अपशिष्ट और प्रबंधन

By Madhav Patel | May 24, 2019

अपशिष्ट और प्रबंधन

यदि वर्तमान परिदृश्य पर हम नजर डाले तो हम पाते है कि हमारा पर्यावरणीय संतुलन अस्थिर हो रहा है क्योंकि घरों ,खेतो,उद्योगों से निकलने वाले अपशिष्ट पदार्थ निरंतर पर्यावरणीय घटको को प्रभावित कर रहे है वास्तव में हमारे उपयोग के बाद जो अनुपयोगी पदार्थ शेष बचते है उन्हें अपशिष्ट कहते है अपशिष्ट का शाब्दिक अर्थ 'अवांछित ' और अनुपयोगी सामग्री होता है| "कोई भी पदार्थ जो की प्राथमिक उपयोग के बाद बेकार या दोषपूर्ण होने के कारण छोड़ दिया जाता है" उसे अपशिष्ट या अवांछित पदार्थ कहा जाता है यदि हम अपशिष्टों के प्रमुख प्रकारों को देखे तो पाते है कि निम्नलिखित अपशिष्ट बहुतायत में मिलते है
1 घरेलू अपशिष्ट – घरों से निकलने वाला कचरा घरेलू अपशिष्ट कहलाता है। जिसमें कागज, काँच, बोतल, डिब्बे, बेकार पड़े कपडे , रसोईघर में फल व सब्जियों का कचरा, अनुपयोगी खाद्य पदार्थ आदि आते हैं। पार्टियों के समय घरेलू अपशिष्ट की मात्रा बढ़ जाती है।

2 औद्योगिक अपशिष्ट – विभिन्न औद्योगिक इकाइयाँ ऊर्जा संयंत्र खनन प्रक्रियाएँ जो अपशिष्ट छोड़ते हैं। वे औद्योगिक अपशिष्ट कहलाते हैं। ये पर्यावरण प्रदूषण के मुख्य स्त्रोत होते हैं। इनके वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण,ध्वनि प्रदूषण एवं मृदा प्रदूषण आदि प्रदूषण होते हैं।

3. चिकित्सकीय अपशिष्ट – अस्पतालों से निकले अपशिष्ट जैसे काँच, प्लास्टिक की बोतलें, ट्यूब, सीरिंज आदि अजैव निम्नीकरणीय अपशिष्ट है इसके अलाव जैव निम्नीकरणीय अपशिष्ट जैसे रक्त, मांस के टुकड़े, संक्रमित उत्तक व अंग अनेक रोगों के संक्रमण हेतु माध्यम प्रदान करते हैं

4. कृषि अपशिष्ट – कृषि में अधिक उत्पादन के लिए अधिक मात्रा में प्रयोग में लिए गए उर्वरक , कीटनाशी, शाकनाशी, कवक नाशी आदि रसायनों से पर्यावरणीय प्रदूषण होता है। अनुपयोगी भूसा, घास-फूस,फसल अपशिष्ट, पत्तियाँ आदि एकत्रित होने पर वर्षा जल से सडऩे वाले कृषि अपशिष्ट होते हैं और इनमें होने वाली जैविक क्रियाओं से प्रदूषण होता है।कृषि कार्य मे उपयोग होने वाले रासायनिक दवाइयां जिनका फसलो पर छिड़काव होता है वारिश के पानी के साथ जल स्त्रोतों को प्रदूषित करता है।
वर्तमान की आवश्यकता और विकास को देखते हुए इन सबके उपयोग को रोका तो नही जा सकता परंतु उनके अपशिष्टों का प्रबंधन जरूर किया जा सकता है पर्यावरण की सुरक्षा हेतु ये करना ही होगा विकास को उचित दिशा देकर अपशिष्ट रहित विकास की कल्पना को मूर्तरूप दिया जाना तथा जीवन और पर्यावरण के अन्योन्य संबंध का निर्धारण करना। अपशिष्ट प्रबंधन में ठोस, तरल, गैस या रेडियोधर्मी पदार्थ आदि को अलग-अलग तरीको और विशेषज्ञता से प्रयोग में लाना अपशिष्ट प्रबंधन कहलाता है।
अलग-अलग क्षेत्रों में अपशिष्ट पदार्थ के प्रकार और उपलब्धता के आधार पर अपशिष्ट प्रबंधन के तरीके भिन्न-भिन्न हो सकते हैं-
भूमिभराव, पुनर्चक्रण , भस्मीकरण, रासायनिक क्रिया आदि तरीको से अपशिष्ट पदार्थों का निस्तारण किया जाता है।

1 घरेलू अपशिष्ट प्रबंधन-
3-आर की अवधारणा: घरों और उद्योगों द्वारा उत्पन्न होने वाले अपशिष्टों की चुनौतीपूर्ण प्रकृति को ध्यान में रखते हुए, 3आर के मंत्र रीयूज, रीडयूस और रीसायकल का पालन करना चाहिए। अतः अपशिष्ट पदार्थो के हानिकारक प्रभाव को कम करने के लिए इन विकल्पों को सुचारु रुप से लागू करने पर ध्यान दिया जाना चाहिए। साथ ही घरों से निकलने वाले कचरे से रिसाइक्लिंग वाले पदार्थ को अलग कर लेना चाहिए फिर शेष को एक गड्ढे में जमा करना चाहिए जिससे बारिश का पानी इन अपघटित होने वाले पदार्थों को खाद में बदल दे

2 औधोगिक अपशिष्ट प्रबंधन
उद्योगो द्वारा अपशिष्ट प्रबंधन के कार्य को सरल बनाकर और अपने अपशिष्ट प्रबंधन को केंद्रीकृत करके इस कार्य में बहुत महात्वपूर्ण भूमिका निभायी जा सकती है। कंपनिया अपने द्वारा उतपन्न खतरनाक कचरे का संचालन और परिवहन करके सुरक्षित रुप से कचरे का निस्तारण करे जिससे वह शून्य अपशिष्ट लैंडफिल के लक्ष्य को हासिल कर सके।

3 चिकित्सकीय अपशिष्ट प्रबंधन-

• स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं (एच.सी.एफ) को जैव चिकित्सा अपशिष्ट की श्रेणी के अनुसार रंगीन थैलियों-पीली, लाल, नीली/सफेद और काली जैव चिकित्सा अपशिष्ट अलग-अलग करना चाहिए।

• वे 48 घंटे तक इस अपशिष्ट को भंडारित कर सकते हैं इसके बाद या तो मौके पर इसका उपचार करें
• साझा जैव चिकित्सा अपशिष्ट उपचार सुविधा (सी.बी.एम.डब्ल्यू.एफ) से कार्यकर्ता इसे एकत्र करे फिर सी.बी.एम.डब्ल्यू.एफ थैली के रंग के अनुसार अपशिष्ट का उपचार करे अलग-अलग रंग अलग-अलग प्रकार के उपचार-भस्मीकरण, गहराई में दफन करना, ऑटोक्लेविंग, श्रेडिंग, रासायनिक उपचार, गडढे में निपटान, आदि करना चाहिए है

4 कृषि अपशिष्ट प्रबंधन-
कृषि क्षेत्रफल और उत्पादन बढ़ने के साथ फसलों के व्यर्थ अवशेष किसानों के लिए विकट समस्या है। अपशिष्ट प्रबंधन की योजनाएं बनी तो जरूर हैं लेकिन अपने कार्यरूप में आई नहीं है।
योजनाओं के कार्यरूप में नहीं आने के कारण मजबूरी वश फसल अवशेष जलाने जैसे कदम किसानों को उठाने पड़ते हैं।
बायो खाद और बायो ऊर्जा जैसी योजनाएं व्यापक स्तर पर अपनायी जाती तो प्रदूषण न बढ़ता और न ही मिट्टी की उर्वरता कम होती।
कृषि अपशिष्ट प्रबंधन हेतु
देश में कई स्थानों पर बायोमॉस इंडस्ट्री स्थापित की गयी है। जिसमें किसानों से कृषि अवशेष खरीद कर उपयोग में लाया जाएगा।
इससे किसानों की आय बढ़ने के अलावा प्रदूषण समस्या पर भी अंकुश लगेगा।
अतः इसी तरह कृषि अपशिष्ट से बायो ऊर्जा को बढ़ावा देने वाली योजनाओं को प्रोत्साहित करने की जरूरत है।
उर्वरक खर्च में बचत
खेतों में अवशेष से कम्पोस्ट तैयार की जाए तो उससे 1.87 प्रतिशत नाइट्रोजन 3.43 प्रतिशत फॉस्फोरस और 0.45 प्रतिशत पोटॉश की आपूर्ति हो सकती है।
फसल कटाई के बाद अवशेष पत्ती और फसल के ठूंठ को सड़ने के कल्टीवेटर या रोटावेटर से मिलाने से आगे बोई जाने वाली फसल पैदावार में 10-20 प्रतिशत तक वृद्धि होती है।
गड्ढों में फसल अपशिष्टों को जमा करने से कम्पोस्ट खाद बनता है।

केंचुआ कृषकों का मित्र एवं 'भूमि की आंत' कहा जाता है। यह सेन्द्रिय पदार्थ (ऑर्गैनिक)ह्यूमस व मिट्टी को एकसार करके जमीन के अन्दर अन्य परतों में फैलाता है इससे जमीन खोखली होती है व हवा का आवागमन बढ़ जाता है, तथा जलधारण की क्षमता भी बढ़ जाती है। केचुँए के पेट में जो रासायनिक क्रिया व सूक्ष्म जीवाणुओं की क्रिया होती है, उससे भूमि में पाये जाने वाले नत्रजन, स्फुर (फॉस्फोरस), पोटाश, कैलशियम व अन्य सूक्ष्म तत्वों की उपलब्धता बढ़ती है। ऐसा पाया गया है कि मिट्टी में नत्रजन 7 गुना, फास्फोरस 11 गुना और पोटाश 14 गुना बढ़ता है।
केचुँए न केवल जमीन को सुधारने एवं उत्पादकता वृद्धि में सहायक होते बल्कि इनके साथ सूक्ष्म जीवाणु, सेन्द्रित पदार्थ, ह्यूमस इनका कार्य भी महत्वपूर्ण है। केंचुआ खाद या वर्मीकम्पोस्ट (Vermicompost) पोषण पदार्थों से भरपूर एक उत्तम जैव उर्वरक है। यह केंचुआ आदि कीड़ों के द्वारा वनस्पतियों एवं भोजन के कचरे आदि को विघटित करके बनाई जाती है।
इस खाद को तैयार करने में प्रक्रिया स्थापित हो जाने के बाद एक से डेढ़ माह का समय लगता है।
प्रत्येक माह एक टन खाद प्राप्त करने हेतु 100 वर्गफुट आकार की नर्सरी बेड पर्याप्त होती है।
केचुँआ खाद की केवल 2 टन मात्रा प्रति हैक्टेयर आवश्यक है।

वर्मीबैड बनाना
जमीन पर वर्मीबैड बनाने के लिये सर्वप्रथम सूखी डंठलों एवं कचरे को बैड की लम्बाई-चौड़ाई के आकार में बिछा दें। इस पर सब प्रकार के मिश्रित कचरे, जिसमें सूखा कचरा, हरा कचरा, किचन वेस्ट, घास, राख इत्यादि मिश्रित हो, उसकी करीब 4 इंच मोटी परत बिछा दें। इस पर अच्छी तरह पानी देकर उसे गीला कर दें। इसके ऊपर सड़ा हुआ अथवा सूखे गोबर के खाद की 3-4 इंच मोटी परत बिछा दें। इसे भी पानी से गीला कर दें।
पानी का हल्का-हल्का छिड़काव करना है बहुत अधिक पानी डालना आवश्यक नहीं। इस पर 1 वर्गमीटर में 100 के हिसाब से स्थानीय अथवा एक्सोटिक प्रजाति के जो भी केंचुए उपलब्ध हो वे छोड़े जा सकते हैं। इसके ऊपर पुनः हरी पत्तियों का 2-3 इंच पतला परत देकर पूरे वर्मीबैड को सूखी घास अथवा टाट की बोरी से ढँक दिया जाता है। मेंढक, मुर्गियों अथवा अन्य पक्षियों एवं लाल चीटिंयों से वर्मीबैड को बचाना आवश्यक है।
इस प्रकार वर्मीबैड बनाने के बाद पुनः कचरा डालने की आवश्यकता नहीं है। इस वर्मीबैड से कुछ दूरी पर इसी तरह कचरा एकत्र करके दूसरा वर्मीबैड तैयार कर सकते हैं। करीब 40-50 दिन बाद जब पहले वर्मीबैड खाद तैयार हो जाता है, तब उसमें पानी देना बन्द कर देते हैं व कल्चर बॉक्स की तरह ही इसमें से धीरे-धीरे ऊपर का खाद निकाल लिया जाता है। नीचे की तह खाद जिसमें सारे केंचुए होते हैं उसे दूसरे वर्मीबैड पर डाल दिया जाता है ताकि उसमें वर्मीकम्पोस्ट की क्रिया आरम्भ हो जाये। ताजे निकाले गए वर्मीकम्पोस्ट के ढेर को भी वर्मीबैड के नजदीक ही रखा जाता है व उसमें पानी देना बन्द कर देते हैं। नमी की कमी की वजह से उसमें से केंचुए धीरे-धीरे नजदीक के वर्मीबैड में चले जाते हैं वर्मीकम्पोस्ट खेत में डालने के लिये तैयार हो जाता है। इस खाद में जो केंचुए के छोटे-छोटे अंडे व बच्चे होते हैं उनसे जमीन में प्राकृतिक रूप से केंचुओं की संख्या बढ़ती है।
केचुआ खाद भूमि की उर्वरकता, वातायनता को तो बढ़ाता ही हैं, साथ ही भूमि की जल सोखने की क्षमता में भी वृद्धि करता हैं।
वर्मी कम्पोस्ट वाली भूमि में खरपतवार कम उगते हैं तथा पौधों में रोग कम लगते हैं।
पौधों तथा भूमि के बीच आयनों के आदान प्रदान में वृद्धि होती हैं।
वर्मी कम्पोस्ट का उपयोग करने वाले खेतों में अलग अलग फसलों के उत्पादन में 25-300% तक की वृद्धि हो सकती हैं।
मिट्टी में पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ जाती हैं।
वर्मी कम्पोस्ट युक्त मिट्टी में नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश का अनुपात 5:8:11 होता हैं अतः फसलों को पर्याप्त पोषक तत्व सरलता से उपलब्ध हो जाते हैं।
केचुओं के मल में पेरीट्रापिक झिल्ली होती हैं, जो जमीन से धूल कणों को चिपकाकर जमीन का वाष्पीकरण होने से रोकती हैं।
केचुओं के शरीर का 85% भाग पानी से बना होता हैं इसलिए सूखे की स्थिति में भी ये अपने शरीर के पानी के कम होने के बावजूद जीवित रह सकते हैं तथा मरने के बाद भूमि को नाइट्रोजन प्रदान करते हैं।
वर्मी कम्पोस्ट मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों की वृद्धि करता हैं तथा भूमि में जैविक क्रियाओं को निरंतरता प्रदान करता हैं।
इसका प्रयोग करने से भूमि उपजाऊ एवं भुरभुरी बनती हैं।
यह खेत में दीमक एवं अन्य हानिकारक कीटों को नष्ट कर देता हैं। इससे कीटनाशक की लागत में कमी आती हैं।
इसके उपयोग के बाद 2-3 फसलों तक पोषक तत्वों की उपलब्धता बनी रहती हैं।
मिट्टी में केचुओं की सक्रियता के कारण पौधों की जड़ों के लिए उचित वातावरण बना रहता हैं, जिससे उनका सही विकास होता हैं।
यह कचरा, गोबर तथा फसल अवशेषों से तैयार किया जाता हैं, जिससे पर्यावरण प्रदूषित नहीं होता हैं।
इसके प्रयोग से सिंचाई की लागत में कमी आती हैं।
लगातार रासायनिक खादों के प्रयोग से कम होती जा रही मिट्टी की उर्वरकता को इसके उपयोग से बढ़ाया जा सकता हैं।
इसके प्रयोग से फल, सब्जी, अनाज की गुणवत्ता में सुधार आता हैं, जिससे किसान को उपज का बेहतर मूल्य मिलता हैं।
केंचुए में पाए जाने वाले सूक्ष्मजीव मिट्टी का pH संतुलित करते हैं।
उपभोक्ताओं को पौष्टिक भोजन की प्राप्ति होती हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में इसके उपयोग से रोजगार की संभावनाएं उपलब्ध हो जाती हैं।
यह बहुत कम समय में तैयार हो जाता हैं।
केंचुए नीचे की मिट्टी को ऊपर लाकर उसे उत्तम प्रकार की बनाते हैं।
केंचुआ खाद के उपयोग में सावधानियाँ
जमीन में केचुँआ खाद का उपयोग करने के बाद रासायनिक खाद व कीटनाशक दवा का उपयोग न करें।
केचुँआ को नियमित अच्छी किस्म का सेन्द्रिय पदार्थ देते रहना चाहिये।
उचित मात्रा में भोजन एवं नमी मिलने से केचुँए क्रियाशील रहते है।
अपशिष्ट प्रबंधन के लाभ
प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा
वनो, गैसों और पानी जैसे कई प्राकृतिक संसाधनों की घटती समस्या हमारे लिए गंभीर चिंता का विषय बन गयी है। हम सभी यह जानते हैं कि पेपर, अलमारी, पेपर कप और कई अन्य उत्पाद पेड़ो की लकड़ी से बने होते हैं और इसीलिए प्रत्येक वर्ष बड़े पैमाने पर वनों की काटाई भी की जाती है। अततः हमें पेपर उत्पादों की पुनरावृत्ति करनी चाहिए ताकि पेड़ों को काटने की इस प्रक्रिया को रोका जा सके। हमें प्लास्टिक और धातु से बने वस्तुओं का पुन: उपयोग करना चाहिए। कुछ देशों ने उत्पादों के पुनर्नवीनीकरण और पुनरावृत्ति के लिए निर्माण-स्थान या भराव क्षेत्रों की स्थापना की है जहां लोग अपने पुराने समाचार पत्र, धातु या अन्य वस्तुओं को ला सकते हैं और उनका पुनर्नवीनीकरण कर सकते हैं।

ऊर्जा का उत्पादन
पुनरावृत्ति ऊर्जा का उत्पादन करने का एक शानदार तरीका है। एक नई वस्तु का उत्पादन करने के लिए आमतौर पर अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है, इसीलिए हम कभी-कभी वस्तुओ की पुनरावृत्ति करने में कुछ ऊर्जा को बचा लेते हैं औऱ कुछ ऊर्जा अपशिष्ट के पुनरावृत्ति द्वारा प्राप्त करना संभव हो जाता है। प्रयोंगो से यह पता चला है कि हमारे घरो के अपशिष्ट पदार्थों को एक विशेष प्रणाली के द्वारा बिजली उत्पन्न में प्रयोग किया जा सकता है, इस प्रणाली में सबसे पहले, शुष्क और गीले कचरे अलग कर दिये जाते हैं। कचरे की पुनरावृत्ति प्रणाली प्रक्रिया का उपयोग बड़े घरों में बिजली उत्पादन के लिए किया जा रहा है।

प्रदूषण में कमी
प्रकृति और मानवता को बचाने के लिए वस्तुओं की पुनरावृत्ति करना सबसे शक्तिशाली तरीका माना जाता है। इसीलिए हमें लोगों को इसके बारे में अधिक से अधिक जागरूक करना चाहिए। जितना अधिक लोग अपने अपशिष्टों का प्रबंधन शुरू करगे उतना ही अधिक वो बेहतर पर्यावरण के निर्माण में अपनी भागीदारी निभा पायेगें। अत्यधिक अपशिष्ट मुक्त करने के साथ-साथ मानव विभिन्न उत्पादों, फैक्ट्री निर्माण प्रक्रियाओं तथा धूम्रपान के द्वारा वायुमंडल को काफी हद तक प्रदूषित कर रहे है। वहीं पुनरावृत्ति की प्रक्रिया प्रदूषण को कम करने तथा ऊर्जा को बचाने में भी मददगार है।

अपशिष्ट पुनरावृत्ति
अपशिष्ट जलीय जीवन के लिए भी एक बड़ी समस्या है। बहुत सारे अपशिष्ट समुद्र और महासागर में फेंक दिये जाते है। हर जगह से जमा किए गए कचरे के ढ़ेर को एक बड़े से कचरे के मैदान में फेक दिया जाता है जिसे "अपशिष्ट द्वीप" कहा जाता है। प्रकृति और मानवता के लिए अपशिष्टों की पुनरावृत्ति करने की प्रक्रिया को महत्वपूर्ण माना जाता है। हालांकि पुनरावृत्ति अपशिष्ट प्रबंधन के साथ प्रारंभ होता है। जैसे कागज के वस्तु कागज वाले तथा ग्लास के वस्तु को ग्लास बिन में पुनरावृत्ति के लिए इकट्ठा किया जाता है।

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