विज्ञान मान्यताओं पर नहीं चलता !

मैं आपको विज्ञान का दर्शन नहीं बताने जा रहा, मैं तो आपको अपने कक्षा अनुभव से रूबरू करवा रहा हूँ। दरअसल मैंने फेसबुक के Teacher Info Point पेज पर ममता अंकित का एक वीडियो देखा जिसमें वे अपने विद्यार्थियों को प्रकाश को सीधी रेखा में चलना दिखा रही थीं। मैं भी इस टॉपिक पर कई बार कुछ गतिविधियाँ करवा चुका था। ये वीडियो मुझे बहुत पसन्द आया और कक्षा में प्रयोग करने लायक भी लगा। तो जैसे ही अवसर मिला मैंने कक्षा 6, 7 व 8 के बच्चों को कंप्यूटर कक्ष में बिठाकर उनके समक्ष ये प्रयोग करने का निर्णय लिया।

कक्ष में अँधेरा करने की आवश्यकता थी, दरवाजे खिड़की बन्द करने पर भी कमरे का उजाला कम नहीं हुआ। फिर गत्ते के डिब्बे खिड़कियों पर लगाकर कुछ हद तक अँधेरा करने का प्रयास किया गया। शुरू हुआ प्रयोग प्रदर्शन। मेरे झोले में लेजर लाइट पड़ी हुई थी। बच्चों से दो डस्टर मँगवाए जो चाक पाउडर से सने हुए थे। प्रदर्शन शुरू करने से पहले बच्चों से बातचीत शुरू हुई।

- बताओ, अगर मैं टॉर्च जलाऊँ तो लाइट कैसे चलेगी?

  बच्चों का समवेत उत्तर था – सीधी रेखा में।

- पर कैसे मानें कि प्रकाश सीधा ही चलता है ?

- क्योंकि वो सामने दिखता है सर – कुछ बच्चे टॉर्च की लाइट को देखते हुए   बोले।

- पर वो टेढ़ा-मेढ़ा चलकर भी तो सामने पहुँच सकता हैं ना ? मैंने पूछा।

हरिओम बोला – अगर ऐसा होता तो ऊपर-नीचे भी कहीं उजाला होता, पर होता नहीं ना।

ठीक है, तो क्या हम प्रकाश का रास्ता देख सकते हैं, जिससे पता चले कि वो सीधा ही चलता है ? कम प्रकाश वाले उस कक्ष में एक बच्चे को लेजर लाइट देकर मैंने उसे सामने खड़े दूसरे बच्चे के कपड़ों पर चमकाने के लिए कहा। अँधेरे में भी उसकी नीली स्वेटर पर लाल बिन्दु चमकने लगा। अभी केवल टॉर्च से निकलती और स्वेटर पर चमकती लाल लाइट दिख रही थी। दोनों बच्चों के बीच प्रकाश कैसे चल रहा है यह नहीं पता चल रहा था। अब मैंने दोनों बच्चों के बीच में डस्टर पर लगी चाक झाड़नी शुरू कर दी। दिख गया ! बच्चे खुशी से चिल्ला उठे, प्रकाश बिलकुल सीधी रेखा में चल रहा था। अँधेरे कमरे में दोनों बच्चों के बीच में एक लाल रेखा चमकने लगी थी, जिसमें असंख्य चाक के कण चमकते हुए नाच रहे थे। प्रकाश के मार्ग को दिखाने के इस तरीके को मैं अपनी बड़ी कक्षाओं में भी प्रयोग कर सकता हूँ। और केवल प्रकाश की गति को ही नहीं वरन प्रकाश के परावर्तन और ‘टिंडल घटना’ दिखाने के लिए भी। ये विचार मुझे इस प्रदर्शन के दौरान ही आ रहे थे। प्रदर्शन का ये सिलसिला यहीं नहीं रुका। मैंने दो बच्चों को समतल दर्पण देकर सीधी रेखा में चलते प्रकाश को मनवाँछित जगह पर मोड़कर दिखाया और बच्चों को प्रकाश के परावर्तन की अवधारणा से भी परिचय करवाया।

दूसरा प्रदर्शन भी कक्षा 6 व 8 के बच्चों के समक्ष किया गया। दरअसल कक्षा 6 में ‘Bases of Sorting materials’ राइम का रिवीजन करवा रहा था तो फ्लोटिंग (चीजें डूबेंगी या तैरेंगी) पर भी बात हुई। समीर ने पूछा – पर सर चीज़ें डूबती-तैरती क्यों हैं? तभी ख्याल आया कि उनके साथ डूबने तैरने पर एक प्रदर्शन गतिविधि करवानी होगी।

आज अवसर मिला तो इन दोनों कक्षाओं के बच्चों को एक साथ बिठाया। बच्चों से कुछ नींबू मँगवाए और एक बीकर, ग्लास रॉड और नमक लेकर कक्षा में गया था। खुले आकाश के नीचे प्रदर्शन शुरू हुआ। ये प्रदर्शन मैं दो-एक बार पहले भी कर चुका था तो विश्वास था कि सब कुछ निर्धारित ढंग से होगा। बीकर में पानी भरकर बच्चों से पूछा – बताओ, क्या होगा अगर मैं इस नींबू को बीकर में डालूँ तो ? डूबेगा या तैरेगा ? डूबेगा जी, डूबेगा। मेरा भी यही मानना था। लेकिन ये क्या ? नींबू बीकर की तली पर जाकर ऊपर लौट आया और तैरने लगा। .... जरा दूसरा बड़ा वाला देना, हैं .... ये भी तैरने लगा। बच्चों के लिए तो ये नया था तो उन्हें आश्चर्य होना स्वाभाविक था। किन्तु मैं भी हैरान-परेशान था, पूर्व अनुभव के हिसाब से तो नींबू को डूब जाना चाहिए था। मतलब सीधा था – विज्ञान मान्यताओं पर नहीं चलता।

अब कुछ बच्चों को छोटे नींबू लाने भेजा तो कुछ को विद्यालय परिसर में पड़े आँवले (जिन्हें बच्चे चूसने के लिए लाते हैं और कुछ फेंक देते हैं)। कुछ आडू के बीज उठाकर ले आए। अब बीकर के जल में कुछ आँवले (कुछ हरे-कुछ सिकुड़े से), कुछ आडू के बीज और एक छोटा सा नींबू डाले गए और सब के सब बीकर की तली में जाकर बैठ गए। एक छोटा सा नीबू या आँवला तली में और बड़ा नींबू पानी के ऊपर ये कैसा आश्चर्य है। मतलब डूबने-तैरने पर चीज़ के आकार और भार का कोई प्रभाव नहीं होता क्या ? यही प्रश्न बच्चों के मन में भी था। होता है – इन दोनों का डूबने तैरने से सम्बन्ध है लेकिन उसे समझने के लिए एक नया शब्द समझना होगा – डेन्सिटी यानी घनत्व। द्रव्यमान (वजन) और आयतन (स्थान घेरने) के अनुपात को ही तो वस्तु का घनत्व कहते हैं और यदि किसी वस्तु का घनत्व पानी के घनत्व (1 किग्रा प्रति मीटर3) से कम हो तो वे तैरेगी और यदि इससे ज्यादा हो तो वो डूब जाएगी।

अब बीकर में धीरे-धीरे नमक डालकर रॉड से हिलाकर घोल दिया गया। छोटा नींबू तली छोड़कर बीकर के बीच में तैरने लगा। क्या कहेंगे इसे डूबा हुआ या तैरता हुआ? डूबे हुए तैरता नींबू। मतलब डूबने और तैरने की बीच की अवस्था। थोड़ा और नमक मिलाया तो छोटा नींबू पानी की सतह पर आकर तैरने लगा। मतलब क्या हुआ ? पानी में नमक घुला तो उसकी डेंसिटी बढ़ गयी जैसे ही उसकी डेंसिटी नींबू से ज्यादा हुयी वो बेचारे निम्बुड़े को बीकर की तली छोड़कर ऊपर आना पड़ा। तो बताओ ! आँवला और आड़ू के बीज अभी भी पानी में डूबे क्यों हैं ? उनकी डेंसिटी अभी भी पानी से ज्यादा है जी – निधि बोली। और तेल पानी पर क्यों तैरता है ? क्योंकि तेल की डेंसिटी पानी की डेंसिटी से कम होती होगी – आदित्य बोल पड़ा। तो क्या हम बता सकेंगे कि बड़ी सी नाव पानी पर कैसे तैरती होगी? उसका बड़ा आकार उसके आयतन को बढ़ा देता है और उसके वज़न के साथ आयतन का अनुपात यानी नाव का घनत्व पानी के घनत्व से कम हो जाता है तो वो पानी पर तैरने लगता है, समझे ? जी हाँ ! बच्चों के स्वर में आत्मविश्वास था।

तो आज के दोनों प्रदर्शनों में अवधारणाओं से इतर जो बात सीखने लायक थी वो थी विज्ञान की प्रकृति की। विज्ञान किसी भी बात को मानने का प्रमाण माँगता है जो प्रयोगों द्वारा सिद्ध किया जा सके, जिसे कभी भी सिद्ध किया जा सके। ये करण-कारण के सिद्धान्त पर काम करता है। चमत्कार जैसे शब्दों के लिए विज्ञान में कोई स्थान नहीं हैं, अगर कुछ चमत्कार जैसा है तो उसके कारण को हम अब तक जान नहीं पाए हैं। सूक्ष्मजीवों की खोज से पहले उनसे होने वाले रोगों को ‘ऊपरी हवा’ का दोष माना जाता था और ये पता चलने के बाद भी चंद्रमा पृथ्वी का उपग्रह है हम उसे देव मानने से नहीं चूकते। बच्चे विज्ञान के चरणों को समझ सकें, तर्क करके, परिकल्पना बनाकर, तथ्यों की जांच करना सीखें, तो शायद भावी समाज अधिक विज्ञान सम्मत हो।


सुन्दर ‘शिक्षार्थी’,शिक्षक, उत्‍तराखण्‍ड

 

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