समावेशी शिक्षा के मायने

राम

उर्दू के मशहूर शायर साहिर लुधियानवी ने अपनी किताब ‘‘तलखियाँ’’  की भूमिका में लिखा है : ....

‘‘दुनिया के तजुर्बातों हवादिस की शक्ल में,

जो कुछ दिया है उसको ही लौटा रहा हूँ मैं।’’

साहिर के इस शेर के जिक्र का मकसद यही कहने की कोशिश है कि मैं यह भरसक प्रयास करूँगा कि समावेशी शिक्षा से जुड़े तमाम खट्टे-मीठे अनुभव बेबाकी से बयान कर सकूँ। यह इसलिए जरूरी है ताकि समावेशी शिक्षा से जुड़े तरह-तरह के लोगों से इसके कुछ पहलुओं के सन्दर्भ में कुछ यथार्थपरक समझ बनने में कुछ मदद मिल सके।

समावेशी शिक्षा का आशय विकलांग विद्यार्थियों (जिन्हें आजकल विशिष्ट आवश्यकताओं वाले विद्यार्थी कहा जाता है) को सामान्य बच्चों के साथ बिठाकर सामान्य रूप से पढ़ाना है, ताकि सामान्य बच्चों और विशिष्ट आवश्यकताओं वाले बच्चों में कोई भेदभाव न रहे तथा दोनों तरह के विद्यार्थी एक-दूसरे को ठीक ढंग से समझते हुए आपसी सहयोग से पठन-पाठन के कार्य को कर सकें।

समावेशी शिक्षा का एक व्यापक लक्ष्य यह भी प्रतीत होता है कि एक साथ शिक्षित होने पर भविष्य में समाज के अन्दर विशिष्ट आवश्यकता वाले व्यक्तियों के सरोकारों को आम लोग बेहतर ढंग से समझ सकें तथा उनमें उनके प्रति अपेक्षित संवेदनशीलता का विकास हो सके। समावेशी शिक्षा को प्रोत्साहित करने का अपना एक राजनीतिक अर्थशास्त्र भी है जो भू-मण्डलीकरण या उदारीकरण की प्रक्रियाओं से प्रेरित है। यह राजनीतिक अर्थशास्त्र इस मान्यता पर आधारित है कि सरकार को जनकल्याण, सामाजिक तथा गैर-उत्पादक कार्यों पर कम से कम खर्च करना चाहिए। विशिष्ट आवश्यकताओं वाले बच्चों के लिए विशेष विद्यालय चलाना महँगा सौदा है (वो भी विकलांगों की कम से कम पाँच श्रेणियों के लिए)। इसलिए समावेशी शिक्षा की अवधारणा को प्रोत्साहित किया जा रहा है।

समावेशी शिक्षा को जमीनी स्तर पर लागू करने के लिए देश के विभिन्न राज्यों के विकलांगों की मुख्य श्रेणियों- दृष्टिबाधित, अस्थिबाधित,  मूक-बधिर,  मन्दबुद्धि तथा स्वलीनता से ग्रसित लोगों को पढ़ाने के लिए अलग-अलग नामों से अंशकालीन शिक्षक एवं शिक्षिकाएँ रखे जाते हैं। इन्हें अधिकतर राज्यों में न्यूनतम मजदूरी से भी कम वेतन दिया जाता है तथा अपर्याप्त प्रशिक्षण।

समावेशी शिक्षा, क्योंकि भू-मण्डलीकरण की देन है, इसलिए इसे अन्तर्राष्ट्रीय तथा बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का भी व्यापक समर्थन हासिल है। इस समर्थन की भी अपनी राजनीति, गणित और विज्ञान है। विकलांगों के विषयों में कार्यरत विभिन्न जन-संगठनों तथा समाजसेवी संस्थाओं की भी अपनी राजनीति है। किसी भी योजना से सबसे अधिक लाभ प्राप्त करने वाले अस्थिबाधित लोगों तथा मूकबधिर लोगों से जुड़े अत्यधिक संगठन समावेशन के नाम पर समावेशी योजनाओं के लाभों से अपेक्षाकृत वंचित लोगों, खासतौर पर दृष्टिबाधित लोगों के अधिकतर संगठन इसका विरोध करते हैं।

इस तरह समावेशी शिक्षा के समूचे मॉडल में शिक्षा की पहुँच तथा शिक्षा की गुणवत्ता दोनों ही गम्भीर प्रश्नों के घेरे में है। इसके लिए चलताऊ नीतियाँ तथा तात्कालिक मसलों को क्षणिक रूप से हल कर लेने की प्रवृत्तियाँ काफी हद तक जिम्मेदार हैं।

मेरा अनुभव

मुझे समावेशी शिक्षा को विद्यार्थी, शिक्षा कार्यकर्त्ता तथा शिक्षक तीनों स्तरों पर देखने का मौका मिला है। हर स्तर पर मैंने अलग-अलग तरह के अनुभव प्राप्त किए। विद्यार्थी के तौर पर मैंने कक्षा नौंवी से स्नातकोत्तर तक स्वयं समावेशी शिक्षा प्राप्त की। पीछे मुड़कर देखने पर मुझे याद आता है कि नौवीं कक्षा के प्रारम्भिक दिनों में मुझे कक्षा की अन्तिम या कभी-कभी सबसे पहली बैंच पर बिठाया जाता था और ज्यादातर विद्यार्थी मुझ से बात नहीं करते थे। अधिकतर शिक्षक भी ‘सकारात्मक भेदभाव‘   करते हुए बच्चों को मेरा ध्यान रखने तथा मुझसे शरारतें न करने की हिदायतें देते रहते थे। प्रारम्भिक दिनों में न तो वे मेरा गृहकार्य जाँचते थे और न ही मुझसे प्रश्नों के उत्तर सुनते थे जो कि मुझे आमतौर पर याद होते थे। मुझे बच्चों और शिक्षकों का यह व्यवहार अधिक पसन्द नहीं आया, इसलिए मैंने अपने आप में कुछ बदलाव किए। धीरे-धीरे मैंने अपनी छवि एक चुलबुले और शरारती विद्यार्थी की बनाई और साथियों से तरह-तरह की शरारतें करनी शुरू कीं। इन शरारतों के चलते कई बार मैंने गम्भीर डाँट खाई, जो मुझे काफी बुरी भी लगी।

बहरहाल, इन शरारतों का नतीजा यह निकला कि कक्षा के अधिकतर विद्यार्थी मेरे साथ काफी घुल-मिल गए और मुझे कक्षा का अभिन्न हिस्सा समझने लगे। शिक्षकों ने भी शायद मुझे शरारतों से रोकने के लिए गृहकार्य देना तथा प्रश्नों आदि के बारे में पूछना शुरू कर दिया। इस तरह नौवीं तथा दसवीं में समावेशी शिक्षा प्राप्त करते हुए मुझे यह स्पष्ट रूप से अनुभव हुआ कि यदि मैं स्वयं लोगों के साथ मेलजोल बनाऊँ तो लोगों को शायद मुझसे कोई परहेज नहीं होगा। इसके लिए यह बहुत जरूरी था कि मैं अपने आप को अन्य बच्चों के अनुसार ढाल लूँ तथा अपने में किसी भी तरह की हीन-भावना न आने दूँ। इसके लिए मैंने स्कूल से भागने से लेकर कक्षाओं की जगह सिनेमा हॉलों में उपस्थिति दर्ज करवाना भी नहीं छोड़ा। मुझे अब भी याद है कि हमने चर्चित हिन्दी फिल्म ’गजल’ के एक गीत ‘किसे पेश करूँ’  के ऊपर पैरोडी बनाई थी,

‘‘मैंने जज्बात निभाए हैं, उसूलों की जगह,

दिन सिनेमा में बिताए हैं, स्कूलों की जगह।’’

कॉलेज की समावेशी शिक्षा का अनुभव स्कूली शिक्षण से कुछ अर्थों में थोड़ा भिन्न था। पूर्व अनुभव को ध्यान में रखते हुए कॉलेज के शुरुआती दिनों में मैंने कक्षा में अधिक से अधिक बोलना शुरू किया, शिक्षकों से बात-बात पर प्रश्न करना तथा उनके अध्यापन पर टिप्पणियाँ करना मुख्य गतिविधियाँ थीं। शीघ्र ही कुछ साथियों को लगने लगा कि शायद मैं उनसे बेहतर विद्यार्थी हूँ। काम चलाऊ स्तर तक तीन भाषाएँ (हिंदी, पंजाबी, अँग्रेजी) जानने की वजह से मेरी एक ऐसी मित्र-मण्डली जल्द ही बन गई, जिसके अधिकतर लोगों का अँग्रेजी में हाथ काफी तंग था। जरूरत पड़ने पर वे मुझसे पढ़ने-लिखने या अकादमिक विषयों को समझने में सहयोग लेते थे और घूमने-फिरने या दूसरे कार्यों में मेरी काफी मदद करते थे। मैंने स्वयं को और अधिक खोला। साथी या शिक्षक मुझसे मेरे बारे में या दृष्टिबाधिता के बारे में कुछ भी पूछ सकते थे। मेरा मानना था कि उनके मन में दृष्टिहीनता के बारे में बहुत सारे भ्रम इसलिए भी होंगे क्योंकि वे उसके बारे में बहुत कम जानते हैं। अगर वे मुझसे नहीं पूछेंगे तो उनके ये भ्रम बहुत दूर तक जा सकते हैं। मेरे खुलेपन की वजह से वे नेत्रहीनों के बारे में बने तरह-तरह के चुटकुले सुनाकर या कभी-कभी सुनियोजित ढंग से चिढ़ाने की कोशिश भी करते थे। मैं अक्सर उनके चुटकुलों में से कुछ न कुछ ढूँढकर गेंद को वापिस उन्हीं के पाले में डालने की कोशिश करता। मेरे लिए उन चुटकुलों में भी सीखने के लिए काफी दुनियाई ज्ञान होता। मसलन मुझे यह समझ में आता कि आम लोगों में विकलांगों तथा खासतौर पर दृष्टिबाधित लोगों के सन्दर्भ में किस-किस तरह के पूर्वाग्रह व्याप्त हैं। इन पूर्वाग्रहों के सामान्य विश्लेषण से ही यह स्पष्ट होता है कि बहुत सारी बातें लोगों के दिमाग पर इसलिए हावी हैं क्योंकि वे इनके बारे में बहुत कम जानते हैं। उदाहरण के लिए मेरे एक मित्र जो आजकल वकील हैं, किसी दृष्टिबाधित व्यक्ति द्वारा माचिस से बीड़ी जलाने को एक बड़ा चमत्कार मानते थे। वे यह घटना अक्सर सुनाते थे कि उनके गाँव में एक नेत्रहीन व्यक्ति था, जो बिना किसी की सहायता से बीड़ी जलाकर पीता था। मैंने उन्हें कई उदाहरणों से समझाया कि ये केवल अभ्यास साध्य बातें हैं। जिस तरह अभ्यास से आप कोई भी काम कर लेते हैं, वैसे ही वे बीड़ी जला लेते होंगे।

मैं कॉलेज में पाठ्येत्तर गतिविधियों में काफी सक्रिय रहता था, जिसकी वजह से बहुत से विद्यार्थी मेरे निकट सहयोगी बने। गतिविधियों के लिए इकट्ठे आना-जाना तथा एक साथ मिलकर कार्य करना मेरे लिए लोगों के साथ समाविष्ट होने में बहुत सहायक हुआ। कॉलेज के दौरान भी मैंने ‘सकारात्मक भेदभाव‘  का कुछ हद तक सामना किया और उसका विरोध भी। एक बार कविता पढ़ने की एक प्रतियोगिता में मुझे प्रथम पुरस्कार दिया गया। मैंने सोचा कि शायद यह पुरस्कार मुझे इसीलिए दिया जा रहा है कि मैंने दृष्टिबाधित विद्यार्थी होते हुए भी प्रतियोगिता में भाग लिया। मैंने इसका पुरजोर विरोध किया। बाद में मुझे अध्यापकों ने डाँटते हुए समझाया कि हर कॉलेज की कोशिश रहती है कि ऐसी प्रतियोगिताओं में विद्यार्थियों को अधिक से अधिक पुरस्कार दिए जाएँ। लेकिन उस विरोध का सकारात्मक असर यह पड़ा कि लोगों को यह समझ आया कि मुझे पात्रता के बिना कुछ नहीं चाहिए तथा मुझमें और अन्य विद्यार्थियों में कोई अन्तर न समझा जाए।

विश्वविद्यालय तक आते-आते मैं कई तरह की राजनीतिक गतिविधियों से जुड़ चुका था, जिनमें दृष्टिबाधित लोगों के लिए चलने वाले संगठनों तथा विश्वविद्यालय में विद्यार्थियों के संगठनों की गतिविधियाँ मुख्य रूप से शामिल थीं। इस दौरान मुझे साम्यवादी विचारधारा से जुड़कर विभिन्न स्तरों पर कार्य करने वाले कई लोगों तथा कई  समूहों ने बहुत गहराई से प्रभावित किया। मैंने साम्यवादी लोगों को शायद वैचारिक स्पष्टता और परिपक्वता की वजह से अधिक मानवतावादी तथा समानता का पैरोकार पाया। कई लोग तो आज भी याद हैं जो सच में हर तरह के भेदभाव से ऊपर उठकर बराबरी का व्यवहार करते थे। साम्यवादी लोगों के व्यवहार ने मेरे विचारों के साथ-साथ आत्मविश्वास को बढ़ाने में विशेष रूप से सहायता की। विश्वविद्यालय में समावेशी अनुभव इस दृष्टि से नया था कि मैं पहली बार सहशिक्षा का अनुभव प्राप्त कर रहा था। मुझे यह स्पष्ट था कि मेरा उद्देश्य और गतिविधियाँ मुख्यधारा से कुछ अलग हैं इसीलिए मैं सामान्य उठा-पटक से कुछ दूर ही रहा। मुझे यह समझने में कोई बहुत देर नहीं लगी कि विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले लड़के और लड़कियों में से कुछ ही पढ़ाई के प्रति गम्भीर होते हैं, अधिकतर लड़के-लड़कियों की प्राथमिकता चण्डीगढ़ तथा विश्वविद्यालय के दूसरे आकर्षण होते हैं।

दूसरी बात जो मुझे समझ में आई, वह यह थी कि अधिकतर की पसन्द ऐसे लोग होते हैं जिनके पास पैसा या चकाचौंध के दूसरे साधन हों। बहरहाल सर्वहारा क्रान्ति के स्वप्न के वशीभूत सह-शिक्षा या दूसरे शब्दों में कहें कि लड़कियों के साथ पढ़ना मुझे विशेष रूप से आकर्षित नहीं कर पाया। दूसरों के ज्ञान तथा अनुभवों ने मुझे इस सन्दर्भ में भी बहुत कुछ सिखाया तथा मैं शीघ्र ही कई लड़कों के लिए काउंसलर की भूमिका निभाने लगा। यह वो दौर था जब पंजाब-विश्वविद्यालय में साम्यवादी राजनीति अपने मध्य तथा अन्त की ओर अग्रसर थी। ऑल इण्डिया स्टूडेंट फैडरेशन (ए.आई.एस.एफ.) की ओर से कार्य करते हुए मुझे अपने कई मित्रों सहित यह लगभग यथार्थ सा लगता था कि कुछ दशकों के बाद तो क्रान्ति आ ही जाएगी।

इस प्रक्रिया में शामिल रहते हुए मैंने विश्वविद्यालय में अपने आप को प्रस्तुत करने तथा अपने विषय के पक्ष में तर्क गढ़ने के हुनर को सेमिनारों तथा गोष्ठियों के द्वारा और मजबूत करने की कोशिश की। यह कार्य मैंने एक समावेशित व्यक्ति के रूप में किया। विद्यार्थी के तौर पर अपने अनुभव को सारांश रूप में पेश करूँ तो कुछ बुनियादी बातें ढूँढ़ी जा सकती हैं।

हमें दूसरों के साथ घुलने-मिलने के लिए अपने आप में आवश्यक बदलाव करके स्वयं को परिस्थितियों के अनुसार ढालना आना चाहिए। हमारा व्यवहार हर प्रकार की हीनता से ऊपर उठते हुए खुला और मिलनसार होना चाहिए। सीखने-सिखाने की प्रक्रिया को द्वि-पक्षीय प्रक्रिया समझकर अपने अनुभवों को उस प्रक्रिया में शामिल करना चाहिए।

आमतौर पर समाज में विकलांगों सहित हर तरह के अल्प-संख्यक समूहों के बारे में तरह-तरह के पूर्वाग्रह व्याप्त हैं,  उन्हें तोड़ने के लिए लोगों के साथ सम्मिलित होना और हर पूर्वाग्रह का तार्किक विश्लेषण आवश्यक है। समाज में विकलांगों के प्रति सकारात्मक व सन्तुलित संवेदनशीलता का बहुत अभाव है,  जिसे संवाद से ही विकसित किया जा सकता है।

शिक्षा कार्यकर्त्ता और समावेशी शिक्षा

मैंने एकलव्य तथा रायपुर चर्चित विकास एवं राहत समिति (आर.सी.डी.आर.सी.) में पूर्ण-कालिक शिक्षा कार्यकर्त्ता के रूप में कार्य किया है। एकलव्य में यह कार्य शालीय ढाँचों के तहत शिक्षकों तथा विद्यार्थियों के साथ किया। रायपुर चर्चित विकास एवं राहत समिति में मजदूरों के समूहों तथा साक्षरता अध्यापिकाओं के साथ मैंने यह कार्य गैरशालीय संगठनात्मक ढाँचों में किया। एकलव्य में देवास, मध्यप्रदेश स्थित केन्द्र पर कार्य करते समय मुझे कुछ शाला स्कूलों के प्रभारियों ने मध्यप्रदेश माध्यमिक शिक्षा विभाग के कुछ कार्यकर्त्ताओं को ब्रेल सिखाने के लिए कहा। कई बार लम्बी बातचीत होने के बावजूद वे अन्ततः अपने कार्यकर्त्ताओं से मेरा सम्पर्क नहीं करवा सके। समावेशी शिक्षा का जो ढाँचा उन्होंने मुझे समझाया उसमें किसी एक केन्द्रीय स्थान पर आसपास के कुछ बच्चों को पढ़ने के लिए भेजा जाना था। वहाँ पर एक ब्रेल अनुदेशक उन्हें सप्ताह में एक या दो दिन प्रशिक्षण देंगे। अनुदेशक से यह अपेक्षित था कि वे सप्ताह में छह दिन चार से लेकर छह समावेशी शालाओं में जाएँगे तथा हरेक शाला में जाकर दृष्टि-बाधित बच्चों को ब्रेल सिखाएँगे। मैंने उनसे पूरी गम्भीरता से यह जानना चाहा कि बाकी दिन ऐसे बच्चों की पढ़ाई किस तरह होगी, इसका उनके पास कोई ठोस कार्यक्रम नहीं था। मैंने उन्हें पाठकों/रीडरों की व्यवस्था, श्रव्य सामग्री तथा कई मामलों में वैकल्पिक उपकरण इस्तेमाल करने की सलाह दी लेकिन वह अपने अंजाम तक पहुँच नहीं सकी। एकलव्य में कार्य करते हुए मुझे कई शालाओं में कुछ विशिष्ट आवश्यकताओं वाले बच्चे, खासतौर पर अस्थिबाधित तथा दृष्टिबाधित बच्चे अधिक मिले। मैंने यह पाया कि निजी रूप से संवेदनशील शिक्षकों के अलावा समूची व्यवस्था ऐसे बच्चों के प्रति बहुत कम ध्यान देती थी तथा बच्चे अपने-आप को समूची प्रक्रिया से काफी अलग-थलग समझते थे। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि इस तरह की व्यवस्था विशिष्ट आवश्यकता वाले बच्चों को शिक्षा में समाविष्ट करेगी या शिक्षा से अलग करेगी?

एक शिक्षक के रूप में

अपने सात वर्ष के शिक्षकीय कार्यकाल में मैंने माध्यमिक या उच्चतर माध्यमिक शालाओं में ही पढ़ाया है। मैंने पाया कि सामान्य शालाओं में विशिष्ट आवश्यकताओं वाले बच्चे अभी भी बहुत कम आते हैं। मेरे ख्याल से मैंने अभी तक ऐसे तीन या चार बच्चों को ही देखा होगा। ये सारे बच्चे अस्थिबाधित थे। पढ़ने में ये लगभग औसत दर्जे के ही थे, इसलिए ये किसी भी तौर पर अपनी योग्यता के आधार पर विशेष आकर्षण का केन्द्र नहीं बनते थे। कुछ शिक्षिकाओं की व्यक्तिगत संवेदनशीलता के अलावा अधिकांश शिक्षक तथा बच्चे इनके प्रति उदासीन ही रहते थे। बच्चे इन्हें तरह-तरह के विशेषणों से चिढ़ाते थे, जो किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को सुनने में अच्छा नहीं लग सकता।

मुझे कई बार मौका मिला कि मैं बच्चों से सम्वाद कर सकूँ। मैंने अपनी तरफ से उन्हें आश्वस्त करने की कोशिश की, कि उनकी विकलांगता उनके मार्ग में तब तक ही बाधा बन सकती है, जब तक वे अपना इरादा मजबूत नहीं करते। एक बार वे तय करें कि उन्हें यह करना है, तब उन्हें जरूरी मदद भी मिल जाएगी। मैंने इन बच्चों के अभिभावकों को उन सरकारी योजनाओं के विषय में भी बताया जिनसे वे लाभ उठा सकते हैं। लेकिन मुझे ठीक-ठीक पता नहीं कि उन्होंने कितना लाभ उठाया।

समाज में विशिष्ट आवश्यकताओं वाले लोगों, खासतौर पर अल्पसंख्यक वाले समूह के लोगों के प्रति व्याप्त सम्वेदनहीनता तो जग जाहिर है और इसके उचित-अनुचित कई कारण हैं, जिन्हें हमारी समूची शिक्षा-प्रणाली, समाजीकरण की प्रक्रियाएँ तथा सामाजिक ढाँचे बिल्कुल सम्बोधित नहीं करते। ऐसा शायद इसलिए कि अब तक हम इस सामाजिक आवश्यकता को सही ढंग से पहचान नहीं पाए हैं। बिना पहचाने किसी भी रोग के उपचार की कोशिशें शायद अन्धेरे में तीर मारने जैसा ही होगा।

जिस समाज में लोगों का 90 प्रतिशत समय मूलभूत आवश्यताओं की पूर्तिै की उधेड़-बुन में ही लग जाता है, वे लोग उन मुद्दों पर कैसे संवेदनशील हो सकते हैं जो उनसे जुड़ते ही नहीं। एक ठोस शुरुआत करने के लिए जरूरी है कि समावेशी शिक्षा के समूचे विषय को एक सम्मत परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तथा विशिष्ट आवश्यकताओं वाले बच्चों के साथ-साथ उनके अभिभावकों, उनके आसपास और उन्हें पढ़ाने वाले लोगों के सरोकारों का भी पूरी शिद्दत के साथ ध्यान रखा जाए। समावेशी शिक्षा निश्चित रूप से प्राथमिक स्तर के विशिष्ट प्रशिक्षण के बाद ही दी जानी चाहिए। तभी इसके नतीजे ठोस और सार्थक निकल सकते हैं।

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राम: शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, कारकौर, ब्लाक डेरा बस्सी-2, जिला-अजीतगढ़ (मोहाली) पंजाब में अध्यापक हैं। राम स्वयं दृष्टिबाधित हैं। उन्होंने मध्यप्रदेश में एकलव्य, शैक्षणिक शोध एवं नवाचार संस्थान में लगभग 8 वर्ष तक ‘सामाजिक अध्ययन’ विषय से जुड़े कई आयामों पर काम किया है। इस दौरान 2003 से 2005 तक छत्तीसगढ़ में बनने वाली नई पाठ्यपुस्तकों के विकास, पाठ्यचर्या के नवीन ढाँचे, 2005-2006 के तहत राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद द्वारा बनने वाली सामाजिक एवं राजनैतिक जीवन की कक्षा आठ की पुस्तक व लोकतांत्रिक राजनीति शीर्षक से विकसित होने वाली कक्षा नौ की पुस्तक के विकास में भी सहयोग दिया। पाठ्यपुस्तक विकास की प्रक्रियाओं में राम बिहार और पंजाब में भी सहयोग दे चुके हैं।

राम, राष्ट्रीय दृष्टिहीन संघ के पिछले 20 वर्षों से सक्रिय कार्यकर्त्ता हैं। आजकल वे इस संगठन के राज्यस्तरीय महासचिव हैं। संघ दृष्टिबाधित लोगों के समग्र विकास के लिए प्रयासरत है। संगठन का मुख्य जोर शिक्षा, रोजगार व पुनर्वास पर है। पंजाब में इस संगठन के प्रयासों से पिछले 20 वर्षों में लगभग 800 दृष्टिबाधित लोगों को रोजगार प्राप्त हुआ है।

राम का मानना है कि हर एक विकलांग व्यक्ति को रोजमर्रा कई तरह के भेदभावों का सामना करना पड़ता है। ये भेदभाव घर से लेकर समाज की उच्चतम इकाई तक अलग-अलग ढंग से परिलक्षित होते हैं। इनसे मुक्त होने का मार्ग यही है कि हर एक विकलांग व्यक्ति को अपनी क्षमताओं व सम्भावनाओं को विकसित होने के पूर्ण अवसर देने चाहिए। ऐसे हर व्यक्ति को अपने विकास के लिए परिवार व मित्रों का भरपूर समर्थन व सहयोग अत्यन्त आवश्यक है। ऐसा समर्थन कुछ हद तक प्राकृतिक रूप से हासिल होता है, लेकिन बहुत कुछ अपने प्रयासों व स्वभाव से हासिल करना होता है।

यह लेख ‘खोजें और जानें’ अंक 8 से साभार।

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