बदहाल सतत समग्र मूल्यांकन प्रक्रिया : मनीष दत्त शर्मा

By editor_hi | अप्रैल 28, 2016

वर्तमान परिदृश्य में देखें तो सतत समग्र मूल्यांकन प्रक्रिया को चलते हुए 6 वर्ष होने जा रहे हैं,क्या यह शैक्षिक प्रणाली को गुणवत्ता की दृष्टि से बदल पाया है, तो मेरा कहना है कि अभी कुछ परिवर्तन नजर नहीं आ रहा है। वास्तव में यह एक व्यवस्था का दूसरी व्यवस्था को प्रभावित करने के कारण हो रहा है। नींव अभी भी कमजोर है और उस कमजोर नींव पर कंगूरा खड़ा करने की कवायद की जा रही है। कोई भी नई व्यवस्था तभी लागू हो पाती है जब उसके लिए आधार बेहतर तरीके से तैयार कर लिया जाता है। मुझे ऐसा लगता है कि हम सब कुछ जल्दी से प्राप्त कर लेना चाहते हैं। शायद हम जरुरत से ज्यादा वैज्ञानिक हो गए हैं और एक जैसे प्रयोग हर जगह करने लगे हैं। जैसे बिना मौसम के हम सब्जी-फल उगाने लगे हैं उसी तरह से हम इंसानों पर, उसके क्रिया-कलापों पर प्रयोग करने लगे हैं जो दुष्परिणाम देने वाले साबित हो रहे हैं।  मैं यहाँ सतत समग्र मूल्यांकन की आलोचना या भर्त्सना नहीं कर रहा हूँ न ही इसकी वकालत करना चाहता हूँ। मैं बस चाहता हूँ कि इस प्रयोग के सार्थक परिणाम निकलें। बच्चों का सीखना हो, उनकी अकादमिक क्षमताओं में बढ़ोत्तरी हो।

वास्तव में सतत समग्र मूल्यांकन शैक्षिक व्यवस्था तथा तंत्र की व्यवस्थात्मक कड़ी के मध्य उलझकर रह गया है। व्यवस्थाएँ सुचारू नहीं हैं, सतत समग्र मूल्यांकन की सामग्री नहीं है या अगर है तो समय निकलने के बाद उपलब्ध हो रही है। यह वही स्थिति है कि आप युद्ध के मैदान में बिना अस्त्र–शस्त्र के खड़े हैं। सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि सतत समग्र मूल्यांकन को शुरू से ही गंभीरता से नहीं लिया गया। अगर इसे लागू करने से पहले कुछ कार्य धरातल पर कर लिया जाता तो आज विद्यालय मर्ज नहीं हो रहे होते। यहाँ एक व्यवस्था का दूसरी व्यवस्था पर जिस प्रकार कुठाराघात हुआ है, उस तरह से एक विरोधाभास की स्थिति पैदा होती जा रही है। सतत समग्र मूल्यांकन के कुछ मूल बिन्दुओं पर बात करें जो शिक्षा में  गुणवत्ता से सरोकार रखते हैं तो शिक्षक द्वारा पाठ योजना बनाना, शिक्षण सहायक सामग्री को शिक्षण प्रक्रिया के दौरान काम में लेना, बच्चा किस गति से आगे बढ़ रहा है ? उसे किसी भी कौशल को सीखने में कितना समय लगता है? बच्चों की कार्य प्रगति अभिभावकों से साझा करना, उनसे बच्चों की रूचि–अभिरुचि जानना ,बच्चों को उनके शैक्षिक स्तर को ध्यान में रखकर आगे बढ़ाना, इन सभी बिन्दुओं को देखें तो यही समझ आता है कि हमारे पास इन बिन्दुओं के पक्ष या सकारात्मक परिणाम के रूप में बहुत से तर्क हैं। फिर समझ में क्यों नहीं आता है कि सतत समग्र मूल्यांकन आज भी क्यों लड़खड़ा रहा है,वह क्यों नहीं अपने पैरों पर खड़ा हो पा रहा है।

सतत समग्र मूल्यांकन की चुनौतियों की बात करते हैं तो अकादमिक समस्याएँ कम, व्यवस्थात्मक समस्याएँ ज्यादा सुनने को मिलती हैं कि शिक्षक पर्याप्त नहीं हैं ,बच्चों की संख्या ज्यादा है,कैसे हर बच्चे को समझें–जानें,बच्चों की संख्या कम है, अब हम समूह कैसे बनाएँ, मैं तो एकल अध्यापक हूँ, हमारे पास कमरा नहीं है, गतिविधि कैसे,कहाँ करूँ ? पोर्टफोलियो का पैसा कहाँ से, किस मद से मिलेगा, मैं तो रिटायर होने वाला या होने वाली हूँ, इन तमाम समस्याओं को देखकर लगता है कि सतत समग्र मूल्यांकन पर जिस तरह से कार्य होना चाहिए था उस तरह से नहीं हो पाया है। 

मैं कहना चाहता हूँ कि अगर हमें बच्चों के शैक्षिक स्तर में इजाफा लाना है तो उसके लिए हमें किसी परियोजना या प्रोजेक्ट की जरुरत नहीं है, मैं तो यहाँ तक कहना चाहूँगा कि हमें उसे कोई नाम भी नहीं देना चाहिए। हमें अपने तंत्र /अपनी व्यवस्थाओं में कुछ बदलाव लाने होंगे, कुछ नीतियाँ बनाने पर कार्य करना होगा और उन नीतियों के लिए ठोस धरातल बनाकर उन नीतियों को क्रांति के रूप में दीर्घकालीन लागू करना होगा। अगर हम विकास की बात कर रहे हैं और वह बच्चो के विकास तक सीमित नहीं हैं। हमें इसे शिक्षकों,प्रशासनिक व्यवस्थाओं के विकास से जोड़कर भी देखना होगा, तभी राजकीय विद्यालयों में बच्चों की अकादमिक स्थितियाँ बदल  पाएँगी।

मनीष दत्त शर्मा, अज़ीम प्रेम जी फाउण्‍डेशन, ब्लॉक उनियारा (टोंक),राजस्थान         

 

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