किसी 'खास' की जानकारी भेजें। सृजन की खिड़कियाँ

राजकीय प्राथमिक विद्यालय अजबपुरकला-1’ का माहौल इतना उन्मुक्त है और बच्चों का आत्मविश्वास इस कदर छलकता है कि बच्चों को आप क्लासरूम में या क्लास के बाहर भी मजे से नाचते-गाते, गीत बनाते देख सकते हैं। किताबों में दर्ज कविताओं पर धुन बनाकर उसे गाते हुए ढफली और ढोलक की थाप पर बच्चों को नृत्य करते हुए आसानी से देखा जा सकता है। ये बच्चे अपने भीतर की तमाम सृजनात्मकता बिखेरने को व्याकुल नजर आते हैं।

इस विद्यालय की प्रधानाध्यापिका कुसुमलता बताती हैं कि ‘वो चिलचिलाती गर्मियों के दिन थे। मैं चौराहे पर सिग्नल हरे होने का इंतजार कर रही थी। तभी कुछ बच्चों का जत्था मेरी गाड़ी घेर लेता है। वो मुझसे कुछ माँग रहे थे...यूँ तो वो भीख माँग रहे थे लेकिन मुझे जाने क्यों लगता है कि भीख माँगना कुछ नहीं होता असल में वो हमसे मदद माँग रहे होते हैं। मेरा मन उदास हो गया। कुछ दिन बाद वो बच्चे फिर नजर आते हैं। अब मैं उदास मन लेकर वापस घर जाने वाली नहीं थी। मैं गाड़ी से उतरकर उनके पास जाती हूँ। उनके बारे में पूछताछ करती हूँ। उनके परिवार वालों से मिलती हूँ। उन्हें अपने स्कूल अजबपुरकला-1 में ले आती हूँ । ये सपेरा बस्ती के बच्चे हैं। इन्हें नहलाना, धुलाना, बाल बनाना, कुछ के बाल तो इतने उलझे कि उन्हें काटकर ही कंघा अन्‍दर जा सकता था। तो खुद कैंची उठाकर बच्चों के बाल काटना...और यह सब करते हुए अपने भीतर थोड़ी तसल्ली महसूस हुई। लेकिन यह चुनौती यहीं समाप्त नहीं हुई। बाहर घूमने वाले बच्चों को अनुशासित होकर क्लास में बैठना भला कैसे अच्छा लगता। कुछ दिन में वो फिर स्कूल से गायब होकर। सड़कों पर भीख माँगते नजर आते। उन्हें फिर स्कूल तक लेकर आती।’

 कुसमलता जी यह बताते हुए लगातार मुस्कुराती रहती हैं। वो कहती हैं कि कई बार तो बच्चे हमसे नाराज हो जाते थे और घर से बस्ते में साँप लेकर आते और क्लास में छोड़ देते ताकि हम उन्हें स्कूल में न रोकें। यह बताते हुए वो लगातार हँस रही थीं। लेकिन ज्यादा समय नहीं लगा बच्चों का मन स्कूल में रमाने में। अब ये सब रोज स्कूल आना चाहते हैं...वो आसपास उन्हें घेरे खड़े बच्चों को प्यार से देखती हैं।

उनका ऑफिस कुछ अलग है। बच्चों के उपयोग की चीजें, उनके हाथों से बनी कलाकृतियां, किताबें, पोस्टर यहाँ सजे नहीं हैं, रखे हैं...कि कभी भी कोई भी बच्चा उन्हें सहज ही उठा सके, इस्तेमाल कर सके।

कुसुमलता जी गर्व से यह बताती हैं कि यहाँ से पढ़ने वाले बच्चों के स्कूल या पढ़ाई छोड़ने की वाले बच्चों की दर काफी कम। वे बताती हैं कि उनके स्कूल के अधिकांश बच्चे दसवीं, बारहवीं, स्नातक तक की पढ़ाई पूरी करते हैं। ये बच्चे आज भी अपने प्राथमिक स्कूल के सम्पर्क में हैं और स्कूल के कार्यक्रमों में आते रहते हैं। आसपास सघनता से बने घरों और दुकानों के बीच यह स्कूल एकदम अलग-सा दिखता है। इस स्कूल में 7 कमरे, 1 किचन शेड और खेल का मैदान है। यहाँ प्रार्थनायें, खेल और व्यायाम के लिए पर्याप्त जगह है। इस मैदान में बच्चों के लिए खेल व अन्य सामूहिक गतिविधियों का आयोजन होता रहता है। इस स्कूल के कई बच्चे खेल की प्रतियोगिताओं में ब्लॉक, जिले व राज्य स्तर तक जा चुके हैं। कुछ बच्चों ने राज्य स्तर पर पुरस्कार भी जीते हैं। मजे की बात है कि इस स्कूल के बच्चे न सिर्फ शारीरिक गतिविधियों में अच्छा करते हैं बल्कि पढ़ने-लिखने, कविता, गीत, नाटक आदि में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं।

कुसुमलता जी अपनी टीम के सहयोग से एक अकादमिक वर्ष में विभिन्न प्रकार के खेल, बाल मेला, कविता, कहानी लेखन, अन्ताक्षरी, बस्ता दिवस, सुलेख अभ्यास, मेंहदी प्रतियोगिता, राखी प्रतियोगिता, बागवानी, क्यारी निर्माण, नाटक प्रतियोगिता आदि का आयोजन करती हैं जिसमें स्कूल के सभी बच्चे प्रतिभाग करते हैं। इस तरह की गतिविधियों से स्कूल का माहौल खुशनुमा बना रहता है। हालाँकि वे इसे काफी शिक्षाप्रद भी बताती हैं जिसमें बच्चे जिम्मेदारी लेना, योजनाएँ बनाना, समूह कार्य, सृजनात्मक लेखन, संवाद आदि सीखते हैं।

इस तरह के प्रयासों की वजह से विद्यार्थी और अभिभावक दोनों ही स्कूल को पसन्‍द करते हैं। उनके स्कूल में कुछ बच्चे तो प्राइवेट स्कूल छोड़कर भी पढ़ने आते हैं जबकि कई बच्चों को काफी प्रोत्साहित करके स्कूल लाना पड़ता है। कुसुमलता जी व अन्य शिक्षिकाएँ समुदाय में जाकर बच्चों को लाती हैं। फिर इन बच्चों को उनकी आयु, सीखने के स्तर और रुचि के अनुरूप स्कूल और कक्षा की प्रक्रियाओं में शामिल किया जाता है। इस तरह के प्रयास को याद करते हुए उन्होंने कुछ बच्चों का जिक्र किया जो अपने परिवार के व्यवसाय सब्जी, निम्बू,मिर्ची बेचना आदि की वजह से स्कूल नहीं आ पाते थे। उनके माता-पिता से काफी बातचीत करने के बाद ये बच्चे स्कूल आने लगे। धीरे-धीरे इनमें से अधिकांश बच्चे स्कूल में रम गए और स्कूल की गतिविधियों में शामिल होने लगे। आज इनमें से कई बच्चे अपनी बस्ती के बाकी बच्चों के स्कूल आने का कारण हैं।

छोटे बच्चों की दुनिया में सरलता और सृजन का महत्व

कुसुमलता जी का कहना है कि सृजनात्मक शिक्षण प्राथमिक शाला के लिए विशेष स्थान रखता है। उन्होंने छोटे बच्चों के साथ काम करते हुए यह पाया कि कक्षा 1 के स्तर के बच्चे नाचने, गाने, खेल, कविता, कहानी, कला, क्राफ्ट मॉडल आदि के माध्यम से आराम से सीखते हैं। इस तरह के संसाधनों को इकट्ठा करने और बनाने के लिए उन्होंने स्कूल स्तर और समुदाय स्तर पर प्रयास किए। इस प्रक्रिया में बच्चों ने सृजनात्मक कार्य में भाग लिया और शिक्षक और समुदाय ने स्कूल के लिए पुस्तकें और स्टेशनरी इकट्ठा की। कुसुमलता जी ने भी बच्चों के लिए छोटी-छोटी कहानियाँ और कवितायें लिखीं। आज उनके पास कहानियों, कविताओं, चित्र और क्राफ्ट की सामग्री का भण्डार है। उनका ऑफिस भी सीखने-सिखाने के संसाधनों से भरा हुआ है। इन सबका इस्तेमाल स्कूल की सजावट और कक्षा-शिक्षण में होता है।

उनके अनुसार जिस प्रकार बच्चा अपने परिवेश की कई बातों से जुड़कर सीखता-समझता है वैसा ही वो स्कूल में भी कर सकता है। वे विशेष ध्यान देती हैं कि बच्चे अपने मन की बात को कह पाएँ इससे न सिर्फ अभिव्यक्ति निखरती है बल्कि बच्चे की अवलोकन क्षमताएँ सोचने-विचारने, तर्क करने जैसी क्षमताओं में भी सुधार आता है। उनकी कक्षा में कहानी और कविता सुनाने-पढ़ने के दौरान हुई बातचीत उनके इस विचार की पुष्टि करते हैं। जिसमें अधिकांश बच्चे अपने अनुभव और प्रश्न उनसे साझा करते हैं। कुसुमलता जी बच्चों से छोटी-छोटी और अत्यधिक सरल बातें करती हैं। उनके बात करने का लहजा ही ऐसा होता है कि बच्चों को सोचने का और अपनी तरफ से से कोई बात कहने का मन होता है। छोटे-छोटे बच्चे भी निर्भीक होकर उनसे अपनी बात कहते हैं और अपने द्वारा किया गया काम उन्हें दिखाते हैं। इसके साथ ही शुरुआती कक्षा में बच्चा कला, क्राफ्ट, प्रार्थना सभा की प्रक्रियाएँ जैसे समाचार बोलना आदि में भाग लेता है। फिर बच्चों की स्वतः ही पढ़ने-लिखने के काम में भी रुचि होने लगती है।

स्कूल की प्रक्रियायों को मजबूत करना

वे प्रत्येक बच्चे को व्यक्तिगत तौर पर जानती हैं तथा निरन्‍तर अन्‍तराल पर सबसे बात करती रहती हैं। कुसुमलता जी स्कूल के सभी बच्चों को नाम से बुलाती हैं। उन्हें उनकी खूबियों और कमियों का अहसास है जिसे वे नोटबुक में लिखती रहती हैं। वे बच्चे के अकादमिक और व्यावहारिक दोनों पक्षों का रिकॉर्ड रखती हैं। स्कूल में प्रत्येक बच्चे के लिए एक बॉक्स फाइल है जिसमें उनके द्वारा रचित कहानियाँ, कविता, लेख, चित्र, गणित, पर्यावरण शिक्षण आदि के काम संग्रहित किए जाते हैं। स्कूल की विभिन्न प्रक्रियाओं से स्वयं जुड़ने पर बच्चे को कोई उपदेश देने की जगह वो उन्हें सीखने और करने के नए मौके देती हैं। उनका मानना है कि बच्चे को  स्वयं यह पता नहीं होता कि वो कितना आगे जा सकता है। बच्चों को नित नए अनुभव कराने के लिए वे स्कूल की प्रक्रियाओं को काफी असरदार मानती हैं क्योंकि इसमें बच्चा विभिन्न प्रकार की जिम्मेदारियों और चुनौतियों का अहसास करता है। स्कूल में हो रहे विभिन्न कार्यक्रमों में वे सबके प्रतिभाग के बारे में सोचती हैं ताकि स्कूल की गतिविधियों में भाग लेकर बच्चा, सहभागिता और समानता का अनुभव करें। वे यह सुनिश्चित करती हैं कि बच्चा स्कूल की अधिकांश प्रक्रियाओं में प्रतिभाग करे। इस स्कूल में सुबह की प्रार्थना से लेकर मध्याहन भोजन, कक्षा शिक्षण, बागवानी, साफ-सफाई आदि कार्यों में सबकी जिम्मेदारियाँ बँटी हुई हैं। इनमें से ज्यादातर कार्य बच्चे स्वतः ही कर लेते हैं। कई बार तो यह यकीन भी नहीं होता कि कोई व्यवस्था बनाई गई है। न तो बच्चों के चेहरे पर किसी नियम के पालन का कष्ट दिखता है और न ही कोई उनके पीछे निर्देश और संचालन का बोझ लिए खड़ा मिलता है। ऐसा लगता है कि सब कुछ स्वचालित तरीके से हो रहा है। प्रार्थना सभा की प्रक्रिया में अक्सर ऐसा होता है कि जिन बच्चों को प्रार्थनाएँ गीत, कविता, विचार आदि बोलना आ जाता है वो नेतृत्व करने के लिए तत्पर रहते हैं। यहाँ भी उन्होंने सभी के प्रतिभाग का ध्यान रखा है। स्कूल में उन्होंने बच्चों के समूह बनाए हैं और हर समूह को बारी-बारी से प्रस्तुति देनी होती है। समय-समय पर बच्चों द्वारा हिन्‍दी और अँग्रेजी दोनों ही भाषाओं में नाटक भी तैयार किया जाता है। बच्चे शिक्षिका के मार्गदर्शन और सामूहिक चर्चा द्वारा चयनित पाठ के विषय का नाटक में रूपान्‍तरण करते हैं। अँग्रेजी में करवाए जाने वाले ज्यादातर नाटक उनकी पुस्तक से ही होते हैं जिसकी विषयवस्तु का उन्हें पता होता है। अब तक इस स्कूल के नाट्य समूहों ने स्कूल के अन्दर और बाहर खूब सराहना पाई है। अब जब बच्चे अपनी पाठ्यपुस्तक के कुछ नाटक कर चुके हैं तो बाहर की पुस्तक का भी एक नाटक तैयार किया गया है। कुसुमलता जी ने बच्चों के काम को स्थानीय अखबारों और पत्रिकाओं में भेजा। अब तक इन बच्चों की कई कहानियाँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छप चुकी हैं।

इस स्कूल में बिताया गया समय न सिर्फ शिक्षाप्रद बल्कि काफी मनोरंजक भी रहा है। इस स्कूल को समझने और बच्चों की सफलता को जानने पर लगा कि यहाँ  आने वाले बच्चे सिर्फ एक स्कूल में शामिल नहीं होते बल्कि एक उत्सव में शामिल होते हैं। यह एक ऐसा उत्सव है जो बच्चों के इस स्कूल से जाने के बाद भी उनके अन्दर चलता रहता है।


सुश्री कुसुमलता से रॉबिन पुष्प की बातचीत पर आधारित। अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, देहरादून द्वारा प्रकाशित ‘उम्‍मीद जगाते शिक्षक...2’ से साभार।

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umasharma का छायाचित्र

inspiring for all teachrs...................

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