फेसबुक पर केवल कांडपाल : निर्माणवाद

By editor_hi | जुलाई 6, 2013
शिक्षा जगत में निर्माणवाद की खूब चर्चा हैं । भारी भरकम शब्दावली से परहेज करके हम समझने की कोशिश करें इसे कुछ यूं कह सकते हैं- बच्चा तभी सीखेगा या ज्ञान का निर्माण करेगा जब वह उस ज्ञान को अपने लिए, अपने संदर्भों में अपनी मानसिक क्षमताओं से अपने मानसिक रूपों में पुन: गढ़ेगा और आत्मसात करेगा । दरअसल जानने एवं मानने में महत्वपूर्ण भेद हैं। बिना जाने मानना ज्ञान निर्माण में बाधक है जबकि जानकर मानना ज्ञान निर्माण का मार्ग है । और ये दोनो बाते अलग अलग भी हैं।.... आप क्‍या कहते हैं।
manohar chamoli 'manu' का छायाचित्र

जानना और मानना दोनों अलग चीजें हैं। मेरा बेटा अनुभव अक्तूबर को तीन साल का हो जाएगा। वह इस दुनिया की हर चीज को अपने संदर्भ से अपनी मानसिक क्षमताओं से गढ़ता है। वह जानता है कि उसे मुझे पापा कहना है। लेकिन जब हम अपने मूल घर में गए और मेरे दो भतीजों और भतीजियों ने मुझे चाचा जी कहकर कई बार बुलाया तो वह मुझे भी चाचा जी कहने लगा। मैंने उसे दो-तीन बार टोका और कहा कि चाचा जी नहीं पापा जी। फिर वह पापा जी कहने लगा। लेकिन फिर औरों द्वारा मुझे चाचाजी पुकारते रहने से वह मुझे फिर पापा जी कहने लगा। इसका अर्थ यह हुआ कि अभी अपनी मानसिक क्षमताओं के आधार पर अनुभव मान रहा है। जान नहीं रहा है। दूसरा उदाहरण छत पर घूम रहे पंखे उसके लिए आकर्षण का केन्द्र हैं। वह हर कमरों में जाकर पंखों को घूमता हुआ देखना चाहता है। बार-बार स्विच आॅन करता है। रसोई में जाकर कटोरी और लगभग एक बराबर से तीन चम्मचे लाकर जमीन पर पंखे की आकृति भी बनाता है। फिर हाथ से घूमा-घूमा कर घुर-घुर की ध्वनि निकालता है। यहां भी वह मान तो रहा है कि पंखे की तीन पंखुड़ियां होती है। बीच में गोल-गोल कोई आकृति होती है। मैं एक चम्मच और उठा लाया और चार पंखुड़ियां बना डाली तो उसने चैथी पंखुड़ी को एकदम से हटा दिया। दूसरे दिन मैंने उसकी तीन पंखुडियों का एक चम्मच हटा दिया तो उसने उसे फिर से जोड़ना चाहा। यानि वह मानता है कि पंखे में तीन पंखुड़िया होती ही हैं। न दो और न चार। अब मैं उसे दो पंखुड़ी वाला पंखा दिखाना चाहूंगा। ताकि वह जान सके कि पंखे की मूल अवधारणा क्या है।

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