कविताओं के बहाने से

घोंसला बनाने में, हम यूँ मशगूल हो गए !

उड़ने को पंख भी थे, ये भी भूल गए !!

ये पंक्तियाँ आज की भागदौड़ भरी जिन्‍दगी में बहुत सटीक साबित हो रही हैं। कल के लिए हम कहीं अपना आज का आनन्‍द और सुख तो नहीं खोते जा रहे ? ये खलने लगता है जब या तो हम अपने जीवन के पिछले पलों को याद करते हैं या बच्चों के साथ काम करते हुए उन्हें बारीकी से देखते और स्वयं से तुलना करते हैं। कुछ ऐसा ही मैंने भी शैक्षिक कार्य के दौरान महसूस किया। इस एहसास ने मुझे फिर से बच्चा बनाया ! एक बार बच्चों के साथ बच्चे बनकर तो देखिये ! वे खुद भी आपके और करीब आते जाएँगे। इसको मैंने कक्षा कक्ष में प्रत्यक्ष रूप से अनुभव किया।      

रोज काम करने के ढंग में बदलाव के साथ हँसते–गाते, उछलकूद करते कक्षा की शुरुआत हमने कवि प्रदीप शुक्ल रचित  “गाँव – शहर” कविता वाचन से की। कविता को जब भाव-भंगिमा के साथ गा रहे थे तो कुछ बच्चे तो पूरी मस्ती में खो चुके थे। जिनसे कविता को समझ पाने की उम्मीद नहीं थी, वे विद्यार्थी ही प्रश्न करने पर सबसे ज्यादा उत्साहित नजर आ रहे थे। मैं तो अचम्भित थी क्योंकि मेरे दिमाग ने मुझे ये संकेत दे दिया था कि जिनको स्तरानुसार पढ़कर समझने में समय लगता है, जो कक्षा में अपने साथियों को भी ध्यान नहीं देने देते वे कविता को कैसे समझ सकते हैं ? पर यहाँ तो मेरी सोच से उलट ही था। मैं सर्वथा गलत थी। सभी कविता वाचन करते हुए आनन्‍द से झूम रहे थे यानी कि सभी समझ रहे थे। कुछ का तो मानो अपने पर नियंत्रण भी नहीं था। वे बार-बार कविता की पंक्तियाँ दोहराते और साथ – साथ नृत्य भी करने लगते। अब उन्हें चुप रहने, कक्षा व्यवस्थित करने को नहीं कहना पड़ता। वे रोज नई कविता गाने को कहते हैं। अगर मैं यूँ ही कह दूँ कि आज कविता बैठे–बैठे ही गाएँगे, तो वे जिद करते हैं और खड़े होकर हाव–भाव से नाचते–कूदते कविता गाना चाहते हैं। इस गतिविधि ने मुझे भी रोमांचित किया है। एक ओर अब हर बच्चा इस गतिविधि में भाग लेता है और अपने आप में व्यवस्थित भी रहता है।

“दीदी की कविता बहुत अच्छी है.........” यह कहकर उसके अच्छे होने का कारण भी बताता है, जो कविता के भावार्थ को समझने, सन्दर्भ को अनुमान से जानने और तर्क को समझने,मुहावरे को समझने के पर्याप्त अवसर देते हैं,यहाँ तक कि कई बच्चों ने तो कविता में निहित तुलनात्मक बिन्दुओं को भी पकड़ा और विश्लेषण भी किया। इस तरह एक छोटी-सी कविता भाषा के कई सारे उद्देश्य पूरे करती नजर आई।

कविता : बदला-बदला सा मौसम है ,बदले से लगते हैं सुर : प्रदीप शुक्ल की कविता से कुछ उदाहरण

मैं : अच्छा बताओ कविता को सुनकर क्या समझ आया ?

मनीष : गाँव और शहर के बारे में बताया गया है।

मैं : गाँव-शहर के बारे में क्या बात बताई है ?

मोहित : गाँव में इतनी भीड़ नहीं है जितनी शहर में होती है ।

मैं : भीड़ शहर में ज्यादा क्यों होती है ?

कोमल : मैं गाँव में तो खेतीबाड़ी का ज्यादा काम है तो शहर से गाँव में कोई नहीं आता लेकिन शहर में इसका उल्टा होता है।

मैं : शहर में किस तरह के काम हैं ?

पायल : शहर में कारखाने, बड़ी-बड़ी दुकानें (मॉल,बड़े बाजार) हैं जिसमें नौकरी के लिए लोग आते-जाते रहते हैं।

मैं : अब तो आपके गाँव में भी खूब दुकानें खुल गई है न ?

पायल : हाँ ! पर अब भी उतनी चीजें नहीं हैं।

मैं : क्या मतलब मैं समझी नहीं पायल। 

पायल : जैसे हमारे भैया लोग हैं न, उनको आगे पढ़ाई करनी थी तो उनको शहर ही जाना पड़ा गाँव में पढ़ने की सुविधा नहीं हो पाई।

मैं : अच्छा ! इसके अलावा और क्या-क्या अन्तर लगता है आपको ?

धनराज : जैसे कोई ज्यादा बीमार हो जाता है तो उसको भी जयपुर ले जाना पड़ता है। नहीं तो बीमारी बढ़ जाती है।

हिमांशु : हाँ अपने स्कूल का हनुमान बहुत बीमार हो गया था फिर उसको भी जयपुर ले गए थे फिर वो मर गया।

मैं : तो जयपुर ही क्यों जाना पड़ता हैं ?

कोमल :क्योंकि जयपुर शहर बड़ा है और वहाँ हर तरह की सुविधा ज्यादा है न इसलिए।

मैं : गाँव में और शहर में और किस तरह के परिवर्तन देखने को मिलते हैं ?

कमलेश : बस, कारें टैक्सी भी ज्यादा हैं और कमाने के लिए मौके भी हैं।

मैं : अच्छा यानी यातायात के साधन भी कह सकते हैं ....?

एक साथ सभी : हाँ, हाँ ।

मैं : अच्छा अब तुम सब इस कविता को एक बार फिर से पढ़कर देखो कि तुमने जो जो बातें बताई हैं उनमें से कौन-कौन सी बातें ये कविता भी कह रही है।

(इसके बाद सभी ने फिर से कविता को पढ़ा और अपनी अपनी बात के लिए कहा कि ये बात मैंने बताई थी जो इसमें है। जैसे : रोजगार,चिकित्सा,स्टेशन बस आदि)। फिर एक बात को मेरे द्वारा और जोड़ा गई कि इसमें देखो परिवार के विषय में भी बताया हैं एकल और संयुक्त। कविता की पंक्ति “सुरसतिया के दोनों बेटे सूरत गए कमाने को ” इस पर सरस्वती नामक महिला के अकेलेपन को बताकर एकल परिवार पर चर्चा की गई और गाँव में दादा-ताऊ-चाचा आदि के एक साथ एक जगह रहने और एक साथ खाना बनाने की बात से संयुक्त परिवार को समझाया गया। इस तरह योजना का क्रियान्वयन किया गया।

अब मुझे भी बल मिला, मैं रोज नई कविताएँ खोजने लगी। खुद उनकी राग बनाती ताकि अगले दिन नई धुन और लय–ताल के साथ उनको कक्षा-कक्ष की गतिविधि का हिस्सा बना सकूँ। और उसका भरपूर आनन्‍द ले और दे सकूँ। इसके बाद तो मानो सीखने–सिखाने के अवसर ही खुल गए थे।

अगली कविता थी ‘गिलहरी का घर’। इसका अगला कदम था कविता को समझना और उससे कहानी बनाना। अब हर बच्चा अपनी स्मृति के आधार पर कहानी बनाता है उससे भी पहले ध्यान से सुनने को आतुर रहता है। काम करते-करते बच्चे कहने लगते हैं हम गिलहरी का घर बनाकर लाएँगे। उन्होंने कक्षा की दीवार पर एक पेड़ बनाकर लगाया उसके पास गिलहरी,खरगोश,चिड़िया,बन्‍दर आदि जानवर भी लगा दिए और उसको नाम दिया “कविता पेड़”। एक छात्रा रिंकू तो गिलहरी के लिए बिस्तर भी बनाकर लाई। किसी से कहा नहीं गया पर अब वे खुद ही उत्साहित हो रहे हैं, जो उन्हें सृजन की ओर उन्मुख कर रहा है। जैसे ही कविता “वन श्री” का वाचन करवाया गया उन्‍होंने कहा अब हम इसके पास एक गाय और लगाएँगे। एक छात्रा बया का घोंसला रंगकर लेकर आई और उसे “कविता पेड़” के पास लगाया । पूछने पर बताया कि वन में तो पेड़ पर घोंसले भी तो होते हैं।

अगली कविता थी ‘पंपापुर जाना है हमको ...’ पंपापुर कविता में पंपापुर बच्चों की रंग - रंगीली दुनिया है, जहाँ सर्कस, खेल–तमाशे, कहानी, कविता और मस्ती की दुनिया है। सबके साथ मिलकर मैंने भी नाच-कूदकर कविता को गाया उस समय कक्षा में बच्चों का आनन्‍द देखने लायक था, जिसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है। उनके चेहरे की मुस्कुराहट और देर तक गूँजने वाले कविता के स्वर इस बात की पुष्टि करते हैं कि वे कविता के भावों को समझने और उसमें डूबने लगे हैं। इन कविताओं को वे अपने आप तैयार करके सुबह की बालसभा(assembly) में भी प्रस्तुत करते हैं। आत्मविश्वास के साथ कहते हैं कि आप सभी खड़े हो जाइए हम कविता को हाव भाव के साथ गाएँगे। कुछ उदाहरण 

कक्षा में जब कविता खत्म हो गई तो

मनीष(उत्साहित होकर) : पंपापुर कहाँ है ?

मैं : क्यों ? तुमको वहाँ जाना है क्या ?

मनीष : हाँ।

मनीष : मुझे वहाँ सर्कस,झूले,रंग बिरंगी दुनिया को देखना है।

मैं : अच्छा ! चलो एक बात बताओ वहाँ क्या क्या है तुमने कैसे जाना ?

मनीष : मैं इसमें आया है न वहाँ खूब रंग-बिरंगी दुनिया है वहाँ गुड़िया है, गुड्डा है,खेल–खिलौने हैं कहानियाँ सुनने को मिलती है और सर्कस भी दिखाते हैं। पंपापुर बच्चों की दुनिया है।

मैं : इसका मतलब तो तुम घूम आए हो।

मनीष : नहीं तो।

मैं : कविता में जिन बातों को बताया गया है उनसे तो आपको सब चीजों का अनुमान लग रहा है। हैं न !

सभी : हाँ हाँ।

मैं : आपको पता है इस तरह से हम कविता की सभी बातों की कल्पना कर रहे हैं और समझ रहे हैं कि पंपापुर किस तरह की दुनिया है।

इस तरह बच्चों को कल्पना और अनुमान लगाने का अभ्यास हो रहा था। अब बच्चों को कहा गया कि इस कविता पर अपने विचार लिखो तुमको क्या-क्या समझ आ रहा है। इस तरह लेखन अभ्यास करवाया गया।

हालाँकि बच्चे ने जो प्रश्न पूछा था कि “पंपापुर कहाँ है ?” का प्रत्युत्तर तो मेरे पास नहीं था। पर इतनी संतुष्टि मिल रही थी कि कविता ने बच्चों के मन को छू लिया है और शायद अब वह कविताओं को पढ़ना और उनका आनन्‍द लेना भी सीखेंगे। अब देखो न ! कितने भाषायी उद्देश्य पूरे हो रहे हैं। जो भाषायी क्षमता संवर्धन के लिए आवश्यक हैं।

एक समय के बाद जब हम बच्चा बनना, उछलकूद करना, खेलना, यहाँ तक कि खुलकर हँसना भी भूल जाते हैं तो वास्तव में जीवन की गति को धीमा कर लेते हैं। गलत भी क्या है? बड़े होने पर हम जाने–अनजाने में ऐसा ही सीख लेते हैं या हमारी जड़ों में यही जम सा जाता है। सिखाया भी तो यही जाता है! इसलिए बचपन शेष भी कहाँ रह जाता है? हर कोई ये ही समझने लगता है कि हमेशा बड़े ही बच्चों को सिखाते हैं बच्चे कब सिखाते हैं। लेकिन अगर बच्चों के साथ गहराई और बारीकी से जुडते हैं तो कई बार हम भी बच्चों से सीख रहे होते हैं और सोच और निर्णय निश्चित रूप से बदलने लगते हैं। बच्चों के साथ बच्चे बनकर सीखने-सिखाने का आनन्‍द ही कुछ और होता है जैसे मैंने सीखा कविता से सृजन की और कैसे बढ़े ? भाषा और रंग चित्रकारी और सामाजिक विज्ञान को कैसे जोड़ सकते हैं ये बताया। ऐसा लगता है कविता को बिना झिझके,मस्ती से गाने के लिए मुझे बच्चों ने ही तैयार किया हो ; ऐसा मैंने अनुभव किया।


प्रतिभा शर्मा, अज़ीम प्रेमजी स्कूल,टोंक, राजस्‍थान

 

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