राकेश कारपेन्‍टर : प्रशिक्षण में खेल,गतिविधि और संवेदनशीलता

By editor_hi | मई 30, 2013

प्रशिक्षण का माहौल सहज बनाने के लिए खेल गतिविधियाँ करवाई जाती हैं। लेकिन क्या कोई भी गतिविधि करवाई जा सकती है ? क्या गतिविधियों के पीछे छिपे निहितार्थ को समझना आवश्‍यक नहीं है?  मुझे शिक्षिकों की कार्यशाला में एक गतिविधि देखने को मिली। कार्यशाला नवनियुक्त सरकारी स्कूल के प्राथमिक शाला शिक्षकों की थी। गतिविधि का नाम था- शेर , दीवार  और बन्दूक।

स्रोत व्यक्ति ने प्रतिभागियों को दो समूहों में बाँट दिया। एक समूह में 12 शिक्षक थे और दूसरे में 13 । सन्दर्भ व्यक्ति ने गतिविधि को कैसे करना है इसके आवश्‍यक दिशा निर्देश दिए। प्रत्येक समूह को अपने लिए शेर, बन्दूक और दीवार में से कोई एक नाम चुनना था। साथ ही यह ख्याल रखना था कि इसके बारे में दूसरे समूह को जानकारी न हो। 

अगर पहले समूह ने तय किया कि वह शेर बनेगा और दूसरे समूह ने बन्दूक बनना तय किया तो शेर समूह गोली से मारा जाएगा और बन्दूक समूह को नम्बर मिल जाएँगे। इसी तरह एक समूह ने शेर बनना तय किया और दूसरे ने दीवार तो शेर दीवार को कूदकर निकल जाएगा। शेर समूह को नम्बर मिल जाएँगे। अगर एक समूह बन्दूक बना और दूसरा दीवार, तो गोली दीवार से टकराकर आएगी और नम्बर दीवार को मिल जाएँगे। अगर दोनों समूहों ने एक ही नाम रख लिए तो दोनों समूह को कोई अंक नहीं मिलेगा।

खेल शुरू हुआ। दोनों समूहों ने तय कर लिया कि वह क्या बनेगा। सन्दर्भ व्यक्ति ने गिनती शुरू की। तीन बोलते ही दोनों समूहों ने एक-दूसरे के ऊपर गोली चला दी। दोनों समूह के मुँह से गोली चलने की आवाज आई धांय....धांय। अर्थात दोनों समूह ने बन्दूक बनना तय किया था। जिसके चलते दोनों समूह मारे गए और किसी को कोई अंक नहीं मिला।

इस गतिविधि में शिक्षकों को बहुत मजा आ रहा था। सन्दर्भ व्यक्ति भी उनको यह गतिविधि बड़े उत्साह से करवा रहे थे। इस गतिविधि का चयन सन्दर्भ व्यक्ति के द्वारा ही किया गया था। लेकिन इस गतिविधि को देखकर मेरे मन में कुछ सवाल आए। दोनों समूह ने बन्दूक बनना ही तय क्यों किया ? दीवार क्यों नहीं बने ?  क्‍या बन्दूक के सहारे वह दूसरे को मारकर खुद को सुरक्षित रखना चाहते थे ?  

गतिविधि करते हुए जब भी कोई समूह बन्दूक बनता था तो उसके हाव-भाव अलग ही प्रकार के हो जाते थे। इस गतिविधि में जिस तरह बन्दूक का उपयोग शेर को मारने के लिए किया गया, उसने मुझे सोचने पर मजबूर किया। आखिर शेर को मारना क्यों जरूरी था। क्या शेर और मनुष्य क्या एक-दूसरे के साथ नहीं रहते हैं ? शिक्षकों के दोनों समूह ने बन्दूक बनना ही तय किया और एक-दूसरे पर गोली चलाई,  जिससे दोनों समूह मारे गए। यह भी हमारी मानसिकता को प्रदर्शित करता है।

यह तो निर्विवाद है कि शिक्षक प्रशिक्षण और इसमें की जाने वाली गतिविधियों का प्रभाव शिक्षक के मन और मस्तिष्क पर पड़ता है। अगर शिक्षा के उद्देश्‍यों की बात करें तो क्या उसमें यह शामिल नहीं है कि हम व्यक्ति को हमारे पर्यावरण, पेड़-पौधों और जानवरों के प्रति को संवेदनशील बनाएँ ? क्या इस तरह की गतिविधियों का चयन करना हमारे लिए ठीक है जिसमें हिंसा का भाव छिपा हो ?

शिक्षक इस गतिविधि को प्रशिक्षण में सीखकर अगर बच्चों के साथ करते हैं तो बच्चों के मन पर इस तरह की गतिविधि का क्या असर होगा ? अगर इस गतिविधि में बन्दूक से शेर को मारकर अंक हासिल करते हैं तो उन्हें तो शेर को मारना ही अच्छा लगेगा। क्योंकि यह अंक हासिल करने का मामला है। क्या यह सकारात्मक होगा ?

प्रशिक्षणों में इस तरह की गतिविधियों का उपयोग करना मुझे तो बहुत सहज नहीं लगता है। आप क्या कहते हैं ?


 

राकेश कारपेंटर, ब्लाक रिसोर्स परसन,  अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन ब्‍लाक एक्‍टीविटी सेन्‍टर,निवाई,टोंक 

 

om parkash sharma का छायाचित्र

बालकों के साथ किसी प्रकार की गतिविधि को करवाने से पूर्व आपको यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि आप उस गतिविधि के माध्यम से क्या करवाना चाहते है अर्थात आपका ल्क्ष्य क्या है। यदि गतिविधि निर्धारित उद्देश्य को पूरा नही करती तो उसको करवाने का कोई औचित्य ही नहीं बनता। गतिविधि उद्देश्य के आधार पर तैयार की जानी चाहिए न कि गतिविधि करवाने के बाद उद्देश्य निर्धारित किया जाए।

pramodkumar का छायाचित्र

हर गतिविधि में छिपे /जुडे उददेश्‍य को समझना आवश्‍यक है । हम बच्‍चे में संवदना , सहकारिता ,राष्‍ट़़ीय ऐक्‍य ,प्रक़ति प्रेम ,अहिंसा व़त्ति ,वीरता ,क्षमा करूणा आदि विकसित करना चाहते हैं ,तो उसी अनुरूप क्रियाकलाप चयन करने होंगे ।सकारात्‍मकता आवश्‍यक है ।

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