विचार और अनुभव

लर्निंग कर्व हिन्दी अंक 1 दिसम्बर,2009 : विज्ञान शिक्षा पर केन्द्रित अंक

व्यापक मुद्दे
एनसीएफ के तरीके से विज्ञान सीखना * इन्दु प्रसाद
ज्वलंत प्रश्न और उनमें छिपी ज्ञान की लौ * कृष्णन बाल सुब्रह्मणयम
वैज्ञानिक सोच का विकास * दिलीप रांजेकर

यह बात अच्छी हो या बुरी, मानव समाजों में स्कूली व्यवस्थाएँ अब स्थापित हो चुकी हैं। घर में ही स्कूलिंग को छोड़ दें तो स्कूल चाहे मुख्य धारा का हो या वैकल्पिक, बच्चे घर और माता-पिता से दूर वयस्कों के एक और समूह के पास जाते हैं, जिन्हें शिक्षक कहते हैं और यहाँ वे एक ऐसी गतिविधि के लिए जाते हैं जिसे हम शिक्षा कहते हैं। स्कूलों में शिक्षा कमोबेश स्पष्ट लक्ष्यों के साथ की जाने वाली गतिविधि है। स्कूलों ने ज्ञानार्जन के इस प्रोजेक्ट के एक बड़े हिस्से को (व्यावसायिक तथा आर्थिक मायनों में) अपने व्यापार के तौर पर ले लिया है। स्कूल व्यक्तियों को भविष्य में किसी पेशे के लिए त

हर युग में शिक्षकों और शिक्षा में उनकी केन्द्रीय भूमिका को मान्यता मिली है। लेकिन समय के साथ शिक्षकों की सामाजिक स्थिति और उनकी भूमिका में जो परिवर्तन आया है उस पर भी सहज ही ध्यान चला जाता है। पहले शिक्षकों को एक निर्विवाद गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त था, जो यह जानते थे कि क्या पढ़ाना है और कैसे पढ़ाना है; लेकिन यह स्थिति बहुत पहले ही समाप्त हो चुकी है।i आज राज्य का आग्रह यह है कि शिक्षक की जवाबदेही के नाम पर शिक्षा में सार्वजनिक निवेश पर अधिकतम लाभ प्राप्त किया जाए जिसका इस्तेमाल शिक्षक की स्वायत्तता को धीरे-धीरे नष्ट करने के लिए किया गया है। राज्य ने शिक्षा की लागत

राजेश कुमार

शिक्षा नीति प्रारूप पर एक नजर : भगवाकरण, असमानता और निजीकरण पर क्या कहता है परामर्श दस्‍तावेज?

अमन मदान

यह लेख नई शिक्षा नीति के प्रारूप पर एक टिप्‍पणी के रूप में पढ़ा जाना चाहिए।

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एक दिन स्टाफ रूम में बैठे हुए प्रथम विश्वयुद्ध के कारणों का विश्लेषण करने में तल्लीन था कि सहसा मेरे सामने वाले मेज पर कुछ गिरने की आवाज़ ने मुझे विचलित कर दिया। मैंने नज़र उठा के देखा तो मैडम ने अपनी किताब जोर से पटक दी थी। उनका चेहरा उतरा हुआ था। हाँ, गुस्सा जरूर था उनके अन्दर लेकिन उससे कहीं ज्यादा उनकी परेशानी उनके चेहरे से झलक रही थी। मैं उनके इस व्याकुल चेहरे को पढ़ने की कोशिश कर ही रहा था कि उन्होंने बड़े व्यथित मन से मुझसे एक प्रश्न पूछा, ‘ सर ! बच्चे मुझसे डरते क्यों नहीं हैं ?’ 

लॉकडाउन में अरविन्‍द गुप्‍ता के साथ एक वेबिनार 'शैक्षिक संवाद' के रूप में आयोजित किया गया। इस पर एक छोटी सी फिल्‍म बनाई गई है।

शैक्षिक दख़ल का जनवरी 2020 का अंक शिक्षा में सामूहिकता पर केन्द्रित है ।

शैक्षिक दख़ल : जनवरी 2020 अंक में

सीखने और मूल्‍य निमार्ण में समूह कार्य * महेश पुनेठा

सीखना एकाकी अथवा सामूहिक प्रक्रिया * फेसबुक परिचर्चा

समूह कार्य एक साझा प्रक्रिया है * अनुपमा तिवाड़ी

पीयर लर्निंग : एक विमर्श * डॉ. केवलानंद कांडपाल

गाँधी जी पर एक महत्‍वपूर्ण फिल्‍म ।

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