विचार और अनुभव

‘शैक्षिक प्रवाह’ अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन द्वारा प्रकाशित होने वाली पत्रिका है जिसका प्रकाशन शिक्षक साथियों और शिक्षा के सरोकारों से जुड़े लोगों को, उनके विचारों और कार्यों को एक सूत्र में बाँधने के उद्देश्य से किया जाता है।  पत्रिका  निशुल्क वितरण हेतु प्रकाशित होती है।  आप सभी के साथ इस पत्रिका के रजत जयन्‍ती अंक को साझा करते हुए हमें बेहद हर्ष है। इस पत्रिका ने नन्हे-नन्हे क़दमों से चलते हुए कई मोड़ों से मुड़ते हुए आज 25 वें पायदान पर कदम रखा है। इस पत्रिका की विशेषता है इसका पूरी तरह से फील्ड के अनुभवों को संजोना। शिक्षक साथियों के अनुभव, चुनौतियाँ, किस्से, प्रक

कोरोना महामारी काल अत्यधिक लम्बा और अनिश्चितकालीन होता जा रहा था। लोग सामान्य स्थिति को देखने के लिए तरसने लगे हैं। हालाँकि काम कुछ समय तक प्रभावित तो रहे मगर हाथ पर हाथ रखकर बैठे रहना प्रगतिशील मानव को अनुकूल कब तक लग सकता है?

पाठशाला - भीतर और बाहर

अंक 5 अगस्त 2020 में

परिप्रेक्ष्य

बच्चों के सवाल हल्के मत लीजिए * कालू राम शर्मा

शिक्षकों का अनुभव लेखन : शिक्षक–शिक्षा में जगह और सम्भावनाएँ * अमित कोहली

शैक्षिक पत्रिका 'पाठशाला - भीतर और बाहर' अंक 1 जुलाई, 2018 में प्रकाशित यह लेख वर्तमान परिप्रेक्ष्‍य में गुणवत्‍ता के विभिन्‍न आयामों की बात करता है। गुणवत्‍ता के मायने क्‍या हैं ?  क्‍या हर क्षेत्र के लिए गुणवत्‍ता के मानदण्‍ड और उसके एक ही होने चाहिए या क्षेत्र विशेष के हिसाब से इससे फर्क हो सकते हैं ? इन प्रश्‍नों पर विचार नहीं किया जाता। यह लेख शिक्षा और सामाजिक सेवाओं के क्षेत्र में गुणवत्‍ता तय करने के लिएएद्योग जगत के मानदण्‍ड अपनाने के सन्‍दर्भ में विश्‍लेषण प्रस्‍तुत करता है।
इसे पूरा पढ़ने के लिए पीडीएफ डाउनलोड करें। लिंक नीचे है।

शैक्षिक पत्रिका 'पाठशाला - भीतर और बाहर' अंक 1 जुलाई, 2018 में प्रकाशित  महमूद खान का यह लेख कक्षा में संवाद की महत्‍ताके बारे में है। अपनी पर्यावरण की कक्षा का अनुभव साझा करते हुए वे बताते हैं कक्षा में संवाद बच्चों को सीखने में किस तरह मददगार होता है। लेखक सुकरात को उद्धृत करते हुए संक्षेप में यह बताता है कि संवाद क्‍या है, इसकी प्रक्रिया कैसी हो, प्रन कैसे हों, किन पर विमर्श हो, किन पर नहीं, शिक्षक की क्‍या तैयारी हो, शिक्षक की क्‍या भूमिका हो और बच्चों की इसमें क्‍या जगह हो।

इसे पूरा पढ़ने के लिए पीडीएफ डाउनलोड करें। लिंक नीचे है।

लर्निंग कर्व हिन्दी अंक 1 दिसम्बर,2009 : विज्ञान शिक्षा पर केन्द्रित अंक

व्यापक मुद्दे
एनसीएफ के तरीके से विज्ञान सीखना * इन्दु प्रसाद
ज्वलंत प्रश्न और उनमें छिपी ज्ञान की लौ * कृष्णन बाल सुब्रह्मणयम
वैज्ञानिक सोच का विकास * दिलीप रांजेकर

यह बात अच्छी हो या बुरी, मानव समाजों में स्कूली व्यवस्थाएँ अब स्थापित हो चुकी हैं। घर में ही स्कूलिंग को छोड़ दें तो स्कूल चाहे मुख्य धारा का हो या वैकल्पिक, बच्चे घर और माता-पिता से दूर वयस्कों के एक और समूह के पास जाते हैं, जिन्हें शिक्षक कहते हैं और यहाँ वे एक ऐसी गतिविधि के लिए जाते हैं जिसे हम शिक्षा कहते हैं। स्कूलों में शिक्षा कमोबेश स्पष्ट लक्ष्यों के साथ की जाने वाली गतिविधि है। स्कूलों ने ज्ञानार्जन के इस प्रोजेक्ट के एक बड़े हिस्से को (व्यावसायिक तथा आर्थिक मायनों में) अपने व्यापार के तौर पर ले लिया है। स्कूल व्यक्तियों को भविष्य में किसी पेशे के लिए त

हर युग में शिक्षकों और शिक्षा में उनकी केन्द्रीय भूमिका को मान्यता मिली है। लेकिन समय के साथ शिक्षकों की सामाजिक स्थिति और उनकी भूमिका में जो परिवर्तन आया है उस पर भी सहज ही ध्यान चला जाता है। पहले शिक्षकों को एक निर्विवाद गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त था, जो यह जानते थे कि क्या पढ़ाना है और कैसे पढ़ाना है; लेकिन यह स्थिति बहुत पहले ही समाप्त हो चुकी है।i आज राज्य का आग्रह यह है कि शिक्षक की जवाबदेही के नाम पर शिक्षा में सार्वजनिक निवेश पर अधिकतम लाभ प्राप्त किया जाए जिसका इस्तेमाल शिक्षक की स्वायत्तता को धीरे-धीरे नष्ट करने के लिए किया गया है। राज्य ने शिक्षा की लागत

राजेश कुमार

शिक्षा नीति प्रारूप पर एक नजर : भगवाकरण, असमानता और निजीकरण पर क्या कहता है परामर्श दस्‍तावेज?

अमन मदान

यह लेख नई शिक्षा नीति के प्रारूप पर एक टिप्‍पणी के रूप में पढ़ा जाना चाहिए।

******

पृष्ठ

18824 registered users
7334 resources