संगोष्‍ठी : भाषा-शिक्षण, विचारशीलता और सृजनशीलता

शिक्षा के सरोकार-4

आधार-पत्र

भाषा-शिक्षण, विचारशीलता और सृजनशीलता

विद्यालयी शिक्षा में भाषा और साहित्‍य के अध्‍यापन पर संगोष्‍ठी

9 से 11 अक्‍टूबर, 2020  नई दिल्‍ली

 

शिक्षा के सरोकारशृंखला की चौथी संगोष्ठी अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय,बेंगलूरु और डिपार्टमेंट ऑफ़ टीचर ट्रेनिंग एण्‍ड नॉन फॉर्मल एजुकेशन (IASE), फैकल्टी ऑफ़ एजुकेशन, जामिया मिल्लिया इस्‍लामिया, दिल्‍ली के संयुक्त आयोजन में दिल्‍ली में होगी। उल्‍लेखनीय है कि यह संगोष्‍ठी जामिया मिल्लिया इस्लामिया के स्थापना के 100 वें वर्ष के उपलक्ष्‍य में होने वाले आयोजनों का हिस्सा है। संगोष्ठी का विषय क्षेत्र भाषा शिक्षण, विचारशीलता और सृजनशीलता के इर्दगिर्द है।

संगोष्ठी में संवाद का माध्यम उर्दू और हिन्‍दी होगा।

 

संगोष्ठी-शृंखला की पृष्ठभूमि

पिछले कुछ दशकों में स्‍कूली शिक्षा के सिद्धान्‍त और व्‍यवहार पर व्‍यवस्थित अकादमिक चर्चा के लिए देश के कई विश्‍वविद्यालयों में कई व्यापक कदम उठाए गए हैं। इनमें नए कार्यक्रमों की संरचना और मौजूदा पाठ्यक्रमों का संशोधन मुख्य हैं। हमारा यह विश्‍वास है कि इस तरह के पाठ्यक्रमों के संचालन से स्‍कूली शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर नागरिक समाज में सजगता आएगी। लेकिन साथ ही इन कार्यक्रमों की गुणवत्‍ता बढ़ाने तथा इन्‍हें और अधिक समावेशी बनाने हेतु इन्‍हें भारतीय भाषाओं में भी आरम्‍भ करने का लक्ष्‍य रखना जरूरी है।

 

इसके लिए यह आवश्‍यक है कि भारतीय भाषाओं में विमर्श व ज्ञान-निमार्ण हो व साथ ही अकादमिक साहित्‍य की रचना भी हो। इस दिशा में एक छोटी पहलकदमी है ऐसी संगोष्ठियों का आयोजन जिनमें प्रस्‍तुत किए जाने वाले आलेख व उन पर विमर्श भी भारतीय भाषाओं में ही किया जाए। अज़ीम प्रेमजी विश्‍वविद्यालय ने अनुवाद पहल कार्यक्रम के अन्‍तर्गत अन्‍य संस्‍थाओं के साथ मिलकर ऐसी संगोष्ठियों के आयोजन की शृंखला आरम्‍भ की है।

अनुवाद पहलटीम का काम विभिन्न सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि के विद्यार्थियों की ज्‍यादा बड़ी संख्या तक गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा और पढ़ने की सामग्री पहुँचाने के अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के लक्ष्य व दृष्टिकोण पर केन्द्रित है। विश्‍वविद्यालय का मानना है कि भारतीय भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण सामग्री की उपलब्धता और गुणवत्ता वाले उच्च शिक्षा कार्यक्रम होने से, अवधारणाओं और विचारों में समृध्दि आएगी।

 

इस क्रम में अब तक तीन संगोष्ठियाँ आयोजित हो चुकी हैं। शैक्षिक अका‍दमिक जगत में इनका व्‍यापक स्‍वागत हुआ है। पहली संगोष्‍ठी 2017 में दिल्‍ली में अम्‍बेडकर विश्‍वविद्यालय दिल्‍ली के साथ स्‍कूली शिक्षा के बदलते परिदृश्‍य में अध्‍यापन-कर्म की रूपरेखा विषय पर आयोजित की गई थी। दूसरी संगोष्‍ठी मोहाली में 2018 में भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्‍थान मोहाली के साथ विज्ञान और विज्ञान शिक्षा विषय पर और तीसरी संगोष्‍ठी 2019 में दिल्‍ली में दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय के शिक्षा संकाय के साथ गणित शिक्षण : अपेक्षाएँ एवं चुनौतियाँ विषय पर आयोजित की गई थी।

 

इन संगोष्ठियों में प्रस्‍तुत किए जाने वाले पर्चों में से चयनित को किताब के रूप में प्रकाशित करने की महती योजना भी है। ताकि इस विचार-विमर्श को व्‍यापक पैमाने पर फैलाया जा सके। पहली संगोष्‍ठी के चुने हुए पर्चों के दो संकलन प्रेस में हैं।

 

प्रस्‍तावित संगोष्‍ठी के लिए परिप्रेक्ष्‍य

भाषा की शिक्षा

भाषा को इन्‍सान, संस्कृति व समाज की रचना व उसके विकास की बुनियाद माना जाता है।  यह भी स्पष्ट है कि भाषा इन सबसे अलग नहीं है और इन सबमें गुँथी हुई है। इन सबके सन्‍दर्भ अलग भी हैं, लेकिन आपस में गुँथे हुए भी। भाषा के बगैर हम न इन्‍सान पर और न ही समाज और संस्कृति पर किसी चर्चा को आगे बढ़ा सकते हैं। जब भी भाषा की चर्चा चलेगी तो इनकी बात भी होगी ही। दूसरे शब्दों में भाषा समाज और संस्कृति का गठन भी करती है और स्वयं भी इससे गठित होती है। कुछ विद्वानों का मानना है कि भाषा न केवल मानव विचारों के विकास का आधार है बल्कि मानव विचारों के अस्तित्व का आधार है। भाषा के बगैर मानवीय चिन्‍तन हो नहीं सकता।

 

शिक्षा के हर स्तर पर भाषा केन्‍द्रीय और खास है। विचार करना, अपने विचारों को आवाज  देना, उन्हें अलग-अलग तरह से विकसित करना इन सबके लिए भाषा जरूरी है। इसके पर्याप्त प्रमाण हैं कि बच्चे अपनी भाषा (वह भाषा जो उन्‍होंने अपने घर में, अपने परिवेश में रहते हुए अर्जित की है) में हर तरह के विचार-विमर्श के लिए सक्षम हैं। ऐसा भी माना जाता है कि इस भाषा में वे अवधारणाओं की पुख्ता और बेहतर समझ बनाने में भी सक्षम होते हैं। उनकी खुद की भाषा में व संस्कृति के सन्‍दर्भ में रचित शिक्षण प्रक्रिया उनमें सीखने के लिए आवश्यक आत्मविश्वास विकसित करती है।

 

शिक्षा के सन्‍दर्भ में यह भी कहा जाता है कि भाषा अभिव्यक्ति और शिक्षितहोने के महज एक माध्यमसे कहीं अधिक है। वह सिर्फ दुनिया व विचार समझने का आधार ही नहीं वरन हर इन्सान की पहचान, अस्मिता व उसकी रचना का स्त्रोत भी है। इस समझ का हर स्तर के भाषा-शिक्षण के उद्देश्यों, शिक्षण के ढंग, बच्चों व शिक्षकों की भूमिका, कक्षा की रचना अन्य विषयों के शिक्षण में भाषा की भूमिका पर व इससे जुड़े प्रश्नों पर सोचना जरूरी है।

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (एन.सी.एफ.), 2005 और 'भारतीय भाषाओं का शिक्षण' पोजीशन पेपर इन सबके बारे में एक दृष्टि रखते हैं। इन्हीं के आधार पर भाषा सिखाने के पाठ्यक्रमों, पढ़ाने के ढंग, पाठ्यपुस्‍तकों व अन्य पुस्तकों की रचना व उनकी कक्षा में जगह,  शिक्षकों की तैयारी, आकलन के तरीकों आदि की रचना हुई है। भारत के बहुभाषी परिदृश्य में लोकतान्त्रिक समावेशी शिक्षा के लिए भाषा, संस्कृति, समाज के शिक्षा के अन्‍त:सम्‍बन्‍ध एक खास सरोकार हैं जिन्हें गहराई से समझना जरूरी है। यह संगोष्‍ठी इस दिशा में बढ़ने का एक प्रयास है।

 

यह विमर्श व इन अन्‍त:सम्‍बन्‍धों के नए पहलू उभरें इसके लिए आवश्यक है कि इनके सन्‍दर्भ में नए-नए प्रयास किए जाएँ और उनका अध्ययन, विश्लेषण व आकलन कर इस पर समझ को आगे बढ़ाया जाए। पिछले तीन-चार दशकों में भाषा शिक्षण में कई नए प्रयास व प्रयोग किए गए हैं। एक ओर तो यह प्रयास वैचारिक स्तर पर हुए हैं और दूसरी ओर स्कूलों व वास्तविक कक्षाओं व उसकी सामग्री के साथ कई बड़े-छोटे प्रयास हुए हैं। हम इस संगोष्‍ठी में इन सब पर विमर्श करना चाहते हैं।

 

प्राथमिक कक्षाओं में भाषा अध्यापन

विद्यालय में हम पढ़ना-लिखनासीखते हैं। आम व्यवहार की भाषा तो बच्चे पारिवारिक और सामुदायिक जीवन जीते हुए यूँ भी सीख लेते हैं, लेकिन पढ़ना-लिखना सीखने के लिए व्यवस्थित प्रयास और प्रायः स्कूल जैसी संस्था की जरूरत पड़ती है। विद्यालयी शिक्षा, खासकर प्राथमिक-शिक्षा की यह आम समझ है। शिक्षित व्यक्ति को आम बोलचाल में 'पढ़ा-लिखा' व्यक्ति कहा जाता है। लिखी हुई भाषा को पढ़ पाना और अपने विचारों और भावनाओं को लिखकर व्यक्त कर पाना- इन बुनियादी क्षमताओं के आधार पर ही आम लोग किसी को पढ़ा-लिखाया शिक्षित मानते हैं। इन अपेक्षाओं के अतिरिक्त शिक्षित व्यक्ति से कुछ नैतिक और बौध्दिक अपेक्षाएँ भी होती हैं, लेकिन पढ़ने-लिखने की काबिलियत को लगभग बिना किसी विवाद के आम लोग शिक्षित व्यक्ति की बुनियादी काबिलियत मानते हैं। जाहिर है जब विद्यालयी तंत्र बड़ी सँख्या में अपने विद्यार्थियों में ये बुनियादी क्षमताएँ विकसित नहीं कर पाता है तो उस तंत्र की विश्वसनीयता संकट में पड़ जाती है। इस समय हमारा विद्यालयी तंत्र कुछ ऐसे ही संकट से गुजर रहा है। साल-दर-साल सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाएँ अपने आकलन की रिपोर्ट जारी करके बता रही हैं कि पाँचवीं कक्षा के विद्यार्थियों को 'पढ़ने-लिखने' की जितनी क्षमता हासिल कर लेनी चाहिए बड़ी सँख्या में विद्यार्थी वैसी क्षमता हासिल नहीं कर पा रहे हैं। नीति-निर्माताओं के बीच सीखने के जिस संकट (लर्निंग क्राइसिस) की चर्चा है उस संकट का एक सिरा विद्यालयी तंत्र की इस असफलता से जुड़ा है। मुश्किल यह है कि पिछले अनेक वर्षों से इस संकट को रेखांकित तो किया जा रहा है, लेकिन इसे समझने की बहुत व्यवस्थित कोशिश नहीं हो रही है। समझ की सीमा यह है कि पढ़ना-लिखना सीखने और सिखाने की एक यांत्रिक समझ हमारे सहज बोध में व्याप्त है। इसे आम तौर पर तकनीकी समस्या के रूप में देखा जाता है और उसका समाधान भी तकनीकी स्तर पर ही पेश किया जाता है, और प्रकट तौर पर यह किसी जटिल स्तर की तकनीकी चुनौती भी पेश करती हुई नजर नहीं आती। साफ तौर पर लोगों को दिखता है कि पढ़ना-लिखना सिखाना कोई रॉकेट साइन्‍स नहीं है। कोई भी पढ़ा-लिखा व्यक्ति किसी भी निरक्षर व्यक्ति को साक्षर बना सकता है। जब ऐसे तकनीकी समाधान देने में हम असफल होते हैं तब झुंझलाहट और बढ़ जाती है।

 

ऊपरी तौर पर भले ही हमें यह समस्या महज एक तकनीकी समस्या के तौर पर दिखती है, लेकिन इस समस्या का एक सामाजिक-सांस्कृतिक पहलू भी है। पिछले बीस-तीस वर्षों में सरकारी प्रयासों से अलग-अलग सामाजिक, सांस्कृतिक और भाषिक पृष्ठभूमि के विद्यार्थी विद्यालयी शिक्षा-तंत्र से जुड़े हैं और यह प्रसन्नता की बात है। बहुत बड़ी सँख्या में ऐसे बच्चे विद्यालयी व्यवस्था से जुड़े हैं जो अपने परिवार के पहले व्यक्ति हैं जो शिक्षित होने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं। स्कूली कक्षाएँ पहले की तुलना में अधिक बहुभाषिक और बहुसांस्कृतिक हुई हैं। आज बहुभाषिकता महज एक वैचारिक टेक नहीं है, बल्कि हमारे अधिकाँश विद्यालयी कक्षाओं की वस्तुस्थिति भी है। ऐसी स्थिति में या तो शिक्षक बहुभाषिकता को एक संसाधन के रूप में देख सकते हैं या एक चुनौती के रूप में, लेकिन बहुभाषिकता की अनदेखी नहीं की जा सकती। अगर पढ़ना-लिखना सिखाने की जो प्रक्रिया है उसे जीवन्‍त बनाना है, पढ़ना-लिखना सीखने की प्रक्रिया में सीखने वाले की सक्रिय भागीदारी को सुनिश्चित करना है, अगर कक्षा में होने वाले संवाद को एकतरफा नहीं होना है तो हमें कक्षा में भाषाओं की विविधता को सहर्ष स्वीकार करना होगा। वैसे ही अलग-अलग सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से आने वाले विद्यार्थी सीखने के अलग-अलग तौर-तरीकों को लेकर कक्षा में आते हैं। क्या विद्यालयी तंत्र की ऐसी तैयारी है कि वह इस विविधता को अपने सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में समाहित करके उस प्रक्रिया को अर्थपूर्ण बना सके। आमतौर पर जब नीतिगत स्तर पर विद्यार्थियों के पढ़ने-लिखने की अपेक्षित क्षमता हासिल नहीं कर पाने की चर्चा होती है तो इन प्रश्नों की अनदेखी की जाती है।

 

भाषा-शिक्षण की दृष्टि से ये प्रश्न महत्त्वपूर्ण हैं। यह संगोष्ठी भाषा-शिक्षण से जुड़े मुद्दों को व्यापक परिप्रेक्ष्य में रखकर उस पर विचार करने की जरूरत को रेखांकित करना चाहती है।

 

उच्च-प्राथमिक और माध्यमिक कक्षाओं में भाषा और साहित्य का अध्यापन

भाषा-शिक्षण का मुद्दा विद्यालयी शिक्षा के हर स्तर और एकाधिक पहलुओं से जुड़ा हुआ है। मसलन अगर प्राथमिक कक्षा में हमारा भाषा-शिक्षण अपने लक्ष्यों को पूरा करने में सक्षम है और विद्यार्थी प्राथमिक कक्षाओं से निकलकर स्वतंत्र ढंग से पढ़ना और लिखना सीख लेते हैं तो आखिर उच्च-प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर अलग से भाषा की कक्षा की आवश्यकता क्यों है। मान लें कि विद्यार्थी के घर की भाषा हिन्दी या उर्दू है और उसने सहज ढंग से सामाजीकरण के दौरान ये भाषाएँ अर्जित कर लीं हैं। तत्पश्चात स्कूल आकर उसने इन भाषाओं में स्वतंत्र ढंग से लिखना और पढ़ना प्राथमिक कक्षाओं में सीख लिया है, फिर इसके बाद उच्च-प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर उसे हिन्दी या उर्दू क्यों पढ़ना चाहिए? अब आगे वह स्कूल में इन भाषाओं में ऐसी कौन-सी दक्षताएँ अर्जित करेगा जो वह सामान्य जीवन में इन भाषाओं को बरतते हुए अर्जित नहीं कर सकता? शिक्षाक्रम, पाठ्यपुस्तक लेखन से जुड़े शिक्षविदों और भाषा-शिक्षकों के पास इन प्रश्नों के स्पष्ट उत्तर होने चाहिए।

 

वैसे तो शायद भाषा-शिक्षण में साहित्य का प्रयोग प्राथमिक कक्षाओं से ही होना चाहिए, लेकिन प्रायः हम देखते हैं कि उच्च-प्राथमिक और माध्यमिक कक्षाओं में उर्दू और हिन्दी साहित्य के स्थापित लेखकों की रचनाओं से विद्यार्थियों को परिचित करवाने की पुरजोर कोशिश होती है। अलग-अलग विधाओं की रचनाएँ पाठ्यपुस्तकों में शामिल की जाती हैं। इन रचनाओं को पढ़ाकर हम किन लक्ष्यों को हासिल करना चाहते हैं? क्या हम इन्हें पढ़ाकर विद्यार्थियों को भाषा के कुछ कौशलों से लैस करना चाहते हैं, या उसे खास तरह की सांस्कृतिक विरासत से परिचित करवाना चाहते हैं या हम उसकी भावनात्मक, संज्ञानात्मक और सौन्दर्यबोधात्मक क्षमताओं के विस्तार का अवसर प्रदान करना चाहते हैं। अगर साहित्य पढ़ाने के पीछे कहीं न कहीं ये तीनों ही मकसद हैं तो शिक्षाक्रमों, पाठ्यपुस्तकों और शैक्षिक गतिविधियों में कब कौन-सा मकसद अधिक प्रभावी होकर हमारे शैक्षिक अभ्यास को दिशा देता है इसे समझना भाषा साहित्य की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। भाषा और साहित्य के अध्यापन से एक और प्रश्न जुड़ा हुआ है। क्या हिन्दी, उर्दू आदि भाषा के साहित्य के इतिहास में जो रचनाएँ समादृत होकर मानक बन चुकी हैं क्या वे उस भाषा-भाषी समुदाय के सभी सामाजिक वर्गों की संस्कृतियों का प्रतिनिधित्व करती हैं? शिक्षा के सार्वजनीकरण के बाद आज विद्यालयी कक्षाओं में जो विविधता है उस परिप्रेक्ष्य में इस प्रश्न पर विचार किया जाना चाहिए।

 

संगोष्‍ठी में भाग लेने के लिए कार्य-योजना

हम चाहते हैं कि संगोष्ठी में विविध तरह के पर्चे आएँ और अलग-अलग पृष्ठभूमि के लोग इस संगोष्ठी के लिए पर्चा लिखें व उसे प्रस्‍तुत करें। संगोष्ठी के लिए पर्चे ऐसे शोध पत्र हों जो कि विषय क्षेत्र से सम्‍बन्धित हों। पर्चा आपके पढ़ाने, शिक्षकों के साथ आपकी अन्तर्क्रिया,प्रशिक्षण के आपके अनुभवों व इसी तरह के अनुभवों पर आधारित हो सकता है। अपेक्षा यह है कि पर्चा महज आपके मत अथवा समझ की अभिव्यक्ति न हो। अपने विचार को तार्किक आधार देने के लिए यह जरूरी है कि आपका आलेख प्रासंगिक शोध-साहित्य के व्यवस्थित विश्लेषणों और अपने ठोस अनुभवों व अवलोकनों के व्यवस्थित विश्लेषण पर आधारित हो। अगर आप शोधार्थी हैं और आपने भाषा-अध्ययन के क्षेत्र में शोध किया है तो आपसे व्यवस्थित शोध-पत्र की अपेक्षा है। आलेख में व्यवस्थित तरीके से उद्धरण दिए जाएँ और सन्दर्भ सूची में प्रत्येक उद्धरण के बारे में विस्तृत ब्योरा हो।

 

ऊपर दिए गए परिप्रेक्ष्‍य में हमने संगोष्‍ठी के लिए कुछ मुद्दों को सूचीबद्ध किया है। आप इनमें से किसी भी मुद्दे पर आप अपना शोध-पत्र,शोध-अध्ययन शोध आलेख हमें भेज सकते हैं :

 

1. प्राथमिक कक्षाओं में भाषा-शिक्षण

·         भाषा-शिक्षण की शुरुआत : साक्षरता, अर्थग्रहण और भाषिक अभिव्यक्ति का बढ़ता दायरा

·         प्राथमिक स्तर पर भाषा-शिक्षण में समावेशन के मसले

·         भाषा-शिक्षण और आरम्भिक साहित्यिक अभिव्यक्तियाँ

·         प्राथमिक कक्षाओं में भाषा-शिक्षण के लिए उपयुक्त पाठ्यचर्या सामग्रियों और गतिविधियाँ का चयन और निर्माण

·         भाषा-शिक्षण और कक्षा में बहुभाषिकता

·         ब्रेल लिपि और सांकेतिक भाषा

·         'भाषाई असमर्थता' और 'भाषाई निपुणता' जैसे पदों का आलोचनात्मक विश्लेषण

 

2. उच्च-प्राथमिक और माध्यमिक कक्षाओं में भाषा-शिक्षण

·         उच्च-प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर हिन्दी भाषा के अध्यापन के लिए पाठ्यक्रम-निर्धारण की चुनौतियाँ 

·         साहित्यिक विधाओं का अध्यापन

·         अकादमिक लेखन की तैयारी

·         साहित्यिक और अकादमिक पाठों को पढ़ने की तैयारी

 

3. पाठ्यक्रम के सभी क्षेत्रों में शैक्षिक उपलब्धि के लिए भाषा-शिक्षण 

·         भाषा, ज्ञानार्जन और विचारशीलता

·         भाषा और सर्जनात्मक अभिव्यक्तियाँ

·         उर्दू और हिन्‍दी में बाल साहित्य 

·         हिन्दी-उर्दू भाषा में विज्ञान शिक्षण

·         हिन्दी-उर्दू भाषा में समाज विज्ञान का शिक्षण

·         भाषिक क्षमता और गणित का ज्ञान

 

4. भाषा और साहित्य के अध्यापन से जुड़े कुछ मुद्दे

·         मानक भाषा, राष्ट्रभाषा, सम्पर्क भाषा या जनभाषा

·         भाषा, लिपि और लिखित संवाद  

·         शिक्षा के माध्यम के रूप में हिन्दी और उर्दू के स्वरूप पर बहस

·         स्कूली पाठ्यक्रम में हिन्दी और उर्दू साहित्य : सांस्कृतिक मानदण्ड, पाठों का चयन और प्रचलित शिक्षण विधि

·         हिन्दी और उर्दू साहित्य के अध्यापन के व्यापक उद्देश्य

·         मध्यकालीन हिन्दी साहित्य का अध्यापन : पाठ्यक्रम में मध्यकालीन साहित्य को शामिल करने के व्यापक उद्देश्य और प्रचलित शिक्षण-विधि

·         आधुनिक हिन्दी और उर्दू साहित्य का अध्यापन : अध्यापन के व्यापक उद्देश्य और प्रचलित शिक्षण-विधि 

·         अध्यापक-शिक्षा में भाषा के अध्यापन से जुड़े मुद्दे

·         अध्यापक शिक्षा में भाषा और ज्ञान-निर्माण से जुड़े मुद्दे

 

संगोष्ठी में भाग लेने के लिए आपको अपने प्रस्तावित शोध आलेख का एक 'एब्स्ट्रैक्ट' भेजना होगा। 'एब्स्ट्रैक्ट' से यहाँ आशय है कि आपके आलेख के मुख्य बिन्दु क्या होंगे, अपनी बात को पुख्ता रूप से रखने के लिए आपके अवलोकन और तर्क की पुष्टि के लिए या ध्यान आकर्षित करने के लिए आप कौन-से साहित्य व शोध प्रविधि का सहारा लेंगे, और इन सबसे आप किन बातों की स्थापना करना चाहेंगे।

यह संगोष्‍ठी हिन्‍दी और उर्दू में हो रही है। यानी इसके लिए लिखे जाने वाले आलेख इन दोनों में से किसी भी भाषा में हो सकते हैं। संगोष्‍ठी में इनका प्रस्‍तुतिकरण और उन पर चर्चा भी सम्‍बन्धित भाषा में ही होगी।

 

आप अपने प्रस्‍तावित पर्चे का एब्‍स्‍ट्रैक्‍ट 20 जनवरी, 2020 तक भेज सकते हैं। एब्‍स्‍ट्रैक्‍ट 500 से 800 शब्दों तक का हो सकता है। एब्‍स्‍ट्रैक्‍ट हिन्दी या उर्दू में लिखे जा सकते हैं। कृपया 'एब्स्ट्रैक्ट' के अन्त में अपना संक्षिप्त परिचय, इमेल, पता तथा फ़ोन नम्बर का उल्लेख अवश्य करें। साथ ही जहाँ तक सम्भव हो 'एब्स्ट्रैक्ट' वर्ड फाइल में यूनीकोड में टाइप करके भेजें। अपनी फाइल की एक पीडीएफ भी भेजें।

 

कृपया हिन्‍दी में लिखे एब्‍स्‍ट्रैक्‍ट seminar.hindiurdu@gmail.com पर भेजें।

कृपया उर्दू में लिखे एब्‍स्‍ट्रैक्‍ट seminar.urduhindi@gmail.com पर भेजें।

 

एब्‍स्‍ट्रैक्‍ट प्राप्‍त होने पर संगोष्‍ठी की अकादमिक समिति उस पर विमर्श के बाद अपनी स्‍वीकृति ईमेल के माध्‍यम से आपको भेजेगी। स्‍वीकृति मिलने के बाद आप अपना पूर्ण आलेख लिखना आरम्‍भ कर सकते हैं। पूर्ण आलेख भी उक्‍त ईमेल पतों पर ही भेजा जाना है।

 

संगोष्ठी आयोजन तिथि : 9, 10 और 11 अक्‍टूबर, 2020

आयोजन स्‍थल : जामिया मिल्लिया इस्लामिया, दिल्ली

एब्‍स्‍ट्रैक्‍ट भेजने की अन्तिम तिथि : 15 फरवरी, 2020

पूर्ण आलेख भेजने की अन्तिम तिथि : 31 मई, 2020

और अधिक जानकारी के लिए दिए हुए ईमेल पतों पर सम्‍पर्क कर सकते हैं।

 

17921 registered users
6752 resources