नई तालीम की कहानी : भाग चार

मार्जोरी साइक्स

गाँधी जी के मित्र जमना लाल बजाज वर्धा मारवाड़ी एज्यूकेशनल सोसायटी के अध्यक्ष थे। 1937 में सोसायटी अपनी रजत जयन्ती मनाने की तैयारी कर रही थी। सोसायटी के तहत वर्धा में नवभारत विद्यालय नामक हाईस्कूल चलता था। इसके प्रधानाचार्य श्रीलंका से आए तमिल शिक्षाशास्त्री ई. डब्ल्यू. आर्यनायकम थे। वे शान्तिनिकेतन में रवीन्‍द्रनाथ टैगोर के साथ भी काम कर चुके थे। उनकी पत्नी आशा देवी एक मेधाविनी विदुषी थीं,  जिनके परिवार के शान्ति निकेतन से करीबी सम्बन्ध थे। सोसायटी के सचिव श्रीमन्नारायण का सुझाव था कि सिल्वर जुबली कार्यक्रम के मौके पर गाँधी जी के शैक्षणिक विचारों पर चर्चा के लिए एक राष्ट्रीय शिक्षा सम्मेलन का आयोजन किया जाए। श्रीमन्नारायण के इस प्रस्ताव को आर्यनायकम का भी समर्थन प्राप्त था। श्रीमन्नारायण ने यह प्रस्ताव गाँधी जी के समक्ष रखा और कार्यक्रम की अध्यक्षता करने के लिए उनसे आग्रह किया। गाँधी जी ने सहर्ष उनका निवेदन स्वीकार कर लिया। यह सम्मेलन वर्धा में 22-23 अक्तूबर 1937 को आयोजित किया गया। इसमें गिने-चुने लोगों को ही न्यौता दिया गया था। आमंत्रण केवल उन्हीं लोगों को भेजा गया जो एक सच्ची भारतीय शिक्षा के बारे में वाकई गम्भीर थे। इसके अलावा जामिया मिलिया इस्लामिया, गूजरात विद्यापीठ,  तिलक महाराष्ट्र विद्यापीठ, मछलीपटनम स्थित आन्ध्र जातीय कलाशाला आदि राष्ट्रवादी शिक्षा संस्‍थानों को भी निमंत्रित किया गया था। नई प्रान्तीय सरकारों के कुछ मंत्रियों और अधिकारियों को भी न्यौता दिया गया था। चूँकि सहभागियों की संख्या बहुत सीमित और स्तर ऊँचा था इसलिए सम्मेलन काफी सफल रहा और वहाँ सामने आए विचारों को सीधे अमली जामा पहनाने का रास्ता खुलने लगा।

अब तक आपने पढ़ा कि किस प्रकार गाँधी जी  ने दाण्डी यात्रा के बाद जीवन का एक नया अध्याय शुरू करते हुए पूना अनशन के माध्यम से अस्पृश्यों की बदहाली की ओर देश का ध्यान आकर्षित किया तथा कहा कि अब उनका पूरा ध्यान अछूतों को सम्मान दिलाने पर ही केन्द्रित होगा। इस कार्य को अंजाम देने के लिए गाँधी जी ने अपने मित्र जमनालाल बजाज की मदद से वर्धा समेत आसपास के गाँवों को रचनात्मक कार्यक्रमों की जीवन्त प्रयोगशाला में तब्दील कर दिया था। हमने गाँधी द्वारा अपने सेवाकार्यों के लिए चुने गए सेगाँव (सेवाग्राम) के बारे में, जिसे आशादेवी ने 1939 में आयोजित पहले बेसिक सम्मेलन में प्रस्तुत किया था, के बारे में पढ़ा। अब आगे...

 

गाँधी जी ने सम्मेलन के समक्ष वे ही प्रस्ताव रखे जिन्हें वे पिछले दिनों हरिजन में लिख चुके थे। उनके प्रस्ताव इस प्रकार थे –

प्राथमिक,  माध्यमिक और हाईस्कूल के नाम पर आज जो शिक्षा दी जा रही है, उसके स्थान पर एक ऐसी प्राथमिक शिक्षा होनी चाहिए जो सात साल या उससे लम्बे समय तक चले।  मैट्रिकुलेशन तक जिसमें अँग्रेजी के अलावा सारे विषय पढ़ाए जाएँ।  इसमें एक ऐसा पेशेवर काम शामिल हो जिसका इस्तेमाल बच्चों के मस्तिष्क को व्यावहारिक ज्ञान की तरफ मोड़ने में किया जा सके। ऐसी शिक्षा अपनी समग्रता में निश्चित तौर पर स्वावलम्बी होनी चाहिए। स्वावलम्बन ही उसकी वास्तविकता की असली कसौटी है।

गाँधी जी ने कहा कि वे किसी पर अपने विचार नहीं थोपना चाहते। उन्होंने स्वतंत्र और बेबाक आलोचना का स्वागत करते हुए कहा कि वे इस बारे में हर किस्म के भ्रम को दूर कर देना चाहते हैं। मिसाल के तौर पर, यह कहा जा रहा था कि गाँधी जी साहित्यिक शिक्षा के खिलाफ हैं। यह भी कहा जा रहा था कि स्कूलों में बच्चों का शोषण होने लगेगा, क्योंकि उन्होंने अपनी योजना में धार्मिक शिक्षा को शामिल नहीं किया है।

गाँधी जी ने अपने भाषण में कई ऐसे बिन्दुओं को स्पर्श किया, जो आज 50 साल बाद भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने तब थे। उन्होंने कहा था, शिक्षा की मौजूदा व्यवस्था न सिर्फ अपव्ययी है, बल्कि निश्चित रूप से हानिकारक है। बच्चे अपने माँ-बाप,  अपने गाँव,  अपने पारम्परिक कौशल से दूर होते चले जाते हैं। वे छोटे-छोटे बाबूगिरी वाले कामों पर निर्भर होकर निस्सहाय हो जाते हैं, वे बुरी आदतों और शहरी अकड़ का शिकार हो जाते हैं और गाँवों के ईमानदार शारीरिक श्रम की उपेक्षा करने लगते हैं, जिस पर हम सभी निर्भर हैं। मैं साहित्यिक शिक्षा का विरोधी नहीं हूँ, बल्कि मैं तो ऐसी शिक्षा देने का सही तरीका बताना चाहता हूँ ताकि हमारे बच्चे हमारी संस्‍कृति के सच्‍चे प्रतिनिधि बन सकें और उनमें हमारे राष्ट्र की सच्ची मेधा झलकती हो। जहाँ तक शोषण की बात की जा रही है, तो मैं पूछना चाहता हूँ कि क्या हम किसी बच्चे को विनाश से बचाकर कुछ गलत कर रहे होते हैं? जब बच्चे खुद अपनी मेहनत के रूप में अपनी पढ़ाई का मोल चुकाएँगे,  तो वे ज्यादा साहसी बनेंगे और उनमें ज्यादा आत्मविश्वास आएगा। अब सवाल उठता है कि मैं धार्मिक शिक्षा पर जोर क्यों नहीं देता? इसका कारण यह है कि यह व्यवस्था हिन्दुओं,  मुसलमानों, पारसियों,  ईसाइयों, सभी के लिए समान है और मैं सभी को व्यावहारिक धर्म - स्वावलम्बन का,  यानी अपनी मदद खुद करने का पाठ पढ़ा रहा हूँ। यह पूरी योजना अहिंसा के मूल्य से ही पैदा होती है। यह अहिंसा और सत्य का एक अनिवार्य अंग है। इस मसले पर काफी गहन चर्चा हुई,  नए-नए विचार सामने आए। बालवाड़ी आश्रम का काम देख रहे विनोबा भावे ने गाँधी जी के इस खयाल का समर्थन किया कि तकली पर कताई सीखने वाले बच्चों के लिए इस अभ्यास में काफी शैक्षणिक सम्भावनाएँ मौजूद हैं। लेखिका को खुद याद है कि कैम्ब्रिज में सामाजिक इतिहास के अध्ययन के दौरान पुरातात्विक स्थलों पर पाई गई घेरेदार चकरियाँ कितना भ्रमित करती थीं;  परन्तु कई साल बाद उसे यह जानकर बड़ा सुखद आश्चर्य हुआ था कि पत्थर या मिट्टी की बनी ये चकरियाँ असल में प्राचीन तकलियाँ थीं जिनके बाँस या लकड़ी के लट्ठे काफी पहले सड़ चुके थे।

काका साहब कालेलकर ने कुछ ऐसी बातों का हवाला दिया जो आने वाले सालों में और ज्यादा अर्थपूर्ण हो गए थीं। उन्होंने कहा, आओ शिक्षा को कक्षा की चारदीवारी से मुक्त कराएँ.... अपनी स्कूलिंग को कभी अपनी शिक्षा पर हावी न होने दो! यह हैरानी की बात है कि चाहे सरकार के भीतर हों या बाहर,  आज कितने सारे लोग यही सोचते हैं कि शिक्षा और स्कूलिंग एक ही चीज है! आशा देवी ने बताया कि टैगोर की तरह गाँधी जी के शिक्षा सम्बन्धी विचार भी आंशिक रूप से प्राचीन भारतीय गुरुकुल परम्परा से निकले हैं,  इसलिए यदि हमें इन विचारों पर रचनात्मक तरीके से काम करना है तो हमने जो सीखा है अपने जहन से, उसे पोंछकर एक नई शुरुआत करनी होगी।

सम्मेलन में ये प्रस्ताव पारित किए गए:

  1. राष्ट्रव्यापी स्तर पर सात साल की मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा दी जानी चाहिए।
  2. शिक्षा का माध्यम मातृभाषा होना चाहिए।
  3. इस दौरान शिक्षा की प्रक्रिया किसी न किसी उत्पादक शारीरिक कार्य के इर्द-गिर्द केन्द्रित होनी चाहिए तथा हर गतिविधि या प्रशिक्षण को जहाँ तक सम्भव हो, उस केन्द्रीय हस्तकौशल के साथ जोड़ा जाना चाहिए, जिसे बच्चे के वातावरण को ध्यान में रखकर चुना गया है ताकि इस हस्तकौशल से बनने वाले उत्पादों से शिक्षकों का खर्च निकाला जा सके।

इन प्रस्तावों को फरवरी-मार्च 1938 में भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस की अगली सालाना बैठक में राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तौर पर स्वीकार कर लिया गया। इसमें घोषणा की गई कि राष्ट्र की प्रगति अन्ततः लोगों को मिलने वाली शिक्षा की प्रकृति, विषय-वस्तु और उसके उद्देश्य पर निर्भर करती है। एक व्यावहारिक कार्यक्रम का विकास व मार्गदर्शन करने के लिए एक स्वतंत्र राष्ट्रीय शिक्षा परिषद का गठन किया गया और उसे हिन्दुस्तानी तालीमी संघ का नाम दिया गया।

आज 50 साल बाद राष्ट्रीय शिक्षा की इस तस्वीर पर नजर डालने के बाद कोई भी इन चारों बिन्दुओं में से हरेक पर सवाल खड़ा किए बिना नहीं रहेगा। पहले बिन्दु से यह पता नहीं चलता कि इसमें बाल्यावस्था के कौन से सात वर्षों का जिक्र किया जा रहा है। गाँधी जी  इस बात को लेकर आश्वस्त थे कि इस शिक्षा की शुरुआत तब होनी चाहिए जब बच्चा सात साल का हो चुका हो क्योंकि तब तक बच्चों की मांसपेशियों के बीच पर्याप्त समन्वय आ जाता है जो कि हस्तकौशल का आनन्द लेने के लिए आवश्यक होता है। भारत के अधिकतर इलाकों में आमतौर पर बच्चों को छठे या पाँचवे साल में ही स्कूल भेज देने का चलन था। अगर यही चलन बेसिक स्कूलों में लागू किया जाता, तो मोहभंग की स्थिति पैदा हो सकती थी क्योंकि इस उम्र तक बच्चे पर्याप्त रूप से परिपक्व नहीं होते हैं। हमारे आधुनिक अँग्रेजी माध्यम के नर्सरी स्कूलों में तो बच्चों को नुकसान पहुँचाने के एक से एक उदाहरण मौजूद हैं। उन्हें ऐसी चीजें सीखने को दी जाती हैं जिनके लिए उनका दिमाग परिपक्व और तैयार नहीं होता। 3 साल के नन्हें बच्चों से उम्मीद की जाती है कि वे अँग्रेजी की वर्णमाला में महारत हासिल कर लें!

सात साल की अवधि अगर जल्दी शुरू होती है तो जल्दी ही खत्म भी हो जाती है। गाँधी जी ने न केवल पढ़ाई पूरी करने के लिए चौदह साल की उम्र को न्यूनतम उम्र माना बल्कि वे तो स्कूली शिक्षा को पन्द्रहवें या सोलहवें वर्ष तक भी जारी रखने के हिमायती थे। तालीमी संघ ने खुद यह सिफारिश की थी कि स्कूली शिक्षा के लिए सात से सोलह साल की उम्र सही रहेगी। यह बात मनु की उस पुरानी कहावत से जाकर जुड़ती है, जिसमें सोलहवें साल को एक उत्तरदायित्वपूर्ण वयस्क जीवन में प्रवेश का द्वार बताया गया था और विनोबा भावे गाँधी जी के शैक्षणिक विचारों के प्रसार में इस बात का अक्सर हवाला देते थे। क्या आज हमारे शिक्षाशास्त्रियों को इस सवाल पर गम्भीरता से नहीं सोचना चाहिए?

सम्मेलन के पहले ही प्रस्ताव से एक और सवाल पैदा होता है: क्या शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिए? क्या अनिवार्यता का विचार गाँधी जी के समूचे दर्शन के लिए बाहरी चीज नहीं है?  उन्होंने यंग इण्डिया में 14 अगस्त 1924 को लिखा था,  मुझे किसी भी तरह की अनिवार्यता से चिढ़ है। मैं नहीं चाहता कि यह राष्ट्र किसी अनिवार्यता के कारण शिक्षित हो.... किसी भी समाज के सही विकास के लिए इस विश्वास से ज्यादा हानिकारक चीज और कोई नहीं हो सकती कि स्वैच्छिक प्रयासों से कोई सुधार नहीं लाया जा सकता। इस तरह से प्रशिक्षित व्यक्ति स्वराज के लिए कतई उपयुक्त नहीं होगा।

अनिवार्यता का आशय राज्यसत्ता द्वारा नियंत्रण से है। गाँधी जी अकसर कहते थे कि वे राज्यसत्ता की ताकत में किसी भी इजाफे से सबसे ज्यादा भय खाते हैं क्योंकि वह निजी पहलकदमी का दमन करती है। जब विनोबा भावे इस बात पर जोर दे रहे थे कि शिक्षा को राज्य के नियंत्रण से मुक्त होना चाहिए तो सम्भवतः वे भी सम्‍मेलन के अनौपचारिक प्रस्तावों की बजाए गाँधी जी की इस सोच को ही प्रतिध्वनित कर रहे थे। इसके बावजूद हम देखते हैं कि 1937-38 में गाँधी जी बार-बार एक प्रकार से राज्य द्वारा नियंत्रण को मान्यता देते नजर आते हैं : राज्य सात साल की उम्र में बच्चे का नियंत्रण अपने हाथ में ले ले और उसे एक कमाऊ व्यक्ति के रूप में परिवार को वापस लौटाए। यह कि यदि राज्य स्कूलों में बने उत्पाद खरीद ले तो स्कूल अपना खर्चा खुद निकाल सकते हैं। एक जगह वे इस बात पर जोर देते हैं कि बेसिक शिक्षा के प्रयोगों को कामयाब बनाने के लिए उन्हें स्वतंत्र रूप से चलाना होगा और उसमें कोई बाहरी दखल नहीं होना चाहिए। इन विरोधाभासों की चाहे जो व्याख्या की जाए मगर इसमें कोई सन्देह नहीं कि राज्य और शिक्षा के सम्बन्धों का मसला आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है और उसके बारे में हमें बहुत सावधानी से सोचने की जरूरत है।

सम्मेलन में लिए गए अन्य प्रस्तावों पर विवाद की इतनी गुंजाइश नहीं हैं। दूसरे प्रस्ताव के सन्दर्भ में जे.बी.कृपलानी ने तुरन्त इस बात की ओर इशारा किया कि बेसिक शिक्षा में शिक्षा का वास्तविक माध्यम काम है,  भाषा नहीं। मातृभाषा तो सिर्फ संचार का माध्यम है,  वह शिक्षा का माध्यम नहीं है। जो लोग स्कूलों के लिए विस्तृत योजना तैयार कर रहे थे उन्हें यह बात जल्द ही समझ में आ गई कि न केवल किसी हस्तकौशल के वैज्ञानिक पक्ष में शिक्षा के वास्तविक संसाधन और स्रोत छुपे होते हैं बल्कि एक बच्चे के प्राकृतिक वातावरण और उन सामाजिक सम्बन्धों में भी शिक्षा के समृद्ध संसाधन निहित होते हैं, जिनसे वह जुड़ा होता है।

इन क्रांतिकारी स्कूलों के लिए सबसे पहली जरूरत यह थी कि उनके लिए शिक्षकों को प्रशिक्षित किया जाए। इसके लिए हिन्दुस्तानी तालीमी संघ ने अप्रैल 1938 में वर्धा में एक ट्रेनिंग स्कूल खोला जिसका निदेशक आर्यनायकम को बनाया गया। फिर इस प्रशिक्षण स्कूल के तहत सेगाँव (सेवाग्राम) में एक स्कूल खोला गया। सेगाँव मध्य प्रान्त का हिस्सा था,  जहाँ काँग्रेस की सरकार थी। इस काम को काँग्रेस का पूरा समर्थन प्राप्त था। गाँधी जी के इस नए प्रयोग को शुरू करने के लिए गाँव का पुराना स्कूल बन्द कर दिया गया।

सेगाँव ग्राम स्कूल और वर्धा प्रशिक्षण स्कूल, ये ही दो स्कूल थे, जिन्होंने दिसम्बर 1938 में मेरी पहली यात्रा में मुझे इतना अभिभूत कर दिया था। पूरा वातावरण उत्साह और कुछ नया करने व खोजने की प्रेरणा से भरा हुआ था। प्रशिक्षण स्कूल के तहत वर्धा में ही एक प्रायोगिक स्कूल भी था। वहाँ जुलाई से सितम्बर 1938 के बीच सात और आठ साल के बच्चों ने हस्तकौशल का जो भी काम किया, उसका पूरा रिकॉर्ड रखा जा रहा था। जिन हस्तकौशलों को चुना गया था, उनमें कपड़े की बुनाई शामिल थी जिसकी शुरुआत तकली पर कताई से होती थी। परन्तु आने वाले सालों में कपास उगाने से लेकर उसकी छँटाई,  सुखाना, रेशों की रंगाई और तैयार कपड़े पर डिजाइनिंग आदि उसके सारे पहलुओं का समावेश किया जाना था। शुरुआती तीन महीनों में तकली ही काम के केन्द्र में रही। पहले यह माना जा रहा था कि बच्चे इस काम से ऊब जाएँगे और यह उन पर बोझ बन जाएगा, लेकिन इसके ठीक विपरीत उन्होंने तो इसे एक दिलचस्प खिलौने के रूप में लिया और शुरुआती तीन महीनों के दौरान उत्पादन में अभूतपूर्व इजाफा दिखाई दिया। जुलाई में केवल 74 लच्छे सूत काता गया था। जबकि सितम्बर में 251 लच्छे तैयार हुए। सितम्बर के अन्त तक कुछ बच्चे 39 गणनांक की बारीकी तक सूत कातने लगे थे जबकि औसत गुणवत्ता 13 गणनांक की थी जो काफी ठीकठाक मानी जाती है। सबसे कम रफ्तार एक घण्टे में 100 फुट सूत की थी जबकि अधिकतम रफ्तार से काम करने वाला बच्चा 500 फुट से भी ज्यादा सूत कात लेता था। फिर भी,  औसत आँकड़ा 250 फुट सूत प्रति घण्टा था। गौर करने वाली बात है कि इन बच्चों को विशिष्ट तौर पर चुना नहीं गया था। परन्तु उनके नतीजों को ज़ाकिर हुसैन कमेटी द्वारा बनाए गए पाठ्यक्रम में उल्लेखित उत्पादन मानकों को जाँचने में इस्तेमाल किया गया।

दूसरे क्षेत्रों में भी सेगाँव के इस स्कूल ने बड़ी उपलब्धियाँ हासिल की थीं। जब काम शुरू किया गया था, उस वक्त गाँव का तकरीबन हर बच्चा जुआ खेलता था। जातीय संकीर्णता अपने चरम पर थी और व्यक्तिगत स्वच्छता या वातावरण की साफ-सफाई को लेकर कोई संवेदनशीलता नहीं थी। कुछ ही माह बाद बच्चों में मित्रता और सहयोग की भावना दिखाई देने लगी। एक सादे लेकिन साफ-सुथरे स्कूल में बच्चे अपने काम में काफी सक्रिय दिखाई दिए। वे अपने साथियों और शिक्षकों के साथ मिलकर इस माहौल को अच्छा बनाए रखने में हमेशा तत्पर थे। उनके पास बाहरी दुनिया के बारे में जानने की भारी जिज्ञासा थी।

इस काम को पूरे भारत में फैलाने के लिए काफी प्रयास किए जा रहे थे। सांगठनिक स्तर पर शहरों की बजाए गाँवों में ऐसे स्कूल खोलने की योजना बनाई गई और शिक्षकों की उपलब्धता के आधार पर शहरों के इर्द-गिर्द स्कूलों का एक तंत्र विकसित करने का फैसला लिया गया, जिससे किसी भी शिक्षक को अकेलापन या अलगाव महसूस न हो बल्कि उन्हें अपने आसपास एक विस्तृत समूह के होने का बोध मिले। इस योजना को तमाम प्रान्तीय सरकारों ने अपने-अपने स्तर पर लागू किया - बिहार, बॉम्बे, मध्य प्रान्त, मद्रास, उड़ीसा,  संयुक्त प्रान्त और कश्मीर। केन्द्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड ने इस प्रयोग को एक वैध मॉडल के तौर पर मंजूरी दे दी। तालीमी संघ ने गाँधी जी के इस प्रस्ताव को मान लिया कि एक कक्षा में विद्यार्थियों की अधिकतम संख्या 25 या हद से हद 30 तक हो सकती है;  यह किसी भी स्कूल के लिए काफी अनिवार्य बाध्यता है, हालांकि इसका पालन नहीं किया जाता। शिक्षकों को पर्याप्त वेतन दिया जाए और स्कूल को हस्तकौशल से होने वाली आय तथा उसके शिक्षकों की तनख्वाह के बीच कोई प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं होना चाहिए।

जहाँ तक शिक्षा की विषयवस्तु का सवाल था तो बुनियादी हस्तकौशल के चुनाव को लेकर काफी सोच-विचार किया गया। तलाश एक ऐसे कौशल की थी जिसमें व्यापक शैक्षणिक सम्भावनाएँ हों और जिसमें मिल-जुलकर काम किया जा सके, उसमें काम की योजना और क्रियान्वयन को उपयुक्त स्थान मिले, बच्चों की पहलकदमी के लिए पर्याप्त स्वतंत्रता हो तथा बच्चे अपने विकास की खुद जिम्मेदारी लें। जैसे-जैसे वक्त बीतता गया इस बात पर सहमति बनती गई कि बच्चों के लिए वे ही हस्तकौशल बेहतर होंगे जो मानवीय आवश्यकताओं से जुडे हुए हों - जैसे खाने-पीने की चीजें व कपड़े बनाना, रोजाना के जीवन में जरूरी बरतन और आवास मुहैया कराने के लिए मिट्टी और लकड़ी से जुडे काम आदि।

इस बुनियादी हस्तकौशल के अलावा कमेटी का जोर इस बात पर भी था कि हरेक स्कूल में संगीत और चित्रकला को भी नियमित पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाए। आर्यनायकम ने इस काम के लिए शान्तिनिकेतन के अपने अनुभवों का सहारा लिया और पाठ्यक्रम तैयार करने के लिए अपने मित्र महान कलाकार नन्दलाल बोस से मदद ली। 1939 के बसन्त तक इस बात की जरूरत महसूस होने लगी थी कि इस काम की प्रगति का जायजा लेने के लिए राष्ट्रीय स्तर की एक बैठक बुलाई जाए ताकि आगे की योजना बनाई जा सके। इस वक्त तक नौ प्रान्तों और राज्यों में 247 बेसिक स्कूल और 14 प्रशिक्षण स्कूल कायम किए जा चुके थे। इस कार्यक्रम में बम्बई सरकार काफी सक्रिय थी और उन्होंने पुणे में कार्यकर्ताओं की बैठक का आयोजन किया। यह अक्टूबर 1939 की बात है। द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हो चुका था और राजनीतिक हालात काफी अनिश्चित थे। बहरहाल, सम्मेलन में तय किया गया कि भविष्य में चाहे जो हो,  बेसिक शिक्षा को रोका नहीं जा सकता। सम्मेलन के प्रस्ताव में कहा गया था कि न्याय, सहकारिता, उत्पादनशील श्रम और वैयक्तिकता के प्रति सम्मान पर आधारित शिक्षा की नई विचारधारा ही शान्ति, न्याय और मानवता का आश्वासन दे सकती है। चाहे कैसे भी राजनीतिक बदलाव आएँ, इसे जारी रखना ही होगा। इस प्रयोग को शुरू हुए एक साल से कुछ ही ज्यादा हुआ था, लेकिन बच्चों के शारीरिक, मानसिक और चारित्रिक विकास के बारे में जो रिपोर्टें आ रही थीं, वे काफी प्रोत्साहित करने वाली थीं। इसे जारी रखने का फैसला बिल्कुल सही साबित हुआ और काँग्रेस सरकारों के इस्तीफे से भी इस अभियान पर बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ा, सिवाय मद्रास के, जहाँ कोयम्बटूर के बेसिक ट्रेनिंग स्कूल को अप्रैल 1940 में बन्द करना पड़ा। (जारी..)

पिछले भाग पढ़ने के लिए इन लिंक पर जाएँ : पहला भाग नई तालीम की कहानी , दूसरा भाग बीजारोपण , तीसरा भाग कोंपलें

 



साभार : मार्जोरी साइक्स, (1988), द स्‍टोरी ऑफ नई तालीम, अनुवाद: श्री प्रकाश, क्षेत्रीय प्रारम्भिक शिक्षा संसाधन केन्द्र, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली।

(यहाँ इसे शैक्षिक पत्रिका ‘शिक्षा की बुनियाद’ के सौजन्‍य से प्रकाशित किया जा रहा है।)

18474 registered users
7227 resources