भूगोल, एक गतिविधि आधारित विषय

 

शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करना लगभग पाँच वर्ष पहले शुरू किया था। शुरुआत में बहुत से ऐसे दस्तावेजों को पढ़ने का अवसर मिला जो शिक्षा के लक्ष्य, अर्थात शिक्षा से किस प्रकार के समाज की पैरवी की गई है, हमारा शिक्षण कैसे संवैधानिक मूल्यों को पिरो सकता है आदि पर आधारित थे। पर जब से स्कूल में बच्चों के साथ काम करना शुरू किया तब से एक स्पष्ट तस्वीर अपने दिमाग में बना पाता हूँ क्योंकि अब सिद्धान्‍त और व्यवहार में तालमेल स्पष्टतः बनता हुआ देख पाता हूँ। शिक्षण एवं शिक्षण प्रक्रियाओं के बारे में जितने भी दस्तावेज पढ़े वे इसी बात की पैरवी कर रहे थे कि शिक्षण गतिविधि आधारित होना चाहिए जिससे बच्चे करके सीखते हुए सृजित ज्ञान को स्थायी कर सकें। इसलिए स्कूल भ्रमण के दौरान भूगोल पर आधारित कुछ गतिविधियाँ करने का प्रयास किया गया जिनको यहाँ साझा किया जा रहा है।

एक बार स्कूल भ्रमण के दौरान एक बच्ची को फ्रांसीसी क्रान्ति पर कुछ लेख लिखते हुए और उसे याद करते हुए देखा। बच्ची से जब पूछा तो पता चला कि उसके दिमाग में रूस, इंग्लैण्‍ड , फ्रांस सब एक हैं। उसके लिए 1857 की क्रान्ति और यूरोप की क्रान्तियों में फर्क कर पाना मुश्किल हो रहा था क्योंकि वह अपने गाँव से लेकर विश्व तक की स्पष्ट तस्वीर अपने दिमाग में नहीं बना पा रही थी। इसके बाद कई विद्यालयों में गया, उनमें भी इस तरह के उदाहरण देखने को मिले। इसलिए सोचा क्यों न कुछ ऐसा किया जाए जिससे बच्चे पहले मानचित्र को अच्छे से समझ पाएँ ताकि वह पूरे विश्व को एक ही नजर में देख पाएँ। इसके लिए शुरुआत तो राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय पौंटी से की गई लेकिन मानचित्र से सम्बधित गतिविधियाँ बाद में कुछ अन्य विद्यालयों में भी करवाई गईं।

गतिविधि की शुरुआत बच्चों से प्रश्न पूछ कर की गई जिसका उद्देश्य उनके पूर्व ज्ञान को जानना था। सवाल कुछ ऐसे थे- कितने महाद्वीप हैं? हम किस महाद्वीप में हैं? जिस महाद्वीप में हम रहते हैं उसमें कौन-कौन से देश हैं? फ्रांस, इंग्लैण्‍ड किस महाद्वीप में हैं? बच्चे यह जानते थे कि कितने महाद्वीप हैं, हम किस महाद्वीप में रहते हैं, पर इस सन्दर्भ में वह इतना ही जानते थे कि सात महाद्वीप हैं और हम एशिया महाद्वीप में रहते हैं। मानचित्र को देखकर बच्चे यह नहीं बता पा रहे थे कि यूरोप कहाँ है? इसमें कौन-कौन से देश हैं, एशिया महाद्वीप कहाँ है, इसमें भारत के अलावा कौन-कौन से देश हैं? हर महाद्वीप की क्या पहचान है, ऐसी बहुत-सी बातें वो नहीं जानते थे इसलिए कक्षा में उनके साथ अमरीकी क्रान्ति, फ्रांसीसी क्रान्ति, रूसी क्रान्ति, पुनर्जागरण, जलवायु आदि सम्बोधों पर बातचीत करने से पूर्व, बच्चों को विश्व मानचित्र की एक स्पष्ट तस्वीर उनके मस्तिष्क में बनाना आवश्यक था, ताकि उन्हें भूगोल, इतिहास, सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन के सभी सम्बोधों को समझने में मदद मिल जाएगी। इसके लिए कक्षा में सभी बच्चों से महाद्वीपों के चित्र नोट बुक पर बनवाए गए (विश्व का मानचित्र)। फिर जिस कागज पर चित्र बनवाए थे उसके दोनों कोनों वाले क्षेत्र के बीच दूरी कितनी है? यह बच्चों से पूछा गया। बच्चे इस प्रश्न को समझ नहीं पाए।

इसके बाद बच्चों को मानचित्र देकर पूछा गया कि उत्तरी अमेरिका और एशिया महाद्वीप के बीच की दूरी ज्यादा है या उत्तरी अमेरिका और यूरोप के बीच की। बच्चों के जवाब इस प्रकार थे-बच्चों ने एक स्वर में बोला अमेरिका और एशिया के बीच की दूरी ज्यादा होगी। फिर बच्चों को उस कागज को गोलाई में मोड़ने को कहा गया। फिर बच्चों से पूछा कि अब बताइए किसके बीच की दूरी ज्यादा है। इसके बाद विश्व के मानचित्र को गोलाई में मोड़कर बच्चे जान गए कि अलास्का और रूस के कोने वाले क्षेत्र के बीच की दूरी कम है तथा उत्तरी अमेरिका और यूरोप के बीच की दूरी इससे अधिक है। इसके बाद बच्चों को ग्लोब दिया गया जिसका अवलोकन करके वह स्पष्ट रूप से जान पाए कि महाद्वीपों के बीच की दूरी कितनी है और वह कहाँ-कहाँ है? इसके बाद उनको विश्व का मानचित्र, ग्लोब एवं एटलस समूह में दिया गया और कुछ देशों को ढूँढ़ने के लिए बोला गया। इस गतिविधि से अब वह कुछ हद तक एक स्पष्ट तस्वीर अपने दिमाग में बना पा रहे थे कि कौन-से महाद्वीप में कौन-कौन से देश हैं। इससे उनकी पाठ्यपुस्तक में दिए गए सम्बोधों और उन देशों में अन्‍तर्सम्‍बन्‍ध को वह समझ पा रहे थे। इसके बाद उनको घर एवं स्कूल से विश्व तक की यात्रा करवानी थी ताकि वो जान पाएँ कि हम कहाँ हैं क्योंकि वह विश्व मानचित्र अथवा 7 महाद्वीप के बारे में जान चुके थे। इसके बाद उनको ब्लाक, जिले, राज्य, देश एवं विश्व का मानचित्र एक-एक करके दिखाया गया एवं उनका अवलोकन करवाया गया। अब बच्चे अपने दिमाग में गाँव से विश्व तक की स्पष्ट तस्वीर बना पा रहे थे।

मानचित्र का गहराई से अध्ययन - मानचित्र के मुख्य घटकों की समझ, सामान्य मानचित्र निर्माण

इस गतिविधि को कक्षा 6, 7 में एक साथ तथा कक्षा 8 में अलग से किया गया। फर्क यह था कि कक्षा 6, 7 के बच्चे थोड़ा समय लेकर चीजों को समझ रहे थे जबकि कक्षा 8 के बच्चे जल्दी ही चीजें समझ के कर रहे थे।

इसकी शुरुआत एक प्रश्न से की- मानचित्र किसे कहते हैं ? उत्तर में बच्चों ने बहुत-सी बातें कहीं, जैसे- मानचित्र में देश होते हैं, मानचित्र एक चित्र होता है, हालाँकि वह उत्तर नहीं दे पाए पर सबने कुछ न कुछ बताने की कोशिश की। इसके बाद मैंने कहा आज हम मानचित्र के बारे में जानने का प्रयास करेंगें तथा उसे बनाने का भी प्रयास करेंगें। इसके बाद एक विश्व का मानचित्र तथा एक उत्तराखण्‍ड का मानचित्र लिया और सवाल किया- आप इन दोनों मानचित्रों का अवलोकन करो और यह सोचो कि एक विशाल क्षेत्र को एक छोटे से कागज पर कैसे दर्शाया गया होगा, जिसमें पैमाना भी सटीक है, आखिर कैसे ऐसा किया गया होगा। इसके बाद उनसे कहा कि अगर इसी तरह हमें अपने गाँव, स्कूल या इसी कक्षा का मानचित्र पैमाने के आधार पर छोटे से कागज या चार्ट पर बनाना हो तो कैसे बनाएँगे? उत्तर में बच्चों ने कुछ हद तक कोशिश की, पर वे नहीं सोच पाए। और सबने कहा, ‘‘सर जी आप ही बताओ कैसे बनेगा, एक बड़ी जगह का मानचित्र एक चार्ट पर।’’ इसके लिए उनको ग्रुप में बाँटा गया। अब उनको मानचित्र बनाना था जिसके लिए उनको क्रमशः ये गतिविधियाँ करवाई गईं -

सबसे पहले उनसे पूछा गया कि बताओ दिशाओं का पता हम कैसे करते हैं? सबने उत्तर दिया- कोई बोलने लगा इधर, कोई उधर, पर कोई भी सही नहीं था। इसके बाद प्रश्न किया गया कि सूर्य किस दिशा से उदय होता है और कहाँ अस्त होता है, इस बार सबने ठीक उत्तर दिया। अब अगला प्रश्न था कि यहाँ सूर्य उदय कहाँ से होता है ? सबने सही उत्तर दिया। इसके बाद एक प्लस का निशान बनाया गया और उनको कहा गया कि इस पर लिखो कि किस तरफ कौन सी दिशा है। उन्होंने पूर्व और पश्चिम दिशा ठीक से लिख दी तथा बताने पर कि उत्तर ऊपर रखना है, उन्होंने सब तरफ दिशाओं के नाम लिख दिए। इसके बाद उस प्लस के निशान में दो लाइन में खड़ा किया गया और लगाकर हर बच्चे से यह प्रश्न किया गया कि वह दूसरे बच्चे के किस दिशा में खड़ा है तब जाकर उत्तर-पूर्व, उत्तर-दक्षिण ऐसे ही 8 दिशाएँ और ऊपर नीचे मिलाकर 10 दिशाएँ बनती हैं कि अवधारणा को स्पष्ट किया गया।

इसके बाद सवाल किया गया कि बताओ सूर्य के अलावा हमें दिशाओं का ज्ञान कैसे होगा। कुछ ने कहा दिशा सूचक। इसके बाद सबको दिशा सूचक यंत्र दिए गए। सबसे पूछा गया कि क्या आपने इससे पहले इसे कभी देखा है? तो बच्चों का कहना था कि उन्होंने इसे किताब में ही देखा है, सामने पहली बार देख रहे हैं। इस पर बात हुई कि कैसे हम दिशा सूचक से भी दिशाओं को जान सकते हैं। इसके बाद बच्चों से कुछ सवाल किए गए; जैसे- हमारा स्कूल किस दिशा में है? सबने अपने-अपने हिसाब से उत्तर दिया। इसके बाद यह बातचीत हुई कि यह जो सवाल मेरे द्वारा किया गया था वह अधूरा है क्योंकि दिशा जानने के लिए एक केन्‍द्र बिन्‍दु की आवश्यकता पड़ती है। जब तक हम इस सवाल में कोई केन्‍द्र बिन्‍दु नहीं मानकर दिशा जानने की कोशिश करेंगे तो हम कभी भी नहीं जान पाएँगे। जैसे- अगर हम यह सवाल करते हैं कि पुरोला ब्लॉक नौगाँव ब्लॉक से किस देश में हैं तो यह सवाल पूरा होगा। इसको और विस्तृत रूप से वहाँ के शिक्षक कमलिया लाल ने बोर्ड पर बच्चों को कुछ केन्‍द्र बिन्‍दु दर्शा कर बताया तथा प्लस में खड़ा करके केन्‍द्र बिन्‍दु के महत्व को करके समझा गया। अब बच्चे दिशाओं के ज्ञान को जान गए थे इसके बाद बात कि गई की चलो आज हम इस कक्षा-कक्ष का नक्शा बनाते हैं और यह जानने की कोशिश करते है कि इस कक्षा कक्ष को हम एक छोटे चार्ट पर कैसे बना पाते हैं।

संकेत चिन्ह

इसके लिए बच्चों से कहा गया कि इस कक्षा-कक्ष में उन सब चीजों की सूची बनाओ जो अपनी जगह से हटाई न जा सकें तथा इसके बाद उनको उत्तराखण्‍ड का मानचित्र दिखाया गया। और बताया गया कि हर मानचित्र में चीजों को चिन्ह से दर्शाया जाता है। तुम भी कक्षा-कक्ष की चीजों को एक चिन्ह का रूप दो।

पैमाना

इसके लिए बच्चों को ग्रुप में एक-एक स्केल दिया गया और कहा गया कि आप इस स्केल से इस कक्षा को नापो। कैसे और कहाँ नापना है, इसको ब्लैकबोर्ड पर करके बताया गया ताकि बच्चों को कोई मुश्किल न आए। कक्षा नापने के बाद ग्रुप में बच्चों को एक-एक माचिस की तीली दी गई और कहा गया कि आप एक माचिस कि तीली को एक स्केल के बराबर मानो और चार्ट पर नक्शा बनाओ। यानी नक्शे में एक तीली की दूरी वास्तव में एक स्केल के बराबर होगी, कुछ ग्रुप के बच्चों ने एक माचिस की तीली को दो स्केल के बराबर माना और नक्शा बनाना शुरू किया। गतिविधि के दौरान उनसे कुछ सवाल किए गए, जैसे- 8 स्केल कितनी तीली के बराबर होंगे। सबने ठीक उत्तर दिया।

इसके बाद मैं हैरान रह गया, जिन बच्चों को पैमाना समझाने में मुझे मुश्किल आ रही थी वह पैमाना समझ गए। मैंने तो सोचा था दरवाजे और खिड़की का पैमाना रहने दूँ पर उन्होंने बिना बोले ही ठीक से पैमाने का उपयोग करके नक्शा तैयार कर लिया तथा उसमें संकेत चिन्ह भी दर्शा दिए। इसके बाद मैंने उनसे पूछा, ‘‘एक स्केल कितने से.मी. था? सबने उत्तर दिया 30 से.मी.। तो अब एक तीली को मापो, वह कितने से.मी. है? सबने बोला 4 से.मी.। तो हमने पैमाना क्या लिया? सबने कहा, 30 से.मी. को हमने 4 से.मी. माना। और जिन्होंने दो स्केल को एक तीली के बराबर माना था उन्होंने भी ठीक से बता दिया कि हमने 60 से.मी. को 4 से.मी. के बराबर माना है। इसके बाद मानचित्र में दिशा, पैमाना और संकेत चिन्ह को उन्होंने दर्शाया, और मानचित्र तैयार कर लिया। इसके बाद उन्होंने रंग का भी इस्तेमाल किया और अच्छे मानचित्र तैयार किए तथा उत्तराखण्‍ड के नक्शे में कई जगहों की दूरी को स्केल से मापा और वहाँ की हवाई दूरी को पैमाना निकालकर जान पाए। इसके बाद मैंने उनसे फिर से सवाल किया कि मानचित्र किसे कहते हैं? अब सबका उत्तर सटीक था। 

दिन-रात का होना, मौसम परिवर्तन

शुरुआत कुछ प्रश्नों से हुई जिसका मकसद बच्चों के पूर्व ज्ञान को जानना-समझना था। जिसमें दिशाएँ क्या होती हैं, कितनी होती हैं, हमें कैसे दिशाओं का ज्ञान होता है, परिभ्रमण और परिक्रमण क्या होता है इत्यादि। इसकी एक प्रश्नावली बच्चों को दी गई। 

परिक्रमण और परिभ्रमण में अन्‍तर   

इसके लिए दो बच्चों को बुलाया गया। एक को हमने पृथ्वी माना और अपनी जगह पर घूमने के लिए कहा और दूसरे बच्चे को वैसे ही अपने अक्ष पर घूमने के साथ-साथ दूसरे बच्चे के इर्द-गिर्द घूमने के लिए कहा। इस प्रकार मन्दिर की परिक्रमा के उदाहरण को लेते हुए बच्चों को परिभ्रमण और परिक्रमण का मतलब तथा उनमे अन्‍तर बताया गया।

दिन-रात के होने पर गतिविधि

इसके लिए शुरुआत में बच्चों से कुछ प्रश्न किए गए, जैसे- 

  • हमें कैसे पता कि अभी दिन है ?
  • हमें कैसे पता कि कब रात होगी ?
  • दिन-रात कैसे होता होगा ?

इसके बाद बच्चों को ग्लोब और टॉर्च दिए गए। स्‍पष्‍ट किया गया कि मान लो यह टॉर्च एक सूर्य है और ग्लोब पृथ्वी। बच्चों ने यह गतिविधि करके देखी और समझ पाए कि किस तरह दिन-रात होता है। इसे तुनालका के टीचर कमलिया लाल ने भी करके देखा। उनका कहना था कि वह इतने सालों से भूगोल पढ़ा रहे हैं पर इस तरह के अभ्यास उन्होंने कभी नहीं करवाए। वह भी अब इस गतिविधि को बच्चों के साथ जारी रखना चाहेंगे।

ऋतु परिवर्तन

ऋतु परिवर्तन की शुरुआत भी कुछ प्रश्नों से की गई।

इसके बाद बच्चों की सहायता से एक रस्सी लेकर एक दीर्घवृत्त बनवाया गया। जिसमें हमने दो बिन्दुओं को स्थिर रखा एवं धागे के बीच से उन दोनों बिन्दुओं के सापेक्ष घुमाया। इस प्रकार एक दीर्घवृत्त आकार एक आकृति बनाई गई। अब पृथ्वी की कक्षा प्राप्त हो गई थी। दोनों बिन्दुओं में से एक पर सूर्य(लैंप) रखा गया। इसके बाद ग्लोब को पृथ्वी की कक्षा पर अलग- अलग स्थिति में रखा गया जिससें वह स्पष्ट रूप से देख पाए कि कैसे सूर्य की किरण कभी कर्क रेखा पर कभी मकर रेखा पर सीधी गिरती है तथा पृथ्वी की सूर्य से दूरी हर दिन अलग-अलग होती है। इससे बच्चे बड़ा दिन, छोटा दिन एवं दिन-रात बराबर, सर्दी-गर्मी कैसे होती है से सम्‍बन्धित अवधारणाओं को जान पाए।  

अतः कक्षा-शिक्षण में बच्चों के साथ किए गए कुछ सफल प्रयासों को इस रिपोर्ट के माध्यम से साझा करने का प्रयास किया गया है। बहरहाल एक बात तो तय है कि शिक्षण प्रक्रिया बेहतर तभी होगी जब हम बच्चों को साथ कक्षा-कक्ष और पाठ्यपुस्तकों से इतर जाकर कुछ रचनात्मक करते हैं व करवाते हैं। तमाम शिक्षाविद् और अकादमिक दस्तावेज भी तो इसी पर जोर देते हैं।


प्रमोद बक्शी, अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, उत्‍तरकाशी,उत्‍तरखण्‍ड

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