खुले प्रश्नों के खुले जवाब : एक शिक्षिका के कक्षा अनुभव

कई साथियों के साथ लगातार संवाद, कुछ खास तरह के अध्‍ययन और बच्चों के अवलोकन से मन में भाषा सीखने की सैद्धान्तिक प्रक्रिया को लेकर एक स्वीकार्यता बनी कि पढ़ना-लिखना सीखने की प्रक्रिया बच्चों के लिए मजेदार और अर्थ लिए होनी चाहिए। जिसमें वे पठन के दौरान उस बात को अपने अनुभवों से जोड़कर देख पाएँ। उनके बारे में सोच-विचार कर पाएँ। साथ ही पठन की प्रक्रिया मन मस्तिष्‍क में लिखे हुए शब्द-चित्रों के कुछ अर्थ गढ़ पाने में इस रूप में मददगार साबित हो, कि शब्दों और पूर्व अनुभवों को जोड़ते हुए अपने लिए कुछ नए विचार बना पाएँ। इसी प्रक्रिया के दूसरे हिस्से के रूप में यह भी समझा कि बच्चों के साथ लिखे हुए सन्‍दर्भों पर थोड़ा ठहरकर चर्चा की जाए तो भाषा सीखने की प्रक्रिया बच्चों में चिन्‍तन को शुरू करने में मददगार साबित होती है। और ये सतत अवसर बच्चों को रचनात्मक रूप में सोचने की दिशा में ले जा पाने में भी भूमिका अदा करते से नजर आते हैं। हालाँकि यह सब काफी धैर्य और खुलेपन के अलावा शिक्षक के रूप में सजग होकर बच्चों के साथ काम की माँग तो करता ही है।

दूसरा पक्ष यह भी है कि सभी बच्चे काम में रुचि के साथ पूरे समय जुड़कर भागीदारी कर पाएँ, यह परिस्थिति बनाना काफी संघर्षपूर्ण रहता है। यह अपेक्षा अपने आप में एक तरह का तनाव भी देती है। यहाँ तनाव को इस रूप में समझा जा सकता है कि काम की योजना के रूप में और किन बेहतर विकल्पों का चुनाव किया जाए जो बच्चों को चुनौतीपूर्ण भी लगें और वे मजे के साथ काम से भी जुड़ पाएँ। खैर काम करने से धीरे-धीरे यह भी समझ बनने लगी इसका हल कहीं और से या यूँ कहें कि किसी और की मदद से मिल जाए, तो 5-10 बार ऐसा कुछ हो सकता है पर हर बार ऐसे ही हो जाए, तो इस तरह तो बात नहीं बनने वाली। इन परिस्थितियों से स्वयं जूझना और जूझते रहकर कुछ नया खोजकर (विषयवस्तु, योजना और उसमें बदलाव, सामग्री और उन्‍हें अलग-अलग ढंग से काम में लेने के तौर-तरीके और इन सबके साथ बच्चों की प्रतिक्रियाओं पर चिन्‍तन) अपने काम में शामिल करते रहना ही इसका एकमात्र हल है! क्योंकि बच्चों के साथ काम की कुछ अपनी ही चुनौतियाँ हैं, जो योजना, विषयवस्तु और बच्चों की जरूरत के अनुसार हर रोज बदलते हुए स्वरूप में सामने आ खड़ी होती हैं।

पिछले दिनों इसी तरह का मौका मिला जिसमें बच्चों के साथ कक्षा–कक्ष में भाषा सीखने–सिखाने के कार्य से जुड़कर इस विचार को और भी करीब से महसूस कर पाने का मौका मिला। इसी सन्‍दर्भ में अज़ीम प्रेमजी स्कूल में कक्षा 2 ,3, 4 के बच्चों के साथ कुछ कहानियों और क्रियात्मक चित्रों पर किए काम के अनुभवों के कुछ अंश साझा करने का प्रयास कर रही हूँ।

टीला, डाकू और चोर

कक्षा 2 में ‘चिड़िया और डाकू कहानी’ सुनाने व चार्ट की मदद से अनुमान से पठन के बाद के बाद बच्चों से चर्चा की शुरुआत की गई।

आशीष ने टीले के बारे में बताया कि : जो ऊँची जगह होती है, उसे टीला कहते हैं।  उस पर चढ़कर सारा गाँव साफ-साफ दिखता है लेकिन टीला पहाड़ से कम ऊँचा होता है!

इसी कहानी में आए डाकू शब्द पर बातचीत हुई तो दिलखुश ने एक कहानी के रूप में अपना अनुभव सुनते हुए बताया कि उसने सुना है उसकी दादी के गाँव में डाकू आए थे, उनके पास बन्‍दूकें थीं। पहले गोलियाँ चलाकर उन्होंने सबको डराया फिर कई घरों से समान लूटकर चले गए।

राजवीर ने कहा : दीदी मेरे पापा मेले में गए थे, किसी ने उनकी जेब काट ली थी, और सारे पैसे ले लिए। इस पर मैंने यह सवाल समूह के सामने रखा कि राजवीर ने जो बात बताई, उन लोगों को हम क्या कहेंगे इस पर सभी बच्चे एक साथ बोल पड़े – दीदी चोर! अब सब चुप थे।  

मैंने पूछा हम किसके बारे में बात कर रहे थे – डाकुओं के बारे में। फिर मैंने बच्चों से डाकू और चोर के बारे में कुछ और जानना चाहा तो विजय ने बताया : दीदी चोर तो चुपके से चीजें चुराते है, पीछे से, कि हमें पता ही नहीं चलता। पर डाकू तो सामने आकर सब कुछ करते हैं! 

कमलेश ने जोड़ा कि डाकू तौलिए से हमेशा अपना मुँह ढके रहते हैं, ताकि कोई उन्हें जल्दी से पहचान न पाए। पायल ने कहा : दीदी चोर तो बस समान ही चुराते हैं, पर डाकुओं के पास हथियार भी होते हैं और वो तो लोगों को मार भी देते हैं!

अजय ने बताया : दीदी सर कहते हैं हमारी कक्षा में कुछ कामचोर भी हैं !

इस पर सब हँस पड़े।

मैंने पूछा कि चोर और कामचोर अलग–अलग बात है क्या? इस पर विशाल बोला,  ‘जो अपना काम न करे वो कामचोर।’ बात पूरी करते हुए गायत्री बोली, ‘कामचोर अपना नुकसान करता है और चोर दूसरों का !’

कौवा, साँप और सोने का हार

पंचतंत्र की कहानी “कौआ और सोने का हार” दिखाते हुए प्रश्नों के माध्यम से इस कहानी के घटनाक्रम के बारे में बच्चों से जानने का प्रयास किया गया। बच्चों की प्रतिक्रिया कुछ इस तरह रही।

कौआ हार लेकर कहाँ जा रहा होगा?

धनराज : अपने बच्चों के लिए।

अजय : कौवी के लिए ।

कमलेश : बेचने के लिए।  

सना : खेलने के लिए।

राधा : घर में सजाने के लिए।

तनवीर : अपने दोस्त को देने के लिए।  

विशाल : इसके बदले में खाने की कुछ चीज लाने के लिए।

कोमल : अभी तक सोच रही थी कि हार तो कौए के किसी काम का नहीं है, पर इससे कौआ कुछ अलग करने वाला है!

पायल ने समूह में पूछा कि : कौआ चुपके से भी तो हार को ले जा सकता था ?  तो सिपाही उसे मारने के लिए उसके पीछे नहीं आते। पायल की बात सुनकर दिलखुश ने कहा दीदी कौआ पागल होता है। मैंने जानना चाहा कि उन्हें ऐसा क्यों लगता है? इस पर धनराज बोला : तभी दीदी वो गंदी चीजें ही खाता है, गोबर में चोंच घुसाता रहता है। 

इस बातचीत से मैं अंदाजा लगा पा रही थी कि उनका मतलब क्‍या हो सकता है। तभी विजय बोल पड़ा : दीदी कौआ कामचोर भी होता है!  क्योंकि वह अपने अण्‍डे कोयल के घोंसले मे रख आता है, अपने बच्चे खुद क्यों नहीं पालता ?

लेकिन कहानी देखने के बाद कौए के हार लाने के बारे में आशीष, कोमल, विशाल आदि बच्चों ने मिलकर यह प्रतिक्रिया दी : कि कौआ साँप को मारने के लिए हार लेने गया था। उसने हार को लाकर साँप के बिल में डाल दिया और सिपाही ने हार लेने के लिए साँप को मार दिया। इससे कौए कि परेशानी दूर हो गई। अब वह आराम से रह सकता था। किरन ने पायल के सवाल पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अगर कौआ सिपाहियों के सामने हार लेकर नहीं उड़ता, तो वे साँप के बिल तक कैसे पहुँचते ? और फिर साँप कैसे मरता, साँप नहीं मरता तो कौए को हार उठाकर लाने से क्या फायदा होता !

मनीष ने बताया कि इस कहानी में उसे साँप बहुत बुरा लगा। क्योंकि उसने कौए के परिवार को बहुत सताया था। राधा ने बताया कि इस कहानी में उसे कौए का व्यवहार अच्छा लगा क्योंकि उसने अपने दुख को दूर करने के लिए इतना सोचा ! तभी तो ये तरीका ढूँढ़ पाया, नहीं तो साँप कभी नहीं मरता ! इस पर अमन ने बताया कि साँप कौए के अण्‍डे नहीं खाता तो कौआ कभी साँप को मारने की नहीं सोचता और फिर दोनों के परिवार मजे से दोस्ती के साथ रहते। फिर दोनों मिलकर खाने के लिए कुछ ढूँढ़ने जाते।

इस बात को आगे बढ़ाते हुए तनवीर ने कहा : अगर कौआ दिमाग नहीं लगाता तो वो पेड़ की और ऊँची डाली पर जाकर घोंसला बना लेता!  इस पर सना ने कहा : साँप तो वहाँ भी आ जाता फिर तो उसे हमेशा के लिए अपना घोंसला छोड़कर कहीं  और जाना पड़ता। घोंसला बनाने के लिए अच्छी जगह ढूँढ़नी पड़ती, फिर से मेहनत करनी पड़ती अपना नया घर बनाने के लिए। घर बनाना इतना आसान थोड़े न होता है!

मैंने बच्चों के बीच एक सवाल रखा कि साँप के साथ क्या करते ? इस पर अजय ने कहा कि मैं तो उसे पत्थर मार-मार के मार डालता ! आशीष ने कुछ सोचकर बताया कि वह साँप के बिल के पास बहुत सारी आग लगा देता जिससे साँप डरकर बिल छोड़कर भाग जाता !

बिल्ली, चील और चिड़ियों का झुण्‍ड 

कक्षा 4 के बच्चों को पंचतंत्र की कहानी  “चालाक बिल्ली”  दिखाकर जब उनसे इस कहानी पर अपनी राय जाहिर करने को कहा गया तो बच्चों ने अपनी राय कुछ तरह व्यक्त की ।

मीनाक्षी : दीदी मुझे ये कहानी अच्छी नहीं लगी। इस कहानी में चील के साथ जो व्यवहार हुआ, उसे उस अपराध की सजा भुगतनी पड़ी, जिसे करने के बारे में वह कभी सोच भी नहीं सकती थी। चिड़ियों के समूह में से किसी भी चिड़िया ने चील को सजा देने से पहले एक भी बार ये जरूरी नहीं समझा कि वे चील से सही कारण के बारे में पूछें या उसे एक बार अपनी बात कहने का मौका दें। उसकी बात सुने बिना ही उसे ऐसे मार दिया। ये भी नहीं सोचा वह चील पिछले कितने समय से उन सभी के बच्चों की देखभाल कितने ध्यान से कर रही थी। आज से पहले तो उनके बच्चों को कभी कोई नुकसान नहीं पहुँचा था! उसके व्यवहार के बारे में विचार किए बिना ही, कारण जाने बिना ही उसे सजा दे दी गई। ये तो ठीक नहीं था!

कक्षा 3 की निशा : दीदी हमें बिल्ली वैसे तो बुरी ही लगी क्योंकि इतने छोटे बच्चों को भी चट कर गई। वो तो कितने मासूम थे। पर जंगल में और कुछ भी तो नहीं था बिल्ली के खाने के लिए। घरों में भी उसे दूध या रोटी कुछ भी नहीं मिलता था खाने के लिए। घास तो उसे अच्छी नहीं लगती होगी। तो उसके पास कोई और रास्ता भी तो नहीं था! (और यह कहते कहते उदास होने लगती है।)

वरुण : इस कहानी में चतुराई देखी जाए तो बिल्ली ने सब जगह खूब दिमाग का इस्तेमाल किया। उसने अपनी चालाकी से चिड़िया के बच्चों को खा लिया, जिसका जिम्मेदार चील को समझा गया। बिल्ली के हिस्से की सजा चील को मिली। चिड़ियों ने भी बिना चील की बात सुने ही उसे सजा दे डाली। उनका ये निर्णय गलत था क्योंकि सही निर्णय तो तभी होता, जब कम से कम एक बार चिड़ियाँ चील से अपने बच्चों को मारने की वजह तो पूछ लेंती।

शुभम : बिल्ली बहुत चालाक तो थी। उसने बच्चों को मारा इसलिए वह हमें बुरी भी लगती है। लेकिन उसे भी तो अपना पेट भरना था, इसलिए अपनी भूख मिटाने के लिए उसे ये सब करना पड़ा। चील तो बिल्ली के बारे में पहले से ही जानती थी कि उसका व्यवहार कैसा था, फिर उस पर भरोसा करने से पहले ये तो सोचना चाहिए था कि किसी का व्यवहार एकदम से कैसे बदल सकता है! इस बात के लिए उसे सजा मिली। चिड़ियों ने भी बिना समझदारी के गुस्से में आकार निर्णय कर दिया।  गुस्से में तो कभी कोई भी निर्णय ठीक नहीं हो सकता !

चेतना : मुझे चील का व्यवहार बहुत अच्छा लगा। वह कितनी जिम्मेदारी से सभी चिड़ियों के बच्चों कि देखभाल करती थी, तभी तो वे चिड़ियाँ अपना खाना ढूँढ़ने बेफिक्र होकर जा पाती थीं। बदले में सभी चिड़ियों ने अपने खाने में से थोड़ा–थोड़ा हिस्सा चील को देकर उसकी मदद की थी। इससे दोनों को एक-दूसरे को बराबर मदद मिल रही थी।

प्रिया : दीदी चील बहुत अच्छी थी वह दिन भर बच्चों का ध्यान रखती, कहीं भी नहीं जाती थी। उसका मन करता तो वो सो भी सकती थी, चिड़ियाँ थोड़े ना आतीं उसे देखने के लिए। उसने अपना काम पूरी ईमानदारी से किया। बिल्ली को भूख लगी थी, इसलिए उसने बच्चों को खाया। अपनी भूख मिटाने के लिए उसने चील से बार–बार कितना झूठ बोला, उसे धोखा दिया यह बहुत बुरा लगा। वह सीधे भी तो चील से कह सकती थी कि मुझे कुछ बच्चे दे दो खाने के लिए। पर पता नहीं तब चील उसे बच्चे देती या नहीं। शायद वो भूखी रह जाती।

अर्चना : चिड़ियों ने चील को देखकर अपने-अपने खाने में से थोड़ा-थोड़ा थोड़ा हिस्सा देकर उसकी मदद की। वह इतनी बूढ़ी हो गई थी कि अपने लिए शिकार करके नहीं ला सकती थी। फ्री में खाना खाने के बजाए इसके बदले में चील ने उनके बच्चों की देखभाल करने में मदद की, तभी तो चिडि़याँ खाना ला पाती थीं। लेकिन बिल्ली किसी मरे हुए जानवर को खाकर भी तो अपना पेट भर सकती थी या चील से सच भी तो बोल सकती थी कि मैं भूखी हूँ। शायद चील उसे खाना ढूँढ़ने में मदद करती, या चिड़ियाँ भी उसे पाने खाने में से कुछ हिस्सा दे सकती थीं।

बरखा सीरीज की पुस्तक ‘तोता’ पढ़ने के बाद शुभम ने बताया कि वो इस कहानी को सुनाना चाहता है व इस कहानी के बारे कुछ बताना चाहता है क्योंकि यह कहानी उसे थोड़ी खास लगी है! खैर कहानी सुनने के बाद शुभम ने अपनी बात को जिस शैली में धारा प्रवाह सबके साथ साझा किया वह मुझे भी कुछ मायनों मे खास लगा।

शुभम : इस कहानी में चोट लगे तोते की देखभाल माधव और काजल ने बड़े खास तरह से की, वैसे तो हम सभी को जीवों की देखभाल करनी ही चाहिए। पर तोसिया और माधव ने इस बात का बिलकुल ध्यान रखा कि तोता उनसे डर रहा है। इसलिए डर के मारे भागने की वजह से उसे और ज्यादा चोट लग सकती है इसलिए उन्होंने इस बात का पूरा ध्यान रखा कि तोता फिर से कोई डर महसूस न करे। इसलिए वे चुपके से तोते के जरूरत की चीजें खाने के लिए उसके पास ले जाते। वे दोनों छुपकर तोते को देखते रहते ताकि जरूरत पढ़ने पर तोते की मदद कर पाएँ। ठीक होने तक तोता कई दिनों तक साथ रहने के कारण वे तोते से प्यार करने लगे थे। शायद वे उसे सच में प्यार कर पाए थे, तभी तो वे यह महसूस कर रहे थे कि उस तोते के लिए सबसे सही जगह जंगल है, क्योंकि वहाँ पर ही वह अपनी मर्जी का जीवन जी सकता है। और वह वहीं पूरी तरह खुश महसूस करेगा। इसलिए वे उसे जंगल में छोड़ने की बात सोच पाए। लेकिन हम होते तो ऐसे सोचते कि चलो इसे पाल लेते है, हम अपना फायदा देखते। लेकिन पिजरें में तो कोई भी जीव कैसे खुश रह सकता है, चाहे हम उसे कितना ही प्यार करें, आजादी तो सबको चाहिए न। शायद माधव और काजल को यह बात पता थी। (वह अपनी बात पूरी करके लम्‍बी साँस लेता है चेहरे पर आत्मविश्वास के साथ मुस्कुराहट तैर जाती है।)

बच्चों की अपनी कल्‍पना  

इसी तरह एक दिन बच्चों से चित्र दिखाकर बातचीत की तो बच्चों ने चित्रों पर वाक्य, जुड़े अनुभव अपने शब्दों में साझा किए। फिर उन्‍हें ‘दूध जलेबी जगग्गा’ से कुछ कविताएँ पढ़ने को दीं और उन पर पठन के बाद बच्चों से इस पर उनके अनुभव सुने। तो बच्चों ने कहा : दीदी ये बातें तो छोटी कविता के जैसी लगती हैं!

बातचीत और पठन से वे इस अन्‍तर को महसूस कर पा रहे थे। चित्र देखकर उस चित्र के बारे में वे जो बता रहे थे वह बात किसी वाक्य के रूप में ही थी। लेकिन जब उन्ही चित्रों पर लिखी पंक्तियों को पढ़ा तो उन्‍हें लगा इन पंक्तियों को लिखने वाले ने काफी सोचा होगा इस चित्र के बारे में! जो कोशिश स्वयं बताते समय उन्होंने नहीं की थी। बातचीत के बाद बच्चों से सहमति लेते हुए उन्हें कुछ चित्र वाली वर्कशीट दी गई व कहा गया कि वे भी उन चित्रों पर कुछ सोचकर लिखने की कोशिश कर सकते हैं। चित्रों पर बच्चों की प्रतिक्रियाएँ कुछ इस तरह देखने को मिलीं -

प्रिया : मूँछें हैं इसकी मतवाली, फिर भी हमसे डरती है!

अजय : चूजे और बकरी में हुई लड़ाई, लोहे से बनती है काली कढ़ाई!

शुभम : करता हूँ मैं भाऊँ–भाऊँ, फिर भी दिन भर मार खाऊँ!

कुलदीप :  बॉल जोर से आया, मैंने शॉट लगाया।

महेंद्र : हूँ मैं एक प्यारी सी बिल्ली, है मुझे है फूलों से प्यार

      हूँ मैं एक छोटी सी गुड़िया, है मुझे खिलौनों से प्यार

      हूँ मैं एक नन्ही सी बच्ची, है मुझे साइकल से प्यार

      हूँ मैं एक छोटी सी मछली, है मुझे समुद्र से प्यार 

      हूँ मैं एक खरगोश, है मुझे गाजर से प्यार

      मैं हूँ एक गिलहरी, है मुझे अपने बच्चे से प्यार ”

कक्षा-कक्ष प्रकियाएँ

बच्चों के साथ काम की प्रक्रिया की बात की जाए तो काम के उद्देश्य व बच्चों की आवश्यकता के अनुसार बच्चे सामूहिक व उपसमूह दोनों ही प्रक्रियाओं के तहत काम करते हैं। पाठ्यपुस्तक के अलावा पठन हेतु अन्य पुस्तकों से बच्चों की आवश्यकतानुसार गीत, कविता, कहानियाँ को बच्चों के साथ साझा करने की कोशिश रहती है, ताकि पठन सामग्री में मिलने वाली विविधता से बच्चों का आमना-सामना सतत प्रक्रिया के रूप में होता रहे। साथ ही यह मकसद भी होता है कि पठन सामाग्री उन्हें अपनी ओर आकर्षित कर पाए इससे वे सीखने में एक आनन्‍द भी महसूस कर पाएँ। बच्चे पुस्तकों से कहानियों, चित्र कथाओं, बालगीतों का पठन करते हैं। पुस्तकों की जटिलता के क्रम में काम को ठीक से व्यवस्थित करने हेतु उपसमूह बनाए तो जाते हैं, पर यह पूरी तरह छूट होती है कि अपनी रुचि व जरूरत के अनुसार दूसरे समूह में जाकर भी अपनी मनपसन्‍द किताब चुनकर पढ़ सकते हैं। कोई कहानी बच्चों को पसन्‍द आ जाए तो एक ही कहानी को बच्चे कई बार पढ़ना चाहते हैं। पर उनसे बात की जाए तो वे ये भी समझ पाते हैं कि फिर उन्हें दूसरी किताबों में छुपी कहानियों के बारे में कैसे पता चल पाएगा। इसलिए और किताबें भी पढ़ना भी उतना ही जरूरी है! पढ़ते समय कुछ बच्चे स्वतंत्र रूप से पढ़ पाते हैं, कुछ धीरे-धीरे पढ़ते हैं, एक से अधिक बार पढ़ते है। कुछ बच्चे अकेले किसी कोने में बैठकर, तो कुछ सीढ़ियों पर जाकर पढ़ना पसन्‍द करते हैं, तो कुछ अपने दोस्तों के साथ मिलकर उनसे बातचीत करते हुए। कुछ बच्चे पढ़कर समूह में कहानियाँ सुनाना पसन्‍द करते हैं, तो कुछ उन कहानियों के बारे में अपनी बात कहना पसन्‍द करते हैं। कुछ बच्चे पठन के आधार पर विषय वस्तु पर प्रश्न तैयार करके लाते हैं और समूह में पूछते हैं, तो दूसरे बच्चे उन प्रश्नों पर प्रतिक्रिया देने में रुचि व उत्साह दिखाते हैं। कोशिश बस यही रहती है कि बच्चे ज्यादा से ज्यादा अपनी बात को अपने शब्दों में कह पाएँ।

कहानी या अन्य विषयवस्तुओं पर काम करते समय यह प्रयास जरूर रहता है कि जो भी सन्‍दर्भ काम में लिया गया है उसकी मदद से ठीक ठाक स्वरूप में बच्चों के बीच एक संवाद जरूर हो पाए। हर सामग्री स्वयं में अपने तरह का एक सन्‍दर्भ लिए तो होती ही है, पर पठन सामग्री के चुनाव से भी काफी हद तक यह सुनिश्चिचित किया जा सकता है कि इसके माध्यम से बच्चों को संवाद कर पाने और सोचने के अपेक्षित और रूचिपूर्ण अवसर दिए जा सकें। इसके लिए कहानी सुनते-सुनाते समय बच्चों से आगे की घटनाओं के बारे में पूछना, घटनाओं के कारणों पर बच्चों की राय जानना, पात्रों की भूमिका पर बच्चों से बातचीत और कहानी में होने वाली घटनाओं को तोड़-मरोड़ कर देखने की कोशिश आदि अवसर देते हैं, जहाँ बच्चे को आसानी से अपनी बात कहने का जरिया मिल पता है। साथ ही अपने मन से कहानी निर्माण कर बताने के कार्य में बच्चों के पास अपने पसन्‍द के पात्र चुनने, सन्‍दर्भ चुनने और अपने मन से उन घटनाओं को घटाने का आनन्‍द मिल पाता है। इस प्रक्रिया में कुछ अच्छे अपने विचार को लिखने का प्रयास करते हैं। तो कुछ बच्चे अपने विचारों का चित्रण भर ही कर पाते हैं। बच्चों के लेखन में अशुद्धियाँ रहती हैं, उसे दुरुस्त करने की कोई बहुत ही सायास कोशिश तो नहीं रहती, पर ज्यादा महत्वपूर्ण ये बात लगती है कि बच्चे अपने विचार को अभिव्यक्त कर रहे हैं। लिखना सीखने पर चिन्‍तित होने के बजाय इस विचार पर सहमति है कि लिखना एक तकनीकी कौशल है, समय दर समय ये ठीक होता जाता है। 

जो मैंने पाया                            

बच्चों के साथ हुए ये अनुभव फिर से मुझे इस विचार की गहराई तक जाने करने के लिए मजबूर करते हैं कि भाषा चिन्‍तन प्रक्रिया में किस तरह एक जरूरी हथियार की भूमिका निभा पाती है। एक अच्छा सन्‍दर्भ (कहानी, घटना, बच्चों के अपने अनुभव, कविता) बच्चों के साथ संवाद के कई तरह के आयाम खोल पाता है, यह बात इस मायने में भी महत्वपूर्ण लगती है कि अलग-अलग सन्‍दर्भों का पठन और उन पर बातचीत लिखित शब्दों में और ज्यादा अर्थ भरकर उसे जीवन से ऐसे जोड़ देते हैं कि लगता है वे शब्दों को सुनने भर से ही उन्‍हें महसूस करने लगते हैं। जैसे सोचकर देखिए किसी पुराने गीत की एक पंक्ति सुनकर ही हम कैसे बीते समय को जीकर फिर वापस आज में लौट आते हैं ! कभी किसी अच्छी कहानी को पढ़कर हम कैसे जीवन के घटनाक्रम को एक बार फिर से जी उठते हैं! क्योंकि देखा जाए तो वास्तविकता में तो शब्दों का कोई अर्थ नहीं होता ही नहीं है। वे तो हम सबके लिए लिखित प्रतीक भर होते हैं। जिन्हें कुछ ध्वनियों से जोड़कर हम सुनने योग्य बना पाते हैं, पर हर शब्द को जीकर उसमें अर्थ भरना पड़ता है। लगातार अलग-अलग घटनाक्रमों की यात्रा करते हुए शब्दों के अर्थ धीरे-धीरे समृद्ध होते चले जाते हैं। और फिर सुनी हुई या पढ़ी हुई बात से मन पर उस बात के बारे में एक अलग तरह का छाया चित्र उकेरने लगता है। तभी तो किसी एक घटना हर किसी में मन में अलग- अलग छाप छोड़ती है। क्योंकि उस बात के बारे में हमारे परिवेशीय अनुभव एक नया अर्थ सृजित करने में अपनी भूमिका अदा करते हैं।

अलग-अलग मजेदार सन्‍दर्भों को सुनकर, पढ़कर और उन पर संवाद करने से बच्चे परिस्थितियों के बारे में अन्‍दाजा लगाते हैं, अनुमान से घटनाएँ गढ़ते हैं, घटनाओं के क्रम में सम्‍बन्‍ध देखने की कोशिश करते हैं, कार्य कारणों के आधार पर सटीक तर्क करने की दिशा में सोचते हैं और उनके अनुभव के आधार पर उनकी व्याख्या करते हैं। जैसे – निशा ने कहानी की पात्र “ बिल्ली” के बारे में उसे पसन्‍द ना करने की बात भी एक सहजता के साथ कही, और नापसन्‍द होने के बावजूद भी उसके पक्ष को ध्यान से देखने की कोशिश की कि किस तरह उन बच्चों को खाकर अपनी भूख मिटाना उस बिल्ली के लिए आखिरी विकल्प रहा होगा। बातचीत की इस प्रक्रिया में किसी विचार को लेकर उसे उचित-अनुचित के रूप में स्वीकारने या कहें कि उसे सही-गलत के रूप में निर्धारित कर देने के बीच में जो सब घट रहा होता है वह सबसे महत्वपूर्ण लगता है।

ऐसे ही शुभम ने कहानी के घटनाक्रम को जिस तरह विश्लेषित किया कि “बिल्ली पर भरोसा करने से पहले से चील को ये तो सोचना चाहिए था कि किसी का व्यवहार एकदम से कैसे बदल सकता है! इस बात के लिए उसे सजा मिली। और चिड़ियों ने बिना समझदारी के गुस्से में आकार निर्णय कर दिया।” यहाँ शुभम की बात पूरी तरह विवेक सम्मत लगती है।

इसी तरह वरुण की बात भी तर्कपूर्ण है कि “बिल्ली ने सब जगह खूब दिमाग का इस्तेमाल किया, लेकिन उसने अपनी चालाकी से चिड़िया के बच्चों को खा लिया, जिसका जिम्मेदार चील को समझा गया और बिल्ली के हिस्से की सजा उसे मिली। और चिड़ियों ने बिना चील की बात सुने बिना ही उसे सजा दे डाली, उनका ये निर्णय गलत था क्योंकि सही निर्णय तो तभी होता, जब कम से कम एक बार चिड़ियाँ चील से अपने बच्चों को मारने की वजह तो पूछ लेती”।

यहाँ गहराई से महसूस किया जा सकता है कि बच्चों के साथ इस तरह के संवाद सुनी बात, लिखित सन्‍दर्भ और उनके जीवन अनुभवों के बीच एक ऐसे लचीले पुल की तरह काम करते हैं, जहाँ बच्चे गिरते, सम्हलते, थोड़ा सहारा लेते हुए शब्दों से खेलने के लगातार प्रयास करते हैं। और अलग परिस्थितियों के अपने–अपने लिए नए परिदृश्‍य खोजने की इस कोशिश में चले जाते हैं, जहाँ से वे अपने विचारों को मनचाहे रूप रंग का आकार देने की चाह में जुटकर चिंतनशील होते नजर आते हैं। यहाँ से सोच-विचार के कौशल को जरूरत भर खाद-पानी मिलते रहने का जरिया खुलता-सा नजर आता है।

इस प्रक्रिया के दौरान बच्चे अपने मन में आई बात को साझा करने के लिए एक तरह का खुलापन महसूस करते हैं, इसलिए वे वो सब कुछ साझा कर पाते हैं, जो वे कहना या बताना चाहते हैं। कुछ बच्चों की पहल से अन्य बच्चों के आत्मविश्वास को भी एक खास तरह का संबल मिल रहा होता है, और एक तरह का उत्साह भी महसूस करते हैं, कि मैं भी एक नई बात सोचकर बता सकता हूँ। मुझे लगता है वरुण, शुभम, प्रिया, चेतना, निशा आदि बच्चों में एक तरह की सोच-विचार कर पाने की एक शैली धीरे-धीरे अपना आकार ले रही है, जिससे वे सुने हुए विचारों के बारे में सहमति या असहमति की कुछ पर्याप्त वजहें या कहें अपने स्तर के तर्क देख पातें हैं, और उन्हें उतनी ही सहजता के साथ अपना पक्ष रखते समय साझा भी कर पाते है। इन बच्चों के अपनी बात कह पाने के इस अन्‍दाज से मुझे लगता है कि वे परिस्थितियों और विकल्पों के चुनाव करने में और निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी करने के दौरान एक तरह की सजगता के साथ अपनी भूमिका अदा कर पाने की क्षमता को हासिल करने की दिशा में बढ़ रहे हैं।


अलका तिवारी, अज़ीम प्रेमजी स्‍कूल, टोंक, राजस्‍थान  

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