सरकारी बुनियादी स्कूलों में घटती छात्र संख्या के कारण क्या हैं?

By manohar chamoli... | जुलाई 24, 2013

समूचे देश में खासकर सरकारी बुनियादी स्कूलों में घटती छात्र संख्या के कारण क्या हैं? यह कहना कि इन स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षक पढ़ाते नहीं हैं। इन सरकारी स्कूलों में सरकारी शिक्षकों के बच्चे नहीं पढ़ते हैं। यह कारण एक तरफा होंगे। मुझे लगता है कि और भी कई सामाजिक,राजनैतिक,सामुदायिक और आर्थिक कारण होंगे, जिसके परिणाम स्वरूप सरकारी स्कूलों की साख दिन-प्रतिदिन गिरती ही जा रही है। आप क्या कहते हैं? आप क्या मानते हैं कि आखिर वे कौन-कौन से कारण हैं जिनकी वजह से सरकारी स्कूलों में छात्र संख्या घटती ही जा रही है।

 

 

ratanchoudhary का छायाचित्र

१.शिक्सकों की गैर शैक्षिक कार्यक्रमों मैं व्यस्तता २शैक्शिक नवाचारों के बहाने बार बार आते बदलाव ३निजि शिक्षण संस्थानों मैं प्रवेश को स्टेटस सिम्बल बतौर लेना ४राजनैतिक हस्तक्षेप ५उप्लब्धियो के प्रचार प्रसार का अभाव ६ अनावाशय्क रूप से स्कूल खोलना और क्रम्मोनत कर देना ७अभिभावको व शिक्षकों के मध्य तालमेल का अभाव ८अन्धाधुनिकिकरन १०कार्य की प्रसशा का अभाव

manohar chamoli 'manu' का छायाचित्र

आपने सही कहा। सारा दोष किसी एक पर नहीं दिया जा सकता। यह कहना भी ठीक न होगा कि शिक्षक नहीं पढ़ा रहे हैं तभी संख्या घट रही है।

sanjayghati का छायाचित्र

चमोली जी ने बहुत अच्छी चर्चा शुरू की है -----आपको badhaayee
ratan जी ने जो कारन दिए हैं मैं उनसे राजी हूँ
कुछ कारण जो और समाज में आते हैं बांटना चाहूँगा
१- ऐसा लगता हैं की जब चीजें पुराणी हो जाती है तो लोगों ka उनसे मोह भंग होने लगता है और वे चीजें भी एक जगह आकर जड़ होने लगती है/ और आज पतिस्पर्धा का युग है हमे टिके रहने के लिए खुद को लगातार अपडेट रखना होगा खुद से लेकर वयस्था के स्तर तक. जो हम कर नहीं पा रहे हैं.
२- मुफ्त में शिक्षा को भी एक कारण के रूप में देखता हूँ, लोग उसका महत्व नहीं समझते

manohar chamoli 'manu' का छायाचित्र

Sanjay singh ji.
सत्तर के दशक में या उससे पहले की स्थिति दूसरी थी। तब स्कूलों के विकल्प नहीं थे। अधिकतर वर्ग के बच्चे कुछ अपवादों को छोड़कर सभी सरकारी स्कूलों में पढ़ते थे। नब्बे के दशक तक आते आते स्थितियो में बदलाव आया। हमारे सरकारी स्कूलों में जिस तरह से समाज बदलता रहा। दुनिया बदलती रही तकनीक बदलती रही, कुछ नही बदला। मूलभूत सुविधाओं में भी कोई बेहतर सुधार नहीं हुआ। परिणाम यह हुआ कि बच्चे और अभिभावकों का मोह भंग होता चला गया। जिस तरह अवाम ने शिक्षा के महत्व को समझा सरकारी संस्थान के संचालक,अ धिकारी और सरकार भी उसी शिछृदत से इसे महसूस करते और अपडेट करते तो आज जो हालात हैं, वह कुछ ओर ही होते। फिर भी आज भी एक बड़ा तबका शिक्षा की जरूरी आम सुविधा के लिए मुह ताक रहा है, कम से कम उस वर्ग का ख्याल करते हुए संख्यात्मक नहीं तो गुणात्मक सुधार अपेक्षित हैं

editor_hi का छायाचित्र

मनोहर जी, इस बात पर और गहराई से बात करने की जरूरत हे कि क्‍या वास्‍तव में मूलभूत सुविधाओं में सुधार हुआ है या नहीं। हां यह सवाल हो सकता है कि उस सुधार का फायदा कितने लोगों तक पहुंचा। दूसरी बात सरकारी संस्‍थान,अधिकारी और सरकार में आखिर कौन लोग हैं... वे हममें से ही हैं....इसलिए इस बात को औरों के जिम्‍मे छोड़कर हम बच नहीं सकते। और संख्‍यात्‍मक और गुणात्‍मक दोनों ही स्‍तरों पर सुधार अपेक्षित है।-संपादक

kswami1978 का छायाचित्र

इसमें कोई दो राय नहीं कि वर्तमान परिप्रेक्ष्‍य में प्राइवेट स्‍कूलों में बच्‍चों का पढाना एक स्‍टेटस सिम्‍बल बन चुका है लेकिन इस स्‍टेटस सिम्‍बल को पोषित करने का कार्य समाज का आर्थिक प्रतिष्ठित वर्ग (शिक्षक, शिक्षाविद, अधिकारी, व्‍यापारी, राजनेता आदि) कर रहा है। इसका उदाहरण इसी पोर्टल पर ''एक अनुभव : अनेक सवाल'' की शुरुआती पक्तियों में देख सकते हैं ''काही हरी नेकर, हल्के हरे रंग की शर्ट, धारीदार टाई और जूते-मोज़े पहनकर वह ख़ुशी-ख़ुशी स्कूल जाता है।'' क्‍या पंक्तियां हमारे देश की बुनियादी स्‍कूली व्‍यवस्‍था में अविश्‍वास का एक कारण नहीं है? अर्थात इस पंक्ति से कोई भी अंदाजा लगा सकता है कि यह बच्‍चा किसी प्राईवेट स्‍कूल में पढता है, हालांकि इन पंक्तियों को वहां किसी अन्‍य संदर्भ में रखा गया होगा।

किसी भी समाज की दिशा और दशा को तय करने में उपरोक्‍त वर्ग की मुख्‍य भूमिका होती है और हमारी शिक्षा व्‍यवस्‍था भी इससे अछूती नहीं रही। हमारी शिक्षा व्‍यवस्‍था में अविश्‍वास के कारण अनेक हो सकते हैं लेकिन उपरोक्‍त वर्ग की ओर इशारा करना बहुत ही उचित लगता है, इतिहास गवाह है कि उक्‍त प्रतिष्ठित वर्ग ही सामाज दशा और दिशा तय करते रहे हैं और बाकी वर्ग तो सिर्फ आंकडों को घटाने और बढाने के काम आता रहा है।

हमारी बुनियादी शिक्षा व्‍यवस्‍था कारणों (प्रतिष्ठित वर्ग में अविश्‍वास) का भी समाधान किया जा सकता है लेकिन हमारे देश की राजनैतिक इच्‍छाशक्ति इस ओर ध्‍यान न देकर स्‍वार्थी बन गई और शिक्षाविद 'बेचारे' अपने-आपको कठघडे में खडे होने से बचाते रहते हैं और चाहते हुए भी बुनियादी शिक्षा व्‍यवस्‍था में अविश्‍वास के मुख्‍य कारणों को छोडकर चारों ओर गोल-गोल घुमकर इसको सुधारने का प्रयास करते रहे हैं लेकन किए जा रहे प्रयास हमारे देश की बुनियादी शिक्षा व्‍यवस्‍था के ढांचे को सुधारना ऊंट के मूंह में जीरा के समान साबित हो रहा है परिणामस्‍वरूप हमारी बुनियादी शिक्षा व्‍यवस्‍था अपना विश्‍वास तेजी खोती जा रही है।

शिक्षा का अधिकार कानून (शिक्षाविदों के प्रयासों का ही परिणाम रहा है) के बावजूद भी हमारे देश की बुनियादी शिक्षा व्‍यवस्‍था ने शहरों से तो अपना विश्‍वास बिलकुल खो दिया है और अब बहुत ही तेजी से गांवों में खोती जा रही है अर्थात शिक्षाविदों द्वारा किए जा रहे प्रयास अधने ही साबित हो रहे हैं।

हमारे देश की बुनियादी शिक्षा व्‍यवस्‍था में विश्‍वास कायम करने के लिए समाज की आर्थिक वर्ग पृष्‍ठभूमि में झांकना होगा और इस आर्थिक वर्ग की पृष्‍ठभूमि में 'टॉप टू बॉटम' (ऊपर से नीचे) विश्‍वास कायम करने पर विशेष काम करना पडेगा तब ही कही जाकर हम हमारे देश की बुनियादी शिक्षा व्‍यवस्‍था में समाज का विश्‍वास कायम कर सकते हैं अन्‍यथा सरकारी आंकडों में भी इसके विश्‍वास को बचा पाना मुश्किल होगा।

ख्‍यालीराम (शिक्षा विमर्श), दिगन्‍तर

editor_hi का छायाचित्र

आपकी बात से एक तरह से सहमति है। -संपादक

manohar chamoli 'manu' का छायाचित्र

आभार आपका। आपका विचार न केवल विचारोत्तेजक है बल्कि मनन करने योग्य भी है। उपचार के प्रयास तब हों जब रोग ने सारे शरीर में फैल जाए तो रोगी का क्या होगा? कौन नहीं जानता। अब भी यदि सरकारी स्कूल उन बच्चों को जो उनके प्रांगण में आ रहे हैं, उन्हें तराशें। हर फन में माहिर करे, तो बात बने। घटती छात्र संख्या चिंता का सबब ही न बनी रहे, बल्कि जो भी है, उन्हें चुनौतीपूर्ण मानकर मुकम्मल शिक्षा दिलाए। वे बच्चे स्कूल में आने से पहले भले ही हाशिए पर रहे हों, लेकिन स्कूल से जाने के बाद मुख्य धारा में होंगे तो वे ही सरकारी स्कूल के श्रृणी होंगे। ऐसा मैं सोचता हूं। आभार आपका कि आपने यहां आकर टिप्पणी दी।

editor_hi का छायाचित्र

मनोहर जी,शुक्रिया इस चर्चा को आगे बढ़ाने के लिए । मुझे कई बार लगता है कि अब समय है जब आप नकारात्‍मक उदाहरणों की बजाय सकारात्‍मक उदाहरणों पर चर्चा करें। अगर हम वास्‍तव में अपने आसपास नजर दौड़ाएं तो हमें ऐसे तमाम शिक्षक मिल जाएंगे, जो इन सबके बावजूद अपने सीमित संसाधनों में अपने तई बेहतर काम कर रहे हैं। चूंकि आप स्‍वयं शिक्षक हैं तथा आपमें क्षमता है कि ऐसे लोगों को सामने लाएं। क्‍यों न उनके बारे में भी कुछ लिखा जाए।-संपादक

kswami1978 का छायाचित्र

हम यहां हमारे देश की बुनियादी स्कूलों की उपेक्षा के सवाल को दूसरे तरीके से समझने की कोशिश करते हैं- क्या कभी हमने इस बात पर गौर किया है कि कोई भी बड़ी कंपनी किसी एक या दो व्यकक्तियों से शुरू होकर कैसे कुछ ही समय में विश्वस्तरीय बन जाती है ?

इस प्रकार की कंपनियां उत्पा्दन को विश्वोस्तनरीय बनाने की कोशिश तो करती ही है (इसी तर्ज पर हम भी लगातार शिक्षा में अनेक स्‍तरो पर गुणवत्ता कोशिश कर रहे हैं) लेकिन साथ में कंपनियां होने वाले परिलाभों में भी कार्मिकों की हिस्से्दारी बड़े शातिर तरीके से जोड़कर पेश करती हैं, फलस्व रूप कार्मिक कंपनी की ग्रोथ में अपना ग्रोथ देखना शुरु कर देते हैं और अनेक मानवीय असुविधाओं के बावजूद भी कार्मिकों के लिए कंपनी की ग्रोथ ही पहला उद्देश्य रह जाता है और कंपनियां विश्वस्‍तरीय बन जाती हैं। लेकिन इसमें भी दो राय नहीं है कि तमाम आरोपों के बावजूद और शीर्षत प्राईवेट कार्मिकों को छोड़कर अधिकतर समाज सार्वजनिक संस्थानों में कार्य को प्राईवेट कंपनियों की बनीस्बात ज्यादा सम्मानीय और प्रतिष्ठित मानता है।

इसलिए हमें शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के साथ ही बुनियादी स्कूलों के प्रति समाज और हमारे कार्मिकों में फैली अन्‍य अरुचियों को समाप्त करने और शैक्षिक कार्मिकों में उत्साह को जाग्रत करने के लिए इस शातिराना सोच से भी कुछ सीखना चाहिए और व्यवस्था में बदलाव लाना चाहिए। जब हम यह मानते हैं कि हमारे देश में सार्वजनिक संस्थानों के कार्मिकों को बेहतर मानवीय सुविधाओं की गारंटी दी गई है तो फिर क्यों न हम हमारी तमाम सार्वजनिक व्यवस्थाओं को विशेषकर बुनियादी शिक्षा व्यवस्था को उपरोक्त कंपनियों के विचारों की तरह (बुनियादी शिक्षा में स्कू‍लों के गिरते-बढते परिलाभों में जिनको तय किया जा सकता है में शामिल करके) बुने और गढे ताकि हमारे सार्वजनिक कार्मिक अर्थात शैक्षिक कार्मिक भी हमारी बुनियादी शिक्षा की ग्रोथ में अपनी ग्रोथ देखें और खोए हुए विश्‍वास को पुन: प्राप्‍त करें।

ख्यालीराम, (शिक्षा विमर्श), जयपुर

bhaskarshodh का छायाचित्र

क्या भारत का व्यापारी भारत के शिक्षक से उच्च चारित्रिक मानदण्डों का पालन करता है? भारत के शिक्षक को भारत के व्यापारी से अधिक नैतिक मानदण्डों की पालना नही करनी चाहिए ?  भारतीय अनुबन्ध अधिनियम, 1872 और भारतीय साझेदारी अधिनियम, 1932 के अनुसार कोई भी अनुबन्ध कर्ता अथवा साझेदार अपने अनुबन्ध अथवा साझेदारी के विपरीत आचरण तब तक नही कर सकता जब तक कि वह अनुबन्ध का एक पक्षकार है अथवा फर्म का साझेदार है। इसके अलावा साझेदार अथवा पक्षकार को साझेदारी अथवा अनुबन्ध के हितों की रक्षा के लिए अन्य शर्तों की पालना भी करना अनिवार्य होता है। अनुबन्ध और साझेदारी करने की आजादी के नाम पर वह कोई भी अन्य अनुबन्ध या साझेदारी नही कर सकता जो पूर्व समझौते के खिलाफ हो। उल्लंघन की दशा में दूसरे पक्षकारों को क्षतिपूर्ति का अधिकार है। अब सूचना के अधिकार के तहत देश के केन्द्रीय शिक्षा मंत्रालयों और राज्य शिक्षा मंत्रालयों से ये जानना जरूरी है कि वे शिक्षक की नियुक्ति के अनुबन्ध पत्र में एक आदर्श समाज की रचना में मददगार शिक्षक से किस तरह की अपेक्षाएं करते हैं। क्या नैतिक रूप से व्यापारी से भी कम चारित्रिक गुणों वाले नागरिकों को वे शिक्षक के रूप में नियुक्ति दे रहे है? अगर हाँ, तो फिर सरकार बताए कि वे अपने शिक्षा तंत्र के जरिये किस प्रकार की पीढि का निर्माण करने के लिए संकल्पित है?  शिक्षा जगत के लोग अपने बच्चों को सरकारी संस्थानों में न पढ़ा कर शिक्षा विभाग के साथ किए गए अनुबन्ध का सीधा सीधा उल्लंघन कर रहे हैं। अगर सेवा शर्तों में ये उल्लेख नही है तो ये नियुक्तियाँ अनुबन्ध के बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ किया गया अनुबन्ध है जो व्यर्थ है।   क्यों ना समस्त वर्तमान कार्यरत अध्यापकों की नोकरी समाप्त करदी जाए जो अपने बच्चों को निजी विद्यालयों में पढा कर अनुबन्ध अधिनियम की व्यवस्थाओं का उल्लंघन कर रहे हैं?  ---सरकारी स्कूलों के लिए सरकार तरह तरह की योजनाएं लाकर शिक्षा के प्रति अपने कर्तव्य को पूरा कर लेने का श्रेय ले लेती है परंतु सवाल ये है कि प्राथमिक, उच्च प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च माध्यमिक और अब तो महाविद्यालय स्तर पर सरकारी स्कूलों में पंजीयन की मात्रा कितनी है? जो भी परिवार अच्छी शिक्षा के लिए आर्थिक भार उठा सकता है वह सरकारी विद्यालयों की तरफ मुँह भी नही करना चाहता। सरकारी कर्मचारी भी अपनी शैक्षिक व्यवस्था पर यकीन नही करते, उनके बच्चे भी चुनाव की आजादी के नाम पर सरकारी विद्यालय छोड़ कर निजी विद्यालयों में पढ़ते हैं। प्रश्न ये है कि क्या वे अपने घर में बना खाना छोड़्कर रोज होटल में महंगा खाना खाने जाते हैं? अपनी आजादी का उपयोग वे घर पर भी क्यों नही करते? सामुहिक उत्तरदायित्व की भावना किस बेशर्म तर्क के सहारे हम त्याग देते हैं ये एक विचारणीय विषय है। घर के बने खाने की तो हम प्रशंसा करते हैं, कभी कभार मित्रों को भी बुलाते हैं, असली आजादी तो ये है कि आप अपने संस्थान में अन्य लोगों को भी आमंत्रित कर के अपने कार्य का प्रदर्शन कर पाएं। कम से कम शिक्षक को तो अनिवार्य रूप से अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में पढाना ही चाहिए। अन्यथा उसे शिक्षक पद से भी त्यागपत्र दे देना चाहिए। व्यवस्था से अगर शिकायतें है तो उसे अपने बच्चे के लिए रोज उस व्यवस्था से संघर्ष करना ही समाधान होना चाहिए, ना कि अपने बच्चे को किसी और प्राइवेट स्कूल में पढाना। या फिर वह अपने विद्यालय की मार्केटिंग कर के साबित करे कि वहाँ उपयुक्त गुणवत्ता और पंजीयन है। किसी परिवार में भी वह रोज खाना खाने से बचना चाहता है तो तलाक लेना ही उचित होगा ना? किसी को लगता है कि बच्चे के अन्यत्र अध्ययन अगर आवश्यकता है तो शिक्षा विभाग के उच्चतर अधिकारियों के सामने अपना पक्ष रख कर उसे अपने बच्चे को अन्यत्र पढाने की अनुमति लेनी चाहिए।   

editor_hi का छायाचित्र

शुक्रिया सुरेश जी, इस सारगर्भित टिप्‍पणी  के लिए।पर मुझे लगता है कि हम कुछ बातें अतिरेक में कहते हैं। हमारे देश में पक्‍के तौर पर सरकारी स्‍कूलों की संख्‍या निजी स्‍कूलों से कहीं ज्‍यादा है। इसलिए यह तो नहीं हो सकता कि हर सरकारी स्‍कूल के शिक्षक का बच्‍चा निजी स्‍कूल में पढ़ता होगा। बहरहाल आपकी बात का जवाब पड़ोस के स्‍कूल की अवधारणा में है।

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