अन्‍तरराष्ट्रीय प्रश्न पूछो दिवस

►मनोज कुमार

आज अन्‍तरराष्ट्रीय प्रश्न पूछो दिवस (International Ask a Question Day) है। इसका लक्ष्य लोगों को अधिक और बेहतर प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित करना है, ताकि वो मिलने वाले उत्तर से लभान्वित हो सकें।

एरिक हाफर का कहना था, “भाषा की खोज प्रश्न पूछने के लिए की गई थी। उत्तर तो संकेत और हाव-भाव से भी दिए जा सकते हैं, पर प्रश्न करने के लिए बोलना जरूरी है। जब मनुष्‍य ने सबसे पहले प्रश्न पूछा तो मानवता परिपक्व हो गई। प्रश्न पूछने के आवेग के अभाव से सामाजिक स्थिरता जन्म लेती है।”

चलिए आज प्रश्न-पूछो दिवस पर मेरा प्रश्न यह है कि हम प्रश्न क्यों पूछते हैं? कुछ प्रश्न तो जानकारी संग्रह करने के लिए किए जाते हैं। कई बार बिगड़ते सम्‍बन्‍ध को बनाए रखने के लिए भी प्रश्न किए जाते हैं। तुम नाराज क्यों हुए, ऐसा क्यों हुआ, वैसा क्यों नहीं हुआ। जहाँ कुछ प्रश्न सीखने के लिए किए जाते हैं, वहीं कुछ प्रश्न सिखाने के लिए भी किए जाते हैं। हाँ कई ऐसे भी लोग हैं जो इसका प्रयोग दूसरे का ज्ञान जाँचने-परखने के लिए करते हैं। कुछ लोग किसी तीसरे का सहारा लेते हैं, “देश जानना चाहता है ....!”

प्रश्न तो हर कोई पूछता है। लेकिन हममें से कुछ ऐसे लोग भी हैं जो जागरूकता बढ़ाने के लिए प्रभावशाली औजार के रूप में इसका इस्तेमाल करते हैं। सामाजिक समस्याओं और उनके समाधान और निर्णय प्राप्त करने के लिए भी कई बार हमें उन अवांछित प्रथाओं के विरुद्ध प्रश्न करने पड़ते हैं। समाज में न सिर्फ कई कुप्रथाएँ, बल्कि मनगढ़ंत बातें भी फलती-फूलती रहती हैं। इन्हें चुनौती देने के लिए भी प्रश्न उठते रहने चाहिए। कभी-कभी कुछ प्रश्नों पर गतिरोध हो जाता है, तो उस गतिरोध को दूर करने के लिए भी प्रश्न किए जाने चाहिए। गतिरोध कैसे दूर हो, इसके लिए नई सम्‍भावनाओं की तलाश के लिए भी प्रश्न होने चाहिए।

सही प्रश्न पूछना भी एक कला है। प्रश्न और प्रश्न पूछने की कला, शायद सबसे शक्तिशाली तकनीक है। जागरूकता और अभ्यास से ही कोई व्यक्ति असाधारण प्रश्न पूछने वाला बन सकता है। उत्सुकता हमारे पास एक महत्वपूर्ण औजार है। इसे हमेशा तराशते रहना चाहिए। कभी यह कुंद न हो। कोई प्रश्न पूछे तो उसे हतोत्साहित नहीं करना चाहिए। कई बार लोग प्रश्न पूछने वाले का यह कहकर मुँह बन्‍द कर देते हैं कि : क्या मूर्खतापूर्ण प्रश्न कर रहे हो। ऐसे लोगों को स्टीनमेज का यह कथन ध्यान में रखना चाहिए कि, “मूर्खतापूर्ण-प्रश्न, कोई भी नहीं होते और कोई भी तभी मूर्ख बनता है जब वह प्रश्न पूछना बन्द कर दे।” सबसे चालाक व्यक्ति जितना उत्तर दे सकता है, सबसे बड़ा मूर्ख उससे अधिक पूछ सकता है। जो प्रश्न पूछता है वह पाँच मिनट के लिये मूर्ख बनता है लेकिन जो नहीं पूछता वह जीवन भर मूर्ख बना रहता है।

हाँ यह सही है कि सही प्रश्न पूछना मेधावी बनने का मार्ग है। हमने देखा है कई विद्यार्थी प्रश्न पूछने में हिचकिचाते रहते हैं। उन्हें दोनों तरह की परेशानी होती है। एक तो वे प्रश्न को सही तरीके से बना ही नहीं पाते, दूसरे सटीक प्रश्न भी नहीं पूछ पाते। इसका परिणाम यह होता है कि जो वे जानना चाहते है, वह जवाब उन्हें नहीं मिल पाता।

हमें प्रश्न पूछते रहना चाहिए। प्रश्न पूछते रहने से जहाँ एक ओर हम नई-नई चीज़ें सीखते हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ लोग नई चीजों का ईजाद भी कर देते हैं। वैज्ञानिक मस्तिष्क उतना अधिक उपयुक्त उत्तर नही देता जितना अधिक उपयुक्त वह प्रश्न पूछता है। सेव गिरते तो पहले भी लोगों ने देखा होगा। पर उस वैज्ञानिक मस्तिष्क में ही यह बात समाई कि सेव नीचे ही क्यों गिरा? .. और हो गया ईजाद गुरुत्वाकर्षण का नियम।
 

रुडयार्ड किपलिंग ने कहा था, “मैं छह ईमानदार सेवक अपने पास रखता हूँ। इन्होंने मुझे वह हर चीज सिखाई है जो मैं जानता हूँ। इनके नाम हैं – क्या, क्यों, कब, कैसे, कहाँ और कौन।”

इसलिए प्रश्न पूछते रहना चाहिए, स्वयं से भी, दूसरों से भी। हाँ, इस बात का ध्यान अवश्य रखें, कि आपका प्रश्न न तो किसी को परेशान करने के लिए होना चाहिए और न ही किसी की विद्वता परखने के लिए।

तो आइए हम एक-दूसरे से तरह-तरह के प्रश्न पूछें?


मनोज कुमार की यह टिप्‍पणी उनकी फेसबुक दीवार से साभार।


 

और इस अवसर पर आप अपनी कक्षा में सवाल पूछने के लिए प्रेरित करने वाला यह गीत भी सुनवा सकते हैं :

क्‍यों ? क्‍यों ? क्‍यों ? : के. के. कृष्‍ण कुमार

हिन्‍दी रूपांतर : अरविन्‍द गुप्‍ता

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क्‍यों हैं आसमान में
चकमक करते तारे
और इंद्रधनुष में
रंग बिरंगे प्‍यारे

क्‍यों गुड़हल होता है
सुर्ख एकदम लाल
क्‍यों झिलमिल करता है
भूरी मकड़ी का जाल
क्‍यों ? क्‍यों ? क्‍यों ?

आम, नीम और इमली
क्‍यों एक जगह हैं ठहरे
क्‍यों समु्द्र में ऊँची
गिरती-पड़ती लहरें
कौए, तोते फर-फर
आसमान में उड़ जाते
क्‍यों नहीं मगर बिल्‍ली के
शरीर पर पंख उग आते
क्‍यों ? क्‍यों ? क्‍यों ?

क्‍यों जुगनू की पीठ पर
जलती हुई मशाल है
क्‍यों गेंडे हाथी की
पीठ उसकी ढाल है
क्‍यों पहाड़ की चोटी
सूनी और वीरान है
क्‍यों हँसती आँखों में
आँसुओं का सैलाब है
क्‍यों ? क्‍यों ? क्‍यों ?

क्‍यों छुट्टन अम्‍माँ संग
हर रोज धूप में खटता
दर-दर की जूठन से भी
क्‍यों उसका पेट न भरता
जरा ध्‍यान से सोचो
सोचो तो मेरे यार
किसकी साजिश हैं आखिर
यह सारे बम हथियार
क्‍यों ? क्‍यों ? क्‍यों ?

क्‍यों नहीं इन्‍हीं पैसों से
लोगों को राहत मिलती
जिससे सारी दुनिया की
भूखी तस्‍वीर बदलती
अपनी जुबान का ताला
अब वक्‍त आ गया खोलो
अपने सारे प्रश्‍नों को
बेधड़क खड़े हो बोलो
क्‍यों ? क्‍यों ? क्‍यों ?

जहाँ भी हो भ्रष्‍टाचार, अन्‍याय
या कहीं हो कोई शक
पूरे साहस और विश्‍वास से
तान के सीना पूछो बेधड़क
हर सवाल से पूछो
हर जवाब से पूछो
पूछो हरेक से एक बात
क्‍यों ? क्‍यों ? क्‍यों ?

यह गीत एकलव्‍य द्वारा प्रकाशित बालविज्ञान पत्रिका 'चकमक' के मार्च 1986 के अंक में प्रकाशित हुआ था। इसे के.के. कृष्‍णकुमार ने केरल शास्‍त्र साहित्‍य परिषद के लिए मलयालम में लिखा था।

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