जैव विविधता और कोरोना

By Madhav Patel | मई 20, 2020

(जैवविविधता दिवस 22 मई विशेष)
*जैवविविधता और कोरोना*
कोरोना महामारी से हमे जैव विविधता के महत्व का ज्ञान हुआ है एक ओर जहाँ अभी तक इसकी कोई कारगर औषधि का निर्माण नही हो सका है तब ऐसे स्थिति में जो वैकल्पिक उपचार किया जा रहा है उससे प्राकृतिक संसाधनों की अहमियत का अहसास हुआ है।फिर चाहे वो निम्बू लानी का सेवन,गोलोय का रस,या काढ़ा हो सभी निर्माण प्रकृति के अनमोल रत्नों से ही हुआ है।ये परिस्थितियां हमारे अनियंत्रित, अनियोजित विकास और रहन सहन से उत्पन्न हुई है।
प्रकृति ने हमारी पृथ्वी को विभिन्न जीवों एवं पादपों से संमृद्ध किया है,प्रत्येक जीव ,वनस्पति का अपने स्थान पर बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है।कल्पना करें यदि अपघटक न होते तो हमारी संपूर्ण पृथ्वी अपशिष्टों से भर चुकी होता वायु प्रदूषण इतना होता कि जीवन संभव ही नही होता।जो महत उत्पादक का है वही अपघटक का भी जैवविविधता के महत्व का पता हमे विभिन्न घटनाओ से चलता ही रहता है प्रकृति से छेड़छाड़ के दुष्परिणाम हमे दिखते ही रहते है चाहे उत्तराखंड के केदारनाथ की घटनाएं हो या वर्तमान की कोरोना से फैली महामारी जिसने बात दिया कि छोटे सूक्ष्मजीवों द्वारा दुनिया खत्म की जा सकती है।प्रकृति स्वयं का संतुलन करने के किये रिसेट करती है।अभी चल रहे लॉकडाउन में प्रकृति जैवविविधता के रंग विखेर रही है।
कोरोना वायरस का आक्रमण भी जैवविविधता असन्तुलन का परिणाम है।भौतिकता और विलासिता के लिए मानव ने। प्रकृति का बेशुमार और अनियोजित दोहन किया है।फिर चाहे प्राकृतिक संसाधन हो या खाने की अप्राकृतिक तरीको को अपनाना कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि कोरोना का उद्भव भी खाने की अव्यहारिक आदतों से हुआ है।जैसा कि प्राकृतिक सत्य है कि हर किसी बड़ी दुर्घटना से भी कुछ अच्छा भी निकल सकता है यही बार कोरोना प्रभाव पर भी लागू हो रही है।इसके कारण हुए लॉकडाउन से जैवविविधता संमृद्ध हुई है,प्रदूषण में भारी कम हुई है।एक रिपोर्ट के मुताबिक, 75 साल बाद पृथ्वी का वातावरण इतना साफ नजर आ रहा है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अभी सबसे ज्यादा हवा पानी शुद्ध हुआ है।हालांकि लॉकडाउन के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं को बहुत बड़ा झटका लगा है लेकिन पर्यावरण के शुभ संकेत ये है कि प्रायः सभी देशों में कार्बन उत्सर्जन रुक गया है कई स्थानों पर तो ये अब तक के आने निचले स्तर पर आ गया है।ग्लोबल कार्बन प्रोजेक्ट के प्रमुख और कैलिफोर्निया स्थित स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर रॉब जैक्सन के मुताबिक द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ऐसा पहली बार होगा कि धरती पर कार्बन उत्सर्जन सबसे कम होगा। उन्होंने बताया कि लॉकडाउन की वजह से पूरी दुनिया में कार्बन उत्सर्जन कम हो गया है। इतना ही नहीं साल 2020 में इकार्बन उत्सर्जन में 5 फीसदी की गिरावट आने की उम्मीद है।दुनिया के सभी प्रमुख देशो के शहरो की वायु पूरी तरह साफ हो गई है।
लॉकडाउन से प्रकृति का एक अलग रूप देखने को मिला है। सभी पर्यटन स्थल खाली पड़े हैं। इन सबके बीच प्रकृति ने एकबार फिर अपना रास्ता खोज लिया है।जापान और पोलैंड जैसे देशों की की सड़कों पर चौबीसों घण्टे जहां चारों तरफ वाहनों का शोर शोर हुआ करता था आज वह की वीरान सड़को पर हिरण अठखेलियाँ कर रहे है।शिकागो के म्यूजियम जहां पर लोगो का हुजूम लगा रहता था आज उस जगह पेंग्विन दौड़ रहे हैं।महामारी का बहुत बड़ा शिकार देश इटली के तटों से क्रूज गायब हो गए तो डॉल्फिन तटों पर आराम कर रही,तो नहरों का प्रदूषण खत्म होने से हंसों के जोड़े फिर लौट आये है।
इस्राइल के एयरपोर्ट पर कभी विमानों की गड़गड़ाहट की गर्जना थी तो आज सन्नाटे के बीच गीज पक्षियों ने अपने परिवार सहित आशियाना बनाया हुआ है।सिंगापुर की सड़कों जो हमेशा प्रोफेसनल्स से गुलजार रहती थी अब ऊदबिलाव से भरी पड़ी है।
ओड़िशा के रूशिकुलया बीच पर एक साथ हजारों की संख्या में कछुए दिखाई दिए हैं. करीब 8 लाख कछुए समुद्र से बाहर बीच पर दिखाई दिए।
लॉकडाउन से जहां यमुना के पानी मे सुधार आया है तो गंगा नदी का तो कायाकल्प से हो गया है।जो कार्य हजारों की संख्या का मानव श्रम और हजारों करोड़ की परियोजनाओं से नही हुआ वो प्रकृति ने स्वयं कर लिया।राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन(एनएमसीजी) द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार गंगा नदी के भिन्न तटों पर पानी की आक्सीजन के स्तर में सुधार हुआ है।केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार इस दौरान गंगा का पानी न केवल नहाने के लिए उपयुक्त हुआ है बल्कि जलीय जीवन के लिए भी अनुकूल हुआ है।इसका सबसे बड़ा प्रभाव दिखाई दिया है ओजोन पर्त पर वैज्ञानिकों के मुताबिक, लॉकडाउन के चलते प्रदूषण का स्तर कम हुआ है।जिससे आर्कटिक के ऊपर ओजोन पर्त का छेद अपने आप ठीक हो गया। नासा के मुताबिक नॉर्थ पोल यानी धरती का आर्कटिक वाला क्षेत्र के ऊपर एक ताकतवर पोलर वर्टेक्स बना हुआ था, जो अब खत्म हो गया है।ओजोन के क्षरण के मुख्य कारकों क्लोरोफ्लोरोकार्बन्स और हाइड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन्स की मात्रा बढ़ने से ये छेद लगातार बढ़ता ही जा रहा था। लेकिन इन तीनों की मात्रा लॉकडाउन के कारण घट गई जिसके सुखद परिणाम ये हुआ कि ओजोन पर्त खुद को रिपेयर कर रही है।लॉकडाउन का सकारात्मक प्रभाव केवल प्राकृतिक घटको पर ही नही बल्कि कई मानवीय घटनाओं पर भी दिखाई दिया है रिपोर्ट के अनुसार अपराध के मामले लगभग आधे हो गए हैं. पीटीआई की ख़बर के मुताबिक़, डकैती और छेड़छाड़ जैसे मामलों में भी भारी गिरावट देखने को मिली है. राज्य में क्राइम रेट आधा हो गया है. छीना-झपटी, चेन-खींचने, पॉकेट चोरी जैसे मामलों में भारी गिरावट दर्ज आई है।साथ ही एक्सीडेंट में होने वाली मौतों में भी गिरावट आई है।हालांकि इन सब कारणों से भी कोरोना को सकारात्मक घटना नही कहा जा सकता परंतु आवश्यकता है कि हम अपनी गतिविधियों पर नियंत्रण रखें और परिस्थितियों के सामान्य होने के बाद भी जैवविविधता को संरक्षित रखने के उपाय करें जिससे प्रकृति पुनः कोई नया सबक सिखाने को मजबूर न हो।
माधव पटेल

Madhav Patel का छायाचित्र

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