बागेश्‍वर

हेमचन्द्र लोहुमी शिक्षण के साथ-साथ प्रभारी प्रधानाध्यापक के रूप में अन्य कामकाज भी देखते हैं। वे बताते हैं कि, 'जब स्कूल खुला था तो यह स्कूल कम और भवन ही ज्यादा दीखता था। इसमें कुछ कमरे थे और एक चारदिवारी। रसोई और कुछ फर्नीचर भी जोड़ लीजिए, तो भी था तो यह भवन ही। इसको एक स्कूल में बदलने की जिम्मेवारी हमारी थी।' जब एक शिक्षक इस तरह से सोचने लगे तो समझिए कि वह सही राह पर है। लेकिन केवल सोचना भर ही काफी नहीं है, उसे अमल में लाना भी जरूरी है।

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