कहानी से शिक्षण

कहानी शिक्षण का एक महत्वपूर्ण अंग है। हम अगर ये कहें कि कहानी से पढ़ाना बहुत ही सरल हो जाता है तो गलत न होगा। परन्तु यहाँ सोचने वाली बात यह है कि कहानी को बच्चों तक कैसे पहुँचाया जाए? जिससे कहानी बच्चों को रोचक भी लगे और साथ ही साथ वो बिना बोझ के सीख भी पाएँ।

इन सब सवालों के उत्तर को खोजने के लिए मैं आपको अपने कक्षा शिक्षण की एक घटना से अवगत कराना चाहता हूँ। मैं कक्षा 2 में बच्चों को हिन्‍दी पढ़ाता था। जैसा आप सभी जानते हैं कि छोटे बच्चे कहानी सुनने के लिए हमेशा अधीर रहते हैं। कहानी में बच्चे इतने खो जाते हैं कि मानो कहानी का नाट्य रूपान्तरण उनके सामने हो रहा हो। मैं भी एक कहानी को लेकर उनकी कक्षा में चला गया। मेरी कहानी बहुत छोटी थी पर मुझे अपने में ये विश्वास था कि मैं कहानी को बच्चों के परिवेश से जोड़कर उसे और विस्तार दे पाऊॅंगा। कहानी मैंने शुरू कर दी, कहानी का शीर्षक बिना बताए। मेरी हमेशा ये कोशिश रही है कि कहानी का नाम आरम्‍भ में न बताया जाए।

अब हम भी कहानी की ओर बढ़ते हैं। कहानी एक गाँव की है जहाँ एक मोटा पहलवान आदमी रहता था। वो इतना ताकतवर था कि पूरा गाँव उससे डरता था। वो सारे गाँव वालों को डराकर उनसे खाना-पीना, रुपए पैसे,जेवरात और बहुत-सा सामान हड़प लेता था। उसके डर से गाँव वाले सारे परेशान थे। उस पहलवान को देखकर हर कोई डर से कुछ भी नहीं कह पाता था। कभी कोई उससे कुछ कह देता, तो वो उसे पटक-पटककर घायल कर देता था। ऐसे ही कई दिनों तक चलता रहा। एक दिन उस गाँव में मोहन आया जो अपने नाना-नानी के घर आया था। वो दुबला-पतला पर होशियार बहुत था। जब उसे गाँव वालों से उस पहलवान के बारे में पता लगा तो उसे बहुत दुख हुआ। और उसने गाँव वालों को उस पहलवान से छुटकारा दिलाने के लिए उपाय खोजने का निश्चय किया।

बहुत सोचकर वो एक दिन पहलवान के घर गया, और पहलवान से बोला एक सप्ताह बाद तुम मुझसे कुश्ती लड़ोगे और यदि तुम हार गए तो तुम्हें ये गाँव को छोड़कर जाना होगा। और यदि मैं हारा तो तुम जो सजा देना चाहो दे सकते हो। पहवान उस पर हॅंसा और बोला इतना पिद्दी सा मुझसे कुश्ती लड़ेगा। चल भाग जा यहाँ से नहीं तो अभी तेरी चटनी बना दूँगा। मोहन बोला सोच लो डर गए क्या जो लड़ना नहीं चाहते। अब पहलवान को गुस्सा आ गया और उसने कहा ठीक है। एक हफ्ते बाद तेरी खैर नहीं। जब गाँव वालों को ये पता चला तो वो मोहन के पास आए और उसे समझाया कि वो पहलवान तुझे मार देगा, तू यहाँ से भाग जा। हमारे लिए तू अपनी जान जोखिम में मत डाल। पर मोहन नहीं माना। देखते-देखते वो दिन आ गया जब कुश्ती होनी थी। एक बड़े से मैदान में जिसके चारों ओर ऊॅंची दीवार थी, वहाँ पहलवान व दुबला पतला लड़का मोहन आ गए। धीरे- धीरे गाँव वाले भी वहाँ पहुँच गए। सब बड़े दुखी थे कि आज पहलवान मोहन के साथ पता नहीं क्या करेगा? मोहन को सबने समझाया, पर वो नहीं माना अब भगवान ही उसे बचा सकता है।

पहलवान ने एक बार फिर मोहन को माफी माँग गाँव छोड़ देने को कहा पर मोहन अपने फैसले पर अडिग था। मोहन पहलवान से बोला, पहलवान जी कुश्ती तो रोज ही करते हैं चलो आज क्यों ना एक खेल खेलें जो हारेगा वो गाँव को छोड़कर चला जाएगा। पहलवान पहले माना नहीं पर जब बार-बार कहा गया तो उसने खेल खेलना स्वीकार कर लिया। मोहन ने अपनी जेब से रूमाल निकाला और पहलवान को देते हुए बोला कि आप इसे इस दीवार के दूसरी तरफ फेंक देंगे तो आप जीत जाएँगें, नहीं फेंक पाए तो आप हार जाएँगे। पहलवान ने कहा कि ये रूमाल तो मैं  एक सेंकड में ही फेंक दूँगा और फिर तेरी खैर नहीं। यह बात सुनकर सारे गाँव वाले सोच में पड़ गए। आखिर ये लड़का कर क्या रहा है। पहलवान ने पूरी ताकत लगाकर रूमाल को ऊॅंचा फेंका पर ये क्या रूमाल थोड़ी दूर जाकर वापस पहलवान के पास आ गया। पहलवान ने फिर जोर लगाकर रूमाल उछाला पर वो फिर वापस आ गया। पहलवान ने कई बार रूमाल को दीवार के पार फेंकने की कोशिश की, पर वो कामयाब नहीं हो पाया। वो पसीने से तरबतर होकर थक गया था। निराशा के कारण उसे बहुत गुस्सा भी आ रहा था। वो पूरी तरह जब थक गया तो गुस्से में उसने लड़के से कहा चल जरा तू इस रूमाल को बाहर फेंककर दिखा नहीं तो मुझसे माफी माँग और भाग जा। लड़का हॅंसते हुए बोला पहले जरा मुझे भी रूमाल फेंकने दें, फिर देखते है कौन भाग कर जाएगा।

मैंने यहाँ पर रूककर बच्चों से एक सवाल किया कि आप बता सकते हैं लड़के ने क्या किया होगा? कैसे रूमाल बाहर फेंका होगा? बच्चों ने अपने-अपने अनुमान बताए-

  • लड़के को गाँव वालों में से सबसे ऊँचे आदमी ने कन्धे पर बिठाया होगा। फिर मोहन ने रूमाल फेंक दिया होगा।
  • वो भाग गया होगा।
  • वो नहीं फेंक पाया होगा।

इसी तरह से बच्चों ने कई अनुमान और उपाय बताए। उन उपायों पर बात कर कहानी को आगे बढ़ाया गया। दरअसल लड़के ने रूमाल के अन्दर एक पत्थर बाँधकर फेंका तो रूमाल सीधे दीवार के पार चला गया।

कहानी का समापन होते ही बच्चों से बातचीत शुरू हो गई। कहानी का नाम तो बताया ही नहीं था। तो बच्चों से ये सवाल किया गया कि यदि आप कहानी के लेखक होते तो कहानी का क्या नाम रखते? इसके उत्तर में बच्चों से कई नाम मिले :

  • मोटा पहलवान
  • पहलवान की हार
  • मोहन जीत गया
  • पतलू की जीत
  • पहलवान का डर
  • पहलवान गाँव छोड़कर भागा
  • दिमाग का काम
  • मोटू-पतलू में कुश्‍ती
  • रूमाल की कहानी

वो खुलकर अपनी कल्पना से कहानी के नाम बता रहे थे। इस तरह कहानी को आगे बढ़ाने का क्रम भी शुरू हुआ। हारने के बाद पहलवान कहाँ गया होगा? गाँव वालों ने मोहन को क्या दिया होगा? आप मोहन की जगह होते तो क्या करते?

ये सारे प्रश्न बच्चों की कल्पना के द्वार खोल देती है। और वो तरह-तरह के उत्तरों से हमें अवगत कराते हैं। तो हम देख सकते हैं कि एक कहानी बच्चों को किस तरह से जोड़ते हुए उन्हें आगे बढ़ाती है।

कहानी को पढ़ाने में कुछ बिन्‍दु महत्वपूर्ण हैं-

  • कहानी रोचक हो।
  • कहानी को सुनाने मे हाव-भाव तथा उतार चढ़ाव हो।
  • बच्चों के स्तर की कहानी हो।
  • कहानी का नाम पहले ना बताकर अन्त में बच्चों को स्वयं कहानी के नाम बतानें दें।
  • आवश्यकतानुसार कहानी को विस्तार देने की कला आप में हो।
  • किताब से सुनाने के बजाए आप स्वंय कहानी को सुनाएँ तो बच्चे ज्यादा रूचि से सुनते हैं।
  • कहानी से बच्चों का जुड़ाव होना जरूरी है।

प्रमोद काण्डपाल, शिक्षक,अज़ीम प्रेमजी स्कूल मातली, उत्तरकाशी, उत्‍तराखण्‍ड

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