सामाजिक अध्‍ययन शिक्षण : अवधारणा और जीवन के बीच सेतु

अंजना त्रिवेदी

मध्यप्रदेश में भोपाल जिले के सरकारी स्कूलों के साथ सघन काम करने के दौरान टीचर लर्निंग सेण्टर में शैक्षिक विमर्श, कार्यशालाओं और विभिन्न प्रशिक्षणों के माध्यम से बने सम्‍पर्कों में एक शिक्षिका लगातार अपनी सामाजिक विज्ञान कक्षाओं से जुड़ी समस्याओं का जिक्र करती रही हैं। काफी लम्बे समय से उनका आग्रह था कि,‘आप जो कहती हैं कि संविधान में उल्लिखित मूल्यों को रुचिकर तरीके से और जीवन अनुभवों के साथ जोड़कर पढ़ाया जाना चाहिए तो एक बार आप आकर उन बच्चों को पढ़ाकर बताएँ। मुझे इससे मदद मिलेगी।’ शिक्षिका ने यह भी कहा कि, ‘मेरे स्कूल के बच्चों में न तो मैं रुचि पैदा कर पा रही हूँ न बच्चे मुझे सहयोग कर पा रहे हैं। आप आकर एक बार क्लास लें, खासतौर से धर्मनिरपेक्षता को मैं किस प्रकार समझाऊँ, ये आप एक बार अवश्य बताएँ।’

मध्यप्रदेश राज्य शिक्षा केन्द्र द्वारा प्रकाशित आठवीं की पाठ्यपुस्तक में धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा कुछ यूँ दी गई है – ‘देश के सभी नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता है। किसी धर्म के लिए राज्य पक्षपातपूर्ण कार्य नहीं करेगा और न ही हस्तक्षेप करेगा। सभी धर्म के नागरिकों को बिना भेदभाव के शासकीय सेवाओं में अवसर प्राप्त होंगे।’ शिक्षिका का सवाल था कि दो लाइन की परिभाषा में दी गई धर्मनिरपेक्षता को आप एक क्लास में रुचिकर तरीके से कैसे समझा सकते हैं।

एनसीएफ 2005, इस दुविधा से उभरने के लिए हमें कुछ इशारे जरूर करता है। राष्ट्रीय पाठचर्या रूपरेखा सामाजिक विज्ञान के जीवन्त शिक्षण की बात कहता है। इसमें दुकान, महिला, व्यापार, लेन–देन, हर नागरिक के लिए सुरक्षित और बेहतर जीवन की बात शामिल है। जिसमें विद्यार्थी और शिक्षक दोनों ही सजीव अभिकर्ता के रूप में सम्मिलित होंगे और वास्तविक जीवन अनुभवों से ही सीखने-सिखाने का व्यवहार होगा। सामाजिक विज्ञान के सन्‍दर्भ में और भी बहुत सी बातें इन दस्तावेजों में कही गई हैं, लेकिन उनकी चर्चा बाद में की जा सकती है।

भोपाल से करीब 25 किलोमीटर दूर एक गाँव के उस माध्यमिक स्कूल में बच्चों से सामान्य बातचीत के साथ कक्षा शुरू हुई। ये स्कूल ग्रामीण इलाके में आता है। जहाँ आदिवासी और मुस्लिम समुदाय के बच्चे हैं। ज्यादातर बच्चों के पालक मजदूरी की तलाश में आकर यहीं बस गए हैं। माध्यमिक स्कूल (कक्षा 6, 7 और 8) में कुल 109 बच्चे हैं। उस रोज कक्षा 7 और 8 के कुल 42 बच्चे मौजूद थे। इसमें एक तिहाई संख्या लड़कियों की थी। शिक्षिका का आग्रह था कि मैं इन बच्चों को सामाजिक विज्ञान पढाऊँ और खासकर धर्मनिरपेक्षता समझाऊँ।

मैंने सीधे ही बच्चों से पूछा कि धर्मनिरपेक्षता क्या है? बच्चे इसका कोई भी उत्तर नहीं दे पाए क्योंकि पहले पढ़ा दिए गए ‘हमारा संविधान; अध्याय के तहत धर्मनिरपेक्षता को बच्चे समझे ही नहीं थे। संविधान में इस धर्मनिरपेक्षता मूल्य को रखने का कारण भी बच्चों को स्पष्ट नहीं था। यदि बच्चों को एतिहासिक पृष्ठभूमि से नहीं जोड़ा जाए तो इस मूल्य को समझना किस प्रकार सम्‍भव हो पाएगा। मुझे भी बहुत चुनौतीपूर्ण लग रहा था कि यदि बच्चों से इसके आगे –पीछे की कभी कोई बात ही नहीं की जाए तो वह किसी एक बिन्दु पर ठहरकर कैसे समझ पाएँगे।

चूँकि मेरा उन बच्चों व उनकी दुनिया से खास परिचय नहीं था न उनसे दोस्ती या विश्वास का रिश्ता था। तो मैंने कुछ अनौपचारिक बातचीत से अपनी बात शुरू की।

मैंने बच्चों से खूब सारी बातें पूछी, जैसे कि आप कहाँ से आए ? घर और स्कूल के बीच कितनी दूरी है ? घर में कौन-कौन है ? आप बड़े होकर क्या बनना चाहते हैं ? बच्चे खूब अच्छे से बात कर रहे थे। वह भोपाल शहर भी आए हैं, इस बात को वे उत्साह से बता रहे थे। बच्चों को अपने बारे में बताने में मजा भी आ रहा था और मुझे बच्चों को जानने-समझने का मौका मिल रहा था। ये सब बातें कोई 15-20 मिनिट तक चली। उसके बाद मैंने कहा चलो हम सब समूह में काम करते हैं। इसमें सब अपनी बात रख सकते हैं और इसमें सबको बोलना है। मैं यह बात करके बच्चों के पूर्व अनुभव को उभारना भी चाह रही थी और कक्षा–कक्ष का वातावरण सहज बनाना भी चाह रही थी। मेरी कोशिश थी कि शिक्षक और बच्चों के बीच भी एक साझेदारी बने। बच्चों के जीवन में वापस लौटना हो सके और उससे उनको जोड़ना ताकि इसको आधार बना कर जीवन अनुभवों और वास्तविक प्रसंगों के मार्फत से अवधारणा तक पहुँचा जा सके।  

एनसीईआरटी की आठवीं की ‘सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन’ किताब के अध्याय 2 में उल्लिखित एक काल्पनिक परिस्थिति मैंने बच्चों के सामने रखी कि– ‘किसी व्यक्ति का धर्म कहता है कि पैदा होते से बच्चे को मार देना चाहिए। उसमें सरकार (आपके इलाके के नेता) की क्या भूमिका होगी।’ किताब के ही अनुसार मैंने भी उनसे कहा कि इस पर समूह में चर्चा कर लिखो या कक्षा–कक्ष में रोल-प्ले करो। मैं इसमें खूब सारे बिन्‍दु को देखना चाह रही थी जैसे स्थानीय स्वशासन, लिंग भेदभाव, धर्म का हस्तक्षेप वगैरह।

दरअसल मध्यप्रदेश राज्य शिक्षा केन्‍द्र की पाठ्य पुस्तक में जहाँ धर्मनिरपेक्षता का जिक्र है वहाँ ऐसा कोई जीवन्त उदहारण मुझे नही दिखा जिसे चर्चा के लिए लिया जाता। इसलिए एनसीईआरटी की किताब से यह उदाहरण चुना। पर जल्दी ही मुझे अहसास हो गया कि इससे तो बहुत सारी परतें खुलती जा रही हैं और कई सारी पूर्ववर्ती अवधारणाओं पर काम किए जाने की भी जरूरत है। यह भी समझ में आया कि एनसीईआरटी की किताब में इस उदाहरण से पहले अवधारणाओं का एक क्रमिक विकास है, जबकि मैंने पहले की तैयारी कराए बगैर एक ऐसा अंश उठा लिया था जिस पर चर्चा तो फिर भी हो सकती थी पर अवधारणाओं की आधारभूत समझ से पहले यह सब किसी काम का नहीं था। शिक्षिका का एक ही कक्षा में धर्मनिरपेक्षता को जल्दी से समझा देने का आग्रह स्वीकार कर उस पर बिना तैयारी बातचीत शुरू करना भी मेरी जल्दबाजी थी। 

मेरे लिए यह काम देखने–समझने का पहला और नया मौका था। हालाँकि बच्चे समूह में जो बात कर रहे थे वह बहुत ही रुचिकर था।

एक बच्चे ने कहा –‘कोई धर्म नहीं कहता है कि पैदा होते से बच्चे को मारे।’

दूसरी बच्ची ने कहा –‘लड़कियों को तो मार देते है।’

तीसरे बच्चे ने उसकी ओर देखते हुए कहा – ‘तुमने देखा है क्या?’

पहले बच्चे ने कहा –‘इसने पेपर में पढ़ा होगा। पेपर में तो सब खबर गलत आती है।’

दूसरी बच्ची बोली - ‘नहीं,मेरी माँ एक जगह मालिश करने जाती है तो उसकी सास कह रही थी कि लड़की थी इसलिए उसे पैदा ही नहीं होने दिया।’ लड़की भी तो बच्चा है न। वह बोलते हुए थोड़ी संशय में थी (लड़की को बच्चा माने या नहीं)।

एक बच्चे ने सवाल फिर से पढ़ा,कहा कि पैदा होने के बाद थोड़ी मारा वह तो पहले ही मार दिया ना।

इन चार छह कथनों ने सामाजिक विज्ञान के कई सारे दरवाजे खोल दिए। क्या धर्म बच्चियों को मारने को कह सकता है? जब कोई कहे कि वास्तव में बच्चियों को लोग मार डालते हैं, तो उसका आधार क्या हो सकता है? क्या कही-सुनी बातें,अखबार की बातें सही हो सकती हैं? क्या इस सन्‍दर्भ में एक मालिश करने वाली महिला की जानकारी सही हो सकती है? क्या बच्चा शब्द इस सन्‍दर्भ में लड़कियों के लिए उपयोग किया जा सकता है कि नहीं, और यह कि क्या यह सब दिए गए सवाल के लिए प्रासंगिक है। समाज विज्ञान के इन बुनियादी सवालों से जूझना तब सम्‍भव हुआ जब हमने एक जीवन्त प्रश्न पर सामूहिक विचार शुरू किया। अब दूसरे सवाल उठने लगे। मगर मेरे सिर पर तो धर्मनिरपेक्षता की तलवार लटकी थी ।

मैंने पूछा कि धर्म क्या होता है ? आप लोग जानते है क्या ?

कुछ बच्चों ने कहा –‘हाँ। जहाँ मन्दिर होता है,’ कुछ ने कहा कि जहाँ पुजारी होता है। मैंने पूछा कि आप कौन से भगवान को मानते हो? तो बच्चों ने कहा कि– ‘हमारे घर में पूजा नहीं होती है। हम तो कभी भी किसी भी मन्दिर में जहाँ प्रसाद मिलता है वहाँ चले जाते हैं और प्रसाद खाकर आ जाते हैं। कभी–कभी हम खाना भी खाकर आते है।’ एक बच्ची ने कहा कि, ‘हम जब यहाँ नए-नए आए थे, तो एक आंटी कार में बैठाकर अपने घर खाना खिलाने ले गई थी। हमको नहीं मालूम तब क्या था’?

बच्चों ने कहा कि ‘एक बार हम मस्जिद में खाना खाने गए थे, हम सब स्कूल से ही चले गए थे,’दूसरा बच्चा, बोला कि, ‘एक बार सरदारों की जगह भी तो खाना खाने गए थे।’

जब हम अवधारणों को खोलने का प्रयास करते हैं तो पाते हैं कि बच्चे उन्हें कितने विविध तरीके से पकड़ने व विमर्श करने का प्रयास करते हैं– यहाँ धर्म का आशय मन्दिर, पुजारी, प्रसाद खाना, कन्या पूजन आदि अनुभवों को समेटकर समझने का प्रयास हो रहा था। ये वे ठोस अनुभव थे जो बच्चों को धर्म से जोड़ रहे थे। और धर्मनिरपेक्षता से भी, आखिर प्रसाद कहीं का भी हो, मन्दिर का या मस्जिद का या गुरद्वारे का बच्चों के लिए कोई फर्क नहीं था। मगर पाठ्यपुस्तक की अवधारणा को समझाने के लिए मुझे उन्हें और कहीं ले जाना था।

मैं मन ही मन सोच रही थी कि ये सब जो बच्चे कर रहे हैं वह सब (व्यक्तिगत स्वतंत्रता) धार्मिक स्वतंत्रता की ही श्रेणी में है। जहाँ वे किसी भी धर्म को नहीं जानते, किसी धर्म का बन्धन या किसी धर्म से बैर नहीं है। पर अभी भी राज्य की धर्मनिरपेक्षता को समझना थोड़ा कठिन लग रहा था। क्योंकि राज्य की धर्मनिरपेक्षता को समझने के लिए राज्य सरकार को समझना जरूरी है।

मैंने पूछा - अच्छा बताओ कि सरकार कौन है ?

एक बच्चा बोला सफेद कपड़े पहन कर वोट माँगने आते हैं वही हैं।

मैंने कहा तुम्हारे यहाँ का नेता कोई होगा ना।

बच्चे बोले एक नहीं है, कभी कोई आता है तो कभी कोई। आते रहते हैं। मोहल्ले के लोग कह रहे थे कि ये लोग काम के नहीं हैं। (शायद कभी पार्षद, विधायक या सांसद आते होंगे।)

अपनी बातचीत को अब किस दिशा में लेकर जाऊँ, मेरे लिए ये बड़ी दुविधा हो गई। राज्य की धर्मनिरपेक्षता समझाने के लिए सरकार की अवधारणा समझाना जरूरी लगा। सरकार क्या है, कैसे बनती है, लोकतंत्र क्या है, इनके बाद ही तो धर्मनिरपेक्षता की बारी है। मुझे शुरू करना होगा इन सफेदपोश नेताओं से। चुनाव प्रक्रिया और उसमें बहुमत दल के नेता को समझाया तो धर्मनिरपेक्षता तो अभी रह ही जाएगा। एक दिन के आधे घण्टे में इतनी बातचीत करके लौट रही थी। मेरे सामने संकट ये था कि कल सरकार पर चर्चा करूँ या संवैधानिक मूल्यों पर ? चर्चा कैसे करूँ ? बच्चे विविधता को तो भलीभाँति समझ रहे हैं, लेकिन उसे व्यवस्थित कर अवधारणा की शक्ल में ढालना जरूरी था।

दूसरे दिन, मैंने चाक और बोर्ड की मदद से सरकार समझाने का प्रयास किया। एकलव्य की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक से मैंने राज्य की विधानसभा, राज्य का मंत्रिमण्डल बताया। (इसे पहले नक्शे के माध्यम से बताया) मैंने बताया कि जिसको हम चुनकर शासन चलाने के लिए भेजते हैं, जो हम सबका ख्याल रखेगा वह सरकार है। किन्तु बच्चों के चेहरों से समझ में आ रहा था कि इस अमूर्त सरकार को वह नहीं समझ पा रहे थे। मैंने सोचा कि स्कूल में कक्षा मॉनिटर और बाल कैबिनेट तो होगी, उसका उदाहरण देकर बताती हूँ। पर उस स्कूल में ऐसा कुछ भी नहीं था। मैंने शिक्षिका से पूछा कि यहाँ आपने कक्षा मॉनिटर और बाल कैबिनेट बनवाई है क्या? शिक्षिका ने कहा नहीं कराया। मैंने कहा कि बच्चे इससे ही भारत की अपनी नागरिकता को समझ पाते। शिक्षिका ने जोर देकर कहा कि ये सब तो मैंने पढ़ा दिया।

मैंने शिक्षिका को समझाने का प्रयास किया कि किसी एक मुद्दे के लिए उससे जुडी कई अवधारणाओं को समझाना आवश्यक होता है। पर उन्हें लग रहा था कि यह सब बच्चों को इतना विस्तार से बताकर मैं खामखा मुद्दे को खींच रही हूँ।

मुझे समझ में आ रहा था कि धर्मनिरपेक्षता से पहले सरकार, स्थानीय सरकार, जिला सरकार और राज्य सरकार के साथ केन्‍द्र सरकार के कार्यों को समझना आवश्यक है। उसके बाद सरकार का चुनाव किस प्रकार से होता है और वह जनता के लिए किस प्रकार से कार्य करती है इस सब के बाद संवैधानिक मूल्यों को सरकार किस प्रकार से लागू करती है, उसे बच्चों को समझाना होगा।

शिक्षिका ने आग्रह पूर्वक कहा कि आप तो धर्मनिरपेक्षता जल्दी से समझा दीजिए। पर मेरे लिए बिना सीढ़ी के ऊपर चढ़ना कठिन था।

तीसरे दिन मैंने बच्चों से पूछा कि आज किस पर बातचीत करनी चाहिए ? बच्चों ने कहा मेम आपने कल कहा था कि रोल-प्ले करवाएँगी तो आज हम तो वही करेंगे। सरकार का चुनाव कैसे होता है ? क्यों किया जाता है ? हम क्लास में किसको अपना नेता चुन रहे हैं ? इस पर पहले बातचीत की और दो बच्चों को चुनाव के उम्मीदवार बनाकर घोषणा की गई। नामों की चिट, मत पेटी बनाई और घोषणा पत्र बनवाकर चर्चा करवाई। इस पूरी प्रक्रिया में बच्चे इस प्रकार मगन हो गए थे कि कोई भी लंच ब्रेक में नहीं जाना चाह रहे थे। वे चुनाव की पूरी प्रक्रिया को करके समझना चाह रहे थे। मैंने उन्हें बताया कि ये एक वार्ड का चुनाव हो सकता है, अलग–अलग क्लास मॉनिटर मिलकर एक स्कूल अध्यक्ष को चुनते हैं उसी प्रकार हम मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री को चुनते हैं जो बहुमत दल का नेता होता है। बच्चों ने बड़े मजे से पूरी प्रक्रिया को समझा। एक बच्चे ने कहा कि हम सबको खेल का एक मैदान चाहिए। फिर इस पर काफी देर तक चर्चा हुई कि मॉनिटर खेल का मैदान पहले क्यों नहीं बनवा सकता है। मैंने जोड़ा कि खेल के मैदान से ज्यादा और कुछ भी जरूरी हो सकता है ना। मैंने कहा चलो जरूरी कार्यों की सूची बनाई जाए। उसमें क्या–क्या हो सकता है। बच्चों के बताए अनुसार – पीने का पानी, टेबल–कुर्सी, शौचालय, पक्की सड़क, मेडम रोज स्कूल में पढ़ाने आए और खाना अच्छा मिले इन सबको लिखा गया। फिर चर्चा हुई। इसमें से इस साल दो काम ही हो पाएँगे तो प्राथमिकता किस काम को मिलना चाहिए। सब बच्चों (40) में से 32 ने कहा पीने का पानी और शौचालय होना चाहिए। इस प्रकार सरकार के कार्यों का एजेंडा और प्राथमिकता को समझा फिर उस मद के लिए जुटाए जाने वाले बजट और जनता के पैसों को समझा।

आज शिक्षिका खुश नजर आईं और उन्होंने कहा कि कम से कम बच्चे चुनाव प्रक्रिया को समझ तो गए। मैंने कहा कि अब कोई भी बात करना आसान हो जाएगा।

चौथे दिन तक बच्चे मुझसे खूब हिल-मिल गए थे। कक्षा में जाते ही बच्चों ने कहा कि आप सरकार की कोई कहानी सुनाएँ। मैंने पूछा कि सरकार को आप लोग अच्छे से समझ गए हैं क्या ? हाँ – सब बच्चों ने एक साथ जवाब दिया। मैंने सोचा कि आज बच्चों को विचार करने के लिए क्यों न कुछ प्रश्न दिये जायें। मैंने पूछा हमारे देश में राजतंत्र है या लोकतंत्र ? कक्षा में सन्नाटा छा गया क्योंकि ये शब्दावली सुनी तो थी किन्तु इसके अर्थ और इसके उपयोग को वह समझ नहीं पा रहे थे। शब्दों को खोलने का प्रयास किया तब बच्चों को तुरन्त समझ में आ गया। दुनिया के नक्शे के मार्फत से राजतंत्र और लोकतंत्र की कहानी सुनाई और हमारे देश में लोकत्रंत कैसे स्थापित हुआ उसको बताया। आजादी के पहले भारत में किस प्रकार की शासन व्यवस्था थी। उसमें जनता का कितना अधिकार होता था। आजादी के बाद जब भारत में लोकत्रंत आया तो उसमें हम भारत के लोग का उल्लेख किया गया। बच्चे राजतंत्र और लोकतंत्र को समझ गए। लोकतंत्र की पहचान है कि सब लोग सीधे मतदान करते हैं ( और जनता के प्रतिनिधि मिलकर सरकार बनाते हैं। एक बच्चे ने सवाल किया कि लोगों का शासन है तो फिर हमारे इलाके में पुलिस का शासन क्यों है ? उसने एक लम्बा सा वाकया बताया कि पुलिस किस प्रकार से हमारे इलाके में हम लोगों को डराती-धमकाती है। इसके लिए हम क्या कर सकते हैं ? बच्चे ने सवाल किया कि पुलिस तो सबसे बड़ी होती है ना ? मैंने बताया कि पुलिस भी हमारी सुरक्षा–व्यवस्था के लिए है। पुलिस के विरुद्ध भी हम अपने यहाँ के पार्षद और मंत्री को शिकायत कर सकते हैं। मेरे इस उत्तर से बच्चा बहुत संतुष्ट नहीं हुआ। मैं समझ सकती हूँ कि व्यवहारिक स्थिति एकदम अलग है। गली–मोहल्ले में पुलिस का दबदबा होता है। नेता तो उन्हें चुनाव के दौरान ही दिखाई देते हैं। पुलिस की शिकायत भी कहीं हो सकती है यह उसके अनुभव में कहीं नहीं है। ना उसको इसकी कहीं सम्भावना दिखाई देती है।

अब मैंने सरकार की धर्मनिरपेक्षता को कैलेंडर की सरकारी छुट्टियों से समझाने की कोशिश की। मैंने कहा कि सरकार का अपना धर्म नहीं होता है। उसका कोई त्यौहार नहीं होता। वह सबकी सोचकर चलती है। सबका ध्यान रखा जाता है। कैलेंडर के आधार पर बच्चों ने छुट्टियों की लिस्ट बनाई। तब जाकर काम आसान हुआ। सरकार के धर्मनिरपेक्ष चरित्र की थोड़ी झलक तो मिली। मैंने पहले दिन के प्रश्न को पुनः दोहराया, तब सब बच्चों ने उसके जवाब में कहा कि सरकार हमारी सुविधा और देखभाल के लिए होती है। यदि वह ऐसा नहीं करती है तो हम उसको हटा सकते हैं। बच्चों के चेहरों पर एक संतोष का भाव दिखाई दे रहा था।

कुल मिलाकर चार दिन की स्कूल विजिट में मैंने समझा कि बच्चे लिंगभेद आर्थिक असमानता, विविधता, चुनाव, सरकार, बहुमत दल का नेता, राज्य सरकार, केन्‍द्र सरकार और अन्ततः राज्य की धर्मनिरपेक्षता की अवधारणाओं के अनुभवजन्य पक्षों से जूझे हैं और कुछ प्रारम्‍भिक समझ बनाई है। अभी सामान्य औऱ अमूर्त सिद्धान्तों तक जाना दूर तो था मगर असम्‍भव नहीं। इन अनुभवों पर विचार करते हुए एनसीएफ की बातें जीवन्त रूप में सामने आईं।

राष्ट्रीय पाठचर्या रूपरेखा 2005 के अन्तर्गत सामाजिक विज्ञान शिक्षण पर तैयार किया गया राष्ट्रीय फोकस समूह का आधार पत्र, समाज को विभिन्न संरचनाओं, उसके शासन और रूपांतरण को समझने के सम्‍बन्‍ध में बात करता है। साथ ही उसमें ‘भारतीय संविधान’ में स्थापित मूल्यों जैसे न्याय, स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे तथा राष्ट्र की एकता और अखण्डता को समझने की बात कही गई है। उसमें कहा गया है कि बच्चे ‘समाज के सक्रिय, जिम्मेदार और चिन्तनशील सदस्य बनें,’ और वे ‘अलग–अलग मतों, जीवन शैलियों और सांस्कृतिक परम्पराओं के अन्तरों को सम्मान देना’ तथा ‘उन्हें प्राप्त हो रहे विचारों, संस्थाओं और व्यवहारों’ पर सवाल उठाना और उसकी जाँच परख करना सीखें। साथ ही वे ‘सामाजिक तथा जीवन कौशलों के विकास के कुछ काम करें और इस बात को समझे कि ‘पारस्परिक सामजिक क्रियाओं के लिए ये कौशल महत्वपूर्ण है’।

आधार पत्र दो प्रमुख बातों की पैरवी करता है एक तो वह संवैधानिक मूल्यों को समझना और दूसरा विचारों, संस्थाओं और व्यवहारों पर सवाल उठाना और उन्हें जाँचना परखना।

कक्षा-कक्ष में यह काम करते हुए मेरी स्पष्ट समझ बनी कि संवैधानिक मूल्यों और सत्‍ता केन्द्रित व्यवहार को बताने के लिए अवधारणाओं को सिलसिलेवार ढंग से बताया और समझाया जाना जरूरी है। बच्चों के बीच एक अवधारणा पूरी तरह से विकसित होने से पहले दूसरी अवधारणा पर कूदकर नहीं जाना चाहिए। माध्यमिक स्तर के बच्चे जो वयस्क होने जा रहे हैं, वो अपने आसपास घर, परिवार, मोहल्ला, स्कूल, शिक्षक, पुलिस, चुनाव, दारू, घर में पुरुषों का व्यवहार, नेता, विरोध प्रदर्शन, लड़ाई-झगड़े को देखता है और कक्षा-कक्ष में वह प्रश्न करना चाहता है और विस्तार से बात कर उसका समाधान भी चाहता है। इसलिए बड़े होते बच्चों की जिज्ञासा, जरूरत और जानने की खुराक को देखते हुए प्रारम्भिक अवधारणा से और जीवन्त अनुभव से ही बातचीत शुरू की जानी चाहिए।       

समाज के जीवित लोगों के जीवन चरित्रों और उनके रोजमर्रा के जीवन अनुभवों से बचकर सामाजिक विज्ञान अपने लक्ष्यों को भला कैसे पा सकता है। जैसे कि सामाजिक विज्ञान की प्रकृति ही है कि वह समाज की जीवन्त घटना और व्यक्ति के उनसे जुडाव पर प्रकाश डालता है। जिससे कि व्यक्ति अपनी स्थिति अपने अधिकार और सही गलत का विश्लेषण कर सके। साथ ही समाज के भीतर पारस्परिक सम्‍बन्‍धों और उसमें राज्य की भूमिका को देख सके।


अंजना त्रिवेदी, अज़ीम प्रेमजी फाउण्डेशन, भोपाल, मध्यप्रदेश

सन्दर्भ

  • एनसीएफ 2005
  • सामाजिक विज्ञान शिक्षण पर राष्ट्रिय फोकस समूह का आधार पत्र
  • सोशल पोलिटिकल लाइफ, क्लास 8 (एनसीईआरटी)
  • सामाजिक विज्ञान, कक्षा 7 (मध्यप्रदेश राज्य शिक्षा केन्‍द्र)
  • शिक्षा विमर्श, (दिगन्तर) अंक जुलाई 2017
  • सामाजिक अध्ययन शिक्षण एक प्रयोग (एकलव्य) 1994

 

 

 

 

 

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