हम बच्चों को कैसे सिखाते हैं

यहाँ मुद्दा यह नहीं है कि बच्चे कैसे सीखते हैं ? मुद्दा यह है कि  “हम बच्चों को कैसे सिखाते हैं? क्योंकि जब हम शिक्षक इस मुद्दे पर शैक्षिक विद्वता दिखाने का एक पल भी कभी नहीं छोडते कि बच्चे कैसे सीखते हैं ? तो फिर हमारे लिए यह जानना और समझना भी उतना ही जरूरी हो जाता हैं कि हम बच्चों को कैसे सिखाते हैं ?
शिक्षक-प्रशिक्षण से लेकर स्कूल अवलोकनों में अनुभव के आधार पर यह देखने को मिलता है कि शिक्षा के क्षेत्र में कार्य कर रहे बहुत से शिक्षक बच्चों के सीखने के सिद्धान्‍तों को जानने की चर्चा तो करते हैं, लेकिन लागू करने के क्षेत्रों में वे वही अपनी पुरानी घिसी-पिटी परिपाटी “भाषण“ पर लौट जाते हैं। जिसकी परिणति यह होती है कि ये सिद्धान्त पहले किताबी और फिर अधिक से अधिक वैचारिक बन कर रह जाते हैं। जमीनी धरातल पर वे कभी अपना अस्तित्व प्राप्त करते दिखलाई नहीं पड़ते।
इसे हम बच्चों की कुछ व्यावहारिक समस्याओं के सन्दर्भ में समझने का प्रयास करते हैं।

जैसे विद्यालय की प्रात:कालीन सभा में शिक्षक को लगता है कि वहाँ पिन-ड्रॉप साइलेंस रहना चाहिए तथा सिर्फ सामने हो रही प्रस्तुतियों को एकाग्रता से सुनना चाहिए।
प्रात:कालीन सभा में यदि कक्षा एक से आठ तक के बच्चे बैठे हैं जो तमाम अलग-अलग तरह कि मानसिक अवस्थाओं वाले हैं। तो इतने छोटे बच्चों से पिन-ड्रॉप साइलेंट बैठने की अपेक्षा करके ही शैक्षिक सिद्धान्‍तों की बुनियादी तिलांजलि तो शिक्षक के रूप में पहले ही दे चुके होते हैं।

फिर भी शैक्षिक विमर्श और लागू करने की प्रक्रिया को यदि शिक्षक आत्म संतुष्टि के लिए अलग रखना भी चाहते हैं तो यह कैसे सम्भव है कि सामने हो रही प्रस्तुतियों में सायास या अनायास कोई हास्य या व्यंग्य पैदा हो और बच्चे उन पर बिना कोई प्रतिक्रिया दिए एक ही मुद्रा में बैठे रहें या आस-पास के वातावरण में हुई किसी हलचल या आवाज से आकृष्ट न हों।

फिर भी चलो मान भी लिया जाए कि शिक्षक बाल-मनोविज्ञान व मानवीय स्वभाव की बाल्यावस्था व व्यस्कावस्था को तराजू के एक ही पड़ले में रखने पर उतारू हो तो भी बच्चों को यह सिखाना कि किसी सभा में आपका व्यवहार किस प्रकार होना चाहिए ? इसका तरीका क्या हो ?

•    क्या उसका तरीका लम्‍बे ऊबाउ भाषण होंगे ?
•    क्या उसका तरीका शिक्षक की तीखी और अपमानित करने वाली सार्वजनिक भाषा होगी ?
•    क्या हम अपनी सोच को अपनी सत्तात्मकता की संतुष्टि के लिए स्वाभाविक बाल-व्यवहार के विरुद्ध जबर्दस्ती व्यवहार करने पर मजबूर करेंगे ?
•    क्या हम गुस्से में बात कर (एक तरह से मारपीट या स्कूल से निकाल देने की धमकी जैसा) बाल-शरीर की जिज्ञासु ज्ञानेन्द्रियों की संवेदनाओं के स्वाभाविक आवेग को कुचलकर रख देंगे ?

यह सिर्फ प्रात: कालीन सभा के 30 मिनिट मौनधारण कर अचेतन योग यंत्रणा तक ही सीमित नहीं है, यह अन्य सभी सभाओं जिनमें प्राथमिक स्कूल के बच्चों को घण्टों बैठकर किसी वयस्क के स्तर की परिचर्चाओं और प्रक्रियाओं को सुनने की बात हो या फिर बिना किसी सन्दर्भ के लम्बे भाषणों को सुनने का अत्याचार हो, सामान्य रूप से हर कहीं जाने अनजाने हम कर रहे होते हैं।

दरअसल शिक्षक के रूप में हम सोच रहे होते हैं, कि हम बच्चों को अच्छा व्यवहार करना सिखा रहे हैं। लेकिन यह अच्छा व्यवहार बच्चों के उस स्वाभाविक बालपन की हत्या करके बच्चे के बच्चे होने के अस्तित्व की स्वीकार्यता को नकार रहा होता है।

भाषणों, डाँट-डपट या अन्य किसी एकतरफा विचार के माध्यम से कुछ सिखा देने का दंभ उसी प्रकार हर बार टूट रहा होता है जिस प्रकार हम सैद्धान्तिक तौर पर शिक्षा विमर्श में कहते हैं कि- 

•    शान्त और शिक्षक केन्द्रित कक्षा में बच्चे नहीं सीखते, बच्चे तो खेल-खेल में गतिविधियों के माध्यम से सीखते हैं।
•    बच्चे अपनी गति से सीखते हैं।
•    बच्चों को सिखाने के लिए उनके पूर्व ज्ञान व स्तर के अनुरूप कार्य करना चाहिए।
•    परिवेश से जोड़ते हुये समझ आधारित प्रक्रियाओं के द्वारा ही बच्चों में स्थायी व्यवहारगत परिवर्तन लाए जा सकते हैं।

लेकिन जैसा कि इस लेख का मूल विषय इन सिद्धान्‍तों के लागू करने के स्तर की समस्या है तो फिर प्रश्न उठता है कि आखिर यदि बच्चे गाली देते हैं तो गाली नहीं देने की शिक्षा के लिए लम्बे भाषण किस प्रकार से बच्चों के व्यवहार में परिवर्तन ला सकते हैं? बिना किसी गतिविधि प्रक्रिया के गाली नहीं देने या झगड़ा नहीं करने की समझ बच्चों में विकसित की जा सकती है ?

अब ऐसी अनगिनत व्यावहारिक समस्याएँ स्कूल में आमतौर पर हो सकती हैं। जैसे –

•    झूठ बोलना, झगड़ा करना, नाम चिढ़ाना
•    स्कूल नहीं आना, स्कूल लेट आना
•    स्कूल सभा या कक्षा में बातचीत करना या ध्यान केन्द्रित नहीं करना
•    पुस्तक फाड़ना
•    स्कूल कार्यक्रमों में भाग नहीं लेना, खेलों में नियमों का पालन नहीं करना
•    उल्टा बोलना, स्कूल नियमों को तोड़ना, लाइन में नहीं लगना
•    खाना जूठा छोडना, पेड़ों को तोड़ना, चोरी करना 
•    किशोरावस्था से सम्बन्धित अन्य कई प्रकार की समस्याएँ या व्यवहार

ऐसी अनेक दिक्कतें हो सकती हैं जिनका समाधान सिर्फ बातचीत या लम्बे ऊबाउ लैक्चरनुमा लम्बे भाषण नहीं हो सकते हैं। दरअसल बच्चों के ऐसे व्यवहार के पीछे एक लम्‍बी अनुभव आधारित समझ होती है जिसकी ही परिणति उनके व्यवहार के रूप में हमारे सामने होती है।

समाधान क्या हो
इन समस्याओं के कारणों को समझना और समझकर सीखने के शैक्षिक सिद्धान्‍तों के अनुरूप उन्हे जमीनी धरातल पर उतारकर कार्य करने की जरूरत है। जैसे मेरे पहले उदाहरण “प्रात:सभा में बच्चे चुप नहीं बैठ पा रहे तो उनके साथ बातचीत या भाषण के अलावा क्या किया जा सकता है।

प्रथम तो हमें यह स्वीकारना होगा कि प्रात:सभा को अमानवीय अजैविक चीजों का समूह नहीं हैं जो कोई प्रतिक्रिया जैसे हँसना या हलचल नहीं होगी। कक्षा 1, 2, 3 के बच्चे ऐसा करेंगे ही।

दूसरा हमें यह भी देखना होगा कि क्या सभी तरह के कार्यक्रमों में वे ऐसा व्यवहार करते हैं। बिना तैयारी वाले स्तरहीन, बिना जुड़ाव के सार्वजनिक कार्यक्रमों में आखिर बच्चे कैसे एकाग्रचित रह सकते हैं। रुचिपूर्ण तथा अपने स्तर के कार्यक्रमों में बच्चे अपनी सीट से नहीं हिलते। तो फिर बड़ी सभाओं को बच्चों के स्तर के अनुरूप व रुचि पूर्ण गतिविधियों से सुसज्जित करना होगा। जैसे एक बहुत अच्छी ज्ञानवर्धक फिल्म वयस्क के लिए अच्छी हो सकती है और वह चाहेंगे कि बच्चे उसे पूरी देखकर कुछ सीखें। लेकिन बच्चों को तो उनके स्तर के अनुरूप फिल्में या कार्टून फिल्में ही अधिक भाएँगी न कि हमारा ज्ञान। हाँ कार्टून पात्रों से जो सीखने होगा वो वे सीखेंगे ही।

  • जैसे यदि बच्चे खाना जूठा छोड़ते हैं तो उनसे सिर्फ बातचीत से बढ़कर उन्हें  मिड डे मील पर कोई प्रोजेक्ट कार्य देकर पूरा विश्लेषण सभी के सामने रखकर बच्चों से समाधान करवाया जा सकता है।
  • इसी प्रकार बच्चे यदि स्कूल की प्रॉपर्टी को नुकसान पहुँचाते हैं तो स्कूल प्रबन्धन पर उनके साथ प्रोजेक्ट कार्य करवाते हुए खर्च पर पारदर्शिता लाकर संवेदनशील किया जा सकता है। 
  • इसी प्रकार व्यवहारगत समस्याओं के समाधान के लिए समस्या के मूल में जाकर, पूरी कार्ययोजना, गतिविधियों, रीडिंग मेटेरियल व टीम प्लान के अनुसार कार्य करके ही सफलता प्राप्त की जा सकती है।
  • इसके लिए समानुभूति जीवन कौशलों और स्वानुभूति वाली गतिविधियाँ जैसे वीडियो, नाटक, खेल, रीडिंग आदि को योजना के अनुरूप पूरी तैयारी तथा टाइमिंग के साथ समूह या व्यक्तिगत रूप से टीम में कार्य करना होता है।
  • बच्चों के घरेलू परिवेश की समझ उसका डॉक्युमेंटेशन, व्यवहार तथा माता-पिता के व्यवहार तक शिक्षक की पहुँच तथा उनको सहभागिता से योजना निर्माण व मनोवैज्ञानिक प्रक्रियाओं के अनुरूप बातचीत व स्टेप को लागू करना।
  • शिक्षक-छात्र सम्‍बन्‍धों को मजबूत करने के सभी बुनियादी उपाय करना। बच्चों की पसन्द के अनुरूप के कार्य पहले करना। फिर उनसे अपेक्षा प्रदर्शित करना।      
  • ऐसा नहीं हैं कि शिक्षक इन चरणों से परिचित नहीं हैं। शिक्षक प्रशिक्षण से लेकर इन सर्विस तक में इन मुद्दों पर चर्चा करते हुये हम सभी उच्च स्तरीय तार्किक चर्चाओं के भागीदार बनने का गौरव हासिल कर रहे होते हैं।

बच्चों के सीखने की प्रक्रियाओं की किताबों को पढ़कर तथा उनकी समीक्षा करके हम बुद्धजीवी वर्ग की जमात में शामिल कर खुद के पढ़े लिखे होने की परिवेशीय अनुभूति भी कराने का प्रयास करते रहते हैं।

लेकिन जमीनी सच्चाई यही है कि शोध प्रक्रियाओं के लम्बे इतिहास के परिणाम से तैयार सीखने-सिखाने के इन सिद्धान्‍तों को हम जमीनी स्तर पर लम्बे समय तक लागू नहीं रख पाते, क्योंकि उसके लिए हमें शिक्षक सत्ता को त्याग कर, योजना और लागू करने के स्तर पर पसीना बहाना पड़ता है, जिसमें निरन्तरता का असीमित संघर्षों से सामना करना होता है जो हमारे स्थायित्व के आनंददायक अनुभूति वाले कालचक्र के दौर को विचलित कर देता है।


अनुराग मुद्गल, शिक्षक, अज़ीम प्रेमजी स्‍कूल, सिरोही, राजस्‍थान 

चित्र : प्रशांत सोनी
 

17473 registered users
6669 resources