दीवार पत्रिका

मैंने अपनी हिन्दी की कक्षा के लिए कुछ गतिविधियाँ निर्धारित कीं व कक्षा 1 से 5 तक समूह गतिविधियों के हिसाब से तय किए। बातचीत को अपने काम का आधार बनाया व उसे एक संसाधन के तौर पर इस्तेमाल किया।

मैंने अपनी हिन्दी की कक्षा के लिए कुछ गतिविधियाँ निर्धारित कीं व कक्षा 1 से 5 तक समूह गतिविधियों के हिसाब से तय किए। बातचीत को अपने काम का आधार बनाया व उसे एक संसाधन के तौर पर इस्तेमाल किया।

विद्यालयों में बाल मैत्रीपूर्ण वातावरण का निर्माण तथा आनंद के साथ सीखने में दीवार पत्रिका की भूमिका अत्यधिक महत्वपूर्ण होती जा रही है तथा खेल-खेल में शिक्षा की भावना को भी बल मिल रहा है। बहुभाषायी ज्ञान समृद्ध हो रहा है। बच्चों की सृजनात्मक क्षमता विकास व प्रतिभा प्रदर्शन में यह एक महत्वपूर्ण उपकरण बनती जा रही है। विद्यालयों में पठन-पाठन का बड़ा ही मनमोहक वातावरण भी निर्मित होने लगा है। न केवल विद्यार्थियों में अपितु अध्यापकों में भी स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का भाव उत्पन्न हो रहा है। दीवार पत्रिका अभियान से अभिभावकों व समुदाय को भी जोड़ा जा रहा है जिससे वि़द्यालय व समुदाय की दूरी भी कम हो रही है तथा संवाद का बेहतर वातावरण बन रहा है। साथ ही दीवार पत्रिका को पाठ्यक्रम से कैसे जोड़ा जाए, इस दिशा में अनेक कर्मठ अध्यापक काम कर रहे हैं।

हिन्दी

प्रेमपाल शर्मा

यह अंक दीवार पत्रिका पर के‍न्द्रित है

विद्यालय आनन्द घर बनें, ऐसी रचनात्मक सोच लेकर लगभग दो वर्ष पूर्व मैंने कुछ शिक्षकों के साथ मिलकर शैक्षिक संवाद मंच का गठन कर नवाचारी शैक्षिक यात्रा प्रारम्भ की थी। मंच का मानना है कि शिक्षा का अधिकार तथा राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 के सुझावों को अपनाते हुए विद्यालय का परिवेश, बच्चों से मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध, समुदाय का विद्यालय से जुड़ाव, विद्यालय प्रबन्ध समिति की सक्रियता के साथ-साथ प्रजातांत्रिक कक्षाओं में भय, तनाव एवं दण्ड से परे हटकर प्रेम भरा वातावरण बने। बच्चे अपने मन की बात सहज रूप से कह सकें। उनमें अभ

उत्‍तराखण्‍ड के शिक्षक महेश पुनेठा ने अपने विद्यालय के विद्यार्थियों के बीच दीवार पत्रिका पर एक कार्यशाला का आयोजन किया। इस कार्यशाला के अनुभवों को उन्‍होंने विस्‍तार से अपनी डायरी में दर्ज किया है। निश्चित रूप से उनके ये अनुभव अन्‍य शिक्षक साथियों के लिए महत्‍वपूर्ण रिसोर्स हैं। यहाँ प्रस्‍तुत है कार्यशाला के तीसरे और चौथे दिन के अनुभव। कार्यशाला के पिछले दिनों के अनुभव आप इन लिंक पर पढ़ सकते हैं -

उत्‍तराखण्‍ड के शिक्षक महेश पुनेठा ने अपने विद्यालय के विद्यार्थियों के बीच दीवार पत्रिका पर एक कार्यशाला का आयोजन किया। इस कार्यशाला के अनुभवों को उन्‍होंने विस्‍तार से अपनी डायरी में दर्ज किया है। निश्चित रूप से उनके ये अनुभव अन्‍य शिक्षक साथियों के लिए महत्‍वपूर्ण रिसोर्स हैं। यहाँ प्रस्‍तुत है कार्यशाला के तीसरे और चौथे दिन के अनुभव। कार्यशाला के पिछले दिनों के अनुभव आप इन लिंक पर पढ़ सकते हैं -

'घर लौटते हुए प्रधानाचार्य श्री ए0के0 श्रीवास्तव ने कार्यशाला की प्रशंसा करते हुए कहा कि बच्चे के बहुमुखी विकास के लिए गणित या साइंस जैसे विषयों को पढ़कर ही नहीं चलेगा। बच्चों का बाल पत्रिकाओं और साहित्य से भी जुड़ना जरूरी है। रोज एक से रूटीन वर्क से बच्चे ऊब जाते हैं इसलिए कभी-कभी विद्यालय में कुछ हटकर भी होना चाहिए जिससे बच्चों में रचनात्मकता पैदा हो। इस तरह की गतिविधियाँ मोनोटोनस वातावरण को तोड़ कर बच्चों में ताजगी पैदा करती हैं। बच्चों में पढ़ने-लिखने के प्रति लगन पैदा करती हैं। किसी भी संस्थाध्यक्ष की इस तरह की प्रतिक्र

विद्यालय में शिक्षण के लिए नियमित रूप से होने वाली गतिविधियों के अलावा कुछ ऐसा होना भी जरूरी है जो विद्यार्थियों में शिक्षा के प्रति न केवल रुचि जगाए, बल्कि उनमें ऐसे कौशल भी विकसित करे जो उनके जीवन में काम आएं। पर ‘ क्‍या किया जाए’, ‘क्‍यों किया जाए’ और ‘कैसे किया जाए’ यह एक महत्‍वपूर्ण सवाल है। ऐसे सवालों से जूझते हुए उत्‍तराखण्‍ड के शिक्षक महेश पुनेठा ने अपने विद्यालय के विद्यार्थियों के बीच दीवार पत्रिका पर एक कार्यशाला का आयोजन किया। इस कार्यशाला के अनुभवों को उन्‍होंने विस्‍तार से अपनी डायरी में दर्ज किया है। निश्च

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