नई तालीम की कहानी : 6

मार्जोरी साइक्स

गाँधी जी 1942-44 के बीच जेल में थे। इस दौरान उन्होंने स्वास्थ्य और शिक्षा के सवाल पर गहन विचार-विमर्श किया। ग्रामोद्योग के लिए गाँधी जी इन दोनों को बहुत महत्‍वपूर्ण मानते थे। उनका मानना था कि इंसान और समाज, दोनों की उन्नति के लिए स्वास्थ्य और शिक्षा बहुत महत्‍वपूर्ण हैं। वे इन्हें जमीनी स्तर पर स्वराज की कुंजी के रूप में देखते थे। दोनों ही कार्यक्रमों पर एक साथ काम किया गया। इसलिए आश्चर्य की बात नहीं है कि इन दोनों में कई समानताएँ दिखाई देती हैं। गाँधी जी की राय में न तो केवल एक क्लीनिक खोलकर सामुदायिक स्वास्थ्य का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है और न ही महज एक स्कूल खोलने से ऐसी सामुदायिक शिक्षा सम्भव है जो स्वराज की भावना के पोषण-संरक्षण में सक्षम हो I

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मारवाड़ी एज्यूकेशन सोसायटी के सचिव श्रीमन्नारायण के सुझाव पर वर्धा में राष्ट्रीय शिक्षा सम्मेलन का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता के लिए गाँधी जी से निवेदन किया गया जिसे गाँधी जी ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। चूँकि सम्मेलन में सहभागियों की संख्या बहुत सीमित और स्तर ऊँचा था अतः सम्मेलन काफी उत्तेजक रहा और वहाँ सामने आए विचारों को सीधे अमली जामा पहनाने का रास्ता खुलने लगा। सम्मेलन में गाँधी जी ने उन्हीं प्रस्तावों को सामने रखा जिन्हें पिछले दिनों वे हरिजन में लिख चुके थे। गाँधी जी ने अपने भाषण में कई ऐसे बिन्दुओं को स्पर्श किया जो आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। सम्मेलन में कुछ प्रस्तावों को 1938 में भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस की सालाना बैठक में राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तौर पर स्वीकार कर लिया गया। डेढ़ साल बाद डा. जाकिर हुसैन के न्यौते पर दूसरा राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया जिसका महत्‍वपूर्ण पहलू शिक्षा में कलाओं के विषय पर समय दिए जाने पर था। इस सवाल पर गम्‍भीर चर्चाएँ भी हुईं। इस सम्मेलन ने आनेवाले वर्षों के लिए एक ठोस और सतत् विकास की मनोवैज्ञानिक तैयारी कर दी थी। हालाँकि राजनीतिक उथल-पुथल के कारण अन्य घटनाएँ इस पर भारी पड़ गई। अब आगे.....

 

गाँधी जी की दृष्टि में यह विस्तार उनकी नई शब्दावली में साफ दिखाई देता था। इसके बाद वे न सिर्फ पूरे देश के बच्चों के लिए बुनियादी राष्ट्रीय शिक्षा को न्यूनतम आवश्यकता बताते हैं बल्कि नई तालीम यानी नई शिक्षा की भी बात करते हैं। 2 अक्टूबर, 1944 को अपने 75वें जन्मदिवस पर दिए एक महत्वपूर्ण अभिभाषण में उन्होंने इसी मसले को केन्‍द्रीय विषय बनाया था। उन्होंने कहा कि शिक्षा को केवल स्कूलों तक सीमित करना ठीक नहीं है। यह आजीवन चलने वाली चीज है जो जन्म से लेकर मृत्यु तक रोजमर्रा जिन्‍दगी के हर पहलू से जुड़ी होनी चाहिए, जिससे प्रत्येक स्त्री-पुरुष को अपने गाँव और क्रमशः देश और विश्व का बेहतर नागरिक बनने का मौका मिले। शिक्षा का यह उद्देश्य होना चाहिए कि वह व्यक्ति के मानसिक क्षितिज का विस्तार करे। वह अपनत्व की भावना का संचार करे ताकि मनुष्य संकीर्ण मानसिकता और मान्यताओं से ऊपर उठकर अस्पृश्यता, साम्प्रदायिक, विद्वेष और सन्‍देह को त्याग सके।

गाँधी जी ने आगे कहा कि जब एक सच्चे मानव समुदाय का उदय होता है, तो वह सर्वहित को ध्यान में रखकर कई प्रकार के सहकारी प्रयासों को हाथ में ले सकता है। भूस्वामी और भूमिहीन, शिल्पकार और मजदूर, पुरुष और स्त्री, सभी को अपने अनुभवों से सीखना चाहिए कि मिल-जुलकर काम करने का वास्तविक अर्थ क्या होता है। यह काम 100 फीसदी स्वदेशी होना चाहिए, इसमें खेती और अन्य ग्रामोद्योग शामिल होने चाहिए ताकि वह हमें पूर्ण स्वराज की ओर ले जाएँ। संक्षेप में, उसमें अहिंसक अनुशासन और संगठन को रोजमर्रा जीवन में उतारने की हर सम्‍भावना होनी चाहिए।

दरअसल गाँधी जी अहिंसक लोकतंत्र के सर्वांगीण प्रशिक्षण का आह्वान कर रहे थे और अपनी पहले कही जा चुकी बात को और विकसित कर रहे थे। शोषण और अन्याय का असली समाधान अहिंसक लोकतंत्र ही है, जिसे सबके लिए सच्ची शिक्षा भी कहा जाता है। अक्टूबर 1944 के बाद के हितों में गाँधी जी नाना विधियों से नई तालीम की सोच को विकसित करते रहे। उन्होंने कहा था, शिक्षा का प्रारम्‍भ और अन्‍त, सब कुछ केवल सत्य की खोज है। जब उनसे पूछा गया कि इस खोज की शुरुआत कहाँ से होनी चाहिए तो उन्होंने तैत्रोरीय उपनिषद् में वर्णित एक दृष्टान्‍त की ओर इशारा किया, जिसमें बताया गया है कि कैसे एक साधक सत्य, यथार्थ और ईश्वर की खोज में निकलता है। उसे सबसे पहले भोजन में, फिर ज्ञान में और उसके बाद आनन्‍द में सत्य के दर्शन होते हैं। कहने का मतलब ये है कि सत्य की खोज समग्र मानवीय आवश्यकताओं यानी शरीर, मस्तिष्क और आत्मा की आवश्यकताओं की सन्‍तुष्टि में निहित है। गाँधी जी कई मौकों पर यह भी कहते थे कि नई तालीम की शुरुआत स्वच्छता से होती है और यहाँ स्वास्थ्य व शिक्षा के अन्‍तर्सम्‍बन्‍ध और स्पष्ट हो जाते हैं। स्वच्छता से उनका आशय न केवल शारीरिक स्वच्छता, बल्कि अपने भौतिक वातावरण की स्वच्छता के साथ-साथ शौचालय और पाखाने की स्वच्छता से भी है। आन्‍तरिक स्तर पर इस स्वच्छता का आशय हृदय की स्वच्छता से है, जो स्वच्छ वाणी, स्वच्छ विचार और स्वच्छ आकांक्षाओं में अभिव्यक्त होती है।

जनवरी, 1945 में हिन्‍दुस्तानी तालीमी संघ ने देश भर के शिक्षकों को गाँधी जी  के साथ इन क्रान्तिकारी शैक्षणिक विचारों के बारे में चर्चा के लिए इकट्ठा किया। इस सभा में मुझे भी बुलाया गया था। उस सभा में गाँधी जी के अभिभाषण के दौरान जैसी शान्ति थी, वह आज भी मेरी स्मृति में जीवित है। उन्होंने कहा था, अब तक आप सभी शान्‍त जल में थे। अब मैं आपको खुले समुद्र में कूदने के लिए कह रहा हूँ। इस समुद्र का विस्तार और गहराइयाँ असीम हैं। इसमें आपको केवल ग्रामीण हस्तकलाओं की रोशनी में ही अपना रास्ता ढूँढना है। उन्होंने हमें उत्पादक हस्तकलाओं को पूरी गम्‍भीरता से लेने का अनुरोध किया। एक ऐसे नियोजित और सहकारी काम में हाथ बँटाना, अपने आप में एक मुकम्मल शिक्षा है, जिसमें प्रत्येक सदस्य सभी के श्रम से लाभान्वित होता है। उन्होंने हमें बाजार में बेचने के लिए नहीं बल्कि खुद अपने उपयोग के लिए कताई-बुनाई का काम करने की चुनौती दी। उन्होंने आह्वान किया कि हम स्वस्थ भोजन के लिए जरूरी सारी चीजें अपने गाँव में पैदा करें, अपने आसपास मौजूद चीजों से हवादार मकान और सारे औजार बनाएँ। उन्होंने कहा कि हमें अपने मवेशियों की देखभाल करनी चाहिए, उनके चारे का इन्‍तजाम करना चाहिए, ईंधन व पीने के पानी समेत अपनी रोजमर्रा की जरूरतों की व्यवस्था खुद करनी चाहिए। क्योंकि इस किस्म की सहकारी आत्मनिर्भरता ही स्वराज का आधार है।

गाँधी जी ने 20 साल पहले कहा था कि वास्तविक आजादी की कुंजी सत्ता के दुरुपयोग का विरोध करने की क्षमता में निहित है। लेकिन विरोध करने की यह क्षमता इस बात से तय होती है कि हमारी आत्मा कितनी स्वतंत्र है। यह स्वतंत्रता हमारी इसी स्वावलंबी उद्यमशीलता से पैदा हो सकती है। उत्पादन, पूँजी बाजार के लिए नहीं बल्कि प्राथमिक रूप से निजी और स्थानीय उपभोग के लिए होना चाहिए।

यह सिद्धान्त ग्रामीण उत्पादन के बारे में प्रचलित आम मान्यता के खिलाफ है। अब यह बात साफ होती जा रही है कि गाँवों की रोजमर्रा जिन्‍दगी के लिए आवश्यक विविध फसलों और खाद्यान्न का उत्पादन बेहतर पोषण और खाद्य सुरक्षा दे सकता है, जबकि पूँजी बाजार पर केन्‍द्रित बड़े पैमाने के एक फसली उत्पादन में ऐसा सम्‍भव नहीं है। हालाँकि गाँधी जी ने यह बात राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष के सन्‍दर्भ में कही थी। लेकिन भारतीय गाँवों की सच्ची आजादी के लिए उनके सिद्धान्‍त आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। दुख की बात है कि गाँधी जी जो नई दृष्टि प्रस्तुत कर रहे थे उस पर खरा उतरने की बात तो दूर रही, हम अध्यापक उनकी बात को पूरी तरह समझ भी नहीं पाए। बेशक, हमने बेसिक स्कूल के दायरे से बाहर निकलकर जीवन के विभिन्न चरणों के लिए कार्यक्रम बनाए थे, हम प्री-बेसिक और पोस्ट-बेसिक शिक्षा की बात करने लगे थे। मगर हममें से अधिकतर लोग इन सारे कार्यक्रमों की कल्पना संस्थाओं के शान्‍त पानी में कर पाते थे। हमने ग्रामीण जीवन के खुले सागर में गोता लगाकर अपने जीवन को उसकी लहरों के हवाले करने का साहस नहीं दिखाया। हमने ग्रामीण कारीगरी को अपना प्रकाशस्तम्‍भ नहीं बनाया और न ही अपनी मेहनत से कमाए भोजन और कपड़े के मामले में ग्रामीणों की तरह आत्मनिर्भर होने का कोई गम्‍भीर प्रयास किया। इस तरह हम एक मूक सामाजिक क्रान्ति की सम्‍भावनाओं वाली नई तालीम को हकीकत की जमीन पर नहीं उतार पाए। चूँकि, हमने ग्रामीण कारीगरी के काम को संजीदगी से नहीं लिया इसलिए जब व्यवसायीकरण का ज्वार भारत की पारम्‍परिक कारीगरी की समृद्ध विरासत को लीलने लगा, तो हम कुछ नहीं कर पाए। खालिस व्यावसायिक दबावों से जूझते लोग ग्रामीण दस्तकारों द्वारा बनाए गए खूबसूरत और उपयोगी सामान के मुकाबले बड़े उद्योगों के दिखावटी और अकसर अनुपयोगी उत्पादों को तरजीह देने लगे हैं। नतीजा, हमारे कारीगर भुखमरी में जी रहे हैं और हम जिस प्रगति पर इतना गुमान कर रहे हैं, वह दरअसल हमारी विपन्नता को और बढ़ा रही है। यह विपन्नता सिर्फ भौतिक ही नहीं है, यह हमारे मस्तिष्क और आत्मा की विपन्नता भी है, हमारे आत्मविश्वास और स्वाभिमान का लोप है, जो आजादी की नींव को दरका रहा है।

हम एक और मामले में विफल हुए हैं। हम गाँधी जी के नए विचारों से इतने आकर्षित थे और भले ही हम उन्हें पूरी तरह समझ नहीं पा रहे थे, लेकिन हम यह नहीं बूझ पाए कि खुद बेसिक स्कूलों में भी कितना सारा काम अधूरा रह गया है। ये स्कूल दो साल तक अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करते रहे और अपना अस्तित्व बचाने में कामयाब भी रहे। उन्हें हमारे ध्यान और विशेष रखरखाव की जरूरत थी, मगर हमने उन पर उतना ध्यान नहीं दिया। 1941 के जामिया नगर सम्मेलन में जिन व्यावहारिक कार्यभारों और अनसुलझे मुद्दों की शिनाख्त की गई थी, उन पर कभी वैसा काम नहीं किया गया, जैसा हमें करना चाहिए था। इससे पाँच साल पहले हिन्‍दुस्तानी तालीमी संघ ने 16 साल तक उम्र के बच्चों के लिए समग्र ग्रामीण विद्यालय खोलने की जो योजना हमें सुझाई थी, उसको पूरी तरह कभी विकसित नहीं किया गया। भले ही यह चीज हमारे विस्तारित कार्यक्रम का केन्‍द्रीय तत्व रही हो, मगर अब वह हमारी रुचियों का केन्‍द्र नहीं थी। (जारी...)


साभार : मार्जोरी साइक्स, (1988), द स्‍टोरी ऑफ नई तालीम, अनुवाद: श्री प्रकाश, क्षेत्रीय प्रारम्भिक शिक्षा संसाधन केन्द्र, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली।

(यहाँ इसे शैक्षिक पत्रिका ‘शिक्षा की बुनियाद’ के सौजन्‍य से प्रकाशित किया जा रहा है।)

पिछले भाग पढ़ने के लिए इन लिंक पर जाएँ : पहला भाग नई तालीम की कहानी , दूसरा भाग बीजारोपण , तीसरा भाग कोंपलें, 

 नई तालीम की कहानी : 4 , नई तालीम की कहानी : 5

 

 

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