संवाद शुरू कैसे हो : पर्यावरण की कक्षा के कुछ अनुभव - 1

महमूद खान

मैं पिछले पाँच वर्षों से राजस्थान के सेवारत शिक्षकों के ग्रीष्मकालीन प्रशिक्षणों में पर्यावरण अध्ययन विषय में जुड़ता रहा हूँ। शिक्षकों से जब भी कक्षा-कक्ष की प्रक्रियाओं पर बात करने का अवसर मिला तो उन्होंने बताया कि उनके स्कूल में सबसे कमजोर बच्चे प्रवेश लेते हैं। गरीब-मजदूर लोग अपने बच्चों के प्रति जागरूक नहीं होते हैं। बच्चे पढ़ाई के प्रति बहुत लापरवाह होते हैं। इन बच्चों का पढ़ाई से ज्यादा दूसरी चीजों में मन लगता है। दरअसल उन्हें कुछ आता ही नहीं है। कुछ भी कर लो वे सीखते ही नहीं हैं। ऐसे में कक्षा-कक्ष में कोई भी प्रक्रिया शिक्षक अपना ले कुछ नहीं हो सकता। ये बातें मुझे कक्षा-कक्ष में जाकर बच्चों के साथ काम करने को प्रेरित तो करती लेकिन काम की प्राथमिकता में हमेशा पीछे छूट जाती।

हालांकि शिक्षकों की इस बात से तो मेरी भी सहमति है कि आजकल सरकारी स्कूलों में ज्यादातर गरीब, खेतीहर एवं मजदूरों के बच्चे ही पढ़ने आते हैं या फिर जहाँ  प्राइवेट स्कूलों की सुविधा नहीं होती वहीं दूसरे बच्चे आते हैं। लेकिन शिक्षकों की दूसरी बातों से मैं इत्तफाक नहीं रखता। गरीब, खेतिहर एवं मजदूरों के बच्चों के साथ भी वो कक्षागत प्रकियाएँ की जा सकती हैं जो अन्य किसी समुदाय के बच्चों के लिए उचित ठहराई जाती हैं। मुझे लगता है कि बच्चे अपने परिवेश की बहुत सी जानकारियों के साथ स्कूल आते हैं। यदि उन्हें यह भरोसा हो जाए कि शिक्षक उनकी बात सुनना चाहता है तथा गलत होने पर डाँट नहीं पड़ेगी तो फिर ये खुलकर संवाद करते हैं। ये सम्भव है कि उनके पास जो जानकारी होती है वह आधी-अधूरी या गलत हो। ऐसे में एक शिक्षक की भूमिका होती है कि वह कक्षा में बच्चों के परस्पर एवं बच्चों व शिक्षक के बीच संवाद की संस्कृति बनाए, तभी वो बच्चों को प्रश्‍न  करने, अपने मत देने, दूसरों की बात सुनने तथा फिर से सोचकर नया मत बनाने की दिशा में अग्रसर करेंगे। यदि यह संवाद की संस्कृति कक्षा में बन पाती है तो बच्चों के सीखने की प्रक्रिया तेज और सही दिशा में होगी।

लेकिन स्कूली अवलोकनों में देखने को मिलता है कि शिक्षक बच्चों की पूर्व जानकारी या अवधारणाओं को नजरअन्‍दाज करके अपनी ओर से नई जानकारी/अवधारणा देने का काम करते हैं। ऐसे में बच्चों के मन में बहुत से द्वंद पैदा होते हैं, मसलन- वो किस बात को सही माने? जिन्हें वो अपने परिवार, दोस्तों तथा आसपास से सीखते हैं या फिर शिक्षक की ओर से बताई गई बात को जो उनके अनुभव से मेल नहीं खा रही है। खासकर तब और मुश्किल हो जाती है जब कक्षा में किसी प्रकार की संवाद की संस्कृति न हो। इन्हीं सब मुद्दों को ध्यान में रखकर मैंने अपने पर्यावरण अध्ययन की कक्षा के अनुभवों को आलेख के रूप में पिरोने का प्रयास किया है।

पिछले दिनों जयपुर के सांगानेर शहरी इलाके में स्थित सरकारी स्कूलों में जाना हुआ। इस दौरान कक्षा-कक्ष में जाकर बच्चों के साथ बातचीत करने और कुछ पाठों को पढ़ाने का अवसर भी मिला। इन्हीं अनुभवों को आपसे साझा करना चाहता हूँ। यह एक प्राथमिक स्कूल था। यहाँ पर शिक्षकों के साथ पहले से परिचय था। स्कूल साफ-सुथरी दिखाई दे रही थी। सभी बच्चों के जूते-चप्पल कायदे से पंक्तिबद्ध लगे हुए थे। मैंने कक्षा 5 के बच्चों के साथ पर्यावरण अध्ययन पर एक पाठ पढ़ाने का तय किया। शिक्षक से जानकारी प्राप्त की, कि अब से पहले क्या क्या पढ़ाया जा चुका है, ताकि अगला पाठ पढ़ाने का काम मैं कर सकूँ। मुझे पता चला कि पानी के स्रोत्र कहाँ-कहाँ नामक पाठ पढ़ाना है।

कुछ बातचीत, पाठ शुरू करने से पहले

कक्षा में जाकर बच्चों को मैंने अपना नाम बताया तथा उनसे कहा कि आज मैं आप लोगों को पर्यावरण अध्ययन विषय पढ़ाना चाहता हूँ, आप तैयार हैं। सभी बच्चे एक साथ बोले यस सर। फिर मैंने कहा कि मुझे चॉक व डस्टर चाहिए। एक बच्चा दौड़कर ले आया। चर्चा की शुरुआत के लिए मैंने बोर्ड पर लिखा - पानी। सब बच्चों ने जोर से उच्चारण किया पानी। मैंने कहा बहुत अच्छा आप सबको तो पढ़ना आता है। बच्चे बोले जी सर। मैंने कहा कि पानी को और क्या कहते हैं ? बच्चों के जवाब थे - जल व वाटर। मैंने उन्हें भी बोर्ड पर लिख दिया।

मैंने फिर से बच्चों से सवाल किया कि हमें पानी कहाँ-कहाँ पर दिखाई देता है? एक-एक कर बताओ, मैं उसकी सूची बोर्ड पर बनाता हूँ। बच्चों के बताए अनुसार मैंने सूची बनाई। सूची में शामिल चीजें निम्नलिखित रहीं – कुआँ, समुन्द्र, नदी, तालाब, बीसलपुर, गंगा, हैंडपम्प, हौद, गड्डा, टंकी, नल, बोर, कुण्ड, झरना, खेत में, वर्षा के दौरान सड़क पर आदि। मुझे इस सूची से पानी के वास्तविक स्रोत्रों तक बच्चों को लेकर जाना था। इसलिए मैंने सूची में आई चीजों पर एक-एक कर चर्चा करनी शुरू की।

बच्चों का आपसी संवाद और तर्क-वितर्क

कक्षा में संवाद करने का उद्देश्‍य होता है कि प्रत्येक बच्चा अपनी बात/विचार के पीछे के आधार को पहचान सके, उस आधार को दूसरे के नजरिये से भी देखकर जाँच सके कि वह ठीक है या नहीं। दूसरे के विचार को तर्क के आधार पर खारिज कर सके,ताकि उसके साथी अपोरिया की स्थिति में आकर अपने मत/विचार को नए सिरे से बनाने की तरफ बढ़ सके। मैंने भी एक कक्षा में पर्यावरण विषय की जल थीम पर काम करते हुए बच्चों को ऐलन्कस के माध्यम से अपोरिया की स्थिति में लाने का काम किया। जिसकी वजह से कक्षा में बच्चों का बच्चों के साथ तथा बच्चों का मेरे साथ एक बेहतर संवाद स्थापित हो पाया। देखिए नीचे लिखे इस संवाद में कहाँ-कहाँ बच्चे एवं शिक्षक, सुकरात की ऐलन्कस युक्ति को काम में ले रहे हैं और कब-कब कुछ बच्चे अपने आपको अपोरिया की स्थिति में पा रहे हैं।

संवाद के सिद्धान्‍त

संवाद के लिए ऐलन्कस सुकरात की प्रिय युक्ति थी। इस युक्ति का मूल उद्देश्‍य  होता है सामने वाले की बात को खारिज करना। दरअसल ऐलन्कस वह प्रक्रिया है जिसके जरिये आप किसी बात/तर्क को खारिज करते हैं। आखिर हम किसी की बात/तर्क को खारिज करते क्यों हैं? सुकरात इस युक्ति का इस्तेमाल अपोरिया की स्थिति प्राप्त करने के लिए करते थे। अपोरिया मतलब एक ऐसी स्थिति जहाँ सामने वाले व्यक्ति को उसकी बात/तर्क में असंगतता या दोष को दिखाया जाता है। इससे वह सोच में पड़ जाता है। जब वह अपने दोष या असंगतताओं को साफ-साफ देख पाता है तो ऐसी स्थिति को अपोरिया कहा जाता है।

मैंने बच्चों से पूछा कि कुआँ किस-किस ने देखा है ?

बहुत से बच्चों ने कहा हमने देखा है। मैंने फिर पूछा कि कुआँ कैसा दिखाई देता है? अधिकतर बच्चों ने कहा कि कुआँ गोल तथा गहरा होता है। लेकिन एक लड़की बोली नहीं सर जी कुआँ तो चौकोर होता है। मैंने कहा अच्छा !

तभी दूसरे बच्चों ने कहा कि चोकोर कुआँ तूने कहाँ देखा ?

लड़की बोली हमारे गाँव में जहाँ से मम्मी पानी भर कर लाती है।

अब बच्चे सोचने लगे। अधिकतर बोले हमारे गाँव में तो ऐसा कुआँ नहीं है।

एक लड़के ने कहा कि तूने कुएँ में झाँककर देखा था कि वह गोल है या चौकोर ?

लड़की ने कहा नहीं।

तो फिर तुम कैसे कह रही हो कि कुआँ चौकोर था ?

लड़की ने कहा कि वह अपनी माँ के साथ कुएँ पर गई थी उस के मुँह पर चार पत्थर की पट्टी लगी थीं तथा महिलाएँ चारों ओर से पानी भर रही थीं।

वह लड़का फिर बोला कि पानी भरने की सुविधा के लिए चार पत्थर की पट्टी लगाई जाती हैं लेकिन कुआँ गोल ही होता है।

बच्चों के आपसी तर्क-वितर्क को सुनकर मैंने कहा कि अधिकतर कुएँ गोल ही होते हैं। लेकिन कुछ पहाड़ी इलाकों में जहाँ चट्टान काटकर कुएँ बनाए जाते हैं वहाँ जरूरी नहीं होता कि कुएँ एकदम गोल ही हों। इसके बाद समुद्र पर बात की गई। बच्चों को समुद्र के आकार का कोई अन्‍दाजा नहीं था। कुछ बच्चे स्कूल के मैदान से दोगुना तो कुछ प्रताप-नगर कॉलोनी जितना बड़ा मान रहे थे।

नदी के बारे में अधिकतर बच्चे कह रहे थे की नदी आड़ी-टेढ़ी होती है तथा बहुत लम्बी भी होती है। लेकिन चर्चा से समझ आ रहा था कि नदी और नहर की अवधारणा में फर्क नहीं कर पा रहे थे।

परिचित सन्‍दर्भ और अनुभव का महत्व

जयपुर के पास टोंक जिले में बीसलपुर डैम बना है। यहाँ से जयपुर शहर के बड़े हिस्से के लिए पीने का पानी आता है। बच्चों के साथ चर्चा से पता चला कि अधिकतर को यह तो पता था कि बीसलपुर से पानी आता है, लेकिन बीसलपुर है क्या ? यानि नदी, समुद्र, बाँध या बावड़ी यह किसी को पता नहीं था। उसके आकार के बारे में भी किसी तरह का अनुमान बच्चों के पास नहीं था। यहाँ बच्चों को बोर्ड पर एक चित्र बनाकर यह समझाने का प्रयास किया गया कि आमतौर पर नदी , तालाब, तथा बाँध किस तरह के दिखाई देते हैं। बाद में उनकी पुस्तक के चित्रों की भी सहायता ली गई।

ये बच्चे अधिकतर भवन निर्माण में लगे प्रवासी मजदूर परिवारों से थे। इनके माता-पिता आसपास बन रही ऊँची-ऊँची इमारतों में मजदूर के रूप में काम करते हैं। बच्चों को कुण्ड, बोरवेल, हैंडपम्प तथा हौद की जानकारी बहुत अच्छी तरह से थी। ये सब इनके अनुभव में शामिल हैं। अतः इन्हीं सन्‍दर्भों पर बात करते हुए मैंने आगे बढ़ने का प्रयास किया। मैंने यह जानने का प्रयास किया कि उनके परिवार को पीने का पानी कहाँ-कहाँ से मिलता है? इसके जवाब में कुआँ, नल, ट्यूबवेल, नदी, टंकी एवं हैंडपम्प को बताया गया।

मैंने अगला सवाल पूछा कि इन सबमें (कुआँ,नल, ट्यूबवेल, नदी, टंकी एवं हैंडपम्प में) पानी कहाँ से आता होगा? बच्चों ने कहा कि वर्षा से आता है। मैंने कहा वर्षा कहाँ  से आती है? जवाब मिला - ऊपर से।

मैंने पुनः पूछा ऊपर कहाँ से ?

आसमान से।

आसमान से कैसे आती है वर्षा ?

एक बच्चे से जवाब मिला सर वर्षा बादलों से होती है। दो बच्चों ने कहा कि नहीं सर वर्षा तो भगवान जी करते हैं। एक बच्चे ने कहा कि शंकर भगवान की चोटी से वर्षा होती है। थोड़ी चर्चा आगे बढ़ी तो जो बच्चा कह रहा था कि वर्षा बादलों से आती है वह भी कहने लगा कि भगवान ही वर्षा करते हैं।

बच्चे बहुत आत्म-विश्‍वास के साथ बात कर रहे थे, इसलिए मैंने कहा कि मान लेते हैं कि वर्षा भगवान ही करते हैं। तो ये बताओ कि भगवान रहते कहाँ हैं?

जवाब मिले : पहाड़ की चोटी पर, हिमालय पर्वत पर, आसमान में,दूसरी दुनिया में आदि। लेकिन बहुमत इस बात के साथ था कि भगवान हिमालय पर्वत पर रहते हैं।

मैंने कहा कि दुनिया में सब जगह तो हिमालय पर्वत है नहीं, और भगवान हिमालय पर्वत पर रहते हैं, तो फिर उन देशों में वर्षा कैसे करते होंगे जहाँ वे रहते ही नहीं ?

इस प्रश्‍न के बाद बच्चे कहने लगे कि भगवान तो हर जगह ही होता होगा।

कक्षा के एक बच्चे ने पहले कहा था कि भगवान हर जगह होता है, लेकिन उसकी आवाज दब गई थी, वह बच्चा एकदम उछलकर बोला में तो पहले ही कह रहा था कि भगवान हर जगह होता है।

अब सवाल यह था कि कैसे यह बात पुष्ट की जाए कि वर्षा बादलों के माध्यम से होती है। इस चर्चा में यह बात भी हो गई की हम सबको भी भगवान ने बनाया है तथा हर जीव को भी भगवान ने बनाया है।

मैंने कहा भगवान देखा है किसी ने ? एक बच्चे का जवाब आया भगवान ऐसे नहीं दिखाई देता, उससे मिलने के लिए मरना पड़ता है। जो मर कर ऊपर चले जाते हैं वही उनसे मिल पाते हैं। हमारे गाँव में जब भी कोई व्यक्ति मर जाता है तो लोग कहते हैं कि वह भगवान को प्यारा हो गया,यानि वह भगवान के पास चला गया। मैंने कहा कि यदि भगवान हर जगह होता है तो फिर उनसे मिलने दूसरी जगह क्यों जाना पड़ता है ? बच्चे फिर से सोचने लगे। मैंने कहा कि हम भगवान की चर्चा यहाँ  बन्‍द करते हैं क्योंकि हम तो अभी तक उनसे मिले नहीं हैं और अभी हम मरना भी नहीं चाहते, बच्चे बोले हाँ सर जी। दरअसल मुझे अपने मुद्दे पर लौट आने के लिए यह सब करना पड़ा।

बात आगे बढ़ाते हुए मैंने कहा कि अब हम वापिस यह चर्चा करते हैं कि यदि वर्षा बादलों से होती है तो ये बादल कहाँ से आते हैं या ये बनते कैसे हैं? एक बच्चे ने कहा कि सर मुझे पता है कि बादल कैसे बनते हैं। मैंने कहा कि सबको बताओ। उसने कहा कि जब घनी तेज आग लगती है तो उसका धुआँ आसमान में जाकर बादल बनाता है। इसमें दूसरे बच्चे ने जोड़ा कि हवाई जहाज के धुएँ से भी बादल बनते हैं। मैंने कई बार आसमान में हवाई जहाज को उड़ते हुए देखा है तथा उसके पीछे लम्बी बादल की लाईन भी बनती देखी है। कक्षा की एक लड़की ने पूछा कि यदि धुएँ से बादल बनते हैं तो उसमें पानी कहाँ से आता है ? अब कक्षा में एकदम सन्नाटा था। सब मेरी ओर देखने लगे। मैंने कहा मुझे तो पता नहीं है चलो पुस्तक खोलते हैं तथा पानी वाले पाठ को देखते हैं कि उसमें इसका जवाब है या नही। सभी बच्चों ने तुरन्‍त अपनी-अपनी पुस्तक में पानी वाला पाठ खोलकर पढ़ना शुरू किया। पाठ अभी पूरा नहीं पढ़ा गया था कि स्कूल की घण्‍टी लग गई। मैंने कहा कि मैं दुबारा आपके स्कूल में आऊँगा जब तक आप बादल का बनना तथा वर्षा के होने के कारण पता लगाने का प्रयास करना। ( जारी)

इस लेख का अगला भाग पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाऍं  संवाद शुरू कैसे हो : पर्यावरण की कक्षा के कुछ अनुभव -1


महमूद खान : सन्‍दर्भ सदस्य, अज़ीम प्रेमजी फाउण्डेशन, जयपुर  चित्र : प्रशांत सोनी

 

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