आचार्य से सेवा प्रदाता की भूमिका : एक अन्तहीन यात्रा

हर युग में शिक्षकों और शिक्षा में उनकी केन्द्रीय भूमिका को मान्यता मिली है। लेकिन समय के साथ शिक्षकों की सामाजिक स्थिति और उनकी भूमिका में जो परिवर्तन आया है उस पर भी सहज ही ध्यान चला जाता है। पहले शिक्षकों को एक निर्विवाद गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त था, जो यह जानते थे कि क्या पढ़ाना है और कैसे पढ़ाना है; लेकिन यह स्थिति बहुत पहले ही समाप्त हो चुकी है।i आज राज्य का आग्रह यह है कि शिक्षक की जवाबदेही के नाम पर शिक्षा में सार्वजनिक निवेश पर अधिकतम लाभ प्राप्त किया जाए जिसका इस्तेमाल शिक्षक की स्वायत्तता को धीरे-धीरे नष्ट करने के लिए किया गया है। राज्य ने शिक्षा की लागत का कुछ हिस्सा माता-पिता को सौंप दिया है और वे इस हद तक सशक्त हो गए हैं कि ‘ग्राहक सन्तुष्टि’ जैसे वाक्यांश उपयोग में लाए जाने लगे हैं। नियमित शिक्षक के लिए लागू नियमों और शर्तों पर पैरा-शिक्षकों की नियुक्ति करके, राज्यों ने शिक्षकों के बीच सहानुभूति को नष्ट करने और असुरक्षा की भावना पैदा करने में सफलता पाई है, जिसके कारण उन्हें हतोत्साहित होकर आत्मसमर्पण करना पड़ता है और बिना किसी शर्त के हर आज्ञा माननी पड़ती है। इस वजह से हमारी शिक्षा प्रणाली, विद्यार्थियों और माता-पिता के मन में शिक्षण और शिक्षक की भूमिका के बारे में भी परिवर्तन आया है। ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि हम शिक्षकों के बारे में अपनी समझ पर पुनर्विचार करें।

अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन की शैक्षिक पत्रिका लर्निंग कर्व फरवरी,2017 के अंक में प्रकाशित राजेश कुमार का यह लेख पूरा पढ़ने के लिए पीडीएफ डाउनलोड करें।

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