खेल एवं शारीरिक शिक्षा

चूँकि कोरोनो वायरस बीमारी 2019 (COVID-19) के बारे में चर्चा हो रही है। बच्‍चे भी इस बात को लेकर चिंतित हैं कि वे स्‍वयं, उनका परिवार, उनके दोस्‍त इससे बीमार न हो जाएँ। माता-पिता, परिवार के सदस्य, स्कूल के कर्मचारी और अन्य भरोसेमंद वयस्क बच्चों की मदद करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। क्‍योंकि बच्‍चे ऐसा समझते हैं कि उक्‍त सब लोग ईमानदार, सही बात करने वाले हैं और वे उनकी चिंता या भय को कम करते हैं। CDC

अब्‍दुल कलाम

बच्चे अपने परिवेश और आसपास घट रही घटनाओं से निरन्तर कुछ न कुछ सीखते रहते हैं। वे कुछ अनुमान लगाते हैं,स्वयं से अनुभव करते हैं और बड़ों से संवाद करते हुए अपनी समझ को विकसित करते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में उनके भीतर की जिज्ञासा, कौतूहल, आनन्‍द की अनुभूति व मन में उठ रहे प्रश्न उन्हें कुछ नया खोजने की ओर प्रेरित करते हैं।

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21 जून अब दुनिया भर में ' विश्‍व योग दिवस' के रूप में मनाया जाता है। इसे विश्‍व भर में मान्‍यता दिलाने में भारत की भूमिका है। निश्चित ही योग शारीरिक शिक्षा का एक बेहतर अंग हो सकता है। इस वीडियो में शरीर को स्‍वस्‍थ्‍य रखने के लिए कुछ आसान क्रियाएँ सुझाई गई हैं। इसी सीरिज के अगले भागों में बच्‍चों को योग के सरल आसन करने के आसान तरीके समझाए गए हैं।

मैं और मेरे स्कूल के बच्चे रोज क्रिकेट खेलते थे। और लड़कियाँ लंगड़ी और गोटीयाँ खेलती थीं। मैं रोज स्कूल में देखता था कि बच्चे क्रिकेट खेलते और लड़कियाँ देखती रहती हैं। उनका मन तो होता था लेकिन वे लड़कों के साथ कैसे खेलें।

उन्होंने मन में ऐसी धारणा बना ली थी कि हम यह खेल नहीं खेल सकते हैं। मुझे उनके मन से धारणा हटानी थी।

प्रतियोगिता के साथ साथ मनोरंजन भी। ये गतिविधि मैंने अपने विद्यालय में बाल दिवस से प्रारम्भ की जिसमें बालिकाओं ने अति उत्साहित होकर भाग लिया और वो भी बिना झिझक के।बच्चों की झिझक को हम शिक्षक ऐसी मनोरंजक प्रतियोगिताएं आयोजित कराकर दूर कर सकते हैं और उनका सक्रिय प्रतिभाग निश्चित कर सकते हैं विद्यालय की गतिविधियों में।

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ऐसे बच्‍चों के साथ काम करना आसान नहीं होता है, जिनसे आप पहली बार मिल रहे हों। खासकर कार्यशालाओं में।  कुछ भी काम शुरू करने से पहले बच्‍चों के संकोच और झिझक को तोड़ा जाना जरूरी होता है, ताकि वे न केवल एक-दूसरे से वरन् कार्यशाला संचालित कर रहे स्रोत व्‍यक्तियों से भी सहज हो जाएँ। ऐसी कार्यशालाओं को आयोजित करने वाले और उन्‍हें संचालित करने वाले नवाचारी कार्यकर्त्‍ता नए-नए तरीके विकसित करते ही रहते हैं।जानी-मानी शैक्षिक संस्‍था एकलव्‍य में कई सालों तक कार्यरत रहे कार्यकर्त्‍ता कार्तिक शर्मा इनमें से एक हैं। इन दिनों वे स्‍वंतत्र रूप से कार्य कर रहे हैं।

एक बच्‍चा जो साइकिल चलाना सीखना चाहता है। लेकिन उसके पास साइकिल नहीं है। एकलव्‍य द्वारा प्रकाशित बालविज्ञान पत्रिका 'चकमक' के मेरा पन्‍ना कालम में एक बच्‍चे ने अपना यह अनुभव लिखा। इस कहानीनुमा अनुभव को एकलव्‍य ने एक सुन्‍दर चित्रात्‍मक कहानी के रूप में प्रकाशित किया है। इस कहानी को वीडियो के रूप में भी जारी किया है।

प्राथमिक कक्षाओं के बच्‍चों के बीच अभिव्‍यक्ति का महत्‍व बताने के लिए एक उपयोगी संसाधन है।

स्‍कूल में जब कोई नया बच्‍चा आता है तो पुराने बच्‍चों के बीच एक तरह की उत्‍सुकता होती है, उसके बारे में जानने के लिए। कई बार पुराना बच्‍चा अपने आपको अन्‍यों के बीच में अजूबे की तरह पाता है। और संयोग से अगर उसके साथ कुछ और समस्‍या हो या वह शारीरिक रूप से चुनौतीपूर्ण हो तो कहानी कुछ और ही होने लगती है। लेकिन ऐसे में किसी की जिम्‍मेदारी तो बनती है कि वह उसे इस स्थिति से बाहर निकाले। लेकिन कैसे ? इस कहानी में पढ़ें।

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