समावेशी शिक्षा के मायने

दस बरस पहले की बात है। मध्‍यप्रदेश के होशंगाबाद जिले के गाँधीवादी समाजसेवी शम्‍भूनाथ गुप्ता जी ने शिक्षा के मुददे पर एक संवाद कार्यक्रम रखा था। इसमें जाने-माने शिक्षाविद अनिल सद्गोपाल अपना व्याख्यान देने आए थे। यह वक्त था जब ‘राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005’ के दस्तावेज पर देश भर में संवाद और परिचर्चाओं के द्वारा रायशुमारी की जा रही थी। अपनी बात रखते हुए अनिल सदृ गोपाल ने बताया कि गाँधी जी ने कहा था, ‘हमें समाज के ‘अन्तिम आदमी’ तक शिक्षा पहुँचाने का प्रयास करना होगा। दूरदराज के गाँव में रहने वाले ‘दलित परिवार की बेटी’ तक शिक्षा को पहुँचाना होगा।’ अपनी बात रखते हुए अनिल जी ने कहा कि मैं आप सबसे अनुमति लेकर गाँधी जी की कही इस बात में एक और शब्द जोड़ना चाहता हूँ। उन्होंने कहा कि हमें समाज के अन्तिम आदमी तक शिक्षा पहुँचाने के गाँधी जी के सपने को साकार करने के लिए संघर्ष करना पड़ेगा। हमें दूरदराज के गाँव में रहने वाले ‘दलित परिवार की विकलांग बेटी’ तक शिक्षा पहुँचाने का काम करना होगा।

अनिल जी ने अपनी बात में विकलांग शब्द पर इतना अधिक जोर क्यों दिया था, इसका अहसास मुझे महज कुछ महीने बाद ही हो गया। मैं होशंगाबाद जिले के बाबई ब्लाक के कोटगाँव के सरकारी स्कूल में सातवीं कक्षा के बच्चों को दिन-रात कैसे होते हैं ? और ग्रहण कैसे होता है ? के बारे में पढ़ा रहा था। काफी देर बाद मैं जान सका कि मेरी कक्षा में एक ऐसा बालक मौजूद था जो सुन और बोल नहीं सकता था। एक शिक्षक के रूप में अपनी कक्षा में मैंने पहली बार ऐसी परिस्थिति में खुद को पाया था, जब आगे बढ़ने का रास्ता नहीं सूझ रहा था।

गाँधी जी के विचारों को और अधिक धार देने के लिए अनिल सदृगोपाल जी द्वारा जोड़ा गया शब्द ‘विकलांग’ इतने बरसों में चलन से बाहर होता गया है। इधर कुछ बरसों में आम बोलचाल या लिखने-पढ़ने की भाषा में ‘विशेष दक्षता वाले बच्चे’ कहना शुरू किया जा चुका है। हाल ही में प्रधानमंत्री जी ने एक और नया शब्द ‘दिव्यांग’ प्रचलन में ला दिया है। लेकिन मुझे यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि इन मुदृदों पर सच में ठोस काम कर पाने में हम लोग आज भी काफी पीछे हैं। गाँधी जी के सपनों को सच करने की दिशा में अभी मीलों का सफर तय करना बाकी है। सभी बच्चों को शिक्षा का अधिकार और समावेशी शिक्षा के नारे को जमीन पर होते हुए देख पाने में अभी तमाम किस्म की अड़चनें हैं। लेकिन कुछ प्रयास और उनसे मिले नतीजे उम्मीद की किरण जगाते रहते हैं। ये प्रयास किसी की व्यक्तिगत संवेदनशीलता और जागरूकता का परिणाम हो सकते हैं या फिर कुछ नीतिगत फैसलों का परिणाम हो सकते हैं। आज, कुछ ऐसे ही किस्सों का एक गुच्छा है मेरे पास जिसे मिला-जुलाकर देखने पर कुछ उम्मीद की किरणें नजर आती हैं, साथ ही यह अहसास भी होता है कि इस दिशा में अभी बहुत काम किए जाने की जरूरत है।

 

एक शिक्षक की संवेदनशीलता

कुछ साल पहले राजस्‍थान के सिरोही जिले के एक दूरदराज गाँव के सरकारी स्कूल में लगातार तीन दिन तक बच्चों और शिक्षकों के बीच रहने का मौका मिला। कक्षा 3 के बच्चों के साथ बातचीत करने के दौरान मेरी नजर कक्षा की दीवार के साथ सटकर बैठे एक दाढ़ी-मूँछ वाले लड़के पर जाकर ठिठक गई। स्कूली पोशाक में मय बस्ते के साथ बैठा यह लड़का बोर्ड पर लिखे कुछ वाक्यों को बड़ी तल्लीनता से अपनी कापी में उतारता जा रहा था। बातचीत शुरू करने पर वह खिसककर थोड़ा और आगे आकर बैठ गया था। वह अन्य बच्चों से थोड़ा अलग-सा दिख रहा था और उम्र में भी काफी बड़ा था। अतः उसके प्रति मेरी जिज्ञासा बन गई। मैंने उसका नाम पूछा। उसने धीरे से कुछ कहा, जो मैं समझ नहीं सका। ठीक से बोल पाने में उसे कुछ समस्या थी। मैं ने सके हाथों में चाक देकर अपना नाम बोर्ड पर लिखने को कहा। उसने लिखा .....क म ले स .....

बाद में शिक्षकों से बातचीत करते हुए पता चला कि एक साल पहले तक कमलेश को इस गाँव के लोग पागल कहते थे। वह इधर-उधर घूमता हुआ स्कूल के पास आ जाता था और बाउंड्री के बाहर से बच्चों को पत्थर मारता था। बच्चे भी भीतर से पत्थर मारकर उसे वापिस भगाते रहते थे। मध्याहन भोजन के समय कोई शिक्षक  या भोजन माता आकर उसे खाना देकर चली जाती थी। माँ-बाप भी उसे पागल मानकर संतोष कर चुके थे। इसी दरम्यान एक नए शिक्षक तबादला होकर इस गाँव के स्कूल में आए। उनका नाम था शिवकुमार।

शिव जी ने बाउंड्री के बाहर से ही खाना खाकर लौट जाने वाले कमलेश के लिए स्‍कूल का फाटक खोल दिया। अब वह भीतर आकर पेड़ के नीचे बैठा रहता और वहीं उसे खाना दे दिया जाता। शुरू में बच्चों के साथ कुछ मारपीट और छीना-झपटी भी हुई, लेकिन धीरे-धीरे वह इस माहौल मे सहज हो गया। अब वह खेलकूद के समय मैदान में खेलने वाले अन्य बच्चों के साथ खेल भी लेता था। शिव जी से मिल रही आत्मीयता के चलते वह उनके और अधिक करीब हो गया। वह उनकी कक्षा के भीतर भी आकर बैठने लगा। अन्य बच्चों के साथ कमलेश भी कुछ गोदा-गादी करता रहे यह सोचकर शिव जी ने उसे भी कापी-पेसिंल दे दी थी। नए सत्र में जब अन्य बच्चों के लिए पोशाक सिलाई जा रही थी तब कमलेश के लिए भी पैंट-कमीज सिल गई और उसे एक बस्ता भी दे दिया गया। इस तरह कमलेश भी नियमित स्कूल आता रहा।

आज डेढ़ साल में वह बोर्ड पर अपना नाम लिख पा रहा है। मैंने उसकी कापी को पलटकर देखा कई टेड़े-मेड़े शब्द और अंक लिखे थे। मेरे लिए यह कभी न भूल पाने वाला अनुभव बन गया। एक ऐसा लड़का जिसे उसके माँ-बाप पागल मान चुके हों, वह आज कक्षा के अन्य बच्चों के बीच बैठकर पढ़-लिख रहा है। ये सब सम्‍भव हुआ एक शिक्षक की संवेदनशीलता के चलते। सच, गुरु के सानिघ्य और स्कूल के माहौल में ही कुछ जादू होता है। तभी तो समाज द्वारा पागल घोषित किया जा चुका लड़का  भी आज साक्षर हो चुका है और अपना नाम लिख पा रहा है।

एक जिला शिक्षा अधिकारी की दूरदर्शिता

चित्‍तौड़गढ़ जिले में मुझे आए हुए अभी कुछ सप्ताह ही हुए थे। एक रोज यहाँ के जिला शिक्षा अधिकारी सुभाष शर्मा जी के साथ कुछ स्कूलों को देखने निकला था। बस्सी के जंगलों के बीच से गुजरते हाइवे से होकर हम एक छोटे से गाँव में आ पहुँचे थे। बच्चों की छुटटी हो चुकी थी। शिक्षक भी जा चुके थे। प्रधान अघ्यापक और दो मजदूर किसी निर्माण कार्य में व्यस्त थे। सुभाष जी ने निर्माण कार्य को देखा और कुछ नाराज दिखे। प्रधानाध्यापक को एक निर्माणाधीन ढलाव के पास लेकर गए और पैरों की नाप से कुछ समझाने लगे। इसके बाद वे शौचालय के पास अपने हाथों लगाए पौधों को देखने चले गए। मैं प्रधानाध्यापक के पास ही खड़ा बातचीत करता रहा और यह जानने का प्रयास किया कि आखिर जिला शिक्षा अधिकारी की नाराजी का कारण क्या था ? प्रधानाध्यापक ने निर्माणाधीन ढलवा दिखाते हुए कहा कि सर चाहते हैं कि इसकी ढलान को और कम किया जाए। अभी यह ढलान ज्यादा है। उन्हें लगता है कि कोई विकलांग बच्चा पहिए वाली कुर्सी से इस पर स्वयं नहीं चढ़ सकेगा।

लौटते समय मैं ने सुभाष जी से पूछा कि आप ढलाव को लेकर इतना नाराज क्यों हो रहे थे ? क्या इस स्कूल में कोई ऐसा बच्चा है, जिसे पहिए वाली कुर्सी पर बैठकर स्कूल आना पड़ता है ? उन्होंने कहा, अभी तो ऐसा बच्चा नहीं है, लेकिन हो सकता है कि आने वाले समय में कोई बच्चा या शिक्षक ऐसा आ जाए जिसके लिए सीढि़यों से चढ़कर कमरे तक पहुँच पाना बहुत मुशिकल हो। ढलाव ठीक रहेगा तो वह अपनी पहिए वाली कुर्सी की सहायता से कक्षा तक पहुँच सकेगा। सुभाष जी ने बताया कि स्कूलों मे होने वाले निर्माण कार्य के लिए कई गाइडलाइन्स जारी की जाती हैं परन्‍तु सभी लोग उनके पीछे के भाव को नहीं समझ पाते हैं और इन्हें नजरअंदाज़ कर जाते हैं। इस तरह के मुददों पर इतनी गहराई से सोचने वाले अधिकारी कम ही मिलते हैं। शिक्षा व्यवस्था को ऐसे और बहुत से लोगों की जरूरत है।

एक शिक्षक की पहलकदमी

चित्तौड़गढ़ जिले का एक ब्लाक .....कपासन। गर्मियों की शिक्षक प्रशिक्षण कार्यशाला चल रही थी। गणित विषय के शिक्षकों की कक्षा थी, जिसमें सतत एवं व्यापक आकलन पर सत्र चल रहा था। प्रशिक्षक ने किसी मुददे पर अपनी बात रखी और अन्य लोग कुछ-कुछ जोड़ते चले गए। बातचीत मूल मुददे से भटककर न जाने कहाँ चली गई थी। लगभग पचास एक साल की उम्र वाले शिक्षक गोपाल सर अपनी कक्षा की घटना बता रहे थे। उनकी कक्षा का एक बच्चा गिनतियों को सही ढंग से बोल नहीं पाता था। वे काफी प्रयास करते थे, सिखाने का, पर उच्चारण ही स्पष्ट नहीं बनता था। बच्चे की कुछ बातें तो समझ में आती थीं पर कुछ का पता ही नहीं चलता था कि वह कहना क्या चाहता है। एक रोज गोपाल जी उसे अपने पास बिठाकर बोलने का अभ्यास करा रहे थे। तभी उनका ध्यान गया कि बच्चे की जीभ ऊपर नहीं उठती है। गौर से देखने पर उन्होंने पाया कि जीभ और नीचे के दाँतों के बीच एक झिल्ली जैसा कुछ है जो जीभ को सामान्य रूप से ऊपर-नीचे नहीं जाने दे रहा है। दूसरे दिन ही वे उस बच्चे को लेकर पास के अस्पताल गए। डाक्टरों ने बताया कि बहुत ही सामान्य सा आपरेशन करने से ही बच्चे के ठीक से बोल सकने की सम्‍भावना है। माँ-बाप गरीब थे और आपरेशन के नाम से डर भी रहे थे। गोपाल जी ने उन्हें समझाया और डाक्टरों से भी मिलवाया। माँ-बाप की सहमति से आपरेशन हुआ जिसमें डाक्टरों ने उस झिल्ली को काटकर निकाल दिया। कुछ दिनों बाद वह बच्चा काफी ठीक उच्चारण से बोलने लगा था। गोपाल जी द्वारा मिली थोडी-सी मदद से वह बालक अब अपना जीवन और भी बेहतर तरीके से जी पा रहा होगा।

सरकार के प्रयास

प्रशांत अभी सात-आठ साल का है। वह अपनी आँखों से देख नहीं सकता। माँ-बाप अपने बच्चे की इस परेशानी से दुखी रहते थे। प्रशांत के पढ़ने की उम्र हुई तो इस शहर में उसके पढ़ सकने की कोई व्यवस्था नहीं थी। किसी निजी स्कूल मे भी कोई इंतजाम नहीं था। पास के जिले उदयपुर में एक स्कूल था, जिसमे विशेष दक्षता वाले बच्चे वहीं रहकर पढ़ते हैं। प्रशांत की माँ अपने इतने छोटे बच्चे को अभी वहाँ रहने को छोड़ नहीं सकती थी। उन्होंने एक बहुत ही मुश्किल लेकिन साहसिक निर्णय लिया। चित्‍तौड़गढ़ से उदयपुर की दूरी 120 किलोमीटर है। रोज सुबह तड़के की बस में बैठकर वे प्रशांत को उदयपुर ले जातीं और वहाँ दिनभर पढ़ने के बाद वापिस लेकर चित्‍तौड़गढ़ लौटतीं। रोज तकरीबन 250 किलोमीटर आना-जाना पड़ता था। पाँच से छह घण्‍टे बस यात्रा में ही बीतते थे।

माँ का हौसला था कि उन्होंने दो साल तक ऐसा किया। इसी दौरान उन्हें पता चला कि चित्तौड़गढ़ के एक सरकारी स्कूल में हफ्ते में एक दिन, एक शिक्षक बैठते हैं जो विशेष दक्षता वाले बच्चों को पढ़ना-लिखना सिखाने में मदद करते हैं। पहले-पहल तो उन्हें सरकार की व्यवस्था पर बहुत भरोसा नहीं हुआ फिर भी लोगों के कहने पर वह एक बार मिलने को आ गईं। कुछ और मुलाकातों में उन्हें अहसास हुआ कि प्रशांत को यहाँ पर ही सिखाया जा सकता है।

आज, प्रशांत चित्‍तौड़गढ़ शहर के ही सरकारी स्कूल में पढ़ रहा है। अभी वह ब्रेल लिपि का प्रयोग कर लेता है। जल्द ही उसे एक ऐसा कम्प्यूटर मिल जाएगा जिससे उसका लिखना-पढ़ना और भी आसान हो जाएगा। सबसे अच्छी बात यह है कि वह सामान्य बच्चों के साथ ही पढ़ रहा है। प्रशांत की मौजूदगी भर ने ही इस स्कूल के अन्य बच्चों और शिक्षकों को पहले से अधिक जिम्मेदार और संवेदनशील बना दिया है। विशेष आवश्‍यकता वाले बच्चों के साथ कैसे काम किया जाना चाहिए यह बताने के लिए सर्व शिक्षा अभियान के प्रशिक्षक लगातार आते रहते हैं। पिछले दिनों एक कार्यक्रम में प्रशांत और उसकी माँ से मुलाकात हुई। माँ अब बहुत खुश हैं। अब उन्हें रोज उदयपुर तक की यात्रा नहीं करनी पड़ रही है। उनके लिए सबसे अच्छी बात यह है कि उनका बेटा अन्य बच्चों के बीच ही रहकर पढ़-लिख रहा है। उसे किसी विशेष स्कूल जाने की आवश्‍यकता नहीं है।


मोहम्‍मद उमर, अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, चित्‍तौड़गढ़, राजस्‍थान

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