नामकरण एक पेड़ का

बात पुरानी है उन दिनों मैं बैतूल जिले के पावरझंडा गाँव में था। शहर से बहुत दूर जंगल से घिरा यह छोटा-सा गाँव है। गाँव में नदी के किनारे मेरा स्‍कूल था। स्‍कूल  से थोड़ी दूर एक बड़ा पहाड़ है। पहाड़ का नाम भँवरगढ़ है।

गाँव के लोग अपने से जु़ड़ी हर चीज के अनोखे नाम रखते हैं। नदी का नाम झिरना था। जंगल का नाम गुन्दी और डगलाबड़ था पर स्‍कूल का नाम स्कूल था। मेरे स्‍कूल की खिड़की से भँवरगढ़ ऐसे दिखाई देता जैसे दीवार पर कोई पहाड़ की तस्‍वीर लगी हो। बरसात के मौसम से इस पहाड़ के बीचोंबीच एक सफेद लाइन दिखाई देने लगती। यह हमारे स्‍कूल के बाजू वाली झिरना नदी ही होती। बच्चों को मालूम था कि झिरना का घर भँवरगढ़ में है, पर मुझे तब मालूम चला जब मैंने पहली बार बारिश के बाद इस सफेद लाइन को भँवरगढ़ पर देखा।

मेरे स्‍कूल में आने वाले बच्चे स्‍कूल आने की उम्र के पहले तक बीसियों बार इस पहाड़ पर चढ़ चुके होते। गुन्दी और डगलाबड़ के रास्तों से उनकी जान-पहचान पक्की हो जाती और झिरना तो उनके साथ-साथ ही बड़ी होती। इन यायावर बच्चों को जब मैं एक कमरे में बिठाकर कुछ अटपटी और अजनबी सी ज्ञान की बातें बताता तो उनका घ्यान जल्दी ही गुन्दी, डगलाबड़ भँवरगढ़, झिरना में भटकने लगता। धीरे-धीरे इन बच्चों की देखा-देखी मैं भी समझदार होने लगा।

अब हम स्‍कूल में से कभी भँवरगढ़ के पेड़ों को गिनते उनका नया नाम रखते तो कभी झिरना के कैकड़ों की बात करते। कहानियाँ कभी पहाड़ से उतरतीं तो कोई खेल कभी जंगल से निकल आता। कल्पनाएँ तो नदी की धार में दूर तक बह जातीं। आपको यकीन नहीं हो रहा न। तो चलो एक कहानी जो झिरना नदी में बह रही थी उसे मेरे स्‍कूल के बच्चे बाहर निकालकर अपने स्‍कूल में ले आए उसे सुन लें।

हुआ यूँ कि एक बार जब झिरना में बाढ़ आई हुई थी तो हम सब पूर को देखने में लगे हुए थे। पावरझंडा में बाढ़ को पूर कहते है। उस पूर में हमने देखा कि एक झींद/ताड़/ का पेड़ बहकर जा रहा था। पेड़ अच्छा लम्बा था। हमारे स्‍कूल के पास नदी के किनारे आम के दो पेड़ लगे हैं। इनमें आकर ये छींद का पेड़ फँस गया। हम सब अब इस छींद के पेड़ के पास इकट्ठे थे। पेड़ में एक सिरे पर खूब सारी झबरीली  जड़ें थीं। दूसरे सिरे पर कोई डाली या पत्तियाँ नहीं थीं। पूरे गोल तने पर खाचें बने हुए थे जो डाँलियों के झड़ने की वजह से थे। समूचा पेड़ बहुत ही आकर्षक था। शाम को मैं तो घर चला गया पर कुछ बच्चे पेड़ से दोस्ती करते रहे।

अगले दिन जब मैं स्‍कूल पहुँचा तो देखा कि बच्चे छींद के पेड़ को घेरे हुए खड़े थे। वे छींद के पेड़ को अपने स्‍कूल में लाना चाहते थे तो हमने मिलकर छींद के पेड़ को लुड़काया सरकाया, घसीटा, खींचा। तमाम जुगत लगाकर जैसे-तैसे हम इसे अपने स्कूल के किनारे तक ले आए। छींद का पेड़ अब हमारे स्‍कूल की सम्पति बन गया। जैसा कि आपको पता है गाँव के लोग अपने से जु़ड़ी हर चीज के अनोखे नाम रखते हैं बच्चे इसे भी अलग-अलग नाम से पुकारते। कोई इसे छीन्दू कहता कोई झबरु,कारु ,घसीटा, अटकाभटका, कँटीला आदि कई सारे नाम थे इसके, पर एक दिन एक लड़की ने इसे नया नाम फंगसु दिया। उसकी फ्राक इसके खाचेनुमा फंगसों में फँसकर फट गई थी। तब से फंगसु को सब फंगसु ही कहने लगे। आड़ा-लेटा फंगसु स्‍कूल की पहचान बन गया। कुछ दिनों बाद किसी बच्चे को सूझा कि फंगसु को खड़ा करना चाहिए। उसका यह विचार जाने कैसे सारे बच्चों के पास पहले से मौजूद था?  मुझे सूचना लगी तो मैंने वह जगह सुझाई जहाँ फंगसु को खड़ा किया जाना चाहिए।

अगले दिन से गड्ढा-खुदना चालू हुआ। तीन-चार दिन में तीस-चालीस बच्चों ने तीन- चार फीट का गड्ढा खोद लिया। अब फंगसु को गड्ढे में खड़ा करना था। स्‍कूल के बच्चों से दोस्ती के कारण फंगसु उनसे हिल-डुल तो सकता था पर उसे खड़ा करना कोई बच्चों का खेल तो था नहीं। तब बच्चों ने अपने-अपने घरों से बड़ों को बुलाया। अगले दिन बच्चों के साथ बड़े भी स्‍कूल में पहुँचे। बड़ों को मालूम था कि अगर बच्चों के साथ गुरुजी भी फंगसु को खड़ा करना चाहते हैं तो जरूर ये पढ़ाई से जुड़ा ही कोई मकसद होगा। इस गाँव के बड़ों के पास कई सारे हुनर थे उन्होंने पहले उस गड्ढे को थोड़ा चौड़ा और गहरा किया फिर फंगसु को लुड़काकर उसका निचला सिरा गड्ढे के मुँह के पास लाए। फंगसु के ऊपरी सिरे पर एक मोटी रस्सी बाँधी। एक रस्सी फंगसु के बीचोंबीच बाँधी गई। अब दोनों रस्सियों को पास के आम के पेड़ की मोटी डाली के ऊपर से नीचे फेंका गया। इन रस्सियों को बड़ों ने खींचना शुरू किया। कुछ बड़ों ने लकड़ी की मदद से इसके निचले हिस्से को सम्हाला। बच्चों के और मेरे हिस्से में कोई काम नहीं था तो हमने उत्साह में चिल्लाना शुरू किया

जोर लगा के हैया हैया। खड़ा हो गया फंगसु भैया।

जोर लगा के हैया हैया। खड़ा हो गया फंगसु भैया।

और इस तरह फंगसु भैया स्‍कूल के आँगन में मजबूती से खड़े हो गए। हम सबको पता था फंगसु खड़े ही इसलिए हुए हैं कि बच्चे इस पर चढ़ सकें पर सबसे पहले इस पर कौन चढ़ेगा? यह तय करना था। तय यह हुआ कि वह लड़की जिसकी फ्राक फंगसु ने फाड़ी थी वो। अगले पल ही फंगसु के फंगसों पर पैर जमाती हुई वो लड़की ऊपर चढ़ी जा रही थी।


मुकेश मालवीय, शिक्षक, शाहपुर, जिला बैतूल, मध्‍यप्रदेश

 

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pramodkumar का छायाचित्र

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