किसी 'खास' की जानकारी भेजें। मोरी से झाँकती रोशनी

उत्तरकाशी जिला अपने आप में प्राकृतिक सुन्दरता को समेटे हुए है। यहाँ 6 ब्लॉक हैं जिनमें से मोरी सबसे दूरस्थ ब्लॉक है। मोरी की भौगोलिक सरंचना को देखें तो यह एक खिड़की के समान दिखाई देती है इसी कारण इसका नाम मोरी (मोरी स्‍थानीय भाषा का शब्द है जिसका अभिप्राय खिड़की से है) रखा गया। अपनी प्राकृतिक सुन्दरता एवं सांस्कृतिक विरासत के लिए यह लोकप्रिय है।

मोरी ब्‍लाक केन्‍द्र से लगभग 22 किलोमीटर दूर प्रकृति की सुन्दरता के बीच एक नई आशा बिखेरता विद्यालय, राजकीय प्राथमिक विद्यालय साँकरी है। यह एक ऐसा विद्यालय है जो बर्फ की चादर ओढ़ने पर भी खुला रहता है। यहाँ के शिक्षक बच्चों को कुछ नया देने के लिए उस ठण्ड में भी तत्पर रहते हैं। विद्यालय का भवन काफी पुराना है। इसमें दो कक्षा-कक्ष हैं। बर्फबारी वाले इलाके में होने के कारण विद्यालय की स्थिति ज्यादा ठीक नहीं है। स्कूल में 29 बच्चे, दो भोजन माताएँ एवं दो शिक्षक हरीश नौटियाल एवं जगमोहन सिंह रावत कार्यरत हैं। यहाँ के शिक्षकों एवं समुदाय का विश्वास है कि विद्यालय एक नवीन चेतना का स्‍त्रोत होता है जहाँ आकर नौनिहालों के सपनोँ को आकार मिलता है। बच्चों को कुछ नया करने, सीखने, बनाने, अपनी बात को रखने, पूछने इत्यादि की आजादी क्या होती है अगर आप प्राथमिक विद्यालय साँकरी पहुँचेंगे तो इन सबको जीवंत देख पाएँगे।

यहाँ शिक्षक बच्चों की प्रतिभाओं को भली-भाँति जानते हैं इसलिए यहाँ जिस बच्चे को जो पसन्‍द है वो करने के अवसर दिए जाते हैं। बच्चा जिसमें सहजता महसूस करता है शिक्षकों द्वारा उसे वही प्रस्तुत करने को प्रेरित किया जाता है। जो नाच सकता है उसे नाचने को, जो गा सकता है गाने को, जो पेंटिंग कर सकता है पेटिंग करने को, जो अभिनय कर सकता है अभिनय करने को, जो चुटकुले सुना सकता चुटकुले सुनाने को प्रेरित किया जाता है। शायद यही कारण है कि यहाँ के बच्चे अपने नाम से ज्यादा अपनी प्रतिभा से जाने जाते हैं। यहाँ के दोनों शिक्षक साँकरी गाँव में ही रहते हैं और गाँव में होने वाली हर एक गतिविधि में जुड़कर विद्यालय में होने वाली नवाचारी गतिविधियों के बारे में सबको बताते हैं। साथ-ही-साथ स्कूल की जरूरतों को भी सबके सम्मुख रखते हैं। शायद यही कारण है कि समुदाय का यहाँ हर प्रकार का सहयोग विद्यालय को मिलता रहता है एवं बच्चे हर दिन स्कूल में दिखाई देते हैं। यहाँ के शिक्षक बच्चों के साथ जब रवाई (स्‍थानीय भाषा) में बात करते हैं, उनके लोक गीतों को गुनगुनाते हैं तो बच्चों को कहीं-न-कहीं अपनापन, सहजता महसूस तो होती ही होगी साथ ही शिक्षक से एक लगाव भी महसूस होता होगा। यहीं वे कारण हैं जिसके फलस्वरूप बच्चे, शिक्षकों को अपनी हर एक बात बिना किसी भय के खुशी-खुशी बताते हैं। 

शिक्षक को एक बड़े परिवर्तन की धुरी माना जाता है। शिक्षक की परिभाषा को विश्लेषित करते हुए हरीश जी कहते हैं कि, ‘वर्तमान सन्दर्भ में शिक्षा-शिक्षण एवं शिक्षक का स्वरुप काफी बदल चुका है। अब शिक्षक वह नहीं जो नीति बनाकर बच्चों को बताए, वह तो इन सबसे ऊपर एक पथ प्रदर्शक है जो नौनिहालों को उचित एवं न्यायसंगत मार्ग दिखाता है। शिक्षण प्रकृति एवं बच्चों के दैनिक जीवन के अनुभवों से जुड़ा हुआ होना चाहिए। बच्चों को स्वतंत्रता पूर्व खुद से कुछ करने, बनाने, सीखने के जितने ज्यादा मौके होंगें बच्चों का विकास उतना बेहतर होगा और शिक्षण भी उतना ही प्रभावशाली होगा। सच्ची शिक्षा तो वही होगी जो हमें चली आई रूढ़िवादी परम्‍पराओ, संकीर्ण मानसिकताओं से दूर करे।’    

आगे हरीश जी कहते हैं कि, ‘प्राइमरी स्‍तर पर अधिकांश स्कूलों में दो ही शिक्षक होते हैं और उनको ही सभी विषयों को पढ़ाना पढ़ते हैं। पाठ्यपुस्‍तक को नवाचारी बनाने, शिक्षकों की पर्याप्‍त संख्‍या इत्यादि कि ओर इशारा करते हुए हरीश जी का कहना है कि अगर दूरस्थ जगहों पर सरकार पर्याप्‍त शिक्षक नहीं नियुक्‍त कर पाती तो कम-से-कम ट्रेनिंग्स ऐसी हो जिसमें सभी विषय समेकित रूप से देखें जाएँ, उन विषयों का क्या अर्न्‍तसम्‍बन्‍ध है, कैसे उन अर्न्‍तसम्‍बन्‍धों को जाना जाए, उन पर कैसे काम किया जाए आदि-इत्यादि पर केन्द्रित होनी चाहिए।

बच्चों को सीखने-सिखाने के मामले में देखें तो इस स्कूल में कक्षाओं का कोई बंधन दिखाई नहीं देता। यहाँ आपको सभी कक्षाएँ समेकित रूप से दिखाई देंगी। कभी कभार कक्षा 2-3 और कक्षा 4-5 गणित, पयार्वरण अध्ययन एवं भाषा जैसे विषयों को साथ-साथ पढ़ते-लिखते समझते दिखाई देंगे। यहाँ के शिक्षक बच्चों को मूर्त रूप से समझाने के लिए खुद एवं बच्चों के साथ मिलकर विभिन्न प्रकार के टीचिंग-लर्निंग मटेरियल (टी.एल.एम.) बनाते हैं। टीचिंग-लर्निंग मटेरियल बनाने के लिए कागज, गत्ते, लकड़ी, चार्ट इत्यादि का प्रयोग किया जाता है।

यहाँ के शिक्षक परिवेश को भी एक प्रयोगशाला मानते हैं और कोशिश करते है कि बच्चों को पेड़-पौधों, जल-हवा के बारे में इससे ही बताया जाए। शिक्षकों की कोशिश रहती है कि बच्चों को ज्यादा से ज्यादा अनुभव आधारित ज्ञान से जोड़ा जाए एवं परिवेश को शिक्षण में स्थान दिया जाए। विद्यालय के दूसरे शिक्षक जगमोहन जी कहते हैं कि जीवन निरंतर परिवर्तन शील है। एक शिक्षक होने के नाते हमें भी निरन्‍तर कुछ-न-कुछ सीखना-पढ़ना एवं अपने पेशेवर विकास के लिए सोचना, कुछ करना चाहिए।

हरीश जी ने ब्रेल लिपि के बारे में पढ़ा था कि इसमें अक्षर धँसे रहते हैं जो प्राय: कम दृष्टि या दृष्टी-बाधित बच्चों के लिए कारगर होती है। किन्‍तु इस लिपि से सम्बन्धित किताबें आसानी से नहीं मिलती हैं। बच्चों के लिए कुछ करने की ललक ने हरीश जी को उत्साहित किया और उन्होंने ब्रेल लिपि को उलटकर उपयोग किया। इसे उन्होंने रिवर्स ब्रेल लिपि कहा। इसमें उन्होंने एक थर्माकोल सीट ली और माचिस की तिल्लियों को वर्ण, अंक, ज्यामिति का रूप देकर इसमें धँसा दिया। इसे कम दृष्टि या दृष्टि-बाधित बच्चे छूकर पहचान सकते हैं। इसको रिवर्स ब्रेल लिपि इसलिए कहा क्यूँकि ब्रेल लिपि में अक्षर सतह से अन्दर की ओर धँसे रहते हैं पर इसमें वे उभरे और सतह से 1 सेंटीमीटर ऊपर हैं। बच्चों को लेकर इस प्रकार की संवेदना की जितनी तारीफ की जाए कम है। 

समुदाय के सहयोग के मामले में यह स्कूल अव्वल है। यहाँ के स्कूल मैनेजमेंट कमेटी (एस.एम.सी.) के अध्यक्ष का कहना है कि पहले हमें बड़ी चिन्‍ता थी कि सरकारी स्कूल में जाकर हमारे बच्चे पिछड़ ना जाएँ। लेकिन यहाँ शिक्षक जिस प्रकार पूरी निष्ठा से लगे हुए हैं वह हमको अच्छा लगता है और भरोसा भी दिलाता है कि हमारे बच्चे सही हाथों में हैं और वे कुछ नया जरूर कर पाएँगे। एक अभिभावक का कहना है कि स्कूल, यहाँ के शिक्षण, शिक्षकों के व्यवहार को देखकर ही हमारे बच्चों को घर से ज्यादा स्कूल भाने लगा है।

ऐसी दूरस्थ एवं विकट परिस्थितियों में भी शिक्षक इतना कुछ कर पा रहे हैं वो अपने आप में एक मिसाल है। यह एक राजकीय स्कूल है जहाँ शिक्षक पूरी निष्ठा के साथ अपने काम में लगे हुए हैं और यहाँ की चमक बच्चों में लगातार दिखाई दे रही है। राजकीय शिक्षा को लेकर जो भ्रम समाज में बने हुए हैं यह उनको आईना दिखाती है। ऐसे शिक्षक जो अपने शिक्षण, बच्चों के विकास के लिए निरन्‍तर प्रयासरत हैं, पयार्वरण को शिक्षण का एक मुख्य अंग समझते हैं, समुदाय को स्कूल से जोड़ते हैं वे निश्चित ही एक दिन समाज में शिक्षा को लेकर व्याप्त परिदृश्य को एक नया आयाम दे पाएँगे और शिक्षा को लेकर बनी भ्रम की स्थिति को भी दूर कर पाएँगे।


अवनीश शुक्‍ला, अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, उत्‍तरकाशी, उत्‍तराखण्‍ड

 

टिप्पणियाँ

Sunder2013 का छायाचित्र

अवनीश सर आप और apf जिस प्रकार से निष्ठावान शिक्षकों के प्रयासों को वृहद स्तर तक पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध हैं वो शिक्षक समाज के लिए सुखद है । हरीश नौटियाल जी और उनकी सहयोगी टीम को अति दुर्गम विद्यालय में दुरूह परिस्तिथियों में भी इतना उत्कृष्ट कार्य करने के लिए शब्द कम पड़ जाते हैं । आप हम सबके लिए प्रेरणा हैं ।

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