भय को खत्म करना है ....पर कैसे ?

By editor_hi | जून 18, 2013

नवीन पाठ्यपुस्तकों पर आधारित प्रशिक्षण चल रहा है। इसमें बार- बार एन.सी.एफ. का जिक्र आता रहता है। आना स्वाभाविक भी है, किताबें एन.सी.एफ. के दिशा निर्देर्शों को ध्यान में रखकर बनाई गई हैं। शैक्षिक तन्त्र पूरे जोर शोर से इस प्रशिक्षण को बेहतर व सफल बनाने में लगा हुआ है। शिक्षक इस प्रशिक्षण   के लिए मानसिक रुप से कितने तैयार हैं, यह अलग मसला है लेकिन वह  प्रशिक्षण में उपस्थित जरूर हैं।

भारी उमस में शिक्षकों को बैठना जब असहनीय हो जाता है तो वह प्रशिक्षण  कक्ष से निकलकर बाहर नीम की छाँव तले आ जाते है। कक्ष में पर्याप्त पंखों की व्यवस्था नहीं और अगर पंखे आ भी जाएँ तो बिजली नहीं है।

दक्ष प्रशिक्षकों के पास मॉड्युल नहीं होता है। श्यामपट्ट पर लिखने के लिए कभी-कभी चॉक भी उपलब्ध नहीं रहते हैं आदि। इन स्थितियों के बीच यह  प्रशिक्षण   चल रहा है। सारा तन्त्र व आला अधिकारी इन बातों से अच्छी तरह वाकिफ हैं। प्रशिक्षणों के निरीक्षण व बेहतर क्रियान्वयन की जिम्मेदारी आला अधिकारियों को दी गई है।

निरीक्षण की एक बानगी। लगभग सुबह के 11 बज रहे होंगे। एक गाड़ी आकर  प्रशिक्षण स्थल पर आकर रुकी। गाड़ी में से 4-5 लोग उतरे। उन्हें देख शिक्षक  जो नीम के तले खड़े थे प्रशिक्षण कक्ष में आने लगे। प्रशिक्षक महोदय उनको अन्दर आता देख कहते हैं शायद कचोड़ी आ गई है? किसी ने बताया कचोड़ी नहीं डी.ई.ओ. साहब आए हैं। साहब के आने की बात सुनकर वह भी अपने आपको दुरस्त करने लगे। प्रशिक्षक कहते हैं,डी.ई.ओ. साहब आए है इसलिए आपसे गुजारिश है आप अब बाहर नहीं निकलना।

कुछ संभागी अपने समूह का प्रस्तुतिकरण कर रहे थे। वे रुक गए और दूसरे समूह ने मना कर दिया कि हम अब प्रस्तुतिकरण नहीं करेंगे। हमारे प्रस्तुतिकरण के समय ही वह आ गए तो बहुत सवाल करेंगे। इस तरह जो काम चल रहा था वह भी रुक गया।

प्रशिक्षण के दौरान  प्रशिक्षक  शिक्षकों को डराने के लिए रीडिंग कैम्पेन, 16 सी.सी. व 17 सी.सी के नोटिस की चेतावनी देते रहते हैं। आज डराने के लिए डी.ई.ओ साहब भी उपस्थित थे। डी.ई.ओ साहब कक्ष में आए। उनके साथ सर्व शिक्षा अभियान के अन्य जिला अधिकारी भी थे। एक कैमरामेन भी था। वह इन गतिविधियों को रिकॉर्ड कर रहा था।

अधिकारी महोदय ने आते ही संभागियों के सामने प्रश्‍न रखा, आपने प्रशिक्षण में क्या-क्या सीखा है ? हॉल में सन्नाटा छा गया। अधिकारी महोदय ने प्रशिक्षक  से कहा, कुछ नहीं सिखाया क्या इनको ? प्रशिक्षक ने कहा अरे साहब सिखाया है और प्रशिक्षक ने भूमिका बनाते हुए कहा, साथियों हमने तीन दिनों में जो किया है उसके बारे में साहब जानना चाह रहे हैं तो आप लोग बे झिझक बताएँ डरने की कोई बात नहीं है।

लेकिन फिर भी कोई बोलने को तैयार नहीं। कक्ष में सन्नाटा पसरा हुआ था। अधिकारी महोदय ने कहा इतना डर किस बात का है। नई किताबें एन.सी.एफ. के आधार पर बनी हैं और एन.सी.एफ कहता है कि बच्चा बेझिझक बोले, भय मुक्त वातावरण हो और यहाँ तो शिक्षक ही नहीं बोल पा रहा है। दूसरे अधिकारी महोदय ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि डरने की जरूरत नहीं है। यहाँ आप गलती करने से नहीं डरे। गलतियों से ही तो सीखते हैं। यही माहौल हमें बच्चों को देना है उनकी झिझक दूर करना है।

एक संभागी ने हिम्मत दिखाते हुए कुछ बताने की कोशिश की। इसके बाद दूसरे संभागी ने अपने द्धारा प्रशिक्षण पर स्वरचित कविता सुनाई। माहौल कुछ सहज हुआ।

तीसरे संभागी खड़े हुए उन्होंने विस्तार पूर्वक प्रशिक्षण के दौरान हुए कार्यो को बताया और साथ ही कुछ अपनी परेशानियाँ रखीं। जैसे पहली कक्षा के बच्चों के साथ काम करने में दिक्कत आती है। प्री प्राइमरी की व्यवस्था होगी तो बच्चे ज्यादा बेहतर तरीके से सीख पाएँगे हमें उनके साथ पहली कक्षा में ज्यादा मेहनत नहीं करनी होगी।

डी.ई.ओ. साहब ने शिक्षक का नाम पूछा ? स्कूल पूछा। और फिर सुनाना शुरू किया। आप  शिक्षक  लोग 6 साल के बच्चे को तो सम्भाल नहीं पा रहे हो और प्री प्राइमरी की बातें करते हो। पहले 6 साल के बच्चे को तो कुछ सिखा दीजिए। अधिकारी महोदय का लहजा काफी सख्त था। अधिकारी महोदय की बात सुनकर कक्ष में पुनः सन्नाटा छा गया । इसके बाद किसी संभागी ने बोलने की हिम्मत नहीं दिखाई।

अधिकारी महोदय शुरुआत में जिस एन.सी.एफ का हवाला देकर भयमुक्त वातावरण निर्माण की बात कर रहे थे। उसको खुद भूल गए और अपने असली अन्दाज में शिक्षकों को खरी खोटी सुना रहे थे।

हम  शिक्षक  से अपेक्षा करते है कि वह बच्चों को भयमुक्त वातावरण देगा, लेकिन क्या हम उस  शिक्षक  को भयमुक्त वातावरण दे पा रहे हैं ? सिर्फ और सिर्फ  शिक्षक  से यह अपेक्षा क्यों है कि वह बच्चों को भयमुक्त वातावरण दे। जब  प्रशिक्षण  ही इतने भययुक्त वातावरण में होगा तो  शिक्षक भयमुक्त कैसे हो पाएगा ? आप क्‍या कहते हैं ?


 

राकेश कारपेंटर, ब्लाक रिसोर्स परसन,  अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन ब्‍लाक एक्‍टीविटी सेन्‍टर,निवाई,टोंक  

manohar chamoli 'manu' का छायाचित्र

आपने अधिकतर प्रशिक्षणों का जीवंत दृश्य उकेर कर रख दिया है जैसे। असल में दृढ़ इच्छा शक्ति की जरूरत है। कमोबेश अधिकारी खुद विद्यालयों से,पठन-पाठन से, प्रशिक्षणों से दूर हैं। जब बाढ़ को ही पता न हो कि खेत कहां से धंस सकता है। कहां से सुरक्षा करनी है। तब भला खेत कैसे हरा-भरा रहेगा। शिक्षा में भी यही हो रहा है शायद। शिक्षक को जब तक कारिन्दा भर समझा जाता रहेगा और उसके काम को महती न समझा जाएगा, यही होगा। घोर निराशा जो शिक्षकों के मन में बैठ गई है, उसके लिए कहीं न कहीं व्यवस्थाएं भी जिम्मेदार हैं। ऐसा नहीं है कि सभी प्रशिक्षक प्रशिक्षण को औपचारिक मानते हैं और शिक्षक भी हैं जो सकारात्मकता के साथ प्रशिक्षण में सहभाग करते हैं। ये ओर बात है कि अधिकारियों का नजरिया अब भी अंग्रेजियत हुकूमत-सा भरा ही होता है अधिकतर मामलों में। manohar chamoli

om parkash sharma का छायाचित्र

शिक्षक प्रशिक्षणों में केवल औपचारिकताओं को निभाने का काम होता है जो प्रशिक्षार्थी कार्यक्रम आयोजकों से गहरी साँठ गाँठ रखते हैं उनकी उपस्थिति केवल उपस्थिति पंजिका में ही होती है। प्रशिक्षण के विषय भी अधिकाँश ऐसे होते हैं जिनसे अध्यापक को कक्षा कक्ष में अध्यापन में कोई सहायता नहीं मिलती। अध्यापकों द्वारा तैयार की गई पुस्तकें विषयवस्तु, वर्तनी, लय, तुक की दृष्टि से उन पुस्तकों से भी घटिया होती हैं जिन्हें बस स्टैण्ड पर बसों में सस्ते दामों में बेचा जाता है।

praveentriovedi009 का छायाचित्र

शिक्षक प्रशिक्षण बीमार ......हो चुकें हैं और उनको सिरे से ख़त्म कर देना चाहिए :(

हालांकि शिक्षक प्रशिक्षणों का अपना महत्त्व है :)

pramodkumar का छायाचित्र

किसी प्रशिक्षण का जीवन्‍त चित्र खींचा आपने ावास्‍तव में प्रशिक्षण अपनी धार खो चुके हैं ा संकुल से डायट तक सब जिम्‍मेवार हैं ा अधिकारी वहा पहुचते हैं जहा से कुछ प्रसाद मिले ा शैक्षिक गुणवत्‍ता की बात बेमानी हो गई है ा भइया सब खाने -पीने का दौर चल रहा है ा बच्‍चों की आखों में सजे सपने बहीं मर रहे हैं ा

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