अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी लर्निंग कर्व हिन्दी अंक 22 सितम्बर,2020 विकलांग बच्‍चों के शिक्षण का परिप्रेक्ष्‍य शिक्षक-प्रशिक्षण कुंजी है * इन्दु प्रसाद । समावेशी शिक्षा : एक सुसंगत समझ के निर्माण में चुनौतियाँ * डॉ. अंकुर मदान । विकलांग बच्चों के लिए अधिगम के अवसर पैदा करना * अनुपमा राय । समावेशन, विशेष आवश्यकताएँ और चिन्तनशील शिक्षक * अनुराधा नायडू । ज़रूरी है परिवार का शामिल होना * फाल्‍गुनी दोषी । अदृश्य विकलांगताएँ * अर्पिता यादव । प्रभावी रणनीतियों के माध्यम से प्रारम्भिक बाल्यावस्था शिक्षा में समावेशन को बढ़ावा देना * अरुणा ज्योति । विकलांग बच्चों में यौन भावना और यौन स्वास्थ्य शिक्षा * डॉ. गिफ्टी जोएल । सम्पूर्ण स्वीकरण * कमला मुकुन्दा । वह बीमार नहीं है * गोदावरी वर्मा । विकासात्मक विलम्ब की प्रारम्भिक पहचान में शिक्षक की भूमिका * किन्नरी पंड्या । सभी के लिए एक गरिमामय जीवन : शिशु सरोथी की यात्रा * ममता घोष और नेहा दास । डिस्लेक्सिया और बहु-बुद्धिमत्ता के सिद्धान्त को समझना * मृदुला गोविन्दराजू । विकलांगता को विविधता के रूप में देखना * प्रणाली शर्मा । अभिभावकों को बिना देर किए मदद लेनी चाहिए * नीता एवं नितिन नायक । अक्षमताओं की बजाय क्षमताओं के साथ कार्य करना * पुष्‍पलता पांडेय । सहानुभूति नहीं अवसर चाहिए : विकलांग बच्चों के लिए बाल मेला * शंकर बडगा, अनवर और वेंकटेश के साथ । स्वीकरण का लम्बा रास्ता : सीता कृष्णमूर्ति । विकलांग बच्चों की शिक्षा : उचित समर्थन के साथ समावेशन का अधिकार * डॉ. सुदेश मुखोपाध्याय । सौजन्यता -चुनौतियों के बावजूद : एक बहन के उद्गार * प्रेमा रघुनाथ । यात्रा के माध्‍यम से अधिगम : दीपिका स्कूल के अनुभव * सुमति रामजी । भारत में समावेशी शिक्षा : संकल्पना से वास्तविकता तक * डॉ. उमा तुली । विशेष शिक्षा में परिवार, स्कूल और समुदाय की भूमिका * उषा मदान । एक महान मनोरथ के लिए काम करना : साक्षात्‍कार एक विशेष शिक्षक के साथ : विजयश्री पी.एस.
व्यापक मुद्दे - एनसीएफ के तरीके से विज्ञान सीखना * इन्दु प्रसाद । ज्वलंत प्रश्न और उनमें छिपी ज्ञान की लौ * कृष्णन बाल सुब्रह्मणयम । वैज्ञानिक सोच का विकास * दिलीप रांजेकर । कक्षा के भीतर - कुछ करके देखें, कुछ बना के देखें * अरविन्द गुप्ता । विज्ञान की कक्षा में बच्चों की आवाज * ज्योत्सना वीजापुरकर । साकार से निराकार की ओर * जी.एस. जयदेव । कक्षा में प्रयोगशाला : मन में आविष्‍कारी सोच * नीरजा राघवन । विज्ञान को रोचक कैसे बनाएँ * यास्मीन जयतीर्थ । विज्ञान में मूल्यांकन की क्षमता * विष्णु अग्निहोत्री, निश्चल शुक्ला,अपूर्व भण्डारी । शिक्षक की अहम भूमिका । विकासशील शिक्षक * कमल महेन्द्रू । स्कूली शिक्षक : परिवर्तन के वाहक * विजय वर्मा । विज्ञान का इतिहास समय के झरोखे से विज्ञान की यात्रा * नन्दिता नारायणसामी । वैज्ञानिक भी गलती करते हैं * नीरजा राघवन । मैंने विज्ञान क्यों चुना समझने की तलाश * ऊषा पोनप्पन । मुझे रसायनशास्त्र से प्यार क्यों है ? * नीरजा राघवन । एक मिसाल का अध्ययन - शिक्षा जनान्दोलन की की ओर – तमिलनाडु साइन्स फोरम (टीएनएसएफ) और स्कूली शिक्षा * टी.वी. वेंकटेश्वरन् । फाउण्डेशन का अनुभव - विज्ञान उत्सव : विज्ञान मेला * उमाशंकर पेरियोडी । शिक्षकों के लिए संसाधन सामग्री - कुछ संदर्भ किताबें जो विज्ञान को मजेदार बनाती हैं । प्राथमिक और माध्यमिक स्कूल के विज्ञान के लिए उपयुक्त वैबसाइट्स और ई-संसाधन । विज्ञान की गतिविधियों और खेलों वाली कुछ किताबें । विज्ञान शिक्षण में सक्रिय कुछ महत्वपूर्ण संगठन पुस्तक समीक्षा ‘ श्योरली यू आर जोकिंग, मि.फाइनमैन !’ रिचर्ड पी. फाइनमैन * नीरजा राघवन । स्मॉल साइन्स सीरिज - एचबीसीएसई * उमा हरिकुमार
लर्निंग कर्व का यह अंक शिक्षक-विकास के मुद्दों की जाँच-पड़ताल पर केन्द्रित है। इसके केन्‍द्रीय लेख शिक्षक-विकास की नीति और व्‍यवहार के बारे में हैं और विकल्‍प सुझाते हैं। कुछ अन्‍य लेख पाठ्यचर्या और उसकी वास्‍तविकताओं की विस्‍तृत चर्चा करते हुए लैंगिक संवेदनशीलता और सेवापूर्व शिक्षक-तैयारी के मुद्दों की पड़ताल करते हैं। निजी और सरकारी, दोनों तरह की संस्‍थाओं से सम्‍बद्ध, जमीन पर काम करने वाले लोगों के लेख हैं। इस अंक में शिक्षकों ने अपने व्‍यावहारिक अनुभवों की याद भी ताजा की हैं।
लर्निंग कर्व हिन्‍दी अंक 13 : अक्‍टूबर, 2016 ‘भारत में सार्वजनिक शिक्षा तंत्र’ पर केन्द्रित है।
लर्निंग कर्व : मई,2016 ‘उत्‍पादक काम और शिक्षणशास्‍त्र’ अंक में खण्‍ड क : परिदृश्‍य - नई तालीम,आज : कुछ समस्याएँ और सम्भावनाएँ * सुजीत सिन्हा । बुनियादी शिक्षा * डॉ. कृष्‍ण कुमार के कुछ विचार । बुनियादी शिक्षा का मूलतत्व * हृदय कांत दीवान । कक्षा के बाहर काम और सोच-विचार के माध्यम से सीखना * अर्धेन्दु शेखर चटर्जी । नई तालीम : उत्पादक कार्य से सीखना : एक चिन्तन * प्रदीप दासगुप्ता खण्‍ड ख : कार्यक्षेत्र से : जहाँ बच्चे ज्ञान निर्मित करते हैं * अमित भटनागर । काम और शिक्षा: थुलीर के अनुभव * अनु तथा कृष्‍ण । शिकक्षत्व की खोज * बिन्दुबेन । हमारी धरती, हमारा जीवन * दीवान सिंह नागरकोटी । निमार्ण,परवाह करने वाले समाज का * मीनाक्षी उमेश । सीखना जीवन भर * प्रेमा रंगाचारी । दैनिक जीवन में ऊर्जा की खोजबीन बनाम अन्तर्सम्बन्धों की खोज * राधा गोपालन मशरूम उत्पादन से शिक्षा और उसका अन्य विषयों से सम्बन्ध * शहाबुद्दीन अन्सारी । मदद करते हुए सीखना * सुरेश कुमार साहू,राकेश टेटा और गुलशन यादव । समेकित तथा समग्र रूप से सीखने का एक सशक्त माध्यम * सुषमा शर्मा । काम पर केन्द्रित शिक्षा का लक्ष्यः महाराष्‍ट्र के माध्यमिक स्कूलों में बुनियादी प्रौद्योगिकी परिचय कार्यक्रम * योगेश कुलकर्णी खण्‍ड ग : कुछ, बड़े स्‍तर के प्रयास - संवहनीय ढंग से जीना सीखनाः पर्यावरण मित्र कार्यक्रम पर आधारित विचार* प्रमोद शर्मा और ऐनी ग्रेगरी । अर्थियन कार्यक्रमः काम और शिक्षा के नजरिए से * शाहीन शाशा और श्रीकान्त श्रीधरन । ग्रीन स्कूल कार्यक्रमः कक्षा के बाहर का एक अनुभव * सुमिता दासगुप्ता
लर्निंग कर्व का यह अंक समावेशी शिक्षा के विभिन्‍न पहलुओं पर केन्द्रित है।
लर्निंग कर्व का यह अंक शाला में समर्थकारी वातावरण के निमार्ण पर केन्द्रित है। पूरा अंक तीन खण्‍डों में बँटा हुआ है।
आकलन अब सीखने की प्रक्रिया का बहुत ही महत्त्वपूर्ण भाग बन चुका है। यह अच्छी बात है कि आकलन की प्रक्रिया में जबरदस्त बदलाव हुआ है और आकलन को अन्ततः विद्यार्थी की अपनी क्षमताओं के साथ जोड़ा गया है, जो भिन्न-भिन्न हो सकती हैं। सबके लिए एक से, तीर-तुक्के और अनुमान पर टिके तरीकों को त्याग दिया गया है और उनकी जगह आकलन के ज्यादा समझदारी भरे स्वरूपों को अपनाया गया है। अब निर्माणात्मक व योगात्मक आकलनों के दोहरे लाभ हमारे सामने हैं जिससे आकलन की समग्र प्रक्रिया सहभागिता-आधारित और पारदर्शी हो जाती है। सतत और व्यापक मूल्यांकन (सी.सी.ई.) तथा निर्माणात्मक और योगात्मक आकलनों की व्यवस्था को लागू करके केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सी.बी.एस.ई.) और अधिकांश अन्य परीक्षा मण्डलों ने बड़ी सफलता के साथ ज्यादा से ज्यादा बच्चों को इसके दायरे में शामिल कर लिया है। इस अंक में ऐसे कई लेख हैं जिनमें लेखकों ने मिश्रित क्षमताओं वाले समूह में सबके सम्मिलित ढंग से सीखने के लक्ष्य के साथ पढ़ाने के अपने व्यक्तिगत अनुभवों को साझा किया है। ऐसी शिक्षण कार्यविधियों ने (जो अब शिक्षण की तर्कसंगत पद्धति लगती हैं) जो बच्चों को अलग-अलग व्यक्ति के रूप में देखती हैं और कक्षा की समृद्धि के लिए हर बच्चे के योगदान को स्वीकार करती हैं, यह सुनिश्चित किया है कि हर बच्चा विश्वसनीय ढंग से अपनी गति से सीखे जिससे ‘अवलोकन, विश्लेषण, समीक्षात्मक सोच और सहयोगपूर्ण कार्यप्रणाली के वास्तविक जीवन सम्बन्धी कौशलों को’ हासिल करना निश्चित हो सके। पूरा अंक तीन खण्‍डों में बँटा है।
सीखने-सिखाने के नवाचारी तरीकों,पर केन्द्रित लर्निंग कर्व के इस अंक में - पाठ्यपुस्तकों से लिए गए तरीके नहीं बल्कि ऐसी तकनीकें, तरकीबें हैं, जो समयसिद्ध और कारगर रही आई हैं। ये एकदम व्यावहारिक हैं और भारत की अधिकांश कक्षाओं में पाई जाने वाली साधारण से साधारण परिस्थितियों में भी इन्हें किया जा सकता है। अध्यापन की इन विधियों को आजमाने के लिए किसी विशेष उपकरण की जरूरत नहीं। विषय चाहे एक-दूसरे से कितने ही अलग क्यों न हों, पर इन सबको जोड़ने वाला सूत्र एक ही है - कुछ अलग करना, कुछ नया करना - जिसके चलते बच्चे सीखने की प्रक्रिया में इस कदर रम जाते हैं कि वे उम्मीद से ज्यादा करने की ठान लेते हैं। इस अंक में देश भर से आए अलग-अलग स्तरों पर विभिन्न विषय पढ़ाने वाले अध्यापकों के लेख शामिल हैं।

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