मैं शिक्षिका के साथ-साथ एक विद्यार्थी भी हूँ

लुबना अहमद

हम सभी...और वे सब भी अच्छे शिक्षक और शिक्षिकाएँ हैं जो अच्छे विद्यार्थी भी हों...जो हमेशा नई बातें सीखने और विद्यार्थियों के प्रबन्‍धन के नए तरीकों के बारे में जानने के लिए उत्सुक रहते हों। कुछ नया खोजने की यही भावना उन्हें सतर्क और मुस्तैद रखती है और उनके कार्य को दिलचस्प बनाती है।

अभिनेता, कलाकार, निर्देशक, मार्गदर्शक,  परामर्शदाता, सुगमकर्ता, अनुकरणीय व्यक्ति, प्रेरणास्रोत, गुरु, बहु-कार्यक्षम, जीवन प्रशिक्षक, मध्यस्थ,प्रबन्धक, नेतृत्वकर्ता, सुझाव देने वाला, संचार कौशल, कायल करने का कौशल, वाकपटुता का कौशल इत्यादि। यह सूची तो अन्तहीन है लेकिन ये सारी बातें एक ही व्यक्ति के बारे में हैं और वह है - शिक्षक।

बहु-भूमिकाएँ निभाने वाला एक व्यक्ति

जिस व्यक्ति से इन सब भूमिकाओं को निभाने की अपेक्षा की जा रही है वह व्यक्ति है स्कूल का एक शिक्षक। आज शिक्षक जिस चुनौती का सामना कर रहे हैं वह यह है कि अन्ततः ये सारी भूमिकाएँ शिक्षण-अधिगम के अनुभव की प्रभावशीलता के लिए कितनी अच्छी तरह से सहक्रिया करती हैं।    

यह सब कुछ कितने उम्दा तरीके से व्यक्त कर दिया गया, कितनी आसानी से कह दिया गया, लेकिन इसे लागू करना कितना कठिन है।

मैंने एक स्कूल शिक्षिका के रूप में अपने दस साल की यात्रा को पुनः रचने का प्रयास किया है और उससे प्राप्त अन्तर्दृष्टि एवं अनुभवों को कागज पर उतारने की कोशिश की है। इन अन्तर्दृष्टियों एवं अनुभवों ने मेरे व्यक्तित्व को आकार दिया और एक पेशेवर के रूप में विकसित होने में मेरी मदद की। इस लेख में मैंने विशेष रूप से अपने कक्षा सम्बन्धी अनुभवों का उल्लेख किया है।

शिक्षक से की जाने वाली अपेक्षाएँ

शिक्षक को एक अच्छा अभिनेता होना चाहिए और उसकी आवाज ऊँची और बोली स्पष्ट होनी चाहिए ताकि वह विद्यार्थियों का ध्यान आकर्षित कर सके। कक्षा में उसका प्रदर्शन ऐसा होना चाहिए कि विद्यार्थियों की रुचि उस विषय में बढ़े। उसे चाहिए कि वह विद्यार्थियों के सीखने की प्रक्रिया में उचित निर्देश दे और उसे आसान बनाए। कक्षा में आधे घण्टे या चालीस मिनट का जो समय शिक्षक को मिलता है उसमें उसे यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उस दिन के लिए निर्धारित उद्देश्य पूरे हो जाएँ और विद्यार्थी विषय के साथ-साथ अच्छे मूल्य भी सीखें।

शिक्षक का हर पहलू - उसका व्यक्तित्व, उसके परिधान, उसका सम्प्रेषण कौशल, यहाँ तक कि उसके धीरज का स्तर - विद्यार्थी ये सब कुछ बड़े ध्यान से देखते हैं और बारीकी से इनकी जाँच करते हैं। शिक्षक के इन पहलुओं को लगातार परखा जाता है।

हमें विद्यार्थियों व शिक्षकों का अनुपात नहीं भूलना चाहिए जो चालीस और एक या पचास और एक और कभी-कभी तो साठ और एक का भी हो सकता है यानी एक शिक्षक और चालीस, पचास या साठ विद्यार्थी। और अगर दसवीं, ग्‍यारहवीं या बारहवीं कक्षा हो तो वे विद्यार्थी आप के बराबर या आपसे लम्बे (और ताकतवर) भी हो सकते हैं। ऐसी कक्षाओं के साथ काम करने के लिए नेतृत्व कौशल और उच्च स्तर की परिपक्वता की जरूरत होती है। इन कक्षाओं में चिल्लाने, डाँटने और भावनात्मक होने से बात और बिगड़ सकती है। यह परिस्थिति वाकई विकट होती है।

मैं पिछले दस सालों से इस पेशे में हूँ और मुझे अब भी लगता है कि मैं एक परिपूर्ण या आदर्श शिक्षिका नहीं बन पाई हूँ। मैं अभी भी सीख रही हूँ और बेहतर शिक्षिका बनने के लिए अपने कौशलों को प्रखर करने के प्रयास में लगी हुई हूँ। हर साल, हर महीने, हर दिन और अपने शिक्षण के हर घण्टे में जब मैं विद्यार्थियों को विषय के मुख्य कौशल सिखाती हूँ और उनके साथ बातचीत करती हूँ तो मैं उनके साथ व्यवहार करने और शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में संवर्धन करने के नए-नए पहलुओं के बारे में सीखती हूँ।

मेरे अनुभव और चुनौतियाँ तथा मैंने उनसे क्या सीखा

मैं अपने कुछ अनुभव यहाँ साझा कर रही हूँ जिनमें से कुछ प्रमुख घटनाओं या चुनौतियों के रूप में हैं और जिनका सामना मैंने पिछले दस वर्षों में किया है तथा जिन्होंने कक्षा में मेरे प्रदर्शन व विद्यार्थियों के प्रति मेरे व्यवहार को समुचित आकार दिया है और खुद को बदलने और विकसित होने की प्रेरणा दी है।

एक दिन जब मैं त्रिकोणमिति पढ़ाने के लिए अपनी कक्षा में गई तो मुझे महसूस हुआ कि विद्यार्थी पढ़ने के मूड में नहीं हैं। एक विद्यार्थी ने कोई टिप्पणी की और बाकी सब हँसने लगे। उन्हें डाँटने-डपटने या शिक्षकों का आदर करने के बारे में लेक्चर देने की बजाय मैंने उनके व्यवहार पर ध्यान न देने और पाठ पढ़ाने का फैसला किया। मैंने सोचा कि मैं अपना टॉपिक एक अलग तरह से पेश करूँ। इससे दो उद्देश्य पूरे होंगे, एक तो विद्यार्थियों का ध्यान दूसरी ओर जाएगा और वे पाठ सीखने की ओर प्रवृत्त होंगे। मैंने उनसे पूछा कि क्या वे स्कूल के भवन के पास गए बिना या उसे छुए बिना उसकी ऊँचाई का पता लगा सकते हैं। अब तो वे सोच में पड़ गए और मैंने भी उन्हें सोचने का समय दिया। तब मैंने उनसे कहा कि आज जो टॉपिक हम पढ़ने वाले हैं वह उन्हें बताएगा कि ऐसा करना सम्भव है और इसे कैसे किया जाए। बस, इस बात ने उनका ध्यान आकर्षित किया और मैं अपना शिक्षण-कार्य आगे बढ़ा पाई।

मैंने क्या सीखा : नकारात्मकता से ध्यान हटाना और सकारात्मकता की ओर बढ़ना।

एक बार पढ़ाते समय मैंने देखा कि एक विद्यार्थी जम्हाई ले रहा था (सामान्य तौर पर आखिर के दो पीरियडों में ऐसा होता है), फिर एक और विद्यार्थी ने जम्हाई ली फिर एक और ने...तो मुझे एहसास हुआ कि मेरे लेक्चर के कारण ऐसा हो रहा है। मैं लगभग 10-12 मिनटों से अविराम बोले जा रही थी और यह अवधि विद्यार्थियों के ध्यान देने की सीमा की अवधि से कहीं अधिक थी। इसलिए मैं रुकी और बोलना एकदम बन्द कर दिया। विद्यार्थियों ने इस चुप्पी पर ध्यान दिया। एक बार फिर उनका ध्यान मेरी ओर था और इस बार मैंने प्रश्न पूछने के माध्यम से पढ़ाना जारी रखा, उन्हें शिक्षण प्रक्रिया में शामिल किया और खुद निष्कर्षों तक पहुँचने के लिए प्रोत्साहित किया। प्रश्नों के उत्तर देने में उनकी मदद करने के लिए मैं उन्हें मुख्य शब्दों के रूप में संकेत देती और जब वे सही उत्तर देते तो मैं उनकी प्रशंसा करती। इससे विद्यार्थी सीखने की ओर अभिप्रेरित हुए और उस दिन के अधिगम उद्देश्यों को प्राप्त करने में भी सहायता मिली।             

मैंने क्या सीखा : सीखने की प्रक्रिया में विद्यार्थियों की भागीदारी एकरसता को तोड़ने में मदद करती है और शिक्षण-अधिगम की प्रक्रिया को प्रभावी बनाती है।

प्रत्येक शिक्षार्थी या विद्यार्थी अपनी गति से सीखता है और कक्षा में हमारे पास विद्यार्थियों का एक मिश्रित समूह होता है। मैं जब भी कक्षा को किसी अवधारणा का परिचय देती हूँ तो सरल से जटिल की ओर जाती हूँ। उदाहरण के लिए, कक्षा 9 को बीजगणित पढ़ाने के दौरान मैं उनकी पिछली कक्षाओं यानी छठी, सातवीं और आठवीं में पढ़ाई गई अवधारणाओं की पुनरावृत्ति करवाती हूँ और उन्हें संक्षेप में दोहराती हूँ। ऐसा करने से विद्यार्थी विषय के साथ जुड़ते हैं और टॉपिक को अच्छी तरह से सीख पाते हैं। कम्प्यूटर और पहले से तैयार मॉड्यूल जैसे मल्टीमीडिया साधनों का उपयोग करने से भी सीखने में सुधार होता है। 

मैंने क्या सीखा : कक्षा को पढ़ाते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कक्षा में कई तरह के विद्यार्थियों का मिश्रण होता है। इसलिए अपनी शिक्षण विधि को तदनुसार रूपान्तरित करना चाहिए।

कुछ साल पहले मैंने अपनी कक्षा से फीडबैक देने को कहा। मैंने उनसे कहा कि वे अपने शिक्षकों के बारे में दो पसन्दीदा और दो नापसन्दीदा बातें लिखें। अधिकांश उत्तर अनुमानित और अपेक्षानुसार ही थे लेकिन यह देखकर आश्चर्य हुआ कि उनमें से कई विद्यार्थियों ने लिखा कि एक शिक्षक गुस्सैल हैं और उन पर चिल्लाते हैं। उन्होंने यह भी लिखा कि वैसे तो वे शिक्षक बहुत अच्छे हैं किन्तु गुस्सा बहुत करते हैं। मैंने अनुमान लगाया कि वे मेरे बारे में ही ऐसा कह रहे थे। मुझे बहुत चिन्ता हुई क्योंकि उन्हें यह बात बेहद अखरती होगी तभी तो उन्होंने इसका उल्लेख किया। तब मुझे महसूस हुआ कि मुझे अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखना चाहिए था क्योंकि इसका प्रभाव मेरे विद्यार्थियों पर पड़ रहा था।   

मैंने क्या सीखा : शिक्षक की डाँट-डपट से बच्चों का ध्यान पढ़ाई से हटता है। शिक्षकों को चाहिए कि वे अपने विद्यार्थियों के लिए एक ‘खुशगवार’ माहौल बनाएँ।

एक स्टाफ मीटिंग में हमारी प्रधानाध्यापिका जी ने मुझसे पूछा कि क्या मैंने अपना नियत कार्य (असाइन्मेंट) पूरा कर लिया है। मैंने वह कार्य नहीं किया था। मुझे लगा कि अब अन्य शिक्षकों के सामने मुझे डाँट पड़ेगी और इतनी शर्मिन्दगी महसूस हुई कि लगा कि (अलंकारिक भाषा में कहूँ तो) जमीन फट जाए और मैं उसमें समा जाऊँ। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। प्रधानाध्यापिका जी ने मेरी तरफ देखा और कहा कि वे मेरी स्थिति समझती हैं कि चूँकि मैं अन्य जिम्मेदारियों के कारण व्यस्त थी इसलिए मैं वह नियत कार्य नहीं कर पाई और फिर उन्होंने पूछा कि मैं वह कार्य कब तक पूरा कर सकूँगी। उनकी मुस्कराहट और उत्साहजनक शब्दों से मेरी घबराहट दूर हुई और मेरे मन में उनके लिए आदर भाव बढ़ गया। मैंने अपना कार्य और अधिक रुचि और उत्साह के साथ पूरा किया और वह काम बहुत अच्छा भी हुआ। अपनी इस सीख को मैंने कक्षा में भी लागू किया। विद्यार्थियों से यह उम्मीद की जाती है कि वे रोज सारे विषयों का काम पूरा करें। अब मैं इस बात का ध्यान रखती हूँ कि उन्हें कितना काम मिला है और फिर उसके हिसाब से उन्हें अपने विषय का कार्य देती हूँ। जब वे प्रश्न हल कर रहे होते हैं तब मैं कक्षा का चक्कर लगाती हूँ और उनसे “बहुत अच्छे”, “हाँ, आप सही हैं...लेकिन इसे ठीक करें” जैसे सकारात्मक शब्द कहकर उन्हें बेहतर काम करने का प्रोत्साहन देती हूँ, भले ही उन्‍होंने एक ही पंक्ति लिखी हो जो पूर्णत: या आंशिक रूप से ही सही हो, तब भी।

मैंने क्या सीखा : शिक्षक की प्रोत्साहन देने वाली मुस्कान या विद्यार्थियों को समझने वाली दृष्टि से शिक्षक-विद्यार्थी सम्बन्धों को बेहतर बनाने में काफी मदद मिलती है और परिणामस्वरूप अधिगम भी बेहतर होता है।

गणित एक ऐसा विषय है जिसे याद नहीं किया जा सकता। इसके लिए बहुत सारा अभ्यास करना जरूरी है क्योंकि तभी अवधारणाओं को आत्मसात किया जा सकता है। कक्षा में पढ़ाने के बाद मैं विद्यार्थियों से यह अपेक्षा करती हूँ कि वे घर जाकर उन अवधारणाओं का अभ्यास करेंगे जो उन्होंने उस दिन कक्षा में सीखी हैं। केवल कुछ ही विद्यार्थी ऐसा करते हैं, अधिकांश विद्यार्थी पुनरावृत्ति नहीं करते और इसीलिए वे अगली अवधारणा को समझने या ‘पचाने’ के लिए तैयार नहीं होते। अगर यह चक्र चलता रहे तो कुछ समय बाद वे विषय पर अपनी पकड़ खो बैठते हैं। ऐसी स्थिति में मैं उनसे कहती हूँ कि वे इस विषय पर सिर्फ पन्द्रह मिनट के लिए ध्यान दें - इसके ऊपर एक मिनट भी नहीं। यह उपाय कुछ हद तक कारगर सिद्ध हुआ है।

मैंने क्या सीखा : मैं अभी भी सीख रही हूँ। विद्यार्थियों को सीखने के लिए प्रेरितकरने के लिए मुझे और प्रयास करने हैं।

निष्‍कर्ष

अन्त में, जापानी भाषा का एक शब्द है ‘काइजेन’, जिसका अर्थ है अपनी कार्य प्रथाओं में निरन्तर सुधार करना भले ही वह थोड़ा-थोड़ा ही क्यों न हो। अब तक की मेरी यात्रा ‘छोटे-छोटे सबक’ की एक शृंखला रही है, जिनसे मिली सीख से मुझे अपने कौशलों का संवर्धन करने और एक बेहतर शिक्षक व इंसान बनने में मदद मिली है।

और एक शिक्षक के रूप में मेरी यात्रा जारी है...कहा भी तो गया है कि सीखने की प्रक्रिया में कभी विराम नहीं लगता..।


लुबना अहमद ने स्नातक होने के बाद लगभग 12 वर्ष तक आई.टी. कम्पनी में कार्य किया। उन्‍होंने एन.आई.आई.टी. में उन्होंने सीनियर ग्रुप लीडर से लगाकर गुणवत्ता नियंत्रण के प्रमुख के रूप में विभिन्न भूमिकाएँ निभाईं। फिर अपने परिवार की देखभाल करने के लिए उन्होंने नौकरी से अवकाश लिया और इसी दौरान गणित में दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय से स्नातकोत्तर व बी.एड. की पढ़ाई की। अब वे ग्रेटर नोएडा के एक अग्रणी स्कूल में गणित की शिक्षिका के रूप में कार्यरत हैं। उनसे lubnaafaque@yahoo.com पर सम्पर्क किया जा सकता है। यह अँग्रेजी लर्निंग कर्व, दिसम्‍बर 2017 में प्रकाशित लेख I Am a Teacher Who is Also a Student : Lubna Ahmed का अनुवाद है। अनुवाद : नलिनी रावल  चित्र : प्रशान्‍त सोनी

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