भारतीय भाषाएँ व संविधान : भाग एक

रमाकान्त अग्निहोत्री

संविधान सभा की बहसों में भाषा एक अहम मुद्दा रहा। कई सवालों पर चर्चा चल रही थी। क्या देश की अपनी एक राष्ट्रभाषा होनी चाहिए या केवल एक राजभाषा रखना उचित होगा? हिन्दी, उर्दू और हिन्दुस्तानी में से किसको चुना जाएगा? कौन-सी लिपि होगी? अंकों की लिपि क्या होगी? संस्कृत का क्या स्थान होगा? क्षेत्रीय भाषाओं का क्या योगदान होगा? संसद, शासन व न्यायालयों की भाषा क्या होगी? शिक्षा किस भाषा में होगी? भाषा को लेकर एक सामान्य नागरिक के क्या अधिकार होंगे? संविधान सभा के सदस्य ऐसे अनेक सवालों से जूझ रहे थे।

इन्हीं सवालों को मद्दे नज़र रखते हुए शैक्षणिक पत्रिका संदर्भ के अंकों में क्रमश: चार लेख प्रकाशित हुए हैं। यह पहला लेख है।

 

भारतीय  भाषाएँ व  संविधान  के बारे में यह पहला लेख है। इसमें हम केवल अनुच्छेद 343 व 344 के बारे में बातचीत करेंगे। एक मुख्य बात जो साफ करना आवश्यक है, वह यह कि हिन्दी भारत की राजभाषा है, राष्ट्रभाषा नहीं। यदि संविधान सभा की बहसों में इस बात पर सहमति नहीं बनती तो शायद भारत का आज वह स्वरूप न होता जो है। सम्भव है, कई टुकड़े हो गए होते।

भारतीय संविधान सभा की पहली बैठक 1 दिसम्बर, 1946 को हुई थी। लगभग 3 साल तक इस सभा में बहसें चलती रहीं। इसकी अन्तिम सभा 14 जनवरी, 1950 को हुई। इस अरसे में देश के अलग-अलग हिस्सों से आए 300 से भी अधिक लोगों ने भाग लिया। उस समय के लोगों की निष्ठा, विवेक व संवेदनशीलता को देखकर विश्वास नहीं आता कि आज हमारी संसद का यह हाल हो गया है। उन दिनों की 11 मीटिंगों में इतने जटिल व विषम मामलों पर बहसें हुईं पर किसी ने भी कभी असभ्य तरीके से बात नहीं की। मेरा मानना है कि संविधान सभा की बहसों के कुछ हिस्से हमारी शिक्षा में पढ़ाई-लिखाई के आवश्यक अंग होने चाहिए।

यह सही है कि उस समय भाषा की प्रकृति, संरचना व विविधता को लेकर संसार भर में हो रहे शोध की कोई विशेष झलक संविधान सभा की बहसों में नहीं मिलती, लेकिन इसमें भी कोई शक नहीं कि भाषा संविधान सभा के लिए एक मुख्य मुद्दा था और उस पर संविधान सभा में खुलकर गहरी संवेदनशीलता से खूब बहस हुई। इस बहस में भाग लेने वाले अलग-अलग प्रान्तों से आए हुए विद्वान व राजनैतिक नेता थे। इनमें राजेंद्र प्रसाद, नेहरू, पटेल, आज़ाद के साथ- साथ हिन्दी के लिए अपनी बात रखने के लिए पुरुषोत्तम दास टंडन, सेठ गोविन्द दास, संपूर्णानंद व रवि शंकर शुक्ल एवं के.एम. मुंशी भी थे। बिहार से जसपाल सिंह, यूनाइटेड प्रोविन्सिज़ से मोहम्मद हिफजुर रहमान व अलगू राय शास्त्री थे। साथ ही आर.वी. धुलेकर,  एस.वी.  कृष्णमूर्ति  राव, लक्ष्मीकांता मैत्रा व दुर्गाबाई थे। हमारे संविधान के कुल 22 भाग हैं और 12 अनुसूचियाँ। इनमें से एक पूरा भाग (17) और एक अनुसूची (8) केवल भाषा के लिए है। भाग 17 में चार अध्याय हैं जिनमें अनुच्छेद 343 से 351 तक शामिल हैं। अनुसूची 8 में पहले 14 भाषाएँ थीं। आज 22 हैं। यह ध्यान देने योग्य बात है कि भाग 17 का शीर्षक ‘राजभाषा’ है। उसके पहले अध्याय का शीर्षक जिस पर हम इस लेख में चर्चा कर रहे हैं, ‘संघ की भाषा’ है।

हमारा मान्य संविधान केवल अँग्रेज़ी में ही उपलब्ध है। यह दुर्भाग्य की बात है कि आज भी हमारा संविधान हिन्दी में या किसी भी अन्य भारतीय भाषा में उपलब्ध नहीं। संविधान सभा के अध्यक्ष व भारत के प्रथम राष्ट्रपति ने वायदा किया था कि संविधान बनने के एक साल के अन्दर एक सर्वमान्य संविधान हिन्दी में भी उपलब्ध होगा। और जल्द ही भारत की अन्य भाषाओं में प्रयास भी हुआ लेकिन भाषा की राजनीति के चलते यह सम्भव नहीं हुआ।

संविधान सभा के सामने सवाल

भाषा के बिना कुछ भी सम्भव नहीं। न राजनीति की बातचीत, न संसद, न  शिक्षा,  न  शासन  और  न न्यायपालिका। इसलिए स्वाभाविक है कि भाषा को लेकर संविधान सभा में कई सवाल थे, खासकर ऐसे देश में जहाँ अभी तक सब महत्वपूर्ण काम अँग्रेज़ी में होता था। आज़ाद भारत के लिए आवश्यक था कि वह अपनी भाषा में बात करे लेकिन कई महत्वपूर्ण भाषाओं के चलते यह आसान काम नहीं था और यह एक बड़ा सवाल था कि देश की राष्ट्रभाषा या राजभाषा कौन-सी हो। राष्ट्रभाषा हो भी या नहीं, अंक किस भाषा में लिखे जाएँ, शिक्षा की भाषा क्या हो, दफ्तरों में किस भाषा का प्रयोग हो, अँग्रेज़ी का क्या स्थान हो, आज़ाद भारत में क्षेत्रीय भाषाओं की क्या जगह होगी, संसद व न्यायपालिका की क्या भाषा होगी, अल्पसंख्यक समुदायों की भाषाओं का क्या होगा, आदिवासी भाषाओं के बारे में संविधान में क्या प्रावधान होंगे?

राष्ट्रभाषा या राजभाषा?

इस बात को लेकर बहुत लम्बी बहस हुई संविधान सभा में कि नए हिन्दुस्तान की भाषा क्या होगी और इसे बार-बार टाला भी जाता रहा। एक गुट के लिए तो यह बिलकुल साफ था कि अब अँग्रेज़ी, फारसी, उर्दू आदि का इस देश में कोई काम नहीं। काफी अधिक लोग हिन्दी समझते हैं और यही नए भारत की राष्ट्रभाषा होनी चाहिए। नया देश नई पहचान, पाकिस्तान की पहचान उर्दू, हिन्दुस्तान की हिन्दी। टंडन, गोविन्द दास व के.एम. मुंशी इस बात को लेकर बार-बार बहस करते और शेष भारतवासियों से विशेषकर दक्षिण भारत के लोगों से अनुरोध करते कि इतना त्याग तो उन्हें हिन्दी को लेकर करना ही पड़ेगा। अन्य कई भाषाओं ने भी राष्ट्रभाषा होने के दावे किए। संस्कृत उनमें से प्रमुख थी। इन लोगों का कहना था कि संस्कृत तो सब भाषाओं की जननी है और हमारी प्राचीन संस्कृति की प्रतीक भी। फिर हिन्दी क्यों, बाँग्ला, तेलुगु ने भी राष्ट्रभाषा होने के लिए तर्क दिए। तेलुगु के लिए कहा गया कि इसमें इस वक्त सबसे अधिक विज्ञान उपयुक्त शब्दावली है जो कि हिन्दी में या किसी भी अन्य भारतीय भाषा में नहीं है। अँग्रेज़ी को ही देश की भाषा रहने दिया जाए, यह भी एक मत था। इसमें सारा काम चल रहा है और शिक्षा व ज्ञान के लिए भी यह कारगर होगी, लेकिन सबसे अधिक बहस दो मुद्दों को लेकर हुई। एक तो यह कि देश की भाषा हिन्दी हो या फिर गांधीजी वाली हिन्दुस्तानी। देश के प्रमुख नेता नेहरू, पटेल, राजेन्द्र प्रसाद व मौलाना आज़ाद हिन्दुस्तानी के पक्ष में थे। यह आम लोगों की भाषा है। इसे ही देश की भाषा होना चाहिए लेकिन हिन्दी वाले संस्कृत-निष्ठ भाषा के पक्ष में थे। इस हिन्दी में से सभी अँग्रेज़ी-फारसी व उर्दू के शब्दों को निकालना होगा। देश की नई पहचान, नई हिन्दी होगी। संस्कृत पर आधारित और वह फारसी लिपि में नहीं बल्कि देवनागरी लिपि में ही लिखी जाएगी। आज़ादी से पहले भारत की कई भाषाएँ फारसी लिपि में लिखी जाती थीं। कोर्ट-कचहरी का काम भी उर्दू में ही होता अधिकतर। लेकिन लोगों का कहना था कि एक नया देश है, उसकी नई सीमाएँ, नया झण्डा, नया  राष्ट्रीय  गान,  अत:  एक  नई संस्कृत-निष्ठ हिन्दी। लोगों का बस चलता तो एक धर्म की भी बात करते। लेकिन भारत का इतिहास अलग रहा है -- बहुभाषी-बहुधार्मिक व बहुसांस्कृतिक।

इस बात को संविधान सभा ने कैसे सुलझाया होगा, यह सचमुच काबिले तारीफ है। यह तो साफ था कि बहुमत को ठुकराना मुश्किल है। दक्षिण को हिन्दी या हिन्दुस्तानी के नाम में राष्ट्रभाषा कबूल नहीं। उत्तर भारत को हिन्दी के सिवा कुछ और कबूल नहीं। संविधान सभा ने कैसे सुलझाया इन मसलों को? संविधान के भाग 17 का शीर्षक ‘राजकीय भाषा’ है। पहला कदम तो यह था कि यह निर्णय लिया गया कि देश की कोई भी राष्ट्रभाषा नहीं होगी। भारत की कोई भी राष्ट्रभाषा नहीं है।

यानी हिन्दी काम-काज की भाषा होगी, बस। भाग 17 के पहले अध्याय का नाम ‘संघ की भाषा’ है। भाग 17 के प्रथम अध्याय के अनुच्छेद 343 में यही लिखा है। अनुच्छेद 343 (1-3) में ये बातें लिखीं हैं: देवनागरी लिपि में लिखी गई हिन्दी देश की राजभाषा है (राष्ट्रभाषा नहीं है)। शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले भारतीय अंकों का रूप अन्तर्राष्ट्रीय अंकों का होगा। यह भी कहा गया कि  अगले 15 वर्षों तक अँग्रेज़ी भी राजकीय भाषा का काम करेगी लेकिन 15 साल से पहले ही दक्षिण में इतनी उथल-पुथल हुई कि आज तक अँग्रेज़ी हमारे साथ है, एक मुख्य सह-राजकीय भाषा के रूप में और उसके वर्चस्व की तो बात ही क्या कहें।

दक्षिण में आज़ादी के बाद लोग इस तरह के नारों से घबरा गए: ‘आर्य समाज’, ‘आर्य संस्कृति’, ‘आर्य भाषा’ और ‘आर्य लिपि’ आदि। 1965 से पहले ही जब अँग्रेज़ी को हटाना तय था, दक्षिण में कई लोग पकड़े गए एवं 70 से भी अधिक लोग मारे गए।
अनुच्छेद 343 (3) के अनुसार यह भी प्रावधान रखा गया कि संसद उक्त पन्द्रह वर्ष की अवधि के पश्चात् विधि द्वारा (क) अँग्रेज़ी भाषा को या (ख) अंकों के देवनागरी रूप के प्रयोग को भी मान्य मान सकती है। भाग 17 के प्रथम अध्याय में दो ही अनुच्छेद हैं, 343 व 344। ऊपर हमने 343 के बारे में चर्चा की।

अनुच्छेद 344 में मुख्यत: यह बात है कि किस प्रकार हिन्दी का अधिक-से-अधिक प्रयोग हो व अँग्रेज़ी का प्रयोग कम किया जा सके। राष्ट्रपति एक आयोग गठित करेंगे जो एक अध्यक्ष और आठवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट (specified)  विभिन्न  भाषाओं  का प्रतिनिधित्व करने वाले अन्य सदस्यों से मिलकर बनेगा। आयोग का यह कर्तव्य होगा कि वह राष्ट्रपति को  संघ के शासकीय प्रयोजनों के लिए हिन्दी भाषा के अधिकाधिक प्रयोग, संघ के सभी या किन्हीं शासकीय प्रयोजनों के लिए अँग्रेज़ी भाषा के प्रयोग पर रोक, संघ की राजभाषा तथा संघ और किसी राज्य के बीच या एक राज्य और दूसरे राज्य के बीच पत्रादि की भाषा के बारे में सिफारिश करे।

हिन्दी को लेकर आज भी बहस जारी है। कई विद्वान मानते हैं कि हिन्दी में से अँग्रेज़ी, फारसी, अरबी व उर्दू के शब्दों को निकाल देना चाहिए। आज भी हिन्दी एक गम्भीर संवाद की भाषा नहीं बन पाई है। जो भाषाएँ पनपती हैं और ज्ञान के प्रसार का साधन बनती हैं, वे ज़मीन से अपना नाता नहीं तोड़तीं और न ही अन्य भाषाओं के लिए अपने दरवाज़े बन्द करती हैं। हिन्दी के लिए भी यह आवश्यक है कि वह स्वयं को भारत एवं विश्व की अन्य भाषाओं से दूर न रखे।

संविधान सभा की बहसों में नेहरू ने बार-बार इस बात पर ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि हमें लोगों से जुड़े रहना चाहिए तभी भाषा पनपेगी। सभी दरवाज़े खुले होने चाहिए, तभी भाषा का विकास होगा। (जारी)


रमाकान्त अग्निहोत्री : दिल्ली विश्वविद्यालय से सेवा निवृत्त। व्यावहारिक भाषा-विज्ञान, शब्द संरचना, सामाजिक भाषा-विज्ञान और शोध प्रणाली पर विस्तृत रूप से पढ़ाया और लिखा है। ‘नेशनल फोकस ग्रुप ऑन द टीचिंग ऑफ इंडियन लेंग्वेजिज़’ के अध्यक्ष रहे हैं। आजकल विद्या भवन सोसायटी, उदयपुर में एमेरिटस प्रोफेसर हैं।

इन सभी लेखों का आधार संविधान के अध्याय 17 के अनुच्छेद हैं। इनका संसद से पारित कोई हिन्दी मानकीकृत रूप उपलब्ध नहीं है। इसलिए सरल हिन्दी में संविधान के इन अनुच्छेदों के बारे में बातचीत की गई है। जहाँ कहीं सम्भव हुआ, इंटरनेट से मदद ली गई है।

(शैक्षणिक संदर्भ अंक 122 से साभार)

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