मेरी भाषा की कक्षा : शिक्षण के कुछ अनुभव

विजय प्रकाश जैन

प्राथमिक कक्षाओं में भाषा शिक्षण जितना चुनौतीपूर्ण कार्य है उससे कहीं ज्यादा रोचक अनुभव प्रदान करने वाला होता है। शुरुआती दिनों में जब बच्चा अपने घर से स्कूल आता है तो उसका साक्षात्कार स्कूल की जिस भाषा से होता है वह उसके घर की भाषा से कई अर्थों में भिन्न होती है। शिक्षक के लिए यह एक बड़ी चुनौती होती है कि स्थानीय भाषा को उचित सम्मान देते हुए वह कैसे विद्यालय की भाषा का परिचय बच्चों के साथ कराता है। बागड़ अंचल के दूरस्थ क्षेत्रों के बच्चों का परिवेश, शहर और विकसित कस्बे के आसपास रहने वाले बच्चों से भिन्न है। मैं जिस स्कूल में शिक्षण का कार्य करवाता हूँ वह स्कूल ऐसे भाषायी क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता है जहाँ हिन्दी बच्चों की दूसरी भाषा है। बागड़ी बच्चों की मातृभाषा है और अँग्रेजी तीसरी भाषा के रुप में देखी जा सकती है। ऐसे भाषायी परिवेश में बच्चों को हिन्दी सिखाना उतना ही चुनौतीपूर्ण है जितना कि अँग्रेजी या अन्य कोई भाषा।

बाँसवाडा राजस्थान का आदिवासी बाहुल्य जिला है। राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय, मेंदिया डिन्डोर, जिला मुख्यालय से 28 किलोमीटर दूर एक ऐसे गाँव में स्थित है जहाँ शत-प्रतिशत भील जनजाति समुदाय के लोग निवास करते हैं। विद्यालय की कक्षा 1 से 8 में इसी समुदाय के 155 बालक/बालिकाएँ अध्ययनरत हैं एवं मेरे सहित 4 शिक्षक कार्यरत हैं। खेती-बाड़ी व मजदूरी करने वाले परिवारों में एक भी व्यक्ति दसवीं पास नहीं है। मेरे स्कूल में आने वाले बच्चों में से ज्यादातर वे हैं जो अपनी पीढ़ी के पहले विद्यार्थी हैं।

इस गाँव में मेरा स्थानान्तरण गत सत्र 2016 में ही हुआ है। इस सत्र में सरकारी अभियानों में मेरी ड्यूटी होने के कारण मैं जुलाई के अन्तिम दिनों में स्कूल पहुँचा। दो-तीन दिनों तक मैं बच्चों के बात करता रहा उनके अनुभव सुनता। बच्चे बागड़ी में बोलते। मैं भी बागड़ी बोलते-बोलते हिन्दी के कुछ शब्द और वाक्य बोल दिया करता। एक दिन बरसात हो रही थी। मैं बच्चों से बात कर रहा था। बरसात में क्या होता है। एक बच्चा बोला बरसात में डेडका आता है। मैंने कहा डेडका मतलब मेंढक होता है। इस शब्द का दो-तीन बार अलग-अलग तरह से प्रयोग हुआ अगले दिन कक्षा में एक मेंढक आ गया। मैंने कहा देखो बच्चों मेंढक आया है।

अभी कुछ दिनों पूर्व जब में ‘बिल्ली के तीन बच्चे’  कहानी की बिग बुक दिखाकर  जब मैंने मेंढक पर अँगुली रखकर बच्चों से पूछा यह क्या है तो बच्चे जोर से बोले मेंढक। इस तरह बच्चों से लगातार बागड़ी मिश्रित हिन्दी में बात करने का परिणाम यह निकला कि तीन महिने बाद अधिकांश बच्चे हिन्दी समझने लगे और बोलने भी । बच्चों को हिन्दी तक ले जाने के इस प्रयास और अनौपचारिक बातचीत का एक और आश्‍चर्यजनक परिणाम दिखा। एक दिन मैं पहली और दूसरी कक्षा के बच्चों के साथ बात कर रहा था। एक कविता सुनाने के बाद मैंने उनसे उनके नाम पूछे। उस वक्त मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब पहली के एक नवप्रवेशित बच्चे महावीर ने मेरे पास आकर दूसरे बच्चे की शिकायत करते हुए मेरा नाम लेकर कहा,  ” विजय लाल जी आ नी मानतोए।”

कई दिन तक अन्य बच्चे भी मेरा नाम लेकर मुझसे बात करते रहे। मैंने भी प्रयास नहीं किया कि बच्चे मुझ सर या मास्टरजी बोलें। बच्चों का यह व्यवहार मुझे थोड़ा अटपटा लगा। लेकिन मैंने महसूस किया कि जो बच्चे बे-झिझक कक्षा में मेरा नाम ले रहे थे उनके साथ भाषा पर कार्य करना ज्यादा आसान लग रहा था। जबकि जो बच्चे अभी भी संकोच कर रहे थे, मैं स्वयं भी उनकी कठिनाइयों को नहीं समझ पा रहा था। यहाँ मेरे मन में एक प्रश्न उठा कि बच्चों को अपने शिक्षक को सर जी या माटसा कहकर क्यों सम्बोधित करना चाहिए ? क्या यह सम्बोधन बच्चों और शिक्षक के बीच अन्तर पैदा करने का पहला आधार न होता होगा?  खैर धीरे-धीरे अब सारे बच्चे मुझे सर कहकर सम्बोधित करते हैं। लेकिन नाम लेकर सम्बोधित करने से सर तक के सफर ने उन्हें मेरे प्रति विश्वास से भर दिया है। कक्षा में सीखने-सिखाने की प्रक्रिया पर इसके सकारात्मक असर दिख रहे हैं।

अपना नाम बताना

अपने अध्ययन और प्रशिक्षणों के दौरान मैंने लोगोग्राफिक पठन के बारे में पढ़ा यानि शब्द की आकृति को चित्र की तरह पढ़ना। उस समय मैं इस प्रक्रिया को ठीक से समझ न पाया था। मैंने कक्षा में इस पर काम करने की योजना बनाई। कक्षा एक में बच्चों से कहा कि एक खेल खेलेंगे। सब बच्चे एक-एक कर अपना नाम बताएँगे मैं एक शीट पर उन्हें लिखूँगा। बच्चे एक-एक कर अपना नाम बताते गए, मैं उन्हें श्यामपट्ट पर बोल-बोलकर लिखता गया और एक बार नाम लिखकर उसके एक-एक वर्ण को बुलवाता गया। जैसे मनीष ने खड़े होकर अपना नाम बताया। मैंने नाम लिखकर बुलवाया म-नी-ष। इसके बाद उस बच्चे के नाम की ताली बजती। जब सारे बच्चों ने अपने नाम बता दिए तो मैंने प्रत्येक बच्चे को पूछा उसका नाम कहाँ लिखा है। मुझे बहुत आश्चर्य हुआ जब उपस्थित 21 बच्चों में से 17 बच्चों ने श्यामपट्ट पर बता दिया कि उसका नाम कहाँ लिखा है। इसके बाद इन नामों को शीट पर लिखकर कक्षा-कक्ष में चिपका दिया। धीरे-धीरे इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाते गए। आज बच्चे अपना और अपने दोस्तों के नाम शीट में कहाँ लिखे हैं बता देते हैं। इस प्रक्रिया का एक और परिणाम दिखा, बच्चे कार्डशीट पर लिखे नामों की नकलकर अपनी कापियों पर उतारने भी लगे हैं। हालाँकि अभी बच्चे पूरी तरह से अपने नामों में प्रयुक्त हो रहे वर्णों और ध्वनियों को पहचान तो नहीं पा रहे लेकिन किसी चित्र की भाँति नाम लिखकर खुश जरूर हो रहे हैं।

बच्चों ने बताए खेतों में लगने वाली 43 चीजों के नाम

बच्चों के साथ उनके परिवेश के बारे में अनौपचारिक बातचीत अब मेरी शिक्षण पद्धति का एक अभिन्न हिस्सा बन गया है। पहली और दूसरी कक्षा में शिक्षण की शुरुआत ऐसी ही किसी चर्चा से होती है। इस चर्चा में बच्चे अधिकांशतः अपने दैनिक जीवन और आसपास की घटनाओं के बारे में बातचीत करते है। यह चर्चा उनको विषय के साथ जोड़ने में मदद तो करती ही है साथ ही साथ बागड़ी भाषा के तमाम शब्दों को सीखने में हमें भी मदद मिलती है। और यहीं से हिन्दी तक ले जाने की प्रक्रिया की शुरुआत भी होती है। ऐसे ही एक दिन कक्षा 1 व 2 की सामूहिक कक्षा में बच्चों से बातचीत के दौरान एक बच्चे ने बताया कल उसके यहाँ वाडी थी यानि मक्के की फसल पकने के बाद उसे देवताओं को अर्पण करने वाली पूजा। मैंने बच्चों से पूछा अच्छा खेतों में और कौन-कौन-सी चीजें होती हैं। बच्चे बताते गए मैं उन सारी चीजों के नाम श्यामपट पर लिखता गया। बच्चों ने 43 तरह की चीजों के नाम बताए। इनमें नारियल और नीलगिरि जैसे पेड़ों के नाम भी थे जो इस परिवेश में पैदा नहीं होते हैं। जब मैंने बच्चों से यह जानने का प्रयास किया कि नारियल और नीलगिरि के पेड़ कैसे होते हैं और उन्होंने उसे कहाँ देखा है तो एक बच्चे ने कक्षा में लटकाई हुई कहानियों की किताबों मे से एक किताब निकालकर मुझे थमा दी। खैर जब मैंने बच्चों द्वारा बताई हुई चीजों की सूची पर नजर डाली तो पता चला कि तमाम चीजें ऐसी हैं जिसका नाम बच्चों ने अपनी स्थानीय भाषा (बागड़ी) में बताया है। ज्यादातर चीजों के नाम हिन्दी में भी थे। बातचीत के दौरान ही उनको उन वस्तुओं के हिन्दी और अँग्रेजी नामों से भी परिचित कराया गया तथा इसका एक चार्ट कक्षा-कक्ष में बच्‍चों की मदद से बनाकर लगा दिया गया। मुझे अब बार-बार महसूस होने लगा है कि कक्षा-कक्ष में चुप्पी की संस्कृति को तोड़कर बच्चों से बात करना आवश्यक है। बात करने से एक तो बच्चे अपने अनुभवों से नए ज्ञान को जोड़कर सीखते हैं दूसरे वे घर की भाषा से मानक भाषा की ओर अग्रसर होते हैं। हम अक्सर यह मानते हैं कि बच्चे ज्यादा कुछ नहीं जानते हैं। बच्चों से यदि बातें की जाएँ और उनकी बातों को तवज्जो दी जाए तो वे बहुत सारी जानकारियाँ साझा करते हैं।

शिक्षण अधिगम सामग्री से लिखना-सीखना

स्कूल के पास में बहने वाली नदी से मैं कक्षा 4 व 5 के बच्चों के साथ छोटे-छोटे लगभग 1000 गोल कंकड़ ढूँढकर लाया और बच्चों के साथ बैठकर पहले उन पर व्हाइट प्राइमर और उसके बाद लाल, पीला, हरा और नीला रंग कर दिया। कक्षा 1 के बच्चों को जब वर्ण और अंक लिखना सिखाया तो सबसे पहले इन्हीं कंकड़ों से सिखाया। बच्चों ने पहले समूहों में वर्ण बनाए, फिर अकेले में बनाए, बच्चों ने अपने आप समूहों में यह भी तय किया कि पहले लाल फिर पीले, हरे और नीले कंकड़ जमाएँगे। बच्चों को एक बार मुझे बताना पड़ा, इसके बाद बच्चों ने स्वयं ही आपस में तय कर लिया कौन किस रंग के कंकड़ छाँटेगा कौन वर्ण बनाएगा आदि। रंग- बिरंगे कंकड़ों के साथ बच्चों को यह खेल रोचक लगा। जब भी मैं बड़ी कक्षाओं में पढ़ाने के लिए जाता हूँ तो इन बच्चों को इन कंकड़ों के साथ छोड़ देता हूँ। बच्चे वर्णों के साथ ही साथ अनेक प्रकार की आकृतियाँ और चित्र इनके माध्यम से बनाने लगे हैं। इन आकृतियों और चित्रों पर बातचीत करते हुए उनकी कल्पनाशीलता और रचनात्मकता का आकलन स्वतः ही किया जा सकता है।

समझते हुए पढ़ना

विद्यालय में कम शिक्षक होने के कारण कक्षा 3 से 5 को एक साथ बिठाकर पढ़ाना पड़ रहा था। मैं बड़ा खुश था कि बहुत सारे बच्चे रूक-रूककर या प्रवाह से कक्षानुसार पढ़ लेते थे यानि डिकोडिंग का काम कक्षा में हो रहा था। एक दिन मैं बच्चों से कक्षा 3 की कहानी “मीठे बोल” को पढ़ाने से पहले बात कर रहा था। मैंने बच्चों से सवाल किया कि शहर किस-किस बच्चे ने देखा है ? सामने से कोई जबाब नहीं आते देख मैंने शहर शब्द को श्यामपट्ट पर लिखकर पूछा यह क्या है ? बच्चे बोले ”शहर“ मैंने कहा अच्छा शहर क्या होता है ? कुछ देर बाद एक जबाब आया “जंगल” फिर खामोशी। मेरा अगला प्रश्न था अच्छा बताओ गाँव में क्या-क्या होता है? बच्चे बोलते गए और मैं लिखता गया जवाब मेरी आशा के अनुरूप नहीं थे। एक बच्चे ने गेहूँ बताया तो अन्य बच्चे भी यही बताते गए। दरअसल मैं यह जानना चाहता था कि गाँव कैसा होता है ? बच्चे अपने गाँव के बारे में क्या-क्या जानते हैं ? लेकिन बच्चों ने मेरे सवाल को यह समझ लिया कि गाँव में क्या-क्या होता है ? यहाँ स्पष्ट था कि बच्चे मेरे द्वारा पूछे गए सवाल को समझ नहीं पाए थे। उन्होंने पूर्व में मेरे द्वारा की गई चर्चा के अनुरूप (जब मैंने पूछा था खेत में क्या-क्या होता है ?) ही होना का अर्थ पैदा होने से लगा लिया। मुझे लगा बच्चे डिकोडिंग तो सीख गए लेकिन उनकी समझ नहीं बन पा रही है। चीजों के बारे में एक व्यापक दृष्टिकोण नहीं बन पा रहा है। बच्चे गाँव के बारे में भी सही तरीके से बता नहीं पा रहे थे। यानि मैं बच्चों को बातचीत करना तो सिखा रहा था लेकिन पूछे गए प्रश्न को समझ कर तद्अनुरुप उसका उत्तर दे पाना शायद नहीं हो पा रहा था। मुझे लगा मैं एक बड़ी भूल कर रहा हूँ। और उसके बाद मैंने श्यामपट्ट पर लिखे शब्दों के अनुसार ही फलों, सब्जियों, जानवरों, वाहनों व अन्य चीजों पर बच्चों के पूर्वज्ञान से जोड़ते हुए बात शुरू की तो कई चीजें मुझे और बच्चों को सीखने को मिली।

जब जानवरों पर चर्चा शुरू हुई तो बच्चों ने कई जानवरों के नाम बताए। उनमें से जंगली जानवर भी थे और पालतू भी। मैं बच्चों द्वारा बताए सारे जानवरों के नाम श्यामपट्ट पर लिखता गया। ध्यान यह रखा कि पालतू जानवरों के नाम एक तरफ हों और जंगली जानवरों के नाम दूसरी तरफ। फिर पूछा अच्छा यह बताओ मैंने ये नाम अलग-अलग क्यों लिखे हैं। बच्चों ने तुरन्‍त बताया ये जंगल में रहते हैं और ये हमारे घरों में। इसी प्रकार वाहनों पर बात हुई। मेरी समझ में यह बात आई कि पढ़ना सिखाना जितना महत्वपूर्ण है उतना ही किसी चीज पर बच्चों की समझ बनाना भी है। अन्यथा पढ़ना सिखाना निरर्थक है।

शब्दावली ज्ञान

पाठों में आए नए/कठिन शब्दों के अर्थ बताने के बाद यह मान लिया जाता है कि बच्चे को इस नए शब्द की जानकारी हो चुकी है। परन्तु शब्दों को सन्‍दर्भ के साथ व बच्चों के रोजमर्रा के जीवन के साथ जोड़कर अर्थ बताने के बारे में कहा गया तो अनुभव अलग प्रकार के रहे। बच्चों के साथ कक्षा 3 में मीठे बोल कहानी पर चर्चा हो रही थी तो दयालु शब्द पर बात करते हुये जब दया की बात आई और मैंने जब बच्चों से पूछा कि दया क्या होती है ? एक बच्चे ने जो उत्तर दिया वह मेरे लिए आँखें खोल देने वाला था। बच्चे ने कहा सर दया होती है जैसे कि उस दिन आपने हमारे ऊपर दया करके हमको जूते बाँटे थे। दरअसल कुछ दिन पूर्व ही एक संस्था द्वारा स्कूल में जूते बाँटे गए थे। बच्चे अपने आसपास की घटनाओं के बारे में अपनी एक राय कायम करते हैं, उनकी इन सब घटनाओं के बारे बात न करने पर उनकी वही राय मजबूत होती जाती है। तीसरी कक्षा के बच्चे द्वारा दया शब्द पर यह समझ बच्चों के अधिकार और दान/खैरात जैसी प्रक्रियाओं पर बड़ा प्रश्न चिन्ह लगाती है।

भाषा शिक्षण के दौरान अपनायी गई इन गतिविधियों ने बच्चों और मेरे स्वयं के लिए सीखने-सिखाने को अत्यन्त ही रोचक बना दिया है। मैं बच्चों को काफी हद तक बागड़ी से हिन्दी तक लाने में सफल हुआ हूँ, प्रयास अभी भी जारी हैं।


विजय प्रकाश जैन, प्रबोधक, राजकीय उच्‍च प्राथमिक विद्यालय, मेंदियाडिंडोर, बाँसवाड़ा, राजस्‍थान

 

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