प्राथमिक कक्षा में कहानी के पीरियड का एक अनुभव

कहानी : “गाँव का लड़का” l

लेखक जेन कोवेन–फ्लैचर (हमारे देश की तरह अफ्रीका के गाँवों में भी लोग मिल-जुलकर रहते हैं। पूरा गाँव एक परिवार की तरह होता हैं। यह उसी भाई चारे की कहानी है)।

इस कहानी को चुनने का उद्देश्य विद्यार्थियों के साथ मिलकर उनके परिवेश के विषय में जानना।

कहानी मिलकर पढ़ना एवं सुनना

बच्चों के साथ मिलकर किताब पढ़ते समय यह कोशिश की जाती है कि बच्चे इर्द-गिर्द ही बैठे हों जिससे सभी बच्चों को किताब आसानी से नजर आए। हर कहानी की किताब अपने साथ कुछ नए मौके लेकर आती है। कहानी सुनाने का तरीका ऐसा होना चाहिए जिसमें बच्चों को चित्रों से, लिखित भाषा से, कहानी में सन्दर्भों से अनुमान लगाने का मौक़ा लगातार मिलता रहे। यह बातचीत बच्चों को चित्रों में चीजें ढूँढने, वर्णन करने, अपने निजी अनुभव को घटना से जोड़ने या कल्पना करने में उपयोगी सिद्ध होती है। इस तरह हम बच्चों को वह सन्दर्भ दे रहे हैं जहाँ वे तर्क और आत्मविश्वास से अनुमान लगा सकें और अपनी प्रतिक्रिया दे सकें। चित्रों में दिखाई गई घटनाओं की बारीकियों को समझते हुए बच्चे अनुमान से कहानी को आगे बढ़ाएँगे। यदि कहानी के बीच में बच्चे अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करना चाहें तो उन्हें उसके अवसर दिए जा सकते हैं। सम्भव है कभी बच्चे बातचीत करते समय कहानी से दूर हो जाएँ। ऐसे में पुन: कहानी पर लौटने का प्रयास किया जा सकता है।

कक्षा में सबसे पहले विद्यार्थियों को कहानी कहने के पूर्व कुछ गाँव के विषय में चर्चा की। उसके बाद कहानी को कहने के बाद उनके अपने गाँव में खो जाने के अनुभवों के बारे में बताने का अवसर दिया । परन्तु इस बात का ध्यान रख गया कि एक अपनी बात समाप्त करने के बाद दूसरे की बात को सुनेंगे सभी को सभी के अनुभवों सुनना है।

विचार विमर्श 

सभी विद्यार्थियों को अपने गाँव में खो जाने के अनुभवों को अपने साथी को बताना था उसके बाद फिर एक–एक करके सभी की बातें सुनना था। जिसमें विद्यार्थियों ने तरह-तरह की बातें कक्षा के सामने रखीं। जैसे कि दुर्गा के मेले में मेरा भाई खो गया था फिर बाद में लाउडस्पीकर में बोलकर उसको ढूँढा फिर मिल गया। अगले ने बताया कि मैं अपने घर का रास्ता भूल गया था फिर मैं वापस स्कूल आया फिर गया। दूसरे विद्यार्थी ने बताया कि छोटे होने पर उसकी मम्मी ने बताया कि मैं खेलते घर से दूर चला गया था तब चाचा ने रोड पर देखा तो वापस लाए। छात्रा ने कहा कि उसका भाई मिल गया ठीक हैं हमारे यहाँ एक बाबा आता है बच्चों को पकड़ कर ले जाता है। उसकी बात कहानी से अलग थी परन्तु महत्वपूर्ण थी। बच्चे पकड़ कर ले जाने की बात आते ही सभी विद्यार्थियों के हाथ ऊपर हो गए, सभी के पास कुछ न कुछ बताने को था चाहे वह सच हो या सुना-सुनाया किस्सा। अब सभी को उनकी बातों को लिख कर लाने का कार्य दिया।

कहानी में गाँव के मेले में एक बच्चा अपनी बहन से बिछड जाता है परन्तु उसका ख्याल मेले में आए लोग एवं दुकानदार रखते हैं। परिवार का अर्थ हमारे परिवेश गाँव एवं समुदाय से होता है जो हमारे दुःख-सुख में हमारी मदद करता है।

कहानी से जुड़े चित्र बनाना

बच्चे द्वारा चित्र बनाना शुरूआती दौर के लिखने के अनुभवों की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। विद्यालय में बच्चों को इसके पर्याप्त अवसर नहीं मिल पाते हैं जबकि चित्रकारी बच्चों के समग्र विकास में, और विशेषकर भाषा के प्रयोग और लेखन में, मदद करती है। चित्रों के माध्यम से बच्चों की कल्पना और सृजनात्मक अभिव्‍यक्ति को प्रोत्साहित किया जा सकता है। बच्चों के चित्र में विविधता इस बात का संकेतक है कि प्रत्येक बच्चे के अन्दर कल्पना और सृजनशीलता मौजूद है। इसकी पूरी सम्भावना है कि बच्चों द्वारा चित्र के माध्यम से की गई अभिव्यक्ति में विविधता हो।

आकलन

अपने अनुभवों को सुनाते समय कुछ विद्यार्थियों के चेहरे उनके शब्दों की तरह गम्भीर एवं डरावने नज़र आने लगे। गाँव में खो जाने का किस्सा सभी विद्यार्थियों के पास था। कभी न कभी थोड़ी देर के लिए या फिर अपने पापा–मम्मी का हाथ छोड़ कर अलग हुए थे उस पर कुछ बच्चों को उनकी डाँट याद आई। पर सभी बच्चे अपने विचारों को कह रहे थे। लेखन में शायद बातें इतनी साफ़ रूप में न हों परन्तु हर तरह के कठिन शब्दों को बोल रहे थे।

कहानियों का असर

धीरे-धीरे कहानियों की किताबों में लिखी बातें विद्यार्थियों की रोजमर्रा की भाषा का हिस्सा बनती दिखने लगीं। जैसे एक छात्रा कहती है कि, “मम्मी मुझे अकेले बाहर जाने से अब मना करती हैं परन्तु मैं चली जाती हूँ मैं डरती नहीं हूँ ना। ”

कभी-कभी कहानी में दी गई घटना जैसा ही कुछ कहने एवं नई कहानी लिखने का प्रयास विद्यार्थी  करते हैं।

इस प्रक्रिया के दौरान एक समझ यह भी बनी के छोटे बच्चों के साथ किसी भी विषय पर बार-बार उनके साथ मिलकर बहुत ही सहज तरीके से और उनके दैनिक जीवन से जोड़ रहे होते हैं तो बच्चे अत्यधिक सक्रिय रूप से उन गतिविधियों में प्रतिभाग करने लगते हैं तथा बातचीत का दायरा बढ़ रहा होता है साथ ही उनकी सुनने और समझने की क्षमता का विकास भी होता हैI इस का अनुभव भिन्न- भिन्न कक्षाओं में छोटे बच्चों के साथ कक्षा कक्ष में भाषा शिक्षण के अन्तर्गत देखने को मिला हालाँकि बच्चों के साथ इन मुद्दों पर बातचीत होती रही है पर नए और छोटे बच्चों के साथ काम करने का यह अनुभव थोड़ा अलग है। 


जि़या शकूर अंसारी, अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, उत्‍तराखण्‍ड

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