विद्यालय : सजा या मजा...?

By editor_hi | नवंबर 8, 2013

बच्चों के लिए विद्यालय मजे की जगह है या फिर एक तरह का कैदखाना.... या फिर दोनों ही। शिक्षा का अधिकार अधिनियम स्पष्ट रूप से कहता है कि विद्यालय में बच्चे को किसी भी प्रकार से प्रताड़ित या दंडित नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन क्या नियम बना देने भर से बात पूरी हो जाती है। जब इस पर सोचने बैठते हैं तो कुछ इस तरह के बिन्‍दु उभरते हैं-

सजा क्यों दी जाती है? सजा किस-किस तरह की होती है? समस्या समाधान के लिए दी गई सजा से क्या वास्तव में लाभ होता है? सजा का बाल मन पर प्रभाव क्या प्रभाव होता है? क्या सिखाने के लिए सजा जरूरी है? विद्यालयी जीवन में सजा ने हमें सचमुच कोई दिशा दी या फिर भटकाव ? सवाल और भी हैं...आप क्‍या सोचते हैं..।

 

pramodkumar का छायाचित्र

स्कूल आनंदघर होना चाहिए. यहा सजा के लिए कोई स्थान नही होना चाहिए .

sanjayedn का छायाचित्र

शिक्षा प्राप्ति में सजा का होना यह बतलाता है कि सीखने के अवसर नहीं है . सजा या फटकार लगाना बच्चों के मेमोरी को बर्बाद करता है और वो भी लम्बे समय तक के लिए .

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