संवाद शुरू कैसे हो : पर्यावरण की कक्षा के कुछ अनुभव - 2

महमूद खान

इस लेख के पहले भाग के लिए इस लिंक पर जाएँ  संवाद शुरू कैसे हो : पर्यावरण की कक्षा के कुछ अनुभव - 1

अगले कुछ दिन के अन्‍तराल के बाद मैं एक बार फिर इसी स्कूल में, इसी कक्षा के बच्चों के बीच था। इस बार मैं इसी मुद्दे से जुड़ी एक फिल्म भी लेकर आया था। यह फिल्म विज्ञान प्रसार द्वारा बनाई गई है तथा इसका नाम है - पृथ्वी के रहस्य। पाठ पढ़ने के बाद फिल्म दिखाने की मेरी योजना थी। आज फिर से जल के स्रोतों पर आधारित अपने पिछले काम को कुछ और आगे ले जाने का प्रयास किया। मैंने पूछा कि बताओ, पिछली बार हमने कहाँ तक काम किया था ? बच्चों ने पाठ को याद करते हुए कहा कि बादल कैसे बनते हैं तथा वर्षा कैसे होती है, इस पर काम छूट गया था।

मैंने कहा कि आज हम इस पर काम करेंगे लेकिन पहले हम यह भी जानेंगे कि नहर व नदी में क्या अन्‍तर होता है। उस दिन आप ये अन्‍तर भी नहीं बता पाए थे।

गणेश नाम के बच्चे ने कहा कि सर नहर छोटी होती है और नदी बड़ी होती है।

आसिफ ने कहा कि कुछ नहर नदी से बड़ी भी होती हैं।

मैंने कहा कि हाँ कुछ नदी कुछ नहरों से लम्बाई में छोटी भी होती हैं। लेकिन यह सब नदियों पर लागू नहीं होता। दूसरा अन्‍तर बताओ ?

एक दूसरे लड़के ने कहा कि नहर की बनावट एक जैसी होती है, जबकि नदी उबड़-खाबड़ होती है। मैंने पूछा कि नदी और नहरों में पानी कहाँ से आता है ? दरअसल मैं यहाँ पर अपेक्षा कर रहा था कि बच्चे कहेंगे कि नदी में बरसात से तथा नहरों में बाँध से, लेकिन मेरी अपेक्षा गलत साबित हुई। बच्चों ने कहा कि वर्षा से। मैंने फिर कहा कि पक्की बात है। बच्चे सोचने लगे। लेकिन वे किसी नतीजे पर नहीं पहुँचे।

अगला सवाल किया गया कि नदी उबड़-खाबड़ तथा नहर एक जैसी क्यों होती है ? कक्षा की एक लड़की बोली कि नहर पक्की होती है तथा नदी कच्ची। इसलिए नदी उबड़-खाबड़ होती है। गणेश बोला हमारे गाँव में तो नहर कच्ची है। आसिफ ने कहा कि सर आप ही बता दीजिए की नहर कच्ची होती है या पक्की। कुछ बच्चे इस चर्चा से बिल्कुल बाहर नजर आए। दरअसल इन्होंने न तो नदी देखी और न ही नहर।

मुझे लगा कि यहाँ मेरी भूमिका बनती है कि नहर व नदी के फर्क को समझा दिया जाए। मैंने बताया कि नदी प्राकृतिक होती है इसलिए ही वह उबड़-खाबड़ भी होती है, जबकि नहरों का निर्माण मनुष्यों द्वारा अपनी जरूरत को ध्यान में रखकर किया जाता है। हाँ ये सही बात है कि कुछ नहर पक्की बनाई जाती हैं और कुछ कच्ची ही होती हैं। एक और बात जिसकी तरफ बच्चों का ध्यान दिलाया गया कि नहर बाँध से निकाली जाती हैं और बाँध नदी पर बनाया जाता है। यानि नहर और नदियों का उदगम स्थल अलग-अलग होता है। यहाँ पर उनकी पाठ्य-पुस्तक में दिए गए बीसलपुर बाँध एवं उससे निकलती नहरों के चित्र की भी मदद ली गई।

इसके बाद मैंने कहा कि अब हम बादल और वर्षा की बात करेंगे,बताओ बादल कैसे बनते हैं ? आसिफ ने कहा कि सर बादल तेज अंधड़ से जब धूल उड़कर आसमान में चली जाती है तो बादल बनते हैं। एक दूसरे लड़के ने कहा कि सर हम बताएँ। हाँ तुम भी बताओ, मैंने कहा। उसने कहा कि धूल के कणों के साथ जब सूरज की तेज गर्मी से पानी भाप बनकर आसमान में चला जाता है तो दोनों मिलकर बादल बनाते हैं। पिंकी ने कहा कि धूल, मिट्टी, धुआँ आदि के कण जब भाप में मिल जाते हैं तो बादल बनते हैं। जब बादलों में अधिक पानी हो जाता है तथा उसका वजन बढ़ जाता है तो वह वर्षा में बदल जाता है। इतनी चर्चा के बाद मुझे लगा कि अब फिल्म को दिखाया जाना उचित होगा क्योंकि इस फिल्म में विस्तार से बादल बनने तथा वर्षा होने को समझाया गया है। फिल्म देखते हुए जहाँ जरूरत महसूस हुई मैं बीच-बीच में समझाता रहा। बच्चों ने फिल्म को रूचि लेकर देखा।

मेरे मन में उठते सवाल

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या 2005 का दस्तावेज अध्यापकों की भूमिका देखता है कि वह बच्चों को अभिव्यक्ति के लिए एक सुरक्षित स्थान व अवसर दें और साथ ही निश्चित प्रकार की अंतःक्रिया(संवाद) स्थापित करें। उन्हें नैतिक सत्ता की परम्परागत भूमिका से बाहर निकलने तथा बिना निर्णयात्मक हुए समानुभूति के साथ कैसे सुनना होता है सीखना होगा। बच्चों को एक-दूसरे को सुनने में सक्षम बनाना होगा। शिक्षार्थियों की समझ को समेकित कर, रचनात्मक रूप से उस समझ की सीमाएँ बढ़ाते हुए इस बात के प्रति सचेत भी करना होगा कि मतभेद या अन्‍तर किस प्रकार व्यक्त किए जा सकते हैं। परस्पर विश्‍वास का वातावरण कक्षा को बच्चों के लिए एक ऐसा सुरक्षित स्थान बना देगा जहाँ वे अनुभव बाँट सकें, जहाँ  विवादों को स्वीकार कर, उन पर रचनात्मक प्रश्‍न उठाए जा सकें, और जहाँ विवादों के हल,परस्पर सहमति से निकाले जा सकें। चाहें ये हल कितने ही अस्थायी क्यों न हों। विशेषकर लड़कियों व वंचित सामाजिक वर्ग से आए बच्चों के लिए कक्षा व स्कूल ऐसे स्थान होने चाहिए जहाँ वे निर्णय लेने की प्रक्रिया पर चर्चा कर सकें, अपने निर्णय के आधार पर प्रश्‍न  उठा सकें तथा सोच-समझ कर विकल्प चुन सकें।

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या 2005 के दस्तावेज में अध्यापकों से अपेक्षा के सन्‍दर्भ में बच्चों के साथ हुए इस संवाद से मेरे सामने कई प्रश्‍न उभर कर आए हैं। मुझे लगता है कि बतौर शिक्षक इन सवालों की तरफ भी सोचना बहुत जरूरी है। मैंने पाया है कि अक्सर शिक्षक बच्चों के व्यवहारिक ज्ञान को नजरअंदाज करके पुस्तकीय जानकारी पर ही केन्द्रित रह जाते हैं। बच्चे बहुत से मुद्दों पर गलत या अधूरी सी अवधारणा अपने साथ लेकर स्कूल आते हैं यदि उन्हें जाने बिना एक शिक्षक उन्हीं मुद्दों पर नई अवधारणा बच्चों को देने का प्रयास करेगा/गी तो क्या ये बच्चों के सीखने को प्रभावित नहीं करेगा? शिक्षा दार्शनिक जॉन डूवी भी कहते हैं कि  ‘‘यदि शिक्षक बच्चे के व्यवहारिक ज्ञान/जानकारी/अवधारणा को नजरअंदाज करता है तो बच्चे को किसी भी जाँच-पड़ताल के लिए प्रेरित या उकसाया नहीं जा सकता। बच्चे की मान्यताओं में कोई समस्या है तो उसे दिखाना जरूरी है।’’  इसलिए शिक्षक बच्चे से पूछता है कि ए अच्छा !!! यह बात सुनने में तो अच्छी लग रही है कि भगवान हिमालय पर रहते हैं। लेकिन तुम्हारी बात सुनकर मेरे दिमाग में एक सवाल उठ रहा है। यदि भगवान हिमालय पर रहते हैं तो फिर उन देशों में वर्षा कैसे होती होगी जो हिमालय पर्वत से बहुत दूर हैं क्योंकि वहाँ तो आपके अनुसार भगवान रहते नहीं हैं। यहाँ  बच्चे अपने उत्तर के लिए फिर से तर्क लाते हैं कि भगवान हर जगह पाया जाता है। यहाँ यह कहने का प्रयास किया जा रहा है कि यदि हम बच्चों को सही तथ्य ढूँढ़ने के लिए प्ररित करेंगे तो ही कक्षा में संवाद की संस्कृति पैदा की जा सकती है जो शिक्षण के लिए निहायत लाभकारी होगी।

ऊपर हमने देखा कि बच्चे यह तो जाने रहे थे कि उनके घरों के नलों में जो पानी आता है वह बीसलपुर से आता है, लेकिन यह बीसलपुर है क्या ? यहाँ पर पानी कहाँ से आता होगा ? इन सवालों से वे अनजाने थे। इसी तरह बादलों को पानी के स्रोत के रूप में तो बता पा रहे थे लेकिन बादलों में पानी कहाँ से आता है ? इस पर बहुत भ्रम था। इस तरह की स्थितियों को शिक्षक द्वारा नजरअंदाज करना क्या ठीक है?

इस तरह के सवालों में हम पर्यावरण की शिक्षा से विज्ञान शिक्षा की ओर बढ़ने के स्पष्ट अवसर खोज सकते हैं। एक और सवाल उभरकर आया कि अक्सर स्कूल की तरफ से अभिभावकों पर जिम्मेदारी डाल दी जाती है। यह सही है कि अभिभावकों को भी अपने बच्चों के सीखने की प्रक्रिया में भूमिका अदा करना चाहिए या कम से कम इस तरफ जागरूक तो रहना ही चाहिए। लेकिन हमारे देश में बहुत से बच्चे अभी पहली पीढ़ी हैं जिन्हें स्कूल जाने का मौका पहली बार मिल पा रहा है। इस स्कूल में भी ज्यादातर बच्चे मजदूर परिवारों से आ रहे हैं। निर्माण कार्य से जुडे परिवारों के बच्चों से यह कहा जाना कि इन सवालों के बारे में अपने परिवार से जानकारी लेकर आओ कितना उचित है ?                                 

एक और बात जिसे मैंने महसूस किया वह यह थी कि शिक्षक और बच्चों के बीच होने वाले संवाद का महत्व। आखिर हमारे स्कूलों में बच्चों को कक्षा में आपसी संवाद या शिक्षक के साथ संवाद का अवसर क्यों नहीं दिया जाता। हमने देखा है कि आपसी संवाद से बच्चों में स्वतंत्र अभिव्यक्ति तथा तर्क करने की क्षमता का विकास होता है। इस तरह कई सारे भ्रम और सवालों का जवाब तो आपसी चर्चा से ही निकल कर आ जाता है। स्कूली ज्ञान बच्चों को ऐसे मौके भी दे सकता है कि वे घर के अनुभवों और वहाँ पैदा हुई चिन्‍ताओं के बारे में बात कर पाएँ। राष्ट्रीय पाठ्यचर्या का दस्तावेज इस ओर पर्याप्त इशारा करता है।


महमूद खान : संदर्भ सदस्य, अज़ीम प्रेमजी फाउण्डेशन, जयपुर  चित्र : प्रशांत सोनी

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