गाँधी और उनकी शिक्षा

 

महान गाँधीवादी नेता और भारत रत्‍न से सम्‍मानित  नेल्‍सन मण्‍डेला का निधन हो गया । वे कहते हैं,

'शिक्षा वह हथियार है, जिससे दुनिया बदली जा सकती है।'

श्रद्धांजलि के रूप में प्रस्‍तुत है शिक्षा पर उनके प्रणेता महात्‍मा गाँधी के कुछ विचार।


 

दीपा ओंकार

भारत में शिक्षा की स्थिति पर हाल में हुई खोज-बीन ऐसे प्रश्नों से जूझती हुई दिखाई देती है जिनके उत्तर शिक्षाविदों, दार्शनिकों और सामाजिक सिद्धान्‍तकारों के पास आसानी से नहीं मिलते। बहस में उठने वाले कई सवाल हैं। एक सवाल यह है कि सुविधा-सम्पन्न भारतीयों को तो प्रतिष्ठित संस्थाओं में शिक्षा प्राप्त हो जाती है, लेकिन लाखों लोगों को प्राथमिक शिक्षा भी नहीं मिल पाती। शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाले दार्शनिक यह सवाल भी उठाते हैं कि क्या सम्पूर्ण इन्सान को शिक्षित किया जा सकता है, विशेष तौर से ऐसे हालात में जब प्रौद्योगिकी और बौद्धिकता के क्षेत्रों में रूझान लगातार विशेषज्ञता की ओर है? वे कौन-से साधन हैं जिनसे संवेदनशील और होनहार व्यक्तित्व विकसित किए जा सकते हैं? उदाहरण के लिए, क्या प्रतिस्पर्द्धा ज्ञानार्जन में मददगार सबसे बेहतर तरीका है? क्या शान्ति शिक्षा का एक केन्द्रीय उद्देश्य हो सकता है? इन प्रश्नों के अनुत्तरित रह जाने का कारण शायद इस दृष्टिकोण में छुपा है कि शिक्षा को सम्पूर्ण मानव से सम्बद्ध होना चाहिए – यानी सामाजिक, बौद्धिक, भावनात्मक और शारीरिक स्तर पर – न कि विभिन्न क्षेत्रों में विशेषज्ञता से।

देश के इतिहास में कुछ लोग ऐसे हुए हैं जिनके लिए ये सवाल केवल अकादमिक महत्व के नहीं थे। अधिकतर शिक्षित भारतीय सम्भवत: गाँधी जी द्वारा अपनाए गए अहिंसा, असहयोग, सत्याग्रह, स्वराज आदि के सिद्धान्तों की थोड़ी-बहुत जानकारी तो रखते ही हैं। गाँधी के लिए ये ऐसे रचनात्मक सिद्धान्त थे जिन्हें वे अपने सहकर्मियों तथा आमजन तक पहुँचाने की कोशिश में रहते थे। अहिंसक विरोध और आत्मनिर्भरता के सिद्धान्तों के माध्यम से गाँधी एक ऐसी संस्कृति की रचना करना चाहते थे जिसके तहत व्यक्ति अपने मन-मस्तिष्क में मौजूद हिंसा से रू-ब-रू हो पाए और समाज के सुधार के लिए प्रयास कर पाए। स्वयं गाँधी की रचनात्मक प्रेरणा शोषितों के हितों की पहचान और उनके साथ एक होने की इच्छा से पैदा हई प्रतीत होती है – पहले दक्षिण अफ्रीका में और फिर भारत में।

मनोविज्ञानी हॉवर्ड गार्डनर ने गाँधी की रचनात्मकता को परिभाषित करने का बहुत ही दिलचस्प तरीका विकसित किया है। गार्डनर की राय में लोगों को प्रभावित करने वाला व्यक्ति उन रचनाशील इन्सानों में से होता है जो लोगों के बड़े समूहों के मन-मस्तिष्क के साथ सम्बन्ध बनाते हुए मानव-गतिविधि का कोई नया क्षेत्र रचते हैं। उद्देश्य होता है कि लोग इस रूप में प्रभावित हों कि स्वयं और संसार के बारे में सोचना शुरू करें। प्रभाव पैदा करने वाले के पास कुछ विशेष गुण होते हैं – मुख्यत: भाषाई और वृत्तात्मक - जिनकी मदद से वे भाषा और कहानी के माध्यम से लोगों की बहुत बड़ी संख्या तक अपनी पहुँच बना पाते हैं। एक नरेटर के रूप में गाँधी का विशेष गुण यह था कि वे व्यक्ति और सामूहिक राष्ट्रीय स्वत्व की पहचान उसमें निहित अहिंसा और आत्मनिर्भरता की आरक्षित ऊर्जा से करवा पाते थे।

शिक्षा को लेकर गाँधी की दृष्टि निहित तौर पर व्यक्तिगत और राष्ट्रीय स्वतन्त्रता के विचार से जुड़ी हुई है। 1937 में गाँधी द्वारा बुनियादी राष्ट्रीय शिक्षा के रूप में प्रस्तावित नई तालीम या नई शिक्षा के केन्द्र में आजादी की परिकल्पना थी, लेकिन इसका अर्थ आत्मनिर्भरता तथा समाज के हित में काम करना भी था। वे ब्रिटिश राज के जाने के बाद एक ‘न्यायसंगत, शान्तिपूर्ण, गैर-लाभकारी सामाजिक व्यवस्था’ की स्थापना करना चाहते थे। नई तालीम की परिकल्पना एक व्यक्ति के सम्पूर्ण जीवन के लिए शिक्षा के रूप में की गई थी। एक व्यक्ति में छुपी हुई सामर्थ्य को उसके सम्पूर्ण जीवन के दौरान विकसित किया जा सकता है और प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन के विभिन्न चरणों में सम्भावनाएँ तलाशनी चाहिएँ।

प्रतिस्पर्द्धा की व्यवस्था के स्थान पर सहयोग की व्यवस्था लाने का भरपूर प्रयास किया गया। प्रतिस्पर्द्धा - यानी बच्चों को ‘प्रथम’ और ‘अन्तिम’ के रूप में आंकना - ईर्ष्या और बेईमानी का कारण बनता है। दूसरी ओर बच्चे उनकी दिलचस्पी के विषयों पर अनथक काम करेंगे – इसके लिए उन्हें किसी बनावटी उत्प्रेरक की आवश्यकता महसूस नहीं होगी। बच्चों में सहयोग की स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है। हो सकता है कि कई स्कूलों की व्यवस्था आपसी सहयोग से काम करने के लिए लम्बे समयकाल प्रदान न करवाए, लेकिन प्रत्येक कक्षा में कुछ समय बच्चों द्वारा इकट्ठे काम करने के लिए अलग से रखा जा सकता है – जैसे, गणित की कुछ समस्याओं के लिए या कला के किसी प्रोजेक्ट के लिए। फिर वे चर्चा कर सकते हैं या प्रस्तुतीकरण हो सकता है जिसमें वे बताएँ कि उन्होंने किस प्रकार कार्य किया। चर्चा को कक्षा की एक गतिविधि बनाने से उन्हें उनके साथ भी सहयोग करने और सम्पर्क में आने का मौका मिलता है जिनके साथ आमतौर पर यह नहीं हो पाता। सहयोग की यह भावना धीरे-धीरे साझेपन और शान्तिपूर्ण तरीके से मिलकर काम करने की एक संस्कृति को पैदा कर सकती है।

नई तालीम में बुनियादी शिक्षा का चरण सातवें से चौदहवें साल तक रहता है। बच्चे को हस्तशिल्प सिखाए जाते हैं क्योंकि ये इन्द्रियों के विकास और समन्वय के लिए बहुत महत्वपूर्ण  होते हैं। केवल पश्चिमी कला के तत्वों (जैसे रेखाचित्र-कला, पानी के रंगों से चित्रकारी आदि) पर ध्यान केन्द्रित करने की बजाए स्कूल बुनाई, कढ़ाई जैसे किसी शिल्प या मिट्टी के बर्तन बनाने की कला को कला की पाठ्यचर्या में शामिल कर सकता है।

वर्णमाला – विशेष तौर से अँग्रेजी वर्णमाला – को बच्चे के मन-मस्तिष्क पर नहीं थोपना चाहिए। शुरू में तो शिक्षण का माध्यम मातृ-भाषा ही होनी चाहिए। जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, उसे शारीरिक और आस-पास की स्वच्छता सिखाई जानी चाहिए। लेकिन अधिकतर स्कूलों में अकादमिक दक्षताओं में कुशलता हासिल करने के बोझ के चलते बच्चा बहुत जल्दी अपने आसपास के वातावरण से, सुन्दरता और व्यवस्थित होने के भाव से कट जाता है। और इस कारण वह अलग-थलग, उदास और भयभीत महसूस करने लगता है। यदि एक बच्चा बुनियादी शिक्षा हासिल करने के बाद कई तरह की मानसिक और हाथ की दक्षताएँ पा लेता है तो वह अपनी पसन्द के किसी भी क्षेत्र में शानदार पेशा हासिल करने की स्थिति में हो जाता है।

शिक्षा पर गाँधी के सब विचार मुख्य तौर से नैतिक सिद्धान्तों पर आधारित थे। गाँधी के जीवन के बारे में पढ़ने पर हमें महसूस होता है कि उन्होंने जो भी काम उठाया या जो भी विश्वास रखा, उसमें वे व्यक्तिगत तौर पर बहुत ही गहराई से शामिल रहते थे। लेकिन इस प्रकार की व्यक्तिगत सम्बद्धता बहुत बार एक ‘उच्च सत्य’ तक पहुँचने को अपना उद्देश्य समझती थी, और यह सत्य धार्मिक ग्रन्थों की गाँधी की व्याख्या से हासिल किया सत्य था।

यहीं से शायद गाँधी ने नैतिकता का गहरा भास पाया और सत्य के प्रति निष्ठा भी, जिससे वे अपने विद्यार्थियों को ‘प्रभावित’ करना चाहते थे। इस प्रकार विद्यार्थियों के साथ अन्त:क्रिया में वे उन मूल्यों की बात करते थे जिन्हें, उनका मानना था कि अनदेखा नहीं किया जा सकता – माता-पिता के लिए आदर, अपनी अन्तरात्मा की आवाज सुनना, ‘दिल में करुणा का होना’ और साम्राज्य से मुक्ति के लिए संघर्ष के सन्दर्भ में निडरता का होना। गाँधी ने व्यक्तिगत प्रयोगों के और उदाहरण रखने के माध्यम से जो जीया और सिखाया, उस ओर ध्यान दिया जाए तो शायद शिक्षा का रूझान सिद्धान्तों में परिवर्तन की ओर बने।  

सन्दर्भ

  1. उदाहरण के लिए, देखें The L ittle Magazine. ’The Country of First Boys’ Sen, Amartya . Vol.VI, Issue I&II Ed. Sen, Antara Dev. (नई दिल्ली, तिथि और प्रकाशक अन्जान )
  2. जे.कृष्णमूर्ति द्वारा स्थापित स्कूलों में प्रतिस्पर्द्धा और सर्वांगीण शिक्षा के मुद्दे पर बड़ी बहस छेड़ी जाती है। उदाहरण के लिए, Journal of the Krishnamurti Schools, ‘Competition and its Educational Consequences: Is there an Alternative?’ Shirali, Sailesh. Issue No.6.  Ed. Chari, Ahalya (Chennai: KFI, 2002).
  3. Gardner, Howard. Extraordinary Minds: Portraits of Exceptional Individuals and an Examination of our own Extraordinariness. “Influencer: The Case of Gandhi”. (London: Phoenix, 2002): 104 – 123.
  4. Sykes, Marjorie. Foundations of Living (Pune: Parisar, 1988): 20. नई तालीम, उसकी उत्पत्ति और दर्शन से सम्बद्ध सब बिन्दु इस स्रोत से लिए गए हैं। मगर स्कूली पाठ्यचर्या में उन्हें शामिल करने से सम्बन्धित की गई बातें इस लेख की लेखिका के विचारों पर आधारित हैं।
  5. Gandhi, Rajmohan. Mohandas: A True Story of a Man, his People and an Empire. (New Delhi: Penguin, 2006).

    दीपा ओंकार सी.एफ़.एल., बंगलौर में शिक्षक रही हैं और आजकल चेन्नई में रहती हैं, सम्पादक हैं। यह लेख टीचर प्लस के अक्‍टूबर 2007 (चिन्तक और शिक्षक) अंक में और फिर टीचर्स ऑफ इण्डिया के अँग्रेजी सेक्‍शन में अक्‍टूबर, 2013 में प्रकाशित हुआ है। अनुवाद : रमणीक मोहन

टिप्पणियाँ

manohar chamoli 'manu' का छायाचित्र

हुम्म्म ! विचारणीय और चिंतन से भरा आलेख.बधाई.

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