शिक्षिका के रूप में मेरा पहला दिन : सविता प्रथमेश

सविता प्रथमेश

जहाँ तक शिक्षकीय जीवन के प्रथम दिन का प्रश्न है तो सचमुच वह दिन (20 अगस्‍त,1990) अविस्मरणीय था और रहेगा। एक तो तुरन्‍त ही मैंने ग्रेजुएशन किया था। अध्यापन का सिवाय बी.एड. के कोई बहुत ज्‍यादा अनुभव नहीं था। तिस पर मेरी उम्र भी कम और मेरे सामने थे अठारह-उन्‍नीस वर्ष के लड़के मेरे ही विद्यार्थियों के रूप में। चूँकि मैं पैसिंजर ट्रेन की भीड़-भाड़ का 21 किलोमीटर का सफर तय करके गई थी। इसके कारण मैं थोड़ा-सा नर्वस भी थी। ट्रेन स्कूल के तय समय से पहले ही पहुँच गई थी। सो इस बीच सारे स्‍कूल का मैंने मुआयना तो कर ही लिया था। इसलिए कक्षा में मुझे क्या करना है मोटे तौर यह खाका मैंने खींच लिया था। दिक्कत थी तो इस बात की कि क्या विद्यार्थियों को मैं संतुष्ट कर पाऊँगी ? मैं उनकी अपेक्षाओं पर खरा उत्तर पाऊँगी की नहीं? सबसे  बड़ी दिक्कत यह भी थी कि मैं स्कूल खुलने के डेढ माह बाद ज्वाइन कर रही थी। यह स्‍कूल था उच्‍चतर माध्‍यमिक शाला कोटमी,सुनार।

बहरहाल... प्रार्थना के दौरान विद्यार्थियों के लिए मैं अजूबे की तरह थी। शायद वे भी मन ही मन मेरी ही तरह आशंकित और उत्सुक भी थे। प्रार्थना के पश्चात हमारे प्राचार्य महोदय ने सीधे मुझे कक्षा बारहवीं में भेज दिया। ग्रामीण परिवेश के मुझसे भी बड़े नजर आ रहे कुछ लड़कों को देखकर मेरी तो सिट्टी-पिट्टी ही गुम हो गई। फिर भी किसी तरह खुद को सँभालते हुए मैं कक्षा से मुखातिब हुई। चूँकि मुझे पहले ही बता दिया गया था की मुझे रसायन विज्ञान विषय पढ़ाना है किन्तु कोर्स में क्या है यह मुझे पता नहीं था। फिर भी पूरे आत्मविश्वास से मैंने सर्वप्रथम अपना परिचय दिया। फिर विद्यार्थियों का परिचय लिया। जब परिचय का यह दौर चल ही रहा था की अचानक मेरी नजर खिड़की पर पड़ी। प्राचार्य मेरे प्रथम दिन के अनुभव के साक्षी हो रहे थे। मैं पुनः अपसेट हो गई। शायद प्राचार्य ने मेरी घबराहट भांप ली और वहाँ से हट गए। मेरी जान में जान आई।

कक्षा में पुनः परिचय का दौर चल निकला। शायद 40 या 50 विद्यार्थी थे। जब आखिरी विद्यार्थी अपना  परिचय देकर बैठा तो मैंने मन ही मन खुद की पीठ थपथपाई की चलो 40 मिनट के पीरियड का कुछ समय तो मैंने पास किया। और साथ ही यह भी निश्चय कर लिया कि आज  जितनी भी कक्षाओं में मुझे भेजा जाएगा सभी में यही फार्मूला अपनाऊँगी। कम से कम आज तो कुछ समय तो यूँ ही पास हो जाएगा। पर अब क्या करूँ ? यह सोचना मेरा काम था। अस्सी-सौ के करीब आँखें  मेरी ओर थीं। कुछ उत्सुकता से,कुछ लापरवाही से और कुछ प्रशंसा भरी नजरों से मेरी ओर ताक रहे थे।

चूँकि मुझे कोर्स के बारे में कुछ भी पता तो नहीं था। ऊपर से मेरी तैयारी भी नहीं थी। इसलिए मैंने सोचा की तरह से जिस तरह से थोड़ा समय परिचय में मैंने सफलतापूर्वक खपा दिया उसी तरह से बाकी का समय भी मैं प्रश्न पूछकर बिता सकती हूँ। बस फिर क्या था। विद्यार्थियों के नाम को आधार बनाकर,उन्हें घर में पुकारे जाने वाले नामों की जानकारी लेकर मैंने रसायन विज्ञान के आधार स्तम्भ तत्वों के नामकरण की जानकारी बच्चों को दी। वह भी मेरे द्वारा कम बल्कि पूछकर उन्हीं से उत्तर निकलवा कर हिन्‍दी,अँग्रेजी और आई.यू.पी.ए.सी. नामों की जानकारी विद्यार्थियों को दी। मजे की बात यह रही की सभी तत्वों की जानकारी हो भी नहीं पाई कि पीरियड खत्म होने की घण्‍टी बज गई। बच्चों के लिए यह तो महज एक पीरियड खत्म होने और दूसरे के आरम्भ की घण्‍टी थी किन्तु मेरे लिए तो यह राहत की घण्‍टी थी। दम भर साँस लेने की घण्‍टी थी। पता नहीं बच्चों ने मेरी घबराहट को कितना समझा और कितना नहीं। पर तय बात है की मैंने अपनी तरफ से पूरी-पूरी कोशिश की कि मेरी घबराहट पकड़ में न आए। किन्तु मुझे मालूम है कि मैं एक्टिंग नहीं कर पाती सो निश्चित ही बच्चों को मेरी घबराहट,हड़बड़ाहट समझ आ गई होगी। पर उस समय इतनी समझ ही कहाँ थी?

बहरहाल...शिक्षकीय जीवन का पहला पीरियड बिताने के बाद स्टाफ रूम में आकर मैंने दो गिलास पानी हलक के नीचे उतार डाला। तब जाकर थोड़ी राहत मिली। थोड़ी देर में चपरासी ने कहा कि प्राचार्य ने मुझे  बुलाया है। डरते-डरते मैंने उनके रुम में प्रवेश किया। पता नहीं क्या कहेंगे ? मन में डर था, किन्तु बड़े ही आत्मीय स्वर में उन्होंने मेरा अनुभव पूछा, मुझे बच्चों की तरफ से कोई परेशानी तो नहीं हुई, किसी बच्चे ने कुछ  कहा तो नहीं ? चूँकि मैं उनके अनुभव में प्रथम महिला शिक्षिका थी। मैंने भी पूरे उत्साह से अपना अनुभव सुनाया, बिलकुल बच्चों की सी उत्सुकता से। हँसते-मुस्कुराते उन्होंने भी मेरे अनुभव का मजा लिया। शाला के बारे में, गाँव के बारे में,सहयोगी शिक्षकों के बारे में, विद्यार्थियों के सामाजिक, आर्थिक, मानसिक स्तर और पृष्ठभूमि की सामान्य जानकारी दी, ताकि अगली बार जब भी मैं कक्षा में जाऊँ तो किन बातों को ध्यान में रखूँ। उनकी यह बात आज भी अध्यापन में मेरे लिए मील का पत्थर साबित हुई और आज भी मैं मानती हूँ की बच्चों को जानने के लिए सिर्फ नाम ही काफी नहीं है।

बस यही था मेरे शिक्षकीय दिन का पहला अनुभव। इसके बाद बाद मुझे पूरे दिन भर के लिए आराम दे दिया गया। ताकि आहिस्ता-आहिस्ता मैं माहौल से बावस्ता होऊँ। मेरे लिए यह एक और बड़ी राहत थी।


सविता प्रथमेश,मसान गंज,बिलासपुर,छत्तीसगढ़

(अगर आप शिक्षक हैं तो अपने पहले दिन का अनुभव हमें भेजिए। हम उसे इसी तरह यहॉं प्रकाशित करेंगे। विवरण में पहले स्‍कूल तथा साल का उल्‍लेख अवश्‍य हो। साथ में अपना एक फोटो भी भेजें।)

टिप्पणियाँ

pramodkumar का छायाचित्र

स्कूल का पहला दिन‚ यह श्रंखला मजेदार और प्रेरक रहेगी‚ ऐसा मुझे लगता है। सविता जी का अनुभव किसी शिक्षक के पहले दिन की जद्दोजहद को दर्शा रहा है। पहले दिन लगभग ऐसा ही होता हे। चलिए‚ इसी बहाने वक्त में पीछे जाने का मौका मिलेगा और उन चीजों को याद कर हंसी भी आयेगी और रोना भी। और वे बच्चे भी झलकेंगे। बहुत अच्छा।

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