ज्ञान सृजन : एक विज्ञान मेला

विज्ञान शिक्षण के क्रम में विज्ञान की गतिविधियाँ करना और सीखना – यह तो कोई नई बात नहीं है, परन्तु यह पढ़कर और देखकर आपको जरूर आश्चर्य हो सकता है कि एक मेले में विज्ञान की गतिविधियों के माध्यम से बच्चों ने 15 से 20 वैज्ञानिक अवधारणाओं को समझा और अपने ज्ञान का सृजन किया।

वैसे तो यह अमूमन स्‍कूलों में आयोजित होने वाले एक सामान्‍य से विज्ञान मेले की रपट है। पर आप अगर इसे ध्‍यान से पढ़ेंगे, तो पाऍंगे कि इसमें बहुत सी ऐसी बातें हैं, जो बच्‍चों ने जो सीखा या जाना है, उसे प्रदर्शित करने में मदद करती हैं। एक शिक्षक के तौर पर आप इस रपट से अपने विद्यालय में आयोजित किए जाने वाले बालमेले के लिए कुछ सुझाव तो प्राप्‍त कर ही सकते हैं। 

मेले का नाम सुनते ही हमारे जहन में एक ऐसी छवि उभरती है, जिसमें खिलौने, गुब्बारे, डमरू-ढोल वाले की तेज आवाज, खाने-पीने की चीजें, दैनिक जीवन की सामग्रियों, लाल-पीली मिठाईयाँ, शोरगुल, वाद्ययंत्रों की आवाजें आदि सम्मिलित होती हैं। लेकिन उत्तरकाशी के एक स्कूल, राजकीय कन्या उच्च प्राथमिक विद्यालय में मैने एक ऐसा मेला देखा जो इन सबसे बिल्कुल ही अलग एवं रोचक था।  इस ज्ञान सृजन मेले को इसी स्कूल के शिक्षकों के प्रयासों से आयोजित किया गया था।

स्कूल में मेले का रंग सुबह से ही दिखाई दे रहा था। बच्चे खुश थे, उनमें एक उत्सुकता थी, कुछ करने का जज्बा था और इस सबको अंजाम देने के लिए शिक्षकों में जो जोश और जुनून था उससे इस कार्य में उनकी मेहनत और निष्ठा स्पष्‍ट  दिखाई दे रही थी। स्कूल में उपलब्ध सभी शिक्षण-सामग्रियों को मेजों में सजाकर रखा गया, बोर्ड पर बड़े-बड़े अक्षरों में “विज्ञान मेला” लिखा गया और बच्चों के लिए बैठने की सुविधा के साथ-साथ आवश्यक पड़ने वाली सारी सामग्रियों को एक ओर रखा गया। मेजों को शिक्षण-सामग्रियों (टी.एल.एम.) से सजाने में बच्चों और शिक्षकों ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। शिक्षक और बच्चों के सम्मिलित प्रयासों की सतरंगी आभा से प्रकाशमान यह माहौल, अपने में जो रंग बुन रहा था वह देखने लायक था।  

बच्चों ने सर्वप्रथम साल भर किए या पिछली कक्षा या अपने से जाने-सुने प्रयोगों को ध्यान में रखा और उन्हें अपनी नोटबुक में दर्ज किया साथ ही कुछ बच्चों ने चित्रकारी करने के लिए विज्ञान या जो उनको पसन्‍द हो, उससे सम्बंधित थीम का चयन किया। यह जानकर आपको सुखद आश्चर्य हो सकता है कि बच्चों ने 20 अलग-अलग पोस्टर अपने सुन्दर कल्पनाओं और रंगों से सजाये और 70-80 अलग-अलग प्रयोगों को अपनी नोटबुक में दर्ज किया। इनमें से कुछ ऐसे थे जो किसी को भी चमत्कार लग सकते हैं, जैसेः पानी में रखी माचिस की तिल्ली को बिना हाथ से स्पर्श किए हिलाना, आग के ऊपर गुब्बारा रखने पर भी गुब्बारे का नहीं फूटना, काँच के बीकर को गायब करना, बिना माचिस के कागज को जलाना इत्यादि ।  

जो बच्चे प्रयोगों में सम्मिलित थे वे समूहों में काम कर रहे थे। कुछ प्रयोग के लिए आवश्यक सामाग्री इकठ्ठा कर रहे थे, कुछ प्रयोग से सम्बंधित तर्क-वितर्क कर रहे थे तो कुछ प्रयोग को अंजाम देकर सबको समझा रहे थे तो कुछ बच्चे अन्य बच्चों, शिक्षकों एवं लोगों को भी उन गतिविधियों में शामिल कर रहे थे। इन गतिविधियों में मेरे द्वारा भी प्रतिभाग किया गया जिसके अनुभव कुछ ऐसे रहे।

चित्रकारी : बच्चों ने पेन्सिल, कलर पेन, पोस्टर और रंगों को लेकर अपनी रचनात्मकता को पोस्टर पर पिरोया ही नहीं अपितु उसके अवधारणात्मक पहलु को समझा और साथ-ही-साथ इसे सबके सम्मुख भी रखा। बच्चों ने पौधों के भोजन बनाने की प्रक्रिया अर्थात् प्रकाश संश्लेषण, जल-चक्र, जल शुद्धिकरण विधि, जीवन-चक्र, जीभ-फेफड़े की क्रियान्वयन प्रक्रिया, सूर्य और चन्द्र ग्रहण, सरल लोलक, पुरातन भवन निर्माण प्रक्रिया, सौर ऊर्जा, प्राकृतिक दृश्य, हमारे जंगल इत्यादि पर पोस्टर बनाए। रंग पिरोने पर इन सभी चित्रों से बच्चों की कल्पना और अवधारणात्मक समझ स्पष्ट रूप से बयां हो रही थी।  

बनाए गए चित्रों के बारे में बच्चों द्वारा बताई गई बातें : प्रकाश संश्लेषण पेड़-पौधों के भोजन बनाने की प्रक्रिया है जिसके लिए प्रकाश, पानी और कार्बनडाइऑक्साइड गैस महत्वपूर्ण होते हैं। यह प्रक्रिया सूर्य के प्रकाश के साथ-साथ कृत्रिम प्रकाश में भी होती है। भोजन के आधार पर एक प्रजाति की दूसरी प्रजाति पर निर्भरता ही भोजन श्रंखला कहलाती है। सूर्य के परिवार को सौर परिवार कहा जाता है जिसमे सूर्य बीच में होता है। सोलर प्लेट्स ऊर्जा सरंक्षण का अच्छा एवं प्रदूषण रहित स्रोत है, हमें इसके प्रयोग को बढ़ावा देना चाहिए। सूर्यग्रहण एवं चँद्रग्रहण एक तरह से छाया के ही वास्तविक एवं जीवंत उदहारण हैं जो अक्सर हमारे समक्ष आते हैं।  

बच्चों द्वारा दी गई जानकारियों ने वहाँ उपस्थित सभी व्यक्तियों का ज्ञानवर्धन किया। उपस्थित लोगों द्वारा तालियों से बच्चों की हौसला अफजाई की गई।         

विज्ञान के प्रयोग : सभी बच्चे समूह बना कर काम कर रहे थे। जब मैं उनके पास गया तो मैंने देखा कि बच्चों ने बेहद कुशलता से आपस में कार्य बाँट लिए थे। कुछ बच्चे प्रयोग सामग्री को लाने एवं कार्य के दौरान सामग्री की उपलब्धता सुनिश्चित करने में लगे थे तो कुछ प्रयोग किस प्रकार होगा, उसकी क्या प्रक्रिया होगी इस विचार में मगन थे। कुछ तो अपनी ही प्रक्रियाओं को तर्कों से चुनौती दे रहे थे और तर्क-वितर्क कर एक निश्चय पर पहुँचने की कोशिश कर रहे थे। यह दृश्य अचंभित भी कर रहा था और आश्वस्त भी, आखिर वे आज के उभरते वैज्ञानिक और कल का भविष्य जो थे, अतः ये सब तो होना ही था। जब बच्चों में इतनी लगन, मेहनत करने की ईच्छा और विज्ञान के प्रति ऐसी जिज्ञासा हो तो सब कुछ व्यवस्थित और सुंदर ढंग से होते जाना स्वाभाविक सी बात है। बच्चों ने अपने समूह के लिए खुद ही प्रयोग निश्चित किए और उनके क्रियान्वयन के बाद सबके सम्मुख प्रस्तुतीकरण भी किया, जिसमें से कुछ इस प्रकार से थे:

प्रकाश की प्रकृति : इसमें बच्चों ने प्रकाश की प्रकृति एवं प्रकाश से जुडी हुई घटनाओं अर्थात् प्रकाश के परावर्तन, अपवर्तन और वर्ण-विछेपण को प्रयोग द्वारा समझाया।  बच्चों ने एक प्रयोग में लेसर लाइट के प्रकाश को धुएँ से भरे एक बॉक्स में डाला तो दूसरे प्रयोग में प्रकाश को डीटोल घोल में आपतित किया। इससे प्रकाश का एक सीधा पथ दिखाई दिया जो प्रकाश के पथ को समझाने का एक साधारण-सा प्रयोग था। आगे बच्चों ने प्रकाश को दर्पण में डाला और एक पेन्सिल लेकर इसे पानी भरे बीकर में डाला और देखा प्रकाश दर्पण से परावर्तित हुआ और पेन्सिल पानी में कुछ टेड़ी-मेढ़ी सी दिखाई देने लगी। ये प्रयोग अपने आप में प्रकाश के परावर्तन और अपवर्तन को बयां कर रहे थे। आगे बच्चों ने एक कटोरे में पानी लेकर इसमें दर्पण का एक छोटा-सा टुकड़ा रखा तो उनको इन्द्रधनुष मिला। जिसे पाकर बच्चों की खुशी देखते ही बन रही थी।

सूक्ष्मदर्शी और कोशिका : बच्चों को सर्वप्रथम स्कूल शिक्षिका द्वारा एक बार फिर से सूक्ष्मदर्शी पर काम करना समझाया गया जिसे जानने के लिए बच्चे अति उत्सुक एवं उत्साहित दिख रहे थे, ऐसा प्रतीत हो रहा था मानों वे भी रोबर्ट हुक बनना चाह रहे हो। रोबर्ट हुक तो पता नहीं पर बच्चों ने तो प्याज की झिल्ली की ईट जैंसी सरंचना वाली कोशिकाएँ देख ही लीं। ये उनका कोशिकाओं से एक निकट का संवाद था जो आगे भविष्य में उनके रोबर्ट हुक जैसा वैज्ञानिक बनने अथवा नयी खोजों को जन्म देने में जरूर मददगार रहेगा।

हवा में भार : बच्चों ने दो गुब्बारों में हवा भर कर, एक रस्सी की मदद से लकड़ी की डंडी पर बाँध दिया जो अपने में एक तराजू जैसा बन गया था। उसके बाद उन्होंने एक गुब्बारे से हवा निकाल दी। जैसे ही हवा निकली तराजू एक ओर लुढ़क गया जैसे एक ओर भार कम और एक ओर ज्यादा हो गया हो। बच्चे इस प्रयोग के माध्यम से समझाने की कोशिश कर रहे थे कि हवा में भी भार होता है और हवा भी स्थान घेरती है।     

वाष्पोर्त्जन : रंगीन पत्तियों, हरी पत्तियों वाले पौधों एवं सूखी लकड़ी को एक-एक सफ़ेद पन्नी से बांधकर धूप में थोड़ी देर के लिए रखा गया। आधे-एक घण्‍टे बाद जब पौधों का अवलोकन किया गया तो बच्चों ने बताया कि रंगीन एवं हरी पत्तियों वाले पौधें में बंधी पन्नी पर पानी की बूँदे इकट्ठा थी पर सूखी लकड़ी पर नहीं। इन पन्नियों में पानी पत्तियों से होने वाली प्रकाश संश्लेषण की घटना की वजह से आया जिसमें पौधों ने अपना भोजन बनाया और पानी की बूँदे पत्तियों से वाष्पोत्सर्जित हुईं।  इस प्रयोग के दौरान हमनें एक नई चीज पाई कि रंगीन पत्तियों वाले पौधें में पानी की मात्रा, हरे पत्तियों वाले पौधे से ज्यादा थी। 

अदृश्य बीकर : इसमें बच्चों ने एक छोटे बीकर को एक बड़े बीकर के अन्दर इस प्रकार रखा कि छोटा बीकर बड़े के अन्दर अच्छे से फिट हो जाए। फिर रिफाइंड तेल लेकर इसे बड़े बीकर में इतनी मात्रा में डाला कि छोटा बीकर तेल में पूरी तरह से डूब जाए या तेल का स्तर छोटे बीकर से ऊपर आ जाए। फिर क्या था, छोटा बीकर गायब हो गया अर्थात् बड़ा बीकर तो देखने में आ रहा था पर छोटा नहीं, तो इस हिसाब से उसे गायब भी मान सकते हैं। आगे बच्चों ने समझाया कि चूँकि काँच (बीकर जिससे बना हुआ है) और रिफाइंड के तेल का अपवर्तनांक बराबर या लगभग बराबर होते हैं इसलिए प्रकाश का सिर्फ मुड़ना बड़े बीकर या रिफाइंड तेल से होता है छोटे से नहीं इसलिए छोटा बीकर अदृश्य होता दिखाई देता है।  

बिना माचिस से आग : इसमें बच्चों ने एक छोटा कागज और एक हैण्ड लेंस लिया।  कुछ देर धूप में सूर्य के प्रकाश को हैण्ड लेंस से कागज पर फोकस किया और देखते-देखते कागज पर आग सुलगने लगी और पूरा कागज जल गया।  हैण्ड लेंस में उत्तल लेंस होता है जो प्रकाश को एक बिंदु पर फोकस करता है इसलिए काग जल गया।

आग के ऊपर गुब्बारा ना फूटे : इसमें बच्चों ने एक गुब्बारा, मोमबत्ती और माचिस ली। फिर गुब्बारे में पानी भर जलती मोमबत्ती के ऊपर रखा, पर यहाँ कुछ असाधारण हुआ, यहाँ गुब्बारा नहीं फूटा। बच्चों ने समझाया कि यह जल की शीतलन क्रिया के कारण हुआ अर्थात् मोमबत्ती से जो ऊष्मा आई वो गुब्बारे से सीधे पानी में गयी (चूँकि पानी की विशिष्ट ऊष्मा रबर से ज्यादा होती है), पानी के जो अणु गरम हुए वो हलके होकर ऊपर गए और ठन्डे अणु नीचे और यही क्रिया चलती रही ।  

बच्चों ने खुद से पोस्टर बनाए, स्वयं अपने लिए प्रयोग निर्धारित किए और उनको बड़ी रचनात्मकता के साथ किया एवं उनकी अवधारणात्मक समझ को सबके सम्मुख प्रस्तुत किया। यह देखने में अद्वितीय था कि बच्चों ने ना केवल पोस्टर बनाए और साल भर शिक्षकों के साथ किए प्रयोगों को एक नई रचनात्मकता से पुनः दुहराया अपितु उन सबके पीछे के कारणों को भी सबके सम्मुख रखा और पूरी प्रक्रिया से सबको अवगत कराया। यह मेला इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण रहा कि इसमें बच्चों के जो माता-पिता, भाई—बहिन और सम्बन्धी आए, वे सभी बच्चों में एक वैज्ञानिक देख पा रहे थे। सभी स्कूल में होने वाली इस प्रकार की अभिनव एवं रचनात्मक गतिविधियों से रूबरू हो पा रहे थे और उनमें स्कूल के प्रति एक विश्वास भी मजबूत हो रहा था, एक ऐसा विश्वास जो इस समझ पर आधारित था कि उनके बच्चे कुशल एवं रचनधर्मी हाथों में बेहतर तरीके से अपने भविष्य की ओर आगे बढ़ रहे हैं।

स्कूल शिक्षिकाएँ बच्चों की बहुमुखी प्रतिभा को देखकर बहुत खुश हुईं और बच्चों को इसके लिए बधाईयाँ दी। आगे उन्होंने बच्चों को सम्‍बोधित करते हुये कहा कि आज आप सभी वैज्ञानिकों ने पोस्टर बनाए, प्रयोग की रुपरेखा को स्वयं निर्धारित किया और स्वयं से प्रयोग किए। यह भी संभावना हो सकती कि प्रयोग से पहले आपने कुछ और सोचा होगा और प्रयोग के बाद कुछ ओर ही परिणाम आया हो। इससे हमको यह समझना होगा कि हमको कोई भी चीज इसलिए नहीं माननी चाहिए कि यह किसी ने कही है बल्कि उसके पीछे के कारणों, तर्कों, साक्ष्यो को जानकर ही मानना चाहिए। विज्ञान भी यही हमसे अपेक्षा करता है कि हम चीजों और अपने आसपास होने वाली घटनाओं को अवलोकनों, तर्कों, साक्ष्यों और प्रयोगों के आधार पर देखें, अवलोकन करें और समझें। हमारे आसपास बहुत सी घटनाएँ होती रहती हैं जिनसे हम बहुत कुछ सीख-समझ सकते हैं बस जरूरत अवलोकन और होने वाली घटनाओं को एक तार्किक नजरिये से देखने की है ।   

बच्चों ने इस मेले के द्वारा जितने रचनात्मक पहलुओं पर काम किया और जिन नए आयामों को छुआ वे सभी स्कूल शिक्षिकाओं के अथक प्रयासों, बच्चों के प्रति उनकी समझ और अपने कार्य के प्रति उनके समर्पण का ही फल था। इस प्रकार के शैक्षणिक मेले में सम्मिलित होकर मेरी यह समझ बनी कि अगर शिक्षण अथवा ज्ञान के निर्माण का स्वरुप इस प्रकार का हो जिसमें बच्चे खुद से निश्चित करें कि उनको क्या करना है, उनको अपनी रचनात्मकता को पिरोने के मौके मिलें, अपनी कल्पना को रंगों से सजाने के मौके मिलें, खुद से जानने और करने के मौके मिलें, तभी शायद बच्चों को ज्यादा से ज्यादा सीखने के मौके मिलेंगे और उनकी सीख भी विकसित होगी। इससे अपने आसपास के वातावरण के प्रति उनकी समझ का दायरा भी बढ़ेगा और उनमें एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी विकसित होगी। ये सभी उनके वैज्ञानिक बनने की प्रक्रिया के मजेदार और अपने अनुभव से सजे हुये चरण होंगें जो न केवल हमें भविष्य के वैज्ञानिक देने में मदद कर रहे होंगें बल्कि देश को एक बेहतर नागरिक भी दे रहे होंगे ।


अवनीश शुक्ला: अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन में ढाई सालों से कार्यरत हैं और गतिविधि पूर्ण विज्ञान शिक्षण एवं विज्ञान की लोकप्रियता को बढ़ावा देने को लेकर कार्य कर रहे हैं । चित्र: अवनीश शुक्ला

 

 

टिप्पणियाँ

Sunder2013 का छायाचित्र

अवनीश सर और सम्बंधित विद्यालय के शिक्षकों के साथ साथ सृजनशीलता के वाहक बच्चों को हार्दिक शुभकामनायें । ये अनुकरणीय पहल है जिसे प्रत्येक शिक्षक को अपने स्तर पर प्रयोग करने का प्रयास करना चाहिए ।

12913 registered users
5537 resources