेसे किया जाना चाहिए ? कौन करेगा ? कैसे करेगा ? कब करेगा ? ऐसे तमाम सवाल हैं। इनमें से कुछ का जवाब अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन के सीईओ अनुराग बेहार इस वीडियो में दे रहे हैं। 

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