किसी 'खास' की जानकारी भेजें। अपील : बसेड़ा के हिन्‍दी वाले माड़साब से बच के रहना

नमस्कार,
बसेड़ा में हिन्‍दी के नए माड़साब आए। आए तो कोई बात नहीं मगर रोज ही स्कूल आ जाते हैं। सप्ताह में एक दो दिन तो गोताखोर अवकाश लेना चाहिए था ना उन्हें। ये बिलकुल अच्छी बात नहीं है हाँ कह देते हैं। कक्षा में आते हैं मगर सीधे किताब पढ़ाने लग जाते हैं, अरे कभी कक्षा में अखबार ही पढ़ लेते और कुछ देर मोबाइल पर फेसबुक और वाट्स एप कर लेते तो माड़साब-जात पर कायम हमारा अटूट विश्वास तो नहीं टूटता। खाली पीरियड में भी खाली नहीं छोड़ते हैं, आ टपकते हैं हिन्‍दी वाले माड़साब। एकदम नवरे हैं। कभी कक्षा और स्कूल को अपना घर कहते हैं और हमसे स्कूल को घर जैसा समझने का दबाव डालते हैं। समय पर आ टपकते हैं। बारिश तक का बहाना बनाना नहीं आता उन्हें। कुछ सटके हुए लगते हैं हिन्‍दी वाले नए माड़साब। प्रार्थना में हमारे साथ ही योग करने जमीन पर बिछी जाजम पर बैठ जाते हैं। पूरे नाटकबाज हैं। कभी अपने मोबाइल से तानपुरा बजाकर ध्यान करवाते हैं। इतने प्रयोग किसी अध्यापक को शोभा नहीं देते हैं। लीक से हटकर भी किसी गुरु को चलना चाहिए भला? राम राम। घोर अलोकतांत्रिक माहौल। बच्चे जाएँ तो कहाँ ? योग करते हुए अनुलोम हो या विलोम, सब हमारे देखा देखी खुद भी करते हैं। असल में खुरापाती हैं, कुछ न कुछ सोचते विचारते रहते हैं। मौका देखते हैं और अपना विचार हमारे मानस पर चपेक देते हैं।

साँवले से हैं और शक्ल अच्छी है। एक दिन छोड़कर दाढ़ी बनाते हैं और हाँ फेरन लवली नहीं लगाते हैं। सादे कपड़े पहनकर आते हैं। प्रार्थना सत्र में अखबार पढ़ते बच्चों को बीच में ही टोकते हुए उनका उच्चारण ठीक करवाकर ही दम लेते हैं। जिद्दी कह लीजिएगा। कभी कभार एकाएक इतना जनरल नॉलेज उंडेल देते हैं कि क्या कहें। बड़े निर्दयी और नए टाइप के हैं। उन्हें एकाएक समझना मुश्किल काम है। कहीं से भी माड़साब नहीं लगते हैं। हर इलाके का नॉलेज रखते हैं। धाराप्रवाह बोलते हैं। कहते हैं पहले आकाशवाणी में दस साल तक बोले, अब वक्‍त नहीं मिलता उन्हें। आकाशवाणी की कसर अब हम पर निकालते हैं। हम मुँह फाड़े उन्हें सुनते रहते हैं। क्या गजब का बोलते हैं। पहले वालों की तरह अटकना और हकलाना तक भी नहीं आता उन्हें। पढ़ाते वक्‍त पासबुक के हाथ नहीं लगाते। हिन्‍दी जैसे विषय में भी श्यामपट्ट काम में लेते हैं। भोले कहीं के। जाने कहाँ-कहाँ से नई-पुरानी तरह तरह की किताबें माँगकर लाते हैं और चुन-चुनकर हममें से ही किसी को जबरन पकड़ा देते हैं। एक तो सिलेबस को ही हम थाम नहीं पाते ऊपर से चम्पक, बाल भारती, राजकमल की प्रतिनिधि कहानियाँ, चकमक और न जाने क्या क्या? एकदम बेतरतीब आदमी हैं हिन्‍दी वाले माड़साब।

ये चिट्ठी आपको उनसे बचकर रहने की सलाह के लिए लिखी जा रही है। हम नहीं चाहते हैं कि आप भी उनके चंगुल में फँसो। पहले हम आराम से थे जब वे नहीं थे। उनके आने से काम बढ़ गया है। सुबह स्कूल खोलते ही आईना बाहर रखो, उसमें अपनी शक्ल देखो, बाल सँवारो, कक्षा और उसके बाहर का आँगन साफ रखो, खुद के कमरे की लाइट और पंखें उपयोग नहीं हो तो बन्‍द करो। डस्टबिन खाली करो, रोज का कचरा रोज जलाओ। असल में उनके आने से टेंशन और मगजमारी ज़्यादा बढ़ गई है। हम सीबीआई जाँच कराना चाहते हैं कि क्या बीते महीने राज्यभर में लगे सभी हिन्‍दी वाले नए माड़साब इसी टाइप के हैं या हमारी ही किस्मत खराब थी। खैर, कक्षा बारह और ग्यारह में दिनभर में कम से कम तीन-तीन बार पढ़ाने जाते हैं। आप ही बताओ एक ही बोरिंग आदमी को कोई कितनी देर सुने। बोलते हैं तो इतना अच्छा और जानकारी भरा कि हम बड़े चाव से सुनते हैं। हमारे पास कोई चारा नहीं बचता। हमारे माड़साब हैं लेकिन इतना मीठा बोलते हैं कि उनकी शक्ल हमारे बड़े भाई, बड़ी बहन, माँ-पिताजी से मेल खाने लगती है। समझ में ये नहीं आ रहा कि ऐसा करके वे अध्यापकों की बनी बनाई परिपाटी को और मिसालों को तोड़ना क्यों चाहते हैं भला ?

हिन्‍दी साहित्य पढ़ाते हुए सिलेबस से इस कदर बाहर जाते हैं कि हम विद्यार्थी उनके घर-परिवार के हो जाते हैं। वे हमें दुनियादारी, जिन्‍दगी, सही रास्ते, चुनाव, विवेक, देश, सत्ता और बेहतर नागरिकता जाने कहाँ-कहाँ ले जाकर वापस किताब में लाकर छोड़ते हैं। बसेड़ा की भोली जनता को इतना घुमाना और गहराई से पढ़ाना अच्छी बात नहीं। टीन एज की फिसलन, करिअर की मुश्किलें, कॉलेज का आकर्षण और हकीकत, ग्रामीण पिछड़ापन और हमारा समय, टीवी और उसका बाजार जैसे दर्जनों विषय उनकी जबान पर हर कभी चस्पा अनुभव हुए। कई बार मुद्दे हमारी समझ के बाहर ही साबित हुए। उनके द्वारा सबकुछ समझा देने की उमंग और स्नेह के वे मौके हमें उनके करीब ले जाकर छोड़ते महसूस हुए। एकदम जुदा किस्म के इंसान हैं हिन्‍दी वाले माड़साब। हमें नालायक कहकर पुकारते हैं और खुद को महा-नालायक। कहते हैं सभी को खुद की तरह बिगाड़कर छोड़ेंगे। कभी-कभार हँसते हैं, हाँ जब हँसते हैं तो उनका एक अतिरिक्त दाँत बड़ा सुन्दर लगता है। वैसे दिल के इतने बुरे भी नहीं है मगर वे कबीर पढ़ाते-पढ़ाते जाने क्यों प्रहलाद सिंह टिपानिया, शुभा मुद्गल, प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल, कुमार गन्धर्व जैसी संज्ञाएँ उगलने लगते हैं। उनका बस चले तो हमें शबनम विरमानी की निर्देशित तीन फिल्में भी दिखा दें। हम डर रहे हैं कि जिस दिन हमारे बसेड़ा स्कूल में म्यूजिक सिस्टम आ जाएगा, माड़साब हमें उनके वरिष्ठ साथी प्रो. दुर्गा प्रसाद अग्रवाल का दिया हुआ कबीर यात्रा प्रोजेक्ट का ऑडियो संग्रह भी सुनाएँगे ही। कितने बहुधंधी व्यक्ति लगते हैं ये।

आदमी एकदम पागल है साहेब। कबीर के तीन पेज के पाठ को तीस पेज में पढ़ाता है। मुंशी प्रेमचंद और प्रसाद की कहानियों पर बात करता है तो हमारी पाठ्यपुस्तक छोड़कर कोई रामचन्‍द्र तिवारी जी हैं उनकी मोटी किताब 'हिन्‍दी का गद्य साहित्य' और विश्वनाथ त्रिपाठी जी की 'हिन्‍दी साहित्य का सरल इतिहास' और भी जाने क्या-क्या लाकर उनमें से पन्ने उलट-पलटकर पढ़ाते हैं और लिखाते अलग से हैं। बच्चों की जान लेंगे क्या? माड़साब कुछ करना चाहते हैं। आखिर में हमने भी हार मान ली। उनके हिसाब से चल रहे हैं। अब जो होनी है उसे कौन टाल सकता है। जो लिखा होगा होकर रहेगा। इन माड़साब की स्पीड हमसे रुकेगी तो है नहीं। उन्हें और हमें मंजिल जरूर मिलेगी, ऐसा हमें भी लगने लगा है। खैर मगर आप ऐसे खतरनाक माड़साब से बचकर रहिएगा। हम तो जकड़ लिए गए हैं। अब सबकुछ लाइलाज हो गया है। चारों तरफ अन्धेरा है। जिस तरफ से उजाला आ रहा है उसी तरफ हिन्‍दी वाले माड़साब खड़े हैं। एक और बात चलते-चलते कि ये जिसे अपना शिष्य बनाकर पढ़ाते और डुबोते हैं तो फिर कहीं का नहीं छोड़ते। हम आपके बचे रहने की कामना करते हैं। आज के लिए इतना ही। नमस्ते।

बसेड़ा के बच्चे।
(बसेड़ा की डायरी,14 जुलाई,2017,लेखक : माणिक)


माणिक जी स्‍वयं राजस्‍थान के चित्‍तौड़गढ़ के बसेड़ा में शिक्षक हैं। यह विवरण उनकी फेसबुक पोस्‍ट से साभार।

टिप्पणियाँ

parveenwrites का छायाचित्र

माड़साब
आपका आना अच्छा लगा।
आप थोड़ा देर से तो आएं हैं पर सच कहूँ तो हम जैसे लोगों के लिए समय से ही हैं।
आप यहीं रहना। ऐसे ही रहना।

parveenwrites का छायाचित्र

वाह। अद्भुत।
कबीर का ज़िक्र और उसमें ये सब नाम! सच अगर बच्चों को ऐसे पढ़ाया जाए तो जीवन आ जाये।
अच्छा लगा महसूस करके कि मैं जो अनायास ही करने लगता हूँ, एकदम सही है, सबसे सही।
जीवो जी आप लिखने वालों।

pramodkumar का छायाचित्र

काश ! ऐसे टीचर हर स्कूल में हों .

harshrudr22@gmail.com का छायाचित्र

एक नया अनुभव

rajkumarpal का छायाचित्र

हम सभी को ऐसा बनना ही होगा,,,तभी अपने ओहदे से वफा निभा सकेेंगे,,,

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