किसी 'खास' की जानकारी भेजें। मुझे अभी तक कोई खराब बच्‍चा नहीं मिला : अरविन्‍द गुप्‍ता

बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी अरविन्‍द गुप्ता देश के प्रसिद्ध खिलौना अन्वेषक एवं विज्ञान संचारक हैं। आप तीन दशकों से विज्ञान जागरूकता को लेकर कार्य करते आ रहे हैं। उन्होंने बच्चों में खिलौनों के माध्यम से विज्ञान संचार का अद्भुत कार्य किया है। हिन्दी और अँग्रेजी के अलावा आपने देश की कई क्षेत्रीय भाषाओं में विज्ञान आधारित पुस्तकों का लेखन तथा अनुवाद किया है। विज्ञान के प्रति आपके समर्पण तथा सेवा के लिए कई राष्ट्रीय एवं अन्‍तर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। अरविन्‍द गुप्ता के साथ मनीष श्रीवास्तव की बातचीत।

मनीष श्रीवास्तव: कृपया अपनी शिक्षा और पृष्ठभूमि के बारे में बताएँ।

अरविन्‍द गुप्ता: मैं मूलत: बरेली, उत्तर प्रदेश का रहने वाला हूँ। यूपी बोर्ड से बारहवीं की परीक्षा के बाद 1970 में आई.आई.टी.में प्रवेश किया। वहाँ से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में बी.टेक. की डिग्री हासिल की। उसके पश्चात मैंने पाँच वर्ष पुणे स्थित टाटा मोटर्स में काम किया। पिछले 11 सालों से मैं आयुका, पुणे विश्वविद्यालय में स्थित एक बच्चों के विज्ञान केंद्र में कार्यरत हूँ।

मनीष श्रीवास्तव: विज्ञान लोकप्रियकरण का काम करने का विचार कैसे आया?

अरविन्‍द गुप्ता: 1970 के दशक में दुनिया भर में तमाम जन आन्‍दोलन उभरे थे। तभी रैचल कार्सन ने सायलेंट स्प्रिंग्स नामक पुस्तक लिखी थी जिससे दुनिया में पर्यावरण आन्‍दोलन का सूत्रपात हुआ। अमेरिका में सिविल राइट्स और वियतनाम युद्ध विरोधी आन्‍दोलन अपने चरम पर थे। भारत में भी जयप्रकाश नारायण और नक्सली आन्‍दोलनों की शुरुआत हुई थी। जब कभी समाज का राजनैतिक मंथन होता है तो उससे बहुत सामाजिक ऊर्जा बाहर निकलती है।

70 के दशक में बहुत से वैज्ञानिक अपनी एक सार्थक सामाजिक भूमिका खोज रहे थे। बहुत से वैज्ञानिकों ने कसम खाई थी कि वे राष्ट्र, धर्म आदि के नाम पर बम और मिसाइल के शोध कार्य में शरीक नहीं होंगे। मानवता को ध्वस्त करने की बजाय वे कुछ सकारात्मक काम करना चाहते थे। उनमें एक व्यक्ति थे डॉ. अनिल सद्गोपाल जो कैल्टेक, अमरीका से पीएच.डी. करने के बाद टी.आई.एफ.आर. में कार्यरत थे। अपनी नौकरी छोड़कर उन्होंने 1972 में मध्यप्रदेश में होशंगाबाद विज्ञान कार्यक्रम की शुरुआत की। 1972 में मुझे आई.आई.टी. कानपुर में उनका एक भाषण सुनने का सौभाग्य मिला। आई.आई.टी. कानपुर में पाँच साल तक मैंने गरीब बच्चों को पढ़ाने का काम किया था। इसलिए मुझे डॉ. अनिल सद्गोपाल का कार्य बहुत अनूठा लगा। फिर 1978 में टाटा मोटर्स, पुणे में काम करने के दौरान मैंने एक वर्ष की छुट्टी ली और वह समय होशंगाबाद विज्ञान शिक्षण कार्यक्रम के साथ बिताया। उस एक वर्ष के अनुभव ने मेरे आगे के जीवन का पथ प्रशस्त किया।

मनीष श्रीवास्तव: खिलौनों के माध्यम से विज्ञान को रुचिकर बनाने तथा बच्चों को आकर्षित करने का विचार कैसे आया?

अरविन्‍द गुप्ता: 1978 में होशंगाबाद विज्ञान कार्यक्रम में काम करते समय पहले ही महीने में मैंने माचिस की तीलियों और साइकिल की वॉल्व ट्यूब से दो और तीन आयामी आकृतियाँ बनाने का एक मेकेनो डिजाइन किया। वह स्थानीय, सस्ते सामान से बना था और उससे बच्चे ज्यामिती के साथ-साथ ढाँचों और आणविक संरचनाओं के बारे में बहुत कुछ सीख सकते थे। बड़े कारखाने में नौकरी करने की बजाय बच्चों के लिए इस प्रकार के काम में मुझे बहुत ज़्यादा मजा आया। भारत में खिलौने बनाने की एक जीवन्‍त परम्परा रही है। परम्परागत खिलौने फेंकी हुई वस्तुओं को दुबारा इस्तेमाल करके बनते हैं, इसलिए वे सस्ते और पर्यावरण मित्र होते हैं। दूसरे, खिलौनों में विज्ञान के कई सिद्धान्‍त छिपे होते हैं जिन्हें बच्चे खेल- खेल में बहुत सहजता से सीख सकते हैं। खिलौने हरेक बच्चे को पसन्‍द होते हैं। इसलिए बच्चे खुशी-खुशी, खेलते-खेलते विज्ञान की बुनियादी बातें सीख सकते हैं।

मनीष श्रीवास्तव: बच्चे खिलौनों के माध्यम से जल्दी सीखते हैं या श्रव्य-दृश्य माध्यम अधिक प्रभावपूर्ण होते हैं?

अरविन्‍द गुप्ता: किसी बात को समझने से पहले बच्चों को अनुभव की जरूरत होती है। अनुभव में चीजों को देखना, सुनना, छूना, चखना, सूँघना, श्रेणियों में बाँटना, क्रमबद्ध रखना आदि कुशलताएँ शामिल हैं। इसके लिए बच्चों को ठोस चीजों से खेलना और प्रयोग करना अनिवार्य है। बच्चों के विकास के सारे सिद्धान्‍त इस पद्धति की पैरवी करते हैं। ऑडियो-विजुअल विज्ञापन बहुत सशक्त माध्यम हैं पर वे खुद अपने हाथों से चीजें बनाने और प्रयोग करने का पर्याय नहीं हैं।

मनीष श्रीवास्तव: बच्चों को विज्ञान के प्रति आकर्षित करने हेतु और कौन-कौन से उपाय किए जा सकते हैं?

अरविन्‍द गुप्ता: सुदर्शन खन्ना की एक बहुत सुन्‍दर पुस्तक है नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित सुन्‍दर सलौने, भारतीय खिलौने। इस पुस्तक में 100 सस्ते खिलौने बनाने की तरकीबें दर्ज हैं। ये सभी खिलौने बच्चे सालों से बनाते आए हैं और इन्हें सस्ती, स्थानीय चीजों से बनाना सम्‍भव है। कुछ खिलौने उड़ते हैं, कुछ घूमते हैं, कुछ आवाज करते हैं। इनसे बच्चे अपने हाथों से खुद मॉडल बनाना सीखेंगे। ये सस्ते, सुलभ मॉडल बच्चों को काटना, चिपकाना, जोड़ना और अन्य कौशल सिखाएँगे। इनके लिए किसी परीक्षा, टीचर अथवा मूल्यांकन की जरूरत नहीं होगी। अगर खिलौना ठीक नहीं बनेगा तो वह काम नहीं करेगा और बच्चे को खुद ही फीडबैक देगा। यहाँ पास-फेल का भी कुछ चक्कर नहीं होगा। मिसाल के लिए पुराने अखबार से पट्टियाँ फाड़ने का काम। अखबार की एक दिशा, जिसमें उसके रेशे होंगे वहाँ लम्‍बी पट्टियाँ फाड़ना सम्भव होगा। उसके लम्‍बवत दिशा में केवल छोटे टुकड़े ही फटेंगे। यहाँ अखबार ही बच्चे का टीचर होगा। इसी प्रकार रेशे की दिशा में ही लकड़ी को छीलना (रंदा) सम्भव होगा, दूसरी में नहीं। हमारे स्कूलों में गतिविधि आधरित विज्ञान शिक्षण की बहुत जरूरत है। पर विडम्‍बना यह है कि इस काम को अंजाम देने के लिए न तो प्रशिक्षित शिक्षक हैं और न ही इस काम को करने वाली प्रेरक संस्थाएँ हैं। उच्च कोटि के लोगों को टीचर ट्रेनिंग संस्थाओं में लाना चाहिए ताकि वहाँ से कुशल, उत्साही और प्रेरित शिक्षक निकल सकें।

मनीष श्रीवास्तव: खिलौना अन्वेषक के रूप में कार्य करने के साथ ही आपने हिन्दी और कई क्षेत्रीय भाषाओं में विज्ञान लेखन का कार्य किया है। इसकी आवश्यकता क्यों महसूस हुई?

अरविन्‍द गुप्ता: मूलत: मैं हिन्दी और अँग्रेजी में लिखता हूँ। पर मेरी अधिकांश पुस्तकों का अन्य भारतीय भाषाओं में भी अनुवाद हुआ है। उदाहरण के लिए मेरी पहली गतिविधियों की पुस्तक मैचस्टिक मॉडल्स एण्‍ड अदर साइन्‍स एक्सपेरिमेंट्स का 12 भारतीय भाषाओं में अनुवाद हुआ। और मेरी वेबसाइट http://www.arvindguptatoys.com पर कुल मिलाकर 4000 पुस्तकें हैं जिन्हें लोग नि:शुल्क डाउनलोड कर सकते हैं। इनमें बहुत-सी पुस्तकें देश की क्षेत्रीय भाषाओं में है। जैसे, मशहूर विज्ञान लेखक आइज़ेक एसिमोव की 36 लाजवाब पुस्तकें मराठी में हैं। ये पुस्तकें इतनी रोचक हैं कि जो कोई भी उन्हें पढ़ेगा उसकी रूह आजीवन विज्ञान से चिपक जाएगी।

मनीष श्रीवास्तव: अँग्रेजी में विज्ञान पर काफी लिखा गया है लेकिन हिन्दी भाषा में इतना लेखन नहीं हुआ। क्या यह भी एक वजह है जिसके कारण विज्ञान के प्रति जन-जागरूकता में कमी आई है?

अरविन्‍द गुप्ता: देश की प्रान्‍तीय भाषाओं में लोकप्रिय विज्ञान की बेहद कमी है। सरकारी संस्थाओं की बहुत सीमाएँ हैं। अधिकांश का आम लोगों की जिन्दगी से कोई सरोकार नहीं है। हिन्दी को ही लें। 40 करोड़ हिन्दी भाषी हैं जो पाँच राज्यों में रहते हैं। यह आबादी बहुत बड़ी है और इसमें अपार सम्भावनाएँ हैं। दुनिया के श्रेष्ठतम लोकप्रिय विज्ञान साहित्य का हिन्दी में अनुवाद करना जरूरी है पर किसी संस्था की इसमें रुचि नहीं है। हिन्दी की पुरानी संस्थाएँ अब बूढ़ी हो चली हैं और मृत्यु की कगार पर हैं। 100 वर्ष से इलाहाबाद से छपती विज्ञान की मात्र 2-3 हज़ार प्रतियाँ ही छपती होंगी। और हिन्दी भाषी हैं 40 करोड़। हिन्दी अकादमी और अन्य संस्थाएँ लोगों की जिन्दगी, उनकी आकांक्षाओं से पूरी तरह कटी हैं। उसके ऊपर एक और तुर्रा है। कौन कहता है कि हिन्दी में लोग नहीं पढ़ते? पर क्या पढ़ते हैं-मेरठ से प्रकाशित घटिया जासूसी उपन्यास खूनी पंजा, मौत का शिकंजा आदि जिनके पहले संस्करण का प्रिंट आर्डर 5 लाख प्रतियाँ होता है! दरअसल हिन्दी जगत में अच्छे साहित्य विशेषकर बालसाहित्य और विज्ञान की लोकप्रिय पुस्तकों का एकदम टोटा है। 90 वर्ष से अमेरिका में हर साल उत्कृष्ट बाल साहित्य के लिए दो पुरस्कार दिए जाते हैं : न्यूबेरी मेडल और सबसे सुन्‍दर चित्रकथा के लिए कैल्डीकॉट मेडल। हिन्दी में नेशनल बुक ट्रस्ट ने मात्र एक न्यूबेरी पुरस्कृत पुस्तक धनगोपाल मुखर्जी की गे-नेक छापी है। दुनिया के सर्वश्रेष्ठ बाल साहित्य से हमारे बच्चे अनजान हैं। यह हिन्दी जगत की गहरी जड़ता का द्योतक है। हम अक्सर भारत की चीन से तुलना करते हैं। पर हमारी मिट्टी कुछ इस तरह बरबाद कर दी गई है कि यहाँ अच्छे बीज भी कुम्हलाकर मुरझा जाते हैं। बच्चों के आगे बढ़ने के लिए कोई रास्ता नहीं है। हमारा काम मिट्टी बनाने का है, दुनिया के बेहतरीन साहित्य को बच्चों और शिक्षकों तक सरल हिन्दी में अनुवाद करके इंटरनेट के माध्यम से नि:शुल्क उपलब्ध कराने का ऐतिहासिक काम।

मनीष श्रीवास्तव: दो दशकों से भी अधिक समय से आप विज्ञान के प्रति जनचेतना जगाने का प्रयास करते आ रहे हैं। क्या अब तक के प्रयासों से सन्‍तुष्ट हैं?

अरविन्‍द गुप्ता: मेरी वेबसाइट से रोजाना 15,000 पुस्तकें डाउनलोड होती हैं और 40,000 वैज्ञानिक प्रयोगों के वीडियो देखे जाते हैं। और यह सब नि:शुल्क। अभी तक 3 करोड़ बच्चे हमारी विज्ञान फिल्मों को 18 भाषाओं में देख चुके हैं। यह अवश्य सांत्वना की बात है। ये आँकड़े सिर्फ यह दर्शाते हैं कि हमारे लोगों में ज्ञान और विज्ञान की अपार भूख है। इस भूख की तुष्टि के लिए हिन्दी भाषी संस्थाओं को अभी बहुत कुछ करना बाकी है। व्यक्तिगत प्रयास अनूठे हो सकते हैं पर अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता। इसके लिए राज्य और समाज की संस्थाओं को सजगता से कार्य करना पड़ेगा। जो कार्य हमारे सामने मुँह बाए खड़ा है उसके हिसाब से सन्‍तुष्टि का प्रश्न ही नहीं होता। एक मिसाल देता हूँ। मैं विज्ञान में अपनी रुचि के लिए रूसियों का आभारी हूँ। बचपन में मेरे छोटे शहर बरेली में रूस के सर्वश्रेष्ठ लोकप्रिय विज्ञान लेखक याकूब पेरेलमैन की पुस्तकें फन विद फिजिक्स, फन विद एस्ट्रोनॉमी सड़क पर 5-5 रुपए में मिलती थीं। इनमें से तमाम पुस्तकों का हिन्दी में अनुवाद भी हुआ था। 1990 में सोवियत संघ के विघटन के बाद यह दुर्लभ साहित्य अब पूर्णत: लुप्त हो चला है। रादुगा और मीर जैसे रूसी प्रकाशकों का नामोनिशान तक नहीं बचा है। पर किसी भी हिन्दी भाषा संस्था को इन पुस्तकों को स्कैन और डिजिटाइज करने की आवश्यकता ही महसूस नहीं हुई। यह हिन्दी की हमारी धरोहर थी। विज्ञान पत्रिका जो 100 सालों से छप रही है को किसी ने अभी तक डिजिटाइज़ कर नि:शुल्क वेबसाइट पर क्यों नहीं डाला?

मनीष श्रीवास्तव: हमारा देश बेहद धार्मिक है। धर्म का आधार आस्था है और विज्ञान का तर्क। इस तरह के धर्मिक परिवेश में ऐसे कौन से प्रयास किए जा सकते हैं कि लोग धार्मिक के साथ ही वैज्ञानिक नजरिया भी अपनाएँ।

अरविन्‍द गुप्ता: भारत निश्चित रूप से एक धर्म प्रधान देश हैं जहाँ लोगों की आस्थाओं का हमें आदर और सम्मान करना चाहिए। दुनिया के अनेक चोटी के वैज्ञानिक धार्मिक होने के बावजूद महत्वपूर्ण, जन-उपयोगी कार्य करते हैं। यहाँ माइकल फैराडे का उदाहरण उपयुक्त होगा। वे एक लुहार के बेटे थे। पिता के लिए फैराडे को स्कूल भेजना सम्भव नहीं था। अगर आज फैराडे जीवित होते तो उन्हें उत्कृष्ट वैज्ञानिक शोधकार्य के लिए कम-से-कम चार नोबेल पुरस्कार अवश्य मिले होते। फैराडे की धर्म में गहरी आस्था थी फिर भी उन्होंने दुनिया में सबसे अव्वल वैज्ञानिक शोध किया। उससे भी अधिक उन्होंने बच्चों के लिए क्रिस्मस लेक्चर्स का आयोजन किया। क्रिस्मस के समय इंग्लैण्‍ड में बच्चों की छुट्टियाँ होती थीं और उनके झुण्‍ड के झुण्‍ड फैराडे के लेक्चर सुनने आते थे। 33 साल तक ये क्रिस्मस लेक्चर्स चले और उनमें 19 वर्ष फैराडे ने ये लेक्चर दिए। उनका सबसे मशहूर लेक्चर है केमिकल हिस्ट्री ऑफ ए कैन्डल जिसको विज्ञान प्रसार ने अँग्रेजी और हिन्दी में छापा है। इस प्रकार का कोई प्रयास हमारे यहां नहीं हुआ है।

इसलिए धर्म के साथ-साथ विज्ञान का प्रचार-प्रसार भी सम्भव है। मुझे लगता है कि हमारे देश में धर्म का इतना प्रधान स्थान इसलिए भी है क्योंकि हमारे बहुत कम वैज्ञानिकों ने बच्चों के लिए कोई अच्छा साहित्य रचा है। बच्चों के लिए रोचक विज्ञान लिखना कोई आसान काम नहीं है। क्योंकि हिन्दी में विज्ञान साहित्य लगभग नगण्य है इसीलिए धर्म हावी है। जब लोग हर घटना पर सवाल पूछेंगे, हरेक चीज की जड़ में जाएँगे, हर बात पर क्यों, कैसे पूछेंगे तभी वे विज्ञान की गहराई को समझेंगे।

आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की एंटीबायोटिक्स द्वारा लाखों: करोड़ों लोगों की जानें बची हैं। चेचक, छोटी माता आदि की उपासना से यह इलाज सम्भव नहीं होता। इस सरल तथ्य को साधारण धार्मिक लोग भी समझते हैं। इसलिए धर्म, विज्ञान का दुश्मन नहीं है। धर्म हमें नेक काम करने के मूल्य देता है और विज्ञान उसे वास्तविकता में अमल करने का रास्ता दिखाता है।

मनीष श्रीवास्तव: वैज्ञानिक चेतना जगाते हेतु कौन-से प्रयास सरकारी और निजी तौर पर किए जा सकते हैं?

अरविन्‍द गुप्ता: सरकारी और निजी संस्थाओं को निम्न कार्य करने चाहिए। एक बड़े पैमाने पर विज्ञान की लोकप्रिय किताबों का हिन्दी और अन्य प्रान्‍तीय भाषा में अनुवाद। इन संस्थाओं को इसके लिए अच्छे अनुवादकों की एक फौज तैयार करनी चाहिए। ऐसे लोग जो सरकारी शब्दकोश देखे बिना, क्लिष्ट और जबड़ातोड़ भाषा का उपयोग किए बिना, सरल रोज़मर्रा की हिन्दी जुबान में पुस्तकों का अनुवाद कर सकें। और सरकार को इन्हें छापने के जंजाल में नहीं पड़ना चाहिए। क्योंकि पुस्तकों को छापना-बेचना सरकारी संस्थाएं अच्छी तरह नहीं कर पाती हैं। इन किताबों को छापने के लिए स्थानीय प्रकाशकों को दे देना चाहिए। और सरकार को इन पुस्तकों के पीडीएफ बनाकर एक वेबसाइट पर लोगों के उपयोग के लिए नि:शुल्क डाल देना चाहिए। इस तरह धीरे-धीरे बूँद-बूँद करके एक ज्ञान के सागर का निर्माण होगा जिससे हमारे बच्चे, शिक्षक और सभी लोग लाभान्वित होंगे। लोकप्रिय विज्ञान की तमाम पुस्तकें कॉपीराइट से मुक्त पब्लिक डोमेन में हैं। सबसे पहले उनसे ही शुरुआत करनी चाहिए। रीडर्स डायजेस्ट के इतिहास में वैज्ञानिक लेखों की एक श्रंखला ‘आई एम जोज़ बॉडी’  को अद्भुत सफलता मिली। शरीर के प्रत्येक अंग पर इन 26 लेखों को जे. डी. रैडक्लिफ ने लिखा है। मेरी जानकारी में किसी भी भारतीय भाषा में इन सुन्‍दर लेखों का अनुवाद नहीं हुआ है। (इनका हिन्‍दी अनुवाद डाॅ.अरविन्‍द गुप्‍ते ने बालविज्ञान पत्रिका चकमक के लिए किया था। चकमक में इनकी एक श्रंखला प्रकाशित हुई है। - राजेश उत्‍साही )

मनीष श्रीवास्तव: आजकल जिस तरह से युवाओं को विज्ञान शिक्षा दी जा रही है उसके बारे में आपके विचार क्या हैं?

अरविन्‍द गुप्ता: हमारे विद्यार्थी विज्ञान को रटकर उसकी परिभाषाओं को परीक्षा में थूक आते हैं। वे बहुत अच्छे अंक भी प्राप्त करते हैं पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण और विज्ञान के अचरज से अछूते रहते हैं। आप तैराकी पर चाहें कितनी भी किताबें क्यों न पढ़ लें, आप चाहें तैराकी पर पीएच.डी. भी क्यों न कर लें, आपको तैराकी तभी आएगी जब आप पानी में कूद कर अपने हाथ: पैर चलाएँगे। यह बात विज्ञान के लिए भी सच है। जब तक बच्चे अपने हाथों से प्रयोग नहीं करेंगे तब तक उन्हें विज्ञान का मजा और मर्म कैसे समझ में आएगा? विज्ञान शिक्षण में आमूल परिवर्तन होने चाहिए। होशंगाबाद विज्ञान कार्यक्रम एक अनूठा प्रयास था। मध्य प्रदेश के एक लाख से अधिक बच्चे गतिविधि आधारित विज्ञान सीख रहे थे। यह एक बेहद सस्ता और हमारी परिस्थितियों के अनुकूल कार्यक्रम था। पर आज से 15 वर्ष पहले डीपीईपी कार्यक्रम आया। इसमें विश्व बैंक का अथाह कर्ज था जिसे देख राजनैतिक वर्ग की लार टपकने लगी। डीपीईपी कार्यक्रम के लिए सरकार ने होशंगाबाद विज्ञान कार्यक्रम को बन्‍द कर दिया और लाखों बच्चों को अच्छी विज्ञान शिक्षा से वंचित कर दिया।

मनीष श्रीवास्तव: इतने लम्‍बे समय से आप विज्ञान संचारक की भूमिका का निर्वाह कर रहे हैं। इस लम्‍बी यात्रा के कुछ और अनुभव हमारे साथ बाँटना चाहेंगे?

अरविन्‍द गुप्ता: मुझे अपने देश के 3000 स्कूलों में बच्चों के साथ काम करने का अवसर मिला है। अभी तक मुझे स्कूलों में खराब मैनेजमेंट, खराब प्रिंसिपल और तमाम खराब शिक्षक मिले हैं पर अभी तक कोई खराब बच्चा नहीं मिला है। हर जगह मुझे बच्चों की आँखों में चमक और ज्ञान की भूख नजर आती है। यह सबसे बड़ी उम्मीद है। मुझे 20 देशों में बच्चों और शिक्षकों के साथ काम करने का मौका मिला है। पर हर बार जब मैं अपने किसी स्कूल में जाता हूँ तो बच्चों में मुझे आशा दिखती है। हमारी पीढ़ी ने उनके लिए मिट्टी नहीं बनाई है। यह काम अभी अधूरा है और इसे मरते दम तक हमें करते रहना है।

मनीष श्रीवास्तव: बच्चों और युवाओं हेतु आपका सन्‍देश।

अरविन्‍द गुप्ता:  पिछली शताब्दी के महान अमरीकी लेखक मार्क ट्वेन ने कहा था, स्कूलों को अपनी असली शिक्षा में आड़े मत आने दो। यह एक अच्छा मंत्र है। महामहिम अम्बेडकर ने भी हमें यही सीख दी थी, अपनी शिक्षा की ज़िम्मेदारी खुद अपने हाथों में लो। सरकारी और निजी संस्थाओं (जिनमें स्कूल शामिल हैं) का मुँह मत ताको। उनका नारा था-खुद शिक्षित हो, संगठन बनाओ और संघर्ष करो!

( एकलव्‍य द्वारा संचालित स्रोत फीचर्स के सौजन्‍य से। फोटो : गूगल इमेज )

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pramodkumar का छायाचित्र

यह साक्षात्कार पहले भी कहीं पढा है । लेकिन आज भी यह उतना ही प्रासंगिक है जितना पहली बार छपने पर रहा होगा ।अरविन्द गुप्ता जी के महती योगदान को शब्दों में व्यक्त कर पाना सम्भव नहीं होगा । गणित और विज्ञान शिक्षण को कितना रूचिपुर्ण और आनन्ददायी बनाया जा सकता है उसे हजारों– हजारों शिक्षकों नें स्वयं कर देखा है और आज भी कर रहे हैं ।आभार

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