किताबें

लॉकडाउन में अरविन्‍द गुप्‍ता के साथ एक वेबिनार 'शैक्षिक संवाद' के रूप में आयोजित किया गया। इस पर एक छोटी सी फिल्‍म बनाई गई है।

पूजा बहुगुणा

इस लेख के माध्यम से मैं अपनी  बेटी के किताबों के साथ बिताए  शुरुआती पल आपके साथ साझा करना चाहती हूँ। मेरी बेटी का नाम शुभावरी है, हम उसे प्यार से शुभा बुलाते हैं।   उसके साथ बिताए शुरुआती साल  और उनसे जुड़ी यादें मेरे लिए सीखने के सुनहरे अवसर लिए हुए थीं। इन्हीं यादों का एक अटूट हिस्सा है शुभा के साथ कहानियों की किताबें पढ़ना।  

हम शिक्षा को सामाजिक बदलाव का महत्वपूर्ण जरिया मानते हैं। शिक्षा वो जो सोचने-समझने और अभिव्यक्त करने का कौशल विकसित करे। जो रटे रटाए प्रश्न-उत्तरों से हटकर हो, जो ज्ञान को अपने आसपास की दुनिया से जोड़कर देखने की समझ विकसित करे। इसके लिए जरूरी है बच्चों से संवाद हो, उनकी बात सुनी जाए, उनकी राय ली जाए। इसके लिए जरूरी है बच्चों को अहमियत दी जाए, उनसे संवाद हो, उनकी बात सुनी जाए, उनकी राय ली जाए। हमारा यह भी मत है कि वर्तमान स्कूली तंत्र में इसकी गुंजाईश कम है। बच्चों के व्यक्तित्व और शैक्षणिक विकास में खेलों और कलाओं के महत्व को भी हम समझते हैं, साथ ही यह भी जानते हैं कि निर्धन परिवार के बच्चों को स्कूल की किताबों के अलावा अन्य किताबें देखने-पढ़ने को नहीं मिलती हैं। पालकों की गरीबी के अलावा इन मुद्दों पर उनकी अनभिज्ञता भी बच्चों को छोटी-छोटी चीजें जैसे कागज, पेन्सिल, कलर आदि से वंचित रखती है।

हिन्दी

पढ़ना सीखने में किताबों का खासा महत्‍व होता है। वास्‍तव में किताबों की भूमिका पढ़ना सीखने से पहले ही आरम्‍भ हो जाती है। कक्षा एक और दो के वे बच्‍चे जो अभी ठीक से पढ़ना नहीं सीखे हैं, उनके लिए भी किताबें होती हैं, चित्र वाली किताबें। जिन्‍हें देखकर उन्‍हें लगता है कि किताबें सचमुच में देखे जाने लायक हैं। 

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