शिक्षक

यह बात अच्छी हो या बुरी, मानव समाजों में स्कूली व्यवस्थाएँ अब स्थापित हो चुकी हैं। घर में ही स्कूलिंग को छोड़ दें तो स्कूल चाहे मुख्य धारा का हो या वैकल्पिक, बच्चे घर और माता-पिता से दूर वयस्कों के एक और समूह के पास जाते हैं, जिन्हें शिक्षक कहते हैं और यहाँ वे एक ऐसी गतिविधि के लिए जाते हैं जिसे हम शिक्षा कहते हैं। स्कूलों में शिक्षा कमोबेश स्पष्ट लक्ष्यों के साथ की जाने वाली गतिविधि है। स्कूलों ने ज्ञानार्जन के इस प्रोजेक्ट के एक बड़े हिस्से को (व्यावसायिक तथा आर्थिक मायनों में) अपने व्यापार के तौर पर ले लिया है। स्कूल व्यक्तियों को भविष्य में किसी पेशे के लिए त

हर युग में शिक्षकों और शिक्षा में उनकी केन्द्रीय भूमिका को मान्यता मिली है। लेकिन समय के साथ शिक्षकों की सामाजिक स्थिति और उनकी भूमिका में जो परिवर्तन आया है उस पर भी सहज ही ध्यान चला जाता है। पहले शिक्षकों को एक निर्विवाद गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त था, जो यह जानते थे कि क्या पढ़ाना है और कैसे पढ़ाना है; लेकिन यह स्थिति बहुत पहले ही समाप्त हो चुकी है।i आज राज्य का आग्रह यह है कि शिक्षक की जवाबदेही के नाम पर शिक्षा में सार्वजनिक निवेश पर अधिकतम लाभ प्राप्त किया जाए जिसका इस्तेमाल शिक्षक की स्वायत्तता को धीरे-धीरे नष्ट करने के लिए किया गया है। राज्य ने शिक्षा की लागत

राजेश कुमार

लुबना अहमद

हम सभी...और वे सब भी अच्छे शिक्षक और शिक्षिकाएँ हैं जो अच्छे विद्यार्थी भी हों...जो हमेशा नई बातें सीखने और विद्यार्थियों के प्रबन्‍धन के नए तरीकों के बारे में जानने के लिए उत्सुक रहते हों। कुछ नया खोजने की यही भावना उन्हें सतर्क और मुस्तैद रखती है और उनके कार्य को दिलचस्प बनाती है।

यहाँ मुद्दा यह नहीं है कि बच्चे कैसे सीखते हैं ? मुद्दा यह है कि  “हम बच्चों को कैसे सिखाते हैं? क्योंकि जब हम शिक्षक इस मुद्दे पर शैक्षिक विद्वता दिखाने का एक पल भी कभी नहीं छोडते कि बच्चे कैसे सीखते हैं ? तो फिर हमारे लिए यह जानना और समझना भी उतना ही जरूरी हो जाता हैं कि हम बच्चों को कैसे सिखाते हैं ?

विद्यालय की अवधारणा में बहुत सारी बातों, विचारों व प्रक्रियाओं को शामिल किया गया है। अक्सर उन पर शिक्षक समाज में हर अवसर पर बात करने के अवसर भी निकाले जाते रहे हैं। विद्यालय की संरचना को और ठोस रूप देने या यूँ कहा जाए, कि विद्यालय के आदर्श स्वरूप को परिभाषित करने को हर शिक्षक तत्पर भी दिखाई देता है क्योंकि शिक्षक तभी शिक्षक है जब विद्यालय है। नहीं तो शिक्षक का अपना कोई स्वरूप समाज में बनता दिखाई नहीं देता। एक समय था जब शिक्षक का स्वरूप समाज में अलग तरह का था। विद्यालय के भौतिक स्वरूप व संसाधनों का इतना महत्व नहीं था

भोपाल में शिक्षकों का रचनात्‍मक मैत्री समूह 'शिक्षक सन्‍दर्भ समूह' नाम से कार्यरत है। इस समूह ने 104 विभिन्‍न शिक्षकों की शैक्षिक यात्रा तथा उनके शैक्षिक अनुभवों को एकत्र किया है। इन्‍हें एड एट एक्‍शन तथा अन्‍य संस्‍थाओं की मदद से एक किताब का रूप दिया गया है। इसका नाम है 'शिक्षकों की शैक्षिक यात्रा'।

किताब की पीडीएफ यहाँ उपलब्‍ध है

 गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पाय,

बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दियो बताये।।।

लर्निंग कर्व हिन्‍दी अंक 14 : जून, 2018 * इस अंक में

खण्‍ड क : परिप्रेक्ष्‍य

शिक्षक-शिक्षा और प्रबन्‍धन : नीति, व्‍यवहार और विकल्‍प * बी.एस. ऋषिकेश

अच्‍छे शिक्षक और ज्ञानार्जन * कृष्‍ण हरेश

कभी बच्चों को विद्यालय के निर्धारित गणवेश में आने को लेकर बाध्य नहीं किया। बच्चे जिस भी प्रकार के कपड़ों में आते, उस पर टीका-टिप्पणी करने की बजाय वे बच्चों के साथ क्या काम करना चाहिए, इस पर ध्यान देते। आरम्भ में जब कोई बच्चा देर से भी (जैसे - लंच के बाद भी) विद्यालय आता तो वे उसे वापिस जाने को नहीं कहते बल्कि वे उसे कक्षा में बैठने की अनुमति देते।बच्चों का पढ़ाने के लिए उन्होंने सीधे पाठ्यपुस्तकों का उपयोग न करते हुए अन्य संसाधनों और गतिविधियों के माध्यम से बच्चों को सिखाने की कोशिश की।

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